Covid-19 : कोरोना पैनिक से बचने के लिए सही सोचें

 

एक नन्हा सा दिया भले ही वो किसी भी कारण किसी भी उद्देश्य से जलाया जाए पूरे मार्ग का अंधियारा हरता है …गौतम बुद्ध

 

आज हम सब ऐसे दौर में हैं जब एक नन्हा सा वायरस COVID-19 पूरे विश्व की स्वास्थ्य पर, अर्थ पर और चेतना पर हावी है| पूरे विश्व में संक्रमित व्यक्तियों व् मृत रोगियों के लगातार बढ़ते आंकडे हमें डरा रहे हैं| हम  चाहते ना चाहते हुए भी बार-बार न्यूज़ देख रहे हैं| निरीह हो कर देख रहे हैं कि एक नन्हे से विषाणु ने पूरे विश्व की रफ़्तार के पहिये थाम दिए हैं| कल तक ‘ग्लोबल विलेज’ कहने वाले हम आज अपने घरों में सिमटे हुए हैं| देश के कई शहर लॉक डाउन हैं| कल तक हम सब के अपने-अपने सपने थे, आशाएं थीं, उम्मीदें थीं पर आज हम सब का एक ही सपना है कि हम सब सुरक्षित रहे और सम्पूर्ण मानवता इस युद्ध में विजयी हो| इन तमाम प्रार्थनाओं के बाद हम ये भी नहीं जानते कि ये सब कब तक चलेगा| जिन लोगों को एकांत अच्छा लगता था वो भी बाहर के सन्नाटे से घबरा रहे हैं| ऐसे में हम तीन तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं| यहाँ मैं किसी प्रतिक्रिया के गलत या सही होने की बात न कर के मनुष्य की विचार प्रक्रिया पर बात करके उसे सही विचार चुनने की बात कह रही हूँ|

 

मैं और मेरा परिवार सुरक्षित रहे बाकी दुनिया…

इस क्राइसिस से पहले  हममें से कई लोग बहुत अच्छे थे| पूरी दुनिया के बारे में  सोचते थे| आज वो केवल अपने और अपने परिवार के बारेमें सोच रहे हैं| ये वो लोग हैं जो ६ महीने का राशन जमा कर रहे हैं| अमेरिका में टॉयलेट पेपर तक की कमी हो गयी| ये वो लोग हैं जो बीमारों के लिए सैनिटाईजर्स की कमी हो गयी है अपने ६ महीने के स्टोर से कुछ देने नहीं जायेंगे| हो सकता है कि ये बीमारना पड़ें| इनके सारे सैनीटाईज़र्स यूँ ही ख़राब हो जाए| खाने –पीने की चीजें सड़ जाएँ पर किसी संभावित आपदा से निपटने के लिए ये सालों की तैयारी कर के बैठे हैं| बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि ये लोग समाज के दोषी हैं पर मैं ऐसा नहीं कह  पाऊँगी …कारण है हमारा एनिमल ब्रेन|

 

मनुष्य का विकास एनिमल या जानवर से हुआ है | क्योंकि जंगलों में हमेशा जान का खतरा रहता था इसलिए दिमाग ने एक कला विकसित कर ली, संभावित खतरों का पूर्वानुमान लगा कर खुद को सुरक्षित करने की| ये कला जीवन के लिए सहायक है और मनुष्य को तमाम खतरों से बचाती भी है|परन्तु ऐसे समय में जब हम जानते हैं कि खाने पीने के सामानों की ऐसी दिक्कत नहीं आने वाली हैं किसी एक व्हाट्स एप मेसेज पर, किसी एक दोस्त के कहने पर, किसी एक न्यूज़ पर दिमाग का वो हिस्सा एक्टिव हो जाता है और व्यक्ति बेतहाशा खरीदारी करने लगता है| हममे से कई लोगों ने इन दिनों इस बात को गलत बताते हुए भी  मॉल में लगी लंबी लाइनों को देखकर खुद भी लाइन में लग जाना बेहतर समझा होगा| भले ही हम उस समय खाली दूध या कोई एक सामान लेने गए हों और खुद भी पैनिक की गिरफ्त में आ गए | इधर हमने भरी हुई दुकानों में  एक दिन में पूरा राशन खाली होते हुए देखा है|

 

हम तो आपस में ही पार्टी करेंगे-

दूसरी तरह के लोग जिन्हें हम अति सकारात्मक लोग कहते हैं| पॉजिटिव-पॉजिटिव की नयी थ्योरी इनके दिमाग में इस कदर फिट है कि इन्हें हर समय जोश में भरे हुए रहना अच्छा लगता है| पॉजिटिव रहने का अर्थ  ये नहीं होता है कि आप सावधानी और सतर्कता  के मूल मन्त्र को भूल जाएँ| जब की सकारात्मकता का आध्यात्मिक स्वरुप हमें ये सिखाता है कि आप जो भी काम करें पूरी तन्मयता और जागरूक अवस्था में करें, अवेयरनेस के साथ करें| शांत रहने का अर्थ नकारत्मक होना नहीं है| एक बार संदीप माहेश्वरी जी ने कहा था कि सक्सेस-सकस भी एक अवगुण है| आम तौर पर लोग अटैचमेंट नहीं सीख पाते | लेकिन जो लोग सक्सेस के प्रति अटैच्ड हो जाते हैं उनके दिमाग में चौबीसों घंटे सक्सेस सक्सेस या काम –काम चलता रहता है| अपने बिजनेस को आगे बढ़ाना रात और सपनों में भी चलता रहता है| यही स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है| जितना अटैच होना सीखना पड़ता है उतना ही डिटैच होना भी | कब आप स्विच ओं कर सकें कब ऑफ कर सकें | अति सकारात्मकता  भी यही प्रभाव उत्प्प्न करती है | अगर व्यक्ति चौबीसों घंटे सकारात्मक रहेगा तो उसका दिमाग सतर्क रहने वाला स्विच ऑफ़ कर देगा| यही हाल कोरोना व्यारस के दौर में हमें देखने को मिल रहा है| जब पूरा शहर लॉक डाउन किया गया है तो कुछ लोग जबरदस्ती अपने घर में दूसरों को बुला रहे हैं | पार्टी कर रहे हैं | पुलिस को धत्ता बता कर ये ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि ये एक –एक कर लोगों को घर बुलाते हैं | जब २५ -३० लोग इकट्ठा हो जाते हैं तब पार्टी शुरू होती है| इनका कहना होता है कि बिमारी –बिमारी सोचने से नकारात्मकता फैलती है|

 

अगर समझाओं  तो भी इनका कहना होता है कि अगर मैं मरुंगा तो मैं मरूँगा …इससे दूसरे को क्या मतलब | सकार्त्मकता के झूठे लबादे ने इनका सत्रकता वालादिमागी स्विच ऑफ कर दिया है | जो इन्हें खुद खतरे उठाने को विवश करता है और सामुदायिक भावना के आधीन हो सामाजिक जिम्मेदारी की अवहेलना के प्रति उकसाता है| ऐसे ही कुछ अति सकारात्मक लोगों द्वारा प्रधानमंत्री द्वारा आवश्यक सेवाओं में लगे लोगों को धन्यवाद ज्ञापन के आह्वान को ध्वनि तरंगों के विगन से जोड़ देने का नज़ारा हम कल २२ मार्च को आम जनता के बीच देख चुके हैं | जब जनता जुलुस के रूप में सड़कों पर उतर आई | इसके पीछे व्हाट्स एप में प्रासारित ये ज्ञान था| हमें पता है कि आम जनता में समझ अभी इतनी नहीं है| वो वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध करे गए ऐसे व्हाट्स एप ज्ञान से प्रभावित हो जाती है| ऐसे में इन अति सकारात्मक लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी|

 

उन्हें समझना होगा कि जब कोई शराब पी कर कहता है कि ये मेरी जिन्दगी है मैं इसे चाहें जैसे जीयूं या खत्म करूँ तो वो अपने परिवार को भी खत्म कर रहा होता है| परन्तु महामारी में ये सोच उसके परिवार के लिए ही नहीं समस्त मानवता के लिए खतरा है | हो सकता है जो अपने को स्वस्थ समझ रहा हो उसके अंदर भी कीटाणु हों वो दूसरों को फैला दे| हो सकता है वो स्वस्थ हो जाये पर जिसको फैलाया है उसकी मृत्यु हो जाए| यहाँ मेरी जिन्दगी सिर्फ मेरी जिन्दगी है कहने से काम चलेगा  न ही  यह कहने से कि मैं तो छोटी सी पार्टी कर रहा हूँ | कहा नहीं जा सकता कि आप सुबह स्वस्थ महसूस कर रहे हों और शाम को अस्वस्थ हो जाएँ |

 

सम्यक सोच विकसित करें 

महामारी और इससे उपजी तमाम विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए सम्यक सोच अपनाने की जरूरत है| न तो इतने साकारात्मक हो जाएँ कि छोटे –मोटे गेट टुगेदर करने लगें | ना ही इतने नकारात्मक की चीजों का जमावड़ा करने लगें| जरूरी है कि इस तरह सोचें …

  • मैं सेल्फ आइसोलेशन को गंभीरता सेलूँगा /लूँगी | जब तक कोई क्रिटिकल इमरजेंसी ना हो अनावश्यक घर से बाहर नहीं निकलना है | अगर जरूरी पड़ें तो मास्क लगा कर सैनिटाई जार का इस्तेमाल करते हुए निकलना है | घर आ कर साबुन से हाथ पाँव धो कर कपड़े बदलने हैं | हो सका है ये हफ़्तों की नहीं महीनों की बात हो पर ये वक्त भी गुज़र जाएगा |
  • मुझे व्हाट्स आइप या न्यूज़ को बहुत देर तक देखने से खुद को दूर रखना है | बार –बार न्यूज़ देखने से पैनिक होने का खतरा है| मुझे उचित सोर्स से दिन में एक दो बार ही न्यूज़ देखनी है| अप चाहें तो यहाँ से न्यूज़ समरी देख सकते हैं |
  • मुझे इस समय का उपयोग रचनात्मक काम करने में करना है | ताकि मेरा मन भी लगा रहे और कुछ अच्छा हो सके | जैसे सिलाई, कढ़ाई, अच्छा खाना बनाना, गार्डनिंग, लेखन आदि आदि|
  • भविष्य के लिए ऑनलाइन जॉब्स के बारे में सोचा जा सकता है|उसके लिए जरूरी तैयारी की जा सकती है |
  • अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिताया जा सकता है |परिवार के साथ कैरम, ताश, अन्ताक्षरी आदि खेले जा सकते है | फोन पर रिश्ते सुधारे जा सकते हैं |

मित्रों हम सब इस आपदा में हैं पर जरूरी है कि हिम्मत ना टूटे, साथ ना छूटे |

वंदना बाजपेयी

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FILED UNDER- COVID-19, CORONA VIRUS, CORONA PAINIK

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