गुजरे हुए लम्हे -अध्याय एक

 

हम सब का जीवन एक कहानी है पर हम पढ़ना दूसरे की चाहते हैं | कोई लेखक भी अपनी कहानियों में अपने आस -पास की घटनाओं को संजोता है | कोई लेखक कितनी भी कहानियाँ लिखे उसमें उसके जीवन की छाया या दृष्टिकोण रहता है ही है| आत्मकथा उनको परदे में ना कह  कर खुल कर कहने की बात है | आत्मकथा लेखन में ईमानदारी की बहुत जरूरत होती है क्योंकि खुद के सत्य को उजागर करने के लिए साहस चाहिए साथ ही इसमें लेखक को कल्पना को विस्तार नहीं मिल पाता | उसे कहना सहज नहीं होता | बहुत कम लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं | बीनू दी ने यह साहसिक कदम उठाया है | इस आत्मकथा “गुज़रे हुए लम्हे “को आप अटूट बंधन.कॉम पर एक श्रृंखला के रूप में पढ़ पायेंगे |

 

 

अध्याय 1

शैशव व कुछ घबराया सा बचपन

(बुलंदशहर1947-56)

 

1947  सितम्बर  का महीना अफरा तफरी का माहौल, स्वतंत्रता मिलने  की ख़ुशी और विभाजन की त्रासदी, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा शहर………… बुलंदशहर ,वहाँ श्री त्रिलोकीनाथ भटनागर का परिवार  जहाँ से ये कहानी शुरू हुई। श्री त्रिलोकी नाथ के बहुत से रिश्तेदार पाकिस्तान की तरफ रहते थे,  जिन्होंने आकर उनके यहाँ शरण ली थी।  करीब पन्द्रह बीस लोग तो अवश्य वहाँ आये हुए थे ,उनकी हर तरह से देख भाल की ज़िम्मेदारी त्रिलोकीनाथ जी और उनकी पत्नी की थी। त्रिलोकी नाथ जी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से इंजीनियर थे, और बिजली  वितरण  की एक कंपनी में उच्चाधिकारी थे।ज़िलाधिकारियों से उनकी अच्छी जान पहचान,उठना बैठना था। संपन्न परिवार था,रिश्तेदार उनके यहाँ चाहें जितने समय तक रह सकते थे। काम करने के लिये भी नौकरों चाकरों  की कमी  नहीं थी।

त्रिलोकी नाथ जी की तीन संतानें थी सबसे बड़े रवींद्रनाथ उस समय 16 वर्ष के थे, बेटी कुसुम 13 साल की और छोटे बेटे सुरेंद्र नाथ 11 साल के थे। 11साल बाद उनकी पत्नी फिर गर्भवती थीं, इस समय बहुत बड़ा घर भी मेहमानों से भरा हुआ था इसलिये वे अधिक आराम भी नहीं कर पाती थीं। 14  सितम्बर की रात में शील भटनागर जी ने एक बेटी को जन्म दिया। जी हाँ, आपने सही समझा,  ये मैं ही हूँ, जिसने बटवारे और आज़ादी मिलने के बाद दुनिया में कदम रखा। श्री त्रिलोकीनाथ और श्रीमती शील भटनागर की सबसे छोटी संतान।

 

अब मैं अपनी कहानी अपनी ज़ुबानी कहूँगी। मेरे दादा दादी का घर अंबाला में था , परंतु वे मेरे जन्म से बहुत पहले परलोक सिधार गये थे, दादा जी वकील थे अंबाला में बहुत अच्छी प्रैक्टिस थी, वहाँ के धनी लोगों में से एक थे ,उनकेएक बेटीऔर तीन बेटे थे । मेरे पिताजी सबसेछोटेऔर सबसेकाबिलथे । छोटे ताऊ जी भी वकील थे ,अच्छा कमाते थे ,पर कुछ बुरी आदतों की वजह से कभी सुख चैन से अपनी गृहस्थी सही तरीके से नहीं संभाल पायेथे। भुआ जल्दी ही गुज़र गईं थीं,बड़े ताऊ जी को भी मैंने नहीं देखा था,हाँ दोनों ताई जी की याद हैं।

 

माँ को मैं मम्मी ही कहती थी,  वे दो बहने थीं, बड़ी बहन की युवावस्था में ही मृत्यु हो गई थी इसलिये हमें हमेशा यही लगा कि वे अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। नानाजी बुलंदशहर के पास ही एक कस्बे सिकंद्राबाद में रहते थे। वे एक स्कूल में अध्यापक थे, छात्रावास के वार्डन भी थे। आसपास पास के गाँव  से बच्चे आकर छात्रावास में रहते थे ।गाँवों के बच्चों के लिये छोटे कस्बों के मामूली स्कूलों में भी  उन दिनों छात्रावास की व्यवस्था होती  थी। नानाजी के छात्रावास में एक लड़का चोखे  लाल काम करता था, ये आगे जाकर हमारे परिवार का अहम हिस्सा बना , इस वजह से इनका यहाँ जिक्र किया है। मेरे नानाजी बहुत संपन्न नहीं थे, पर कोई कमी भी नहीं थी,वे हमेशा किराये के घर में रहे , अपनी छोटी सी तनख़्वाह से खेती के लिये ज़मीनें और फलों के बाग़ ख़रीदते रहते थे । यह उनके निवेश का तरीका था। यह जमीनें वे खेती करने के लिये किसानों को ठेके पर दे देते थे, जिससे फसल का कुछ हिस्सा और कुछ अतिरिक्त सालाना आमदनी हो जाती थी। नानी के घर में हमेशा ताजी खेत की सब्जियाँ और मौसम के फल होते थे,  अनाज भी सब उनके  अपने खेतों का ही होता था।  सेवानिवृत्त होने के बाद तो नाना जी का पूरा ध्यान खेती पर ही रहा, अच्छी आमदनी होती तो और खेती की ज़मीन ख़रीद ले लेते थे,पर कभी मकान बनाने पर विचार नहीं किया।यह किराये का मकान ही सदा उनका घर रहा यहाँ का माहौल भी कुछ विचित्र सा था जिसकी चर्चा फिलहाल स्थगित करती हूँ, आगे आने वाले पन्नों में जरूर करूँगी।

 

जिस घर में मेरा जन्म हुआ था ,पहले नौ वर्ष उसी घर में बीते, कुछ याद है, कुछ तस्वीरें हैं , कुछ सुनी हुई बातें हैं। वह बहुत बड़ी दो मंज़िला कोठी थी, जिसको पिताजी की कंपनी ने किराये पर लिया हुआ था, उसके एक हिस्से में उनका दफ्तर था। मेरे जन्म से 14,15 साल पहले से मेरा परिवार उसी कोठी में रहता था। मुझे बताया गया था कि मेरे बड़े भाई जिनका मैं जिक्र कर चुकी हूँ उनको छोड़कर मेरी बहन और दूसरे भाई भी उसी कोठी में पैदा हुए थे। मेरे पिताजी का अंग्रेजों के साथ उठना बैठना था इसलिये हमारे परिवार में थोड़ी अंग्रेज़ियत थी,जैसे डाइनिंग टेबुल पर खाना खाना, अलग ड्राइंग रूम होना। बाकी सामान याद नहीं पर वह डाइनिंग टेबल बहुत बड़ी और भारी थी। मेरे कज़िन ने बतायाथा कि वह डाइनिंग टेबुल सिकंद्राबाद के एक बढ़ई मंगत ने बनाई थी। 30 के दशक के पूर्वार्द्धमें मम्मी  के दहेज़ में आई थी। वह डाइनिंग टेबुल बिना किस्सी मरम्मत के मेरे इन ही कज़िन के घर मे अभी भी उपयोग में है। बस उसमें उन्होंने टॉप पर लाल रंग का माइका लगवा लिया है।संभवतः बाकी फर्नीचर भी वहीं का बना हुआ था।

 

पिता जी की कंपनी ने उन्हें दो तीन नौकर और एक रसोइया घरेलू काम के लिये दे रखेथे। रसोइये की जगह मेरे नाना जी ने अपने छात्रावास से चोखे लाल को भेज दिया था। वह खाना बनाने काम बहुत अच्छी तरह से सीख चुके थे। हमारे घर में हर एक की पसंद के अनुसार खाना बनता था, यहाँ तक कि मम्मी और पिताजी की भी खाने की पसंद अलग थी, तो उनका खाना भी उनकी अलग अलग पसंद के अनुसार बनता था। हम भाई बहन चोखे लाल की बहुत इज्जत करते थे और उन्हें चोखा महाराज ही कहते थे। हम क्या सभी उन्हें चोखा महाराज कहते थे। वे हम भाई बहनों से बहुत स्नेह करते थे। उन दिनों खाना बनाने वाले को महाराज ही कहा जाता था, वे सच में महाराज ही थे, दूसरे नौकरों को हिदायत दी जाती थी “ओ चल्ले मसाला पीस…. सब्जी बारीक काट……………” जैसी अवाज़ आती रहती थीं। मैंने कभी मम्मी को रसोई का काम करते नहीं देखा था। एक बार सुबह दिन भर में क्या बनेगा बता देती थीं और खाने का सामान स्टोर से निकाल कर दे देती थीं। उन दिनों रसोई थोड़ी दूर आँगन में कहीं होती थी, साथ ही स्टोर होता था।

 

मैं छोटी थी तो बड़े भाई बहनों का बड़ा लाड़ था।मम्मी पिताजी के साथ बहुत से सामाजिक व सांस्कृतिक  कार्यक्रमों में या क्लब में ताश वगैरह खेलने जाती थीं। हालाँकि नानी के घर का वातावरण बहुत देसी था पर पिताजी के साथ रह कर मम्मी ने छुरी काँटे से खाना,कोर्स मील वाला  खाना सीख लिया था।  खाना भले ही वे न बनाती हों , क्योंकि ज़रूरत नहीं थी ,पर सिलाई कढ़ाई बुनाई बेजोड़ करती थीं। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद हिन्दी, इँगलिश और उर्दू लिख पढ़ सकती थीं। इँगलिश भले ही ज्यादा नहीं आती थी पर काम चला लेती थीं ।संगीत में जिस साज़ को हाथ लगाती थीं, सुर में ही बजता था, वायलिन बहुत अच्छा बजाती थीं। बच्चों को लाड़ प्यार कम अनुशासन की ज्यादा ज़रूरत होती है ,ये उनका मानना था।  पिताजी के बारे में जो जानकारी है वो सुनी  सुनाई है, वो मन से एक बहुत सच्चे सरल इंसान थे।अंग्रेज़ो के ज़माने वो जिस ओहदे पर थे, अपनी काबिलीयत की वजह से थे, ज़रूरतमंद रिश्तेदारों की मदद करते थे, अहंकार का नाम नहीं था, कभी कभी लोग अपनी दीनता की कहानियाँ सुनाकर उनसे पैसे ले जाते थे, तो वो कह देते कि वो किसी की मदद करने लायक हैं, इसलिये तो लोग माँग लेते हैं। बाद के वर्षों में वो स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ गये थे।

 

बड़े तीनों भाई बहनों को पिताजी पढ़ाते थे, पर मुझे आरम्भिक शिक्षा मेरे बड़े भाई बहनों से मिली। जब मैं बहुत छोटी थी, मेरे भाई बहन डी.ए.वी. स्कूल में पढते थे ,जो घर के सामने ही था। वह स्कूल केवल लड़कों के लिये था, लड़कियों का स्कूल बहुत दूर था। मेरे पिताजी ने प्रिंसिपल  तथा प्रबंधन से कहकर वहाँ सह-शिक्षा का प्रबंध करवाया और मेरी बहन को वहाँ दाखिल करवाया था । शुरू में तो वो अकेली लड़कीं थी, दो भाई वहीं पढ़ रहे थे, इसलिये सब निश्चिंत थे।धीरे धीरे औरलकड़ियाँ भी वहाँ पढ़ने आने लगीं।उस समय तक वो स्कूल दसवीं तक था ,मेरे बड़े भाई इंटरमीडिएट के लियें इलाहाबाद गये बाद में वही स्कूल इंटर कॉलिज हो गया तो मेरी बहन और दूसरे भाई ने वहीं से इंटर किया।मेरी पढ़ाई घर में ही होती रही और हम अब 1947 से1952 तक पहुँच गये।

 

मेरी याद वहाँ से शुरू होती है जब दिसम्बर 1952 में  मेरी बहन की शादी हुई ।वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी ए कर रहीं थी । उस समय लड़कियों को बाहर भेजकर पढ़ाने का रिवाज बहुत कम था। मेरी मम्मी आस पास के शहर में उन्हें भेजना चाहती थीं, वे दयालबाग़ (आगरा) की सत्संगी थी तो उन्होंने वहाँ भेजना चाहा पर पिताजी ने कहा कि घर से बाहर भेजना है तो वे इलाहाबाद विश्वविद्यालयही भेजेंगे जो कि उत्तर भारत का आक्सफोर्ड मानी जाती थी।

 

मैं बहन को मैं बीबी कहती हूँ ,दीदी नहीं ,हमारे यहाँ यही चलन था। कायस्थों या विशेषकर भटनागरों में बड़ी बहन को बीबी कहने का चलन संभवतः मुसलमानों से आया होगा, क्योंकि किसी भी महिला को संबोधित करने के लिये उर्दू में ये एक आदर सूचक शब्द है। बड़े भाई को भैया और दूसरे भाई को सुरेन भैया। मेरे जीजा जी यू.पी. के सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे(अब अमरीका में हैं) रुड़की के पढ़े हुए हैं। भैया उस समय  बनारस में इंजीनियरिंग कर रहे थे,सुरेन भैया इंटर कर रहे थे और मुझे पढ़ाते थे, मैंने स्कूल जाना देर से शुरू किया था। बीबी के ससुराल जाने का दर्द असहनीय हो गया था, इसलिये मुझ में चिड़चिड़ापन और जिद्द आ गई थी, कोई इसका कारण समझ नहीं पा रहा था। मम्मी को मुझ पर काफ़ी क्रोध आता रहता था। कभी कभी उनके मुंह से सुनने को मिला कि ” बड़े तीन तो आराम से पल गये पर इसको संभालना मुश्किल हो रहा है।” मेरा बाल मन  दुविधाओं से घिर गया था।  जीजा जी जिन्हें मैं भाई साहब कहती हूँ, जब मायके से बीबी को लेने आते थे, तो बहुत गुस्सा आता था। बीबी की कोई चीज़ छुपा देती थी और सोचती थी कि शायद उनका रुक जाये।

 

बुलंदशहर में बचपन की दो सहेलियाँ थीं जो बहनें थी,शोभा और रक्षा उनका नाम याद है, क्योंकि एक फोटो है,जिसमें मैं उनके साथ हूँ, गुड़िया के घर के सामने,जिसकी एक तस्वीर ही बाकी है। गुड़िया का घर भी सिकंद्राबाद के बढ़ई मंगत राम ने बनाया था और साठ के दशक तक भैया के पास था। बहुत अच्छी कारीगरी थी। पूरे घर का फर्नीचर भी था।पलंग ,ड्रैसिंग टेबल, सोफासैट और डाइनिंग टेबुलसब

थे।ये घर मुझे बहुत प्यारा था, मेरी ख़ुशी थी। एक और सहेली बनी थी रीता,  पर इनसे जब संपर्क टूटा तो फिर नहीं बना। दो लड़के जो भाई थे वे भी मेरे दोस्त थे अनिल और राकेश। ये दोनों भाई किसी तरह पता करते हुए लखनऊ में बाद में एक बार मुझसे आकर मिले थे, मैं भी एक बार उनके घर गईथी, फिर कभीमुलाक़ात नहीं हुई। उस समय संपर्क के साधन ही नहीं थे।

 

1955 में नाना जी गुज़र गये मम्मी के ऊपर नानी और उनके खेतों की जिम्मेदारी आ गई। सिकन्द्राबाद बहुत दूर नहीं था, वे जाती रहती थीं, किसी तरह संभाले हुए थी पर अभी और बुरा समय इंतज़ार कर रहा था।पिताजी को फ़ालिज का दौरा पड़ गया फिर दौर शुरू हुआ डॉक्टर और तरह तरह के इलाजों का, जो जिसने कहा किया पर बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ। मेरी जिंदे चिड़चिड़ापन बढ़ रहा था और मम्मी का गुस्सा! वे किस मुश्किल से गुज़र रहीं थी उसका मुझे अंदाज ही नहीं था।  ऐसे ही समय बीता, स्कूल आ जाने लगी थी, पाँचवीं कक्षा में। मेरी औपचारिक पढ़ाई पाँचवीं से शुरू हुई ही थी। सुरेन भैया कभी कभी पढ़ाई देख लेते थे।

 

नाना जी की मृत्यु पर रोना चीख़ना देखकर मैं घबरा गई थी क्योंकि उस ज़माने में जो लोग मिलने भी आते थे वे भी दहाड़े मारकर रोते थे कि चार घर दूर तक आवाज़ जाती थी।  पिताजी की बीमारी और नाना जी की मृत्यु के बाद मम्मी की घर बाहर की  ज़िम्मेदारियाँ बहुत बढ़ गईं थी।दोनो भाई पढ़ाई के लियें शहर से बाहर थे, बीबी गर्भवती थी और मैं काफ़ी छोटी थी।किसी और रिश्तेदार से किसी सहायता की अपेक्षा नहीं थी। आर्थिक तंगी न होते हुए भी बहुत सारी दिक्क़तें मम्मी झेल रही थीं।1956 फरवरी के महीने में पिताजी का देहांत होगया, एक साल पहले जो डर  मन में बैठा था वह बहुत उग्र हो गया और मैं पड़ौस के घर से आने को तैयार नहीं हुई। मम्मी का मुझ पर बहुत दिनों तक क्रोध बना रहा कि मैने पिता जी के अंतिम दर्शन भी नहीं किये, अंतिम विदाई भी नहीं दी।बीबी भी गर्भवती होने के कारण नहीं आ पाई थी।

 

पिताजी के देहांत के बाद हमें वह कोठी भी छोड़नी थी. क्योंकि वो कंपनी ने किराये पर ली थी उसका किराया बहुत ज़्यादा था।सब कुछ होते हुए भी मकान न नाना जी ने बनवाया न पिताजी ने, अंबाला का मकान छोटे ताऊजी की आदतों की वजह से पहले बिक चुका था।मम्मी ने उस ही इलाके में एक और कोठी का ऊपरी हिस्सा किराये पर ले लिया था,सामान कुछबेचा और कुछ बाँट दिया था।मम्मी ने चोखा महाराज से कह दिया था कि वे कंपनी के मुलाज़िम है ,अब वे उनकी तनख्वाह नहीं दे पायेंगी। चोखा महाराज ने तत्काल नौकरी छोड़ दी और कहा “इस जनम तो किसी और के घर खाना ना बनाऊँगा, जहाँ आप रहेंगी वहीं पड़ा रहूँगा, खाना कपड़ा तो आप दे ही देंगी।” इस बात को उन्होने जीवन भर निभाया।अब बुलंदशहर में मैं ,मम्मी और चोखा महाराज ही थे। मम्मी बाहर के कामों में लगी रहती थी चोखा महाज ने पूरा घर सँभाला हुआ था। जहाँ दूसरा नौकर सब्जी काटता तब वे खाना बनाते थे, अब ज़रूरत पड़ने पर, जब काम वाली छुट्टी पर होती थी, झाडू पोंछा और बर्तन माँजने से भी पीछे नहीं हटते थे। घर के कामों का बोझ चोखा महाराज ने कभी मम्मी पर नहीं पड़ने दिया। ज़रा आज सोचिये, कि एक नेक ब्राह्मण ने,एक कायस्थ परिवार की इतनी सेवा की, क्योंकि इस कायस्थ परिवार ने जब उसे ज़रूरत थी, नौकरी दीथी,इज्जत दीथी ।

 

मई के महीने में बीबी को बेटा हुआ वो उसे लेकर बुलंदशहर आई, मेरी ज़िन्दगी में कुछ रौनक आई।बीबी समझ गई थी कि यहाँ मैं तनाव में थी,जिसे मम्मी  ज़िद समझती रहीं थीं ,वह मेरा गहरा तनाव व बाल मन की अशांत उग्रता थी। मम्मी के लिये भी परिस्थितियाँ आसान नहीं थी।बीबी मुझे अपने साथ हरिद्वार ले गई।मेरे जाने के बाद मम्मी को सिकन्द्राबाद और बुलंदशहर मे सब काम निपटाने के लिये पर्याप्त समय था।अब बुलंदशहर में रहने का कोई सबब नहीं था, उन्होने सिकन्द्राबाद जाकर रहने और नानाजी की खेती को संभालने का निश्चय कर लिया।बुलंदशहर का किराये का मकान छोड़कर नानी के घर में आ गईंथीं, साथ में चोखा महाराजभी आ गयेथे ।नानी का घर भी किराये का था, बहुत बड़ा मकान था जो’बड़ा महल’कहलाता था। पूरा बड़ा महल नानी के पास नहीं था उसके एक हिस्से में वो रहती थीं, बाकी में और दूर दराज़ के रिश्तेदार रहते थे।सिकंद्राबाद बुलंदशहर के रहन सहन में ज़मीन आसमान का अंतर था। यहाँ बहुत सादगी थी, एक तख्त और दो तीन कुर्सियाँ बस!सोफा डाइनिंग टेबल वहाँ किसी के घर में नहीं थे।खाना रसोई में नीचे बैठकर खाते थे।

 

मम्मी को जल्दी समझ में आ गया कि खेती का काम करवाना आसान नहीं है, इसलिये उन्होने बड़ी कुशलता से एक एक करके ज़मीनें और बाग़ बेचने शुरु किये, कुछ लोग सामने आये कि वे संभाल लेंगे बस उन्हे पावर ऑफ ऐटौर्नी दे दी जाये पर मम्मी ने ऐसा नहीं किया। उनको शक था कि लोग  जायदाद हड़पने के चक्कर में उनसे कहीं भी हस्ताक्षर करवा सकते है, इसलिये उन्होने अपने ही दम पर सब कुछ बेचना ही सही समझा। यहाँ पर मम्मी के शक्की मिज़ाज की जड़ेजमी थीं, जिसका अंदाज मुझे बहुत बाद में हुआ था।वे हर व्यक्ति को शक के कटधरे में रखकर देखने की आदी हो गईं थीं। उनका विश्वासपात्र बनना किसी के लिये आसान नहीं था। हम भाई बहनों से भी वो अक्सर कहती रहती थीं कि जो जैसा दिखता है. वैसा नहीं होता, इसलिये हमेशा चौकस रहो।

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

आपको गुज़रे हुए लम्हे का परिचय कैसा लगा हमें अवश्य बताये | कल इसका पहला अध्याय पोस्ट किया जाएगा | अगर आपको अटूट बंधन की रचनाएँ अच्छी लगती हैं तो वेबसाईट को सबस्क्राइब करें व् अटूट बंधन का पेज फॉलो करें |

 

गुज़रे हुए लम्हे – परिचय

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