व्यष्टि से समष्टि की ओर

 

 

ये दौर भी बीत जाएगा। परिवर्तन प्रकृति का मूल स्वभाव है। यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है । मनुष्य अपने आविष्कारों के दंभ में सोचता है कि उसने प्रकृति पर विजय पा ली है। जो वह चाहेगा सब एक दिन पा सकता है।किंतु प्रकृति ने कोरोना महामारी के बहाने से एक बार फिर मनुष्य को सकल ब्रहमांड में उसकी कमजोर स्तिथि से पुन: परिचय करवा दिया।

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।

खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

कोरोना ने एक इंसान को नहीं पूरी दुनिया को अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। तेज रफ्तार से दौड़ती दुनिया थम गई है। कोरोना ने जैसे आ के कह दिया… स्टैचू । जहाँ हो वही बने रहो। बहुत भाग लिए। ठहरो जरा!
मौका मिला है तो सोचो। क्या खोया क्या पाया अब तक! अपनों के बीच रहो। जानो उन्हें। कितना जानते हो उन्हें जिनके लिए इतनी मेहनत-मशक्कत कर रहे थे। अपने आपको जानो। जो कर रहे थे अब तक। क्या वह तरीका सही था। क्या वाकई वही करना था। कब अपने बुर्जुगों के बीच बैठे थे। कितने वर्ष पहले उनके र्थर्थराते हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा था आप कैसे हैं? हम सब आपके पास हैं।

कबीर दास कहते हैं-

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।

जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।

जब जीवन में दुख आता है, कठिनाईयां आती हैं। ।तभी अपनों की याद आती हैँ।तभी उस परम सत्ता की याद आती है।जिसने इस अखिल विश्व को रचा है।

व्यष्टि से समष्टि की ओर

कोरोना काल ने बहुत बुरे दिन दिखाये हैं।अभी तक वैक्सीन नहीं बन पाया। अमेरीका जैसा  शक्ति-संपन्न देश भी अपने नागरिकों के लिए कुछ नहीं कर पाया।लाखों लोग मारे जा चुके हैं। आंकड़े दहला देने वाले हैं।हमारे देश में भी यह तेजी से फैल रहा है।जो डॉक्टर्स कोरोना मरीजों के ईलाज में लगे हुए हैं उनकी जान पर खतरा लगातार बना हुआ है।शुरुआत में कईयों की जान गई।

 

कल तक “बी पॉजिटिव “जब डॉक्टर किसी मरीज को हौसला देने के लिए कहते तो एक शुभकामना मंत्र की तरह वह उच्चारित होता था। आज वही शब्द किसी व्यक्ति को जब डॉक्टर कहते हैं तो उसे अपनी मौत सामने दिखने लगती होगी। वहीं जांच की रिपोर्ट आने के बाद “आपकी रिपोर्ट निगेटिव है” कहे जाने पर “जान बची लाखों पाए “की अनुभूति से भर जाता होगा।

समय ने शब्दों के मायने बदल दिए।जीने के तरीके में न चाहते हुए कई बदलाव लाने पड़े।रहन-सहन, खान-पान के तरीकों में विशेष सावधानी रखने के प्रयास में कई  अच्छी आदतों का समावेश हो गया।कई बुरी आदतों ने धीरे से खुद ही किनारा कर लिया। रिश्तों में नई गर्माहट , नई ऊर्जा भर दी है। दुख ने सबको करीब कर दिया। आइसोलेशन के इस फेज ने सबको सबके करीब कर दिया।अलग होते हुए भी सुख भी साझा। दुख भी साझा।हमारी सांझी संस्कृति रही हैं विविधताओं में भी हमने सांझापन खोज लिया था।

आधुनिक जीवन शैली ने हमें व्यक्तिनिष्ठ बना दिया था। हम आपसी संबंधों में ऑफिस में, समाज में हर वक्त एक अजीब तरह की मानसिक असुरक्षा , भविष्य की चिंता में घिरे रहते थे। संबंधों में एक अदृश्य खिंचाव रहता था। ऑफिस हो या घर संशकित दृष्टि से तौलने , खुद को ज्यादा काबिल की समझने की ग्रंथि से लैस , संबंधों की गरिमा खो बैठे थे।
अपना सुख प्यारा, अपना दुख सबसे बड़ा दुख की सोच हमें कितना छोटा कर देता है। ये समझ आ रहा है। हर इंसान किसी न किसी रोग या समस्या से दुखी है परेशान है। पर जीवन तो है उसके पास। अचानक सामने खड़ी मौत से तो उसका सामना नहीं हो रहा। जो अपनों के स्नेहिल छांव में समय बीता रहे हैं। वे भाग्यशाली हैं। भले ही किसी पीड़ा से गुजर रहे हों । पर वह अकेला तो नहीं है न। कितने लोग अकेले फंसे है। अवसाद , निराशा से जुझ रहे हैं। कामगार वर्ग भय से सड़को पर निकल आया है। घर से दूर और रोजगार नहीं मिलने की आशंका उन्हें मौत के मुंह मे ढकेल दिया है। उन्हें सही तरीके से समझाने और सुरक्षा देने की कोशिश में सरकार और समाजसेवी लगे हुए हैं। इस समय सबको सबका सानिध्य चाहिए। लोग इस तरह सोचने लगे हैं। सोच बदली है और ये सोच साकारात्मकता की ओर ले जा रही है।

सहायिका/सहायक का जीवन भी जीवन हैं।अपने साथ-साथ उनकी जिंदगियां भी कीमती हैं।हर घर में ये सोच आई है या लाई गई जैसे भी। समाज में समानता व मानवीय दृष्टिकोण में वृद्धि हुई है। मौत के भय ने सबको एक ही प्लेटफार्म पर ला दिया है। लेकिन यह भी सच है कि लगातार लोगों की नौकरियां जा रही हैं। रोज ही किसी न किसी फर्म में छंटनी हो रही है । या पूरा फर्म ही बंद किया जा रहा है।हजारों लोगों के जीवन में जीविका का आसन्न संकट आ खड़ा हुआ है। बिजनेस ठप्प पड़ा हुआ है। मॉल बंद होने के कगार पर हैं।ई-बिजनेस थोड़ा संभला है।भारत विश्व के साथ मिलकर अपनी जीजिविषा के सहारे इस संकटकाल को पार कर जाने का प्रयत्न कर रहा है।

आज पूरी विश्व की सोच व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख हो रही है। उत्तरोत्तर ये सोच और बढ़े । यही मंगलकामना।

  • महिमा श्री
  • mahima shree

 

परिचय:-

शिक्षा:- स्नातकोत्तर- पत्रकारिता व जनसंचार (मा.च.रा.प.ज.वि.),  एम.सी.ए.(इग्नु)

-सीनियर फेलोशिप(2019-2020)मिनिस्ट्ररी ऑफ कल्चर,नई दिल्ली

-स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता

-एकल काव्य संकलन “अकुलाहटें मेरे मन की”, अंजुमन प्रकाशन 2015,

-कई साझा संकलनों में कविताएं व लघुकथा प्रकाशित

-देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स में रचनाएं प्रकाशित

मेल:- mahima.rani@gmail.com

Blogs:www.mahimashree.blogspots.com

 

 

 

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