जया आनंद की कविताएँ
पर धरती से
नापना चाहती हूँ ऊंचाई
पर आधार नहीं
खोना चाहती
उड़ना चाहती हूँ
पर बिखरना नही चाहती
होना चाहती हूँ मुक्त
पर बंधन नही तोडना चाहती
होना चाहती हूँ व्यक्त
पर परिधि नहीं लांघना चाहती
…….
देखती हूँ मेरा न चाहना
मेरे चाहने से अधिक प्रबल है
और फिर
मेरा न चाहना भी तो
मेरा चाहना ही है
इसलिए शायद
मेरे सवालों का
मेरे पास ही हल है
ढाईअक्षर का
अधूरा सा शब्द ‘स्नेह’
पर कितना पूरा
इसकी परिधि में है
विचारों की ऊँचाई
भावनाओं की गहराई
नेहिल मुस्कान
सजल दृष्टि
कोमल अभिव्यक्ति
सहज अनुभूति
आशीषों की वृष्टिे
बीते पल
जीये गीत
सुनहरे सपने
हमारे अपने …
सच !स्नेह शब्द अधूरा कहाँ
यह तो पूरा है ।
#डॉ जया आनंद
अटल बिहारी बाजपेयी की पाँच कवितायें
जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ
डायरी के पन्नों में छुपा तो लूँ.
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