मेरे नक्शे के मुताबिक- लोक, शिक्षा, और साहित्य पर गहन दृष्टि सम्पन्न संस्मरण 

“हम सब का जीवन एक कहानी है पर हम पढ़ना दूसरे की चाहतें हैं”

       दुनिया की हर कहानी, जो यथार्थ के करीब है, उसका कोई जीवित पात्र होता है जिसका दुख-दर्द लेखक को बेचैन करता है। अवचेतन में धँसी ये बेचैनियाँ मानस की सीप में गहरा जख्म करती हैं, तब उससे छुटकारा पाने के लिए कल्पना की परतें चढ़ती हैं और कहानी का मोती तैयार होता है। बेशक ये कहानी लेखक की कहानी नहीं होती पर हर कहानी में लेखक कहीं न कहीं होता है, भले ही भाषा-भाव विचार के रूप में। किसी भी पाठक के रूप में कहानियाँ पढ़ते हुए हम थोड़ा-बहुत लेखक को पढ़ ही लेते हैं। लेखक का विज़न उसके अपने जीवन से ही आता है। परिस्थितियों की उस मिट्टी से आता है, जिनसे उसका निर्माण हुआ है।

क्या हो कि लेखक ये तमाम बाहरी परदे हटाकर अपने जीवन की कुछ छोटी-बड़ी घटनाओं को स्वयं ही पाठकों के सामने रखकर इस कयास पर ही विराम लगा दे। संस्मरण की विधा ऐसी ही विधा है।ये वो विधा है जो लेखक को पाठक के और करीब ले आती है। आत्मकथा के विपरीत क्या बताना है क्या नहीं ये लेखक स्वयं चुनता है। फिर भी ये साहसिक लेखन ही है कि लेखक अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को पाठक से साझा करता है, विरोधाभासों को प्रकट करता है और साहित्यिक गतिविधियों, परिपाटियों पर खुलकर अपनी बात रखता है। आश्चर्य नहीं कि व्लॉग संस्कृति के बाद बाद सच्चे अनुभव लोगों को ज़्यादा प्रभावित करने लगे तब संस्मरण विधा में भी वृद्धि देखी गई। इस साल पुस्तक मेले में संस्मरण विधा की कई पुस्तकें आईं। उनमें से कई पुस्तकें मैंने पढ़ी सराहीं।

मेरे नक्शे के मुताबिक- लोक, शिक्षा और साहित्य पर गहन दृष्टि सम्पन्न संस्मरण 

उन्ही में से एक पुस्तक है वरिष्ठ साहित्यकार सूरज पालीवाल जी की पुस्तक “मेरे नक्शे के मुताबिक”।

सूरज पालीवाल जी को साहित्य जगत वरिष्ठ आलोचक के रूप में जानता रहा है, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके तार्किक आलोचनात्मक लेख उनके ज्ञान और मेधा से चमत्कृत करते रहे हैं। उसके बरक्स उनके संस्मरणों की यह पुस्तक पाठकों को एक अलग ही आस्वाद प्रस्तुत करती है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक को “गुड़-रोटी” खाने का अहसास होता है। पुराने समय में जब बच्चा रोटी खाने से इनकार करता था तो माँ गुड़ की डली रोटी मीस कर उसे खिला देती थी। जिससे बच्चे को पौष्टिकता और स्वाद दोनों मिलता था । प्रस्तुत संस्मरण संग्रह में भी ग्राम्य जीवन में गुड़ की विशेषता बताई गई है। इसी गुड़ के स्वाद से तृप्त करने के लिए लेखक ने केवल जीवन की घटनाएँ नहीं हैं बल्कि बड़ी ही चतुराई से उसमें हमारा ग्राम्य  समाज, परंपराएँ संस्कृति, लोक जीवन, भाषा, वैविध्य आदि इतनी खूबसूरती से गूँथ दिया है, कि थोड़े उम्र-दराज पाठक उस समय की स्मृतियों में जाने से बच नहीं सकते हैं और युवा पाठक अपनी जड़ों को पहचानने से। ये पुस्तक जहाँ एक ओर लोक  जीवन को सहेजती हैं वहीं दूसरी ओर एक ऐसे गाँव को, जहाँ पुस्तकालय नहीं है, अच्छी शिक्षा की व्यवस्था भी नहीं है. यहीं जन्में बच्चे की शिक्षक, वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक तक की यात्रा देखना सभी के लिए प्रेरणा दायक भी है।

इतना ही नहीं शिक्षा और साहित्य जगत संबंधों, अंतर्संबंधों, जीवन में आने वाले आम-खास व्यक्तियों की स्मृतियों के ताने-बाने से बुनी ये पुस्तक अपनी पूरी यात्रा में पाठक को जिस तरह से समृद्ध करती चलती है उससे तुलसी का ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥‘ सहज ही याद आ जाता है।

पुस्तक की भूमिका में ही लेखक लिखते हैं कि,” गाँव की चिंताओं में शहर शामिल नहीं है, शहर के अकेले और भयावाह संघर्ष भी दूर-दूर तक नहीं हैं लेकिन शहर की चकाचौंध है। फिर ऐसा क्या है जो मेरे जैसे युवक को शहर में झोंकता है?”

एक अन्य स्थान में वे लिखते हैं कि, “इन संस्मरणों को लिखते हुए मुझे बार-बार लगता रहा कि गाँव से आए अकेले और अपनी पीढ़ी के पहले शिक्षित युवाओं के लिए यह दुनिया अनवरत संघर्षों के जरिए ही खुलती है।”

17 अध्यायों में बँटी यह पुस्तक पहले अध्याय से ही बाँध लेती है। पाठक, लेखक के मथुरा के पास स्थित बरौठ नामक एक गाँव में पहुंचता है। सात जातियों वाला गाँव जहाँ सबके अपने -अपने मुहल्ले हैं। आपसी प्रेम है पर शिक्षा और स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था नहीं है। शिक्षा के निजीकरण के साथ ही एक निजी विद्यालय तो खुल जाता है पर उसका उद्देश्य धन कमाना ही है। इसलिए शिक्षकों की नियुक्ति के लिए ‘कितना वेतन लोगे?’ और ‘अपने गाँव से कितने विधार्थी लाओगे?’ जैसे प्रश्न पूछे जाते हैं। जो ग्रामीण अंचलों की लचर शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल देते हैं। शिक्षक भी अधिकांशतः खेती-बाड़ी वाले थे, वे अध्यापन में कम और खेती में ज़्यादा रुचि लेते थे। लेखक इन विषमताओं को आरोप की तरह न दर्शाकर उसी बालमन के साथ साथ साधते हैं।  

इसी में मिलते हैं गाँव के पुरोहित पंडित कमलदत्त शर्मा, मुखिया कहे जाने वाले परिवारों के अनब्याहे रह जाने वाले चाचा, कमला पंडित के दुबले-पतले बेटे घनश्याम, कन्नी चौधरी के, “पता नहीं कौन कह रहा है”, साबुन से नहाने की विलासिता, बंबई में बसे रामस्वरूप चौधरी और एक दावत में सौ मालपूए खा जाने वाले भोजन भट्ट नंगा पंडित जैसे रोचक किस्सों से। इन्हीं प्रसंगों के मध्य राम लीला में हिन्दू-मुसलमान दोनों की भागीदारी हमारी समृद्ध गंगा-जमुनी संस्कृति की जड़ों को दर्शाती है।

चौधरानी नामक सशक्त महिला का प्रसंग निजी तौर पर मुझे बहुत भाया। अभी कुछ दिन पहले किसी कहानी में एक महिला आई. ए. एस महिला के डिलीवरी के दस दिन बाद ऑफिस जॉइन करने के चर्चे का जिक्र था। सशक्त महिला के रूप में यह अखबारों में खबर छपी थी। गाँव की ये चौधरानी अपने नवजात बच्चे को रेत में लिटा चारा काटती है और सिर पर चारा और गोद में बच्चे को लेकर अपने बच्चे के नामकरण के लिए घर लौटकर, बच्चे के नामकरण के लिए आए पंडित के लिए खीर पूड़ी बनाती है। अक्सर हम सशक्त महिलाओं को परिभाषित करते हुए गाँवों की एक जीवट, जुझारू, सशक्त महिलाओं को भूल जाते हैं।

जब कोई कालखंडों की यात्रा पर हो तो तुलना हो ही जाती है । लेखक भी वर्तमान से उस समय की तुलना भी करते जाते हैं। जैसे तब बड़े-बड़े तीज-त्योहार खीर-पूड़ी में निपट जाते थे। लड़कों को शिक्षा मुश्किल से मिलती थी पर लड़कियों के लिए दुर्लभ थी। गाँव की लड़की पूरे गाँव की बेटी होती थी और उसके कन्यादान में सब का योगदान। गाँव की लड़कियाँ तीज-त्योहारों पर ही पिता के घर पर आती थीं। झगड़कर पिता के घर पर रहने की परंपरा नहीं थी। कुछ परंपराएँ बड़ी रोचक लगीं- जैसे नाई की खुराक से गाँव की लड़कियों के स्वास्थ्य का पता लगाना।

दूसरे-तीसरे अध्याय में वे अपने अध्यापकों को याद करते हैं। हर बच्चे का पहला अध्यापक माँ होती है। मन की कच्ची स्लेट पर संस्कारों की पहली इबारत वही लिखती हैं। वे पक्के घर से कच्चे घर में आई अपनी माँ की कर्तव्यनिष्ठा की सराहना करते हुए उद्घाटित करते हैं कि उनकी माँ ने कभी उन सबसे यह नहीं कहा कि बहुत पैसे वाला बनना बकी हमेशा यही कहा कि खूब पढ़ना और ईमानदार रहना।

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अपनी प्राइमरी शिक्षा के बारे में वे बताते हैं कि एक हाल में ज्यादातर कक्षाओं की पढ़ाई हो जाती थी। बच्चे बस अ ब स द ही लिखते, और अध्यापक को दिखाने जाते। छठवीं कक्षा में अंग्रेज़ी विषय की शिक्षा प्रारंभ होते ही वे अ ब स द की जगह ए बी सी डी ने ले ली। वे अध्यापकों द्वारा बच्चों का पीटे जाने का भी वर्णन करते हैं। हालांकि बच्चे इसके अभ्यस्त थे। फिर भी अंग्रेज़ी के मास्साब जलेसिंह किताब को हाथ न लगाकर बस अंग्रेज़ी शब्दों की स्पेलिंग पूछते थे और उत्तर न देकर पीटते थे। उस समय बहुत पिटने  वाले सरदार सिंह ने टोपी में छुपे काँटे मास्साब को चुभाकर अपने पिटने का विरोध किया था। हालांकि वह इसके बाद पढ़ नहीं पाया। कभी घास काटते हुए मिलने पर उसने अपने आगे न पढ़ पाने का कारण शिक्षक को ही बताया। एक स्थान पर वर्णन है कि खचेरमल एक छात्र का सिर इतनी ज़ोर से दीवार में दे मारा कि सारे छात्रों में भय व्याप्त हो गया । यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमारे जैसे पाठकों में भी भय व्याप्त हो गया । हालांकि ‘Spare the rod and spoil the child’ वाला फॉर्मूला अब नहीं चलता। इन प्रसंगों को पढ़ते हुए मन द्रवित हुआ, कितनी बोध कथाएँ याद आई, जहाँ बच्चों में शिक्षा के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने के लिए उन्हें किस्सों कहानियों के माध्यम से अपने पास बुलाया जाता था। छोटे बच्चे अपना हित-अहित नहीं जानते । प्राइमरी शिक्षक का काम है कि उनके अंदर पढ़कर आगे बढ़ने की इच्छा उत्पन्न करना।

परंतु लेखक उस समय की समग्र सोच को शिक्षा के प्रति  अरुचि वाला बताते हैं। तभी एक ही क्लास में बच्चे कई बार फेल होते पर उन पर पास होने का दवाब नहीं था। फिर भी शिक्षा का सूर्य उदित हो रहा था। गणेश चतुर्थी के दिन शिक्षकों के साथ बच्चों का उन बच्चों के घर जाना, जो स्कूल नहीं जाते हैं और उनकी माँ को उलाहने देते हुए बच्चों को स्कूल भेजने के लिए राजी करवाना, और गुड़ धानी बनाना आदि इसी प्रकाश की छुटपुट किरणें हैं । आज बच्चों के ऊपर नंबरों के बढ़ते दवाब का में कबीर का, “अति का भला न बरसना अति की भली न धूप” याद आता रहा। शायद हर काल खंड अपनी समस्याओं से जूझ रहा होता है और उसके समाधान वहीं से निकलते हैं।

 इन खंडों में वे अपने अध्यापकों खचेरमल, कथावचक लक्ष्मीनारायण, पतरोल साहब, अध्यापक राम सहाय, वर की खोज में आए लड़कीवालों को फेल होने वाले छात्रों का झूठा चरित्र प्रमाण पत्र बाँटने वाले कॉलेज के प्राचार्य देवीलाल, इलाहाबादी अमरूद कहलाये जाने वाले हरी सिंह, कॉमर्स पढ़ाने वाले मनोहरलाल, जिनकी मूँछे नहीं होने के कारण लोग उन्हें वृंदावन की बाईजी कहते थे, हाईस्कूल में पाँच बार फेल हुए रघुवीर पंडित के रोचक किस्से हैं।

गाँव के टीले पर दीपावली पर मिट्टी की खुदाई करने गई लड़कियों की अक्सर मिट्टी में दबकर हुई मृत्यु पाठक को व्यथित करती है। वहीं कुओं के इर्द-गिर्द पसरी गाँव की सामूहिकता को सरकार द्वारा लगाए जा रहे हैन्ड पंपों से नष्ट करने का विरोध मन को सुकून देता है, जब मीना पानी भरने जाते समय गुनगुनाती थी, “फिरंगी नल मत लगवईयों…।” इस खंड में लेखक कई देसी शब्दों लोकगीतों से भी परिचित करवाते हैं, जैसे अनुत्तीर्ण के लिए नापास, मोड़की का मोरकी और अंग्रेज़ों  द्वारा मथुरा का मटूरा, अंगुली के ठेकों पर महीनों की गिनती, और “पाँच सेर का सिर तो हिला रहा है पर छटांक भर की जुबान नहीं जाती” से पाठकों को लोक  भाषा भाव, कहन के रस से भाव विभोर कर देते हैं।

अध्यापक -2 में अलीगढ़ के किस्से हैं। ये वह स्थान है जहाँ लेखक ने उच्च शिक्षा पाई, उनकी वैचारिकी सुदृढ़ हुई और जीवन को दिशा मिली। जीवन कि पटकथा का लेखक कोई और और है इसका उदाहरण भी कई बार देखने को मिला। जैसे एक बार गाँव में आए एक सिद्ध पुरुष ने लेखक की अंगुलियाँ जवाहर लाल नेहरू सरीखी बताते हुए कहा था कि उनके हाथ में हमेशा कलम रहेगी, जबकि उस समय लेखक खेती-किसानी करना चाहते थे । वहीं अलीगढ़ में वे शायद धर्म समाज कॉलेज में पढ़ते पर उसे समय हुए चुनाव में कॉंग्रेस के प्रत्याशी के प्रचार के लिए अपने साथी ख्वाजा हलीम के साथ जुड़ गए । ये कोई सुनियोजित कार्य नहीं था पर वहीं से उनके अलीगढ़ कॉलेज में पढ़ने की भूमिका बन गई। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सुअवसर हमारे लिए दरवाजे खोलते हैं और ये हम पर है कि हम नई राह में प्रवेश करें या नहीं। ये अलग बात है कि जो गाँव जाति व्यवस्था के अनुसार तथाकथित नीची जाति में आने वाले अध्यापक को पंडित जी कह कर पुकारता था वहीं ये भय भी था कि मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने के कारण कहीं मुसलमान उन्हें मार न दें। ‘साँच को आंच नहीं’ की तर्ज पर वे जल्दी ही वे अपने माता -पिता को समझने में सफल हो गए।

उर्दू पढ़ने वाले डॉ. कोकब कदर, राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले महमूद साहब, हिंदी पढ़ाने वाले डॉ. नरेंद्र शर्मा आदि अनेक शिक्षकों को याद करते हुए लेखक उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । नरेंद्र शर्मा द्वारा कक्षा में किया गया अशोभनीय व्यवहार देखकर मुझे लगा कि लड़कियों के लिए शिक्षा का संघर्ष कितना जटिल रहा होगा। वे उदार अध्यापक के रूप में कुँवरपाल सिंह का वर्णन करते हैं।, जिनके अधीन लेखक ने शोध किया था। वे लिखते हैं कि, “उनका घर एक प्रकार से कम्यून था, जहाँ शोधार्थियों से लेकर सी पी एम सक्रिय कार्यकर्ता लेखक और संपादक जुटे रहते थे। उनके यहाँ कई सारी पत्रिकाएँ आती थीं, जिनमें वे और उनकी पत्नी नमिता सिंह न केवल लिखते थे अपितु आर्थिक सहायता भी करते थे।“

उन्होंने कॉलेज में ज्ञान के नीचे पलती ईर्ष्या और चिढ़न पर भी बेबाक कलम चलाई है। जैसे प्रो. प्रेम स्वरूप गुप्ता कुँवरपाल सिंह की लोकप्रियता से चिढ़ते थे। भाषा विज्ञान के गहरे अध्येता डॉ. अंबिका प्रसाद सुमन और प्रो. हरवंशलाल शर्मा से बनती नहीं थी। इसलिए वे रीडर भी नहीं बन पाए। कुँवरपाल सिंह द्वारा ‘भक्तिकाल” संगोष्ठी बुलाए जाने पर फूलबिहारी द्वारा तंज कसना आदि किस्से अपनी साफ़गोई के कारण प्रभाव डालते हैं। लेखक एएम यू का अपने जीवन पर गहरे प्रभाव को स्वीकारते हुए लिखते हैं कि, “ए एम यू केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं है वरन वह अपनी विशाल उपस्थिति में ज्ञान और धर्मनिरपेक्षता का हिमालय है…”

‘मेरा गुरुकुल मेरा कम्यून” में मुख्यतः तो कुँवरपाल सिंह और उनकी पत्नी नमिता सिंह जी के रहन-सहन उदारता का वर्णन है। ‘चेरी ऑन द केक’ की तर्ज पर पाठकों को साथ में ही शिक्षा और साहित्य जगत के कई दिग्गजों के नाम और कार्य जानने को मिलेंगे। लेखक को कुछ की यात्रा के साक्षी रहने की खुशी है तो कुछ गुम हो गई रेखाओं की कसक भी। नमिता सिंह जी के बारे में पढ़ते हुए ममता कालिया जी की याद आती रहीं। घर-परिवार को समर्पित नौकरीपेशा स्त्री, जो कहानियाँ भी लिखती हैं, निरंतर छपती भी हैं और उतनी ही सहजता से साहित्यिक गोष्ठियों की मेजबानी भी कर लेती हैं। मन आदर से भर उठा। अब वहाँ वो घर नहीं हैं पर स्मृतियों के घर कभी नष्ट नहीं होते और आज शब्दों के घर के माध्यम से साहित्य जगत की धरोहर बन गए हैं।

संभवतः इसीलिए ‘जीवन और सृजन में वैचारिक धार’ नामक संस्मरण नमिता जी और उनकी लेखन यात्रा को समर्पित है। और क्यों न हो रसायन शास्त्र से गोल्ड मेडिलिस्ट, सुमित्रानंदन पंत जी की पोती नमिता जी जनवादी लेखक संघ और जनवादी महिला संगठन की पदाधिकारी भी रहीं हैं। पति-पत्नी के बीच पारिवारिक पृष्ठभूमि में भिन्नता के बावजूद वाम विचारधारा का कॉमन पॉइंट था। के पी सिंह सदैव इस पर गर्व करते थे और किसान, मजदूर, धर्म, राजनीति नमिता जी के कथा साहित्य के स्तंभ थे, जिसपर आमतौर पर तब महिला लेखिकाएँ नहीं लिखती थीं । ‘घर फूँक तमाशा देखने’ के मुहावरे को चरितार्थ करते हुए दस वर्ष तक जिस तरह पति-पत्नी दोनों ने और बाद में नमिता जी ने वर्तमान साहित्य को संभाला, जो हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।  

नमिता सिंह जी का घर अलीगढ़ आने वालों के लिए एक आश्वस्ति थी कि कभी भी पहुँच जाओ, वहाँ एक घर है, आत्मीयता है। समय-असमय आने वालों के लिए भोजन खिचड़ी, शयन आदि का प्रबंध करना उनके मूल्यों में शामिल था। लेखक आज के अकेलेपन को उसी आत्मीयता के लोप की संज्ञा देते हैं। जैसे हमीं हाथ नहीं बढ़ाते और हमीं अकेलेपन का रोना रोते हैं। संस्मरण के दौरान लेखक एक अन्य प्रबुद्ध लेखिका का जिक्र भी करते हैं, जो संवाद के दौरान अनेक विदेशी लेखकों के उदाहरण तो देती रहीं पर हिंदी लेखकों के उदाहरण नहीं दिए। हम आज भी यही देख रहें हैं कि लेखक अपने समकालीनों को पढ़ना नहीं चाहते पर विदेशी लेखकों का नाम लेकर बौद्धिकता के झूठे दंभ प्रदर्शन से हिंदी साहित्य का क्या भला होगा?

माँ धरती है तो पिता आसमान हैं। किसी बच्चे का व्यक्तित्व दोनों से ही पूरा होता है।“पिता की उपस्थिति” नामक संस्मरण में वे अपने पिता को याद करते हैं, साथ ही याद करते हैं ज़मीदारी छीनी जाने के बाद के समय के राजनीति में सक्रिय पिता को, जो पहलवानी के शौकीन थे, बाँसुरी के शौकीन थे पर अपने शौक को कोई सिखाने वाला न मिलने के कारण कोई धार नहीं दे सके। ये पुस्तक का ऐसा हिस्सा है, जिसे पढ़ते हुए पाठक को अपना किस्सा जरूर याद आएगा । माँ के समय घर से मुक्त रहने वाले पिता ने माँ के पश्चात माँ और पिता की भूमिका को कैसे निभाया, आँखें नम कर देता है। 

‘उसने ये जाना कि’ संस्मरण में मुख्य रूप से काज़ी साहब और शहरयार साहब का उल्लेख है। दोनों का संबंध एएमयू के उर्दू विभाग से रहा। एक अफसाना निगार और एक शायर। कई छोटे-बड़े प्रसंगों में काज़ी साहब और शहरयार साहब  के व्यक्तित्व की दृढ़ता प्रकट होती है। जिनमें काजी साहब की पाकिस्तान की यात्रा, अनेकों सम्मान, संप्रदयिकता की आग में झुलसी किताबों की दुकान के ऊपर स्थित अपने घर से यह कहते हुए इनकार करना कि अदब तो जल रहा है, मैं अपनी जान बचा कर क्या करूंगा। शहरयार द्वारा प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए आलोचना ग्रंथ लिखने की माँग को ठुकराना, बीमार अवस्था में किसी से न मिलना आदि शामिल हैं। शेरो-शायरी के प्रसंग इस हिस्से को रोचक बना देते हैं। 

“गांधी हिल पर राय साहब” मुख्यतः विभूति नारायण राय जी को समर्पित है। उन दिनों वे वर्तमान साहित्य का सम्पादन कर रहे थे और उनका उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ चर्चा के केंद्र में था, जिसके कारण उनके मित्रों की कम शत्रुओं की संख्या में वृद्धि होती जा रही थी। विशिष्ट पदों पर उनकी पदोन्नतियाँ, इलाहाबाद के प्रति उनका अनुराग, साहित्यिक गोष्ठियाँ, खराब समय में उनसे लाभ प्राप्त लोगों द्वारा उनका साथ छोड़ना आदि पर लेखक ने दिल खोलकर कलम चलाई है। उन्होंने कुलपति के रूप में राय साहब की पाँच उपलबद्धियों का विशेष तौर पर वर्णन किया है। जिनमें प्राध्यापकों के खाली पदों को भरने, अतिथि लेखकों के रूप में ख्याति लयबद्ध लेखकों को आमंत्रित करने, हिंदी समय के माध्यम से ऑनलाइन सारी महत्वपूर्ण रचनाओं का संग्रह करने, अतिथि गृह, सामुदायिक भवन, सड़कों आदि के नाम साहित्यकारों के नाम पर रखने आदि शामिल हैं। कई किस्सों में नामवर सिंह जी, कालिया जी, कृष्ण कल्पित जी स्वाभाविक रूप से आए हैं, और छाए हैं।

“अतिथि लेखकों की दुनिया” में पाठकों को महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अतिथि लेखक के रूप में आमंत्रित किये गए लेखकों के बारे में जानने को मिलेगा। आमंत्रित अतिथियों में आलोकधन्वा जी का व्यक्तित्व, बड़े लेखकों का नाम लेते समय कान पर हाथ रखना,निराला, टैगोर आदि पर बात करते हुए आँख भीग जाना, विलक्षण स्मृति, कभी समकालीन लेखकों की निंदा न करना उन्हें विशिष्ट बनाता है। राजकिशोर  जनसत्ता में आलोकधन्वा पर अशालीन टिप्पणी करने के बाद सजा या प्रसाद के तौर पर अतिथि बनाए जाने का भी जिक्र है। आर्थिक अभावों से जूझ रहे कथाकार संजीव जी को अतिथि लेखक के रूप में आमंत्रित किये जाना संजीवनी बूटी सा लगा। साल की जगह दो साल वे निरपेक्ष भाव से वहाँ रहे और किसानों की आत्महत्याओं पर आधारित अपना उपन्यास ‘फांस’ पूरा करते रहे। से.राम यात्री के आने से वातावरण के आत्मीय बन जाने का भी जिक्र लेखक ने किया है। इसके अतिरिक्त रघुवीर सहाय, सुरेश शर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, ऋतुराज और दूध नाथ सिंह आदि अतिथि लेखक के रूप में आए। राय साहब के कार्यकाल के बाद ये अच्छी परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

निदा फ़ाज़ली के शेर ‘हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसे भी देखना हो कई बार देखना” कि रोशनी में लेखक ने एक अन्य संस्मरण ‘शुचिता और पारदर्शिता के शिखर’ अपने निजी दायरे में शामिल ईमानदार व कर्मठ पुलिस अधिकारी  डॉ.भूपेन्द्र सिंह जी को याद किया है। भय, आश्चर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ते इस संस्मरण में लेखक ने हमारी उस सामाजिक कंडीशनिग पर सवाल भी उठाया है, जो आमतौर पर पुलिस को भ्रष्ट समझती है। लोग इसीलिए पुलिस से भय खाते हैं और अध्यापक की नौकरी से ऊपर पुलिस को समझते हैं। फिर लेखक स्वयं ही आकलन करते हैं कि लोग-बाग जब गांधी जी को बुरा-भला कहने से बाज नहीं आते तो भला आम पुलिसवालों की क्या बात कह जा सकती है। आगे भावुक हृदय के स्वामी भूपेन्द्र सिंह जी के पुलिस महानिदेशक का पदभार ग्रहण करने के बाद भी “पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ मिलकर काम करने की नीति पर अडिग रहना, लेखक के मूल्यांकन की पुष्टि करता है।

वरिष्ठ और लोकप्रिय आलोचक नामवर सिंह जी के ऊपर लिखे गए संस्मरण ‘नामवर को देखते सुनते हुए” में लेखक जिस बेबाकी से अपनी कलम चलाते हैं वह वंदनीय है। वंदनीय इसलिए कि अधिकांशतः हम किसी व्यक्ति को उसकी औरा में देखने के आदी होते हैं, उसके इतर कुछ भी देख-सुन पाना संभव नहीं होता है। लेखक के अनुसार उन्हें विरोध में रहना पसंद था और अपना विरोधी चुन लेने के पश्चात वे विरोध की राजनीति अपनाते थे। मौका देखकर सनसनीखेज वक्तव्य देना, अपने दिए वक्तव्य या स्थापना को काट कर किसी दूसरी स्थापना को जन्म देना, दिए गए विषय पर वक्तव्य न देकर अन्य पर वक्तव्य देकर आयोजकों और श्रोताओं को चौकाना उनकी आदतों में शुमार था। जो एक वक्ता के तौर पर चमत्कार से कम नहीं लगता, लेकिन उनके आलोचनात्मक साहित्य पर काम करने वालों को भ्रमित करने वाला है। नामवर सिंह जी कि स्मृति, ज्ञान-कौशल की सराहना करते हुए उनपर की गई टिप्पणी में लेखक ने कुछ ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं उनसे आने वाले समय में साहित्य जगत दो-चार अवश्य होगा और संभावना है कि आगे औरा से इतर लिखे-कहे को नापने-परखने की प्रवृत्ति निर्मित हो। 

 पुस्तक के अन्य संस्मरण यथा ‘सूर्यनगरी जोधपुर, झुंझुनू वाया रानी सती’, महात्मा गांधी की छत्रछाया में पोदार कॉलेज में भी पाठकों को साहित्य और शिक्षा जगत की जुगलबंदी के महत्वपूर्ण प्रसंग जानने-सुनने को मिलेंगे। पुस्तक के अंतिम संस्मरण ‘राजस्थान साहित्य अकादमी की उजली यादें में वे 80 के दशक के उस समय को याद करते हैं, जो राजस्थान साहित्य अकादमी का स्वर्ण काल था। अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ लेखकों की अपनी पत्रिका थी और उसकी रचनात्मकता बनी हुई थी। कालांतर में यह पत्रिका अकादमिक होती गई और उसमें लेखकों से अधिक अध्यापक छपने लगे। संस्मरण की शुरुआत वे प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव ‘वेदव्यास’ और अकादमी के अध्यक्ष ‘प्रकाश आतुर’ के बीच डोलते लेखक समुदाय की दुविधा से करते हैं । शायद ये शाश्वत प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि लेखक के लिए अकादमी या संघ की कितनी आवश्यकता है। वे स्पष्ट करते हैं कि अकादमी या संघ किसी को लेखक नहीं बनाते हैं, जिसमें प्रतिभा है वह उभरकर आएगा ही। अंत तक वे अपने विचार पर कायम रहते हैं पर यह भी स्पष्ट करते हैं कि लेखक की क्षमता को मूल्यांकित करने और उसे धार देने में दोनों की भूमिका असंदिग्ध है । इसलिए अकादमिक मंच हर रचना और रचनाकार के लिए खुले रहने चाहिए और अकादमी की पत्रिका को सिर्फ अकादमिक होने से बचते हुए अधिक से अधिक रचनात्मक होना चाहिए।

अंत में मैं यही कहूँगी कि ‘मेरे नक्शे के मुताबिक’ पढ़ते हुए लेखक की स्मृति और साफ़गोई की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता। सुबह मिले को शाम को भूलने के इस दौर में पुराने कितने नामों को उनके कामों को याद रखना, विश्लेषित करना निश्चित रूप से श्रम साध्य कार्य है, तो साहित्य और शिक्षा के गलियारों की दबी-छुपी जुगलबंदी पर रोशनी डालना साहस का। लेखक ने दोनों को बखूबी निभाया है। लेखक के जीवन में ए एम यू का कितना महत्व है ये पुस्तक पढ़ते हुए ज्ञात हो जाता है। जैसे ए एम यू केंद्र हो, और उससे लेखक के जीवन की अन्य त्रिज्याएँ जुड़ी हों। भविष्य की ही नहीं बचपन और अतीत की भी। संस्मरण विधा के दो अन्य स्तंभ रोचकता और भाषा भी होती है। अगर भाषा की बात करूँ तो हिंदी का वो भाषाई आस्वाद मिला, जो इन दिनों नई वाली हिंदी के शोर में दुर्लभ होता जा रहा है। साहित्यिक, सुगठित भाषा की रवानगी देखते ही बनती है। रोचकता ऐसी कि एक बार पुस्तक उठाने के बाद पाठक उसे छोड़ नहीं सकता। मुझे लगता है साहित्य और शिक्षा से जुड़े व्यक्तियों को ये पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए । ये पुस्तक पाठकों के लिए हिंदी साहित्य के समकालीन इतिहास का एक ऐसा द्वार खोलती है, जो भाषा, कथ्य, शैली से अंततः उनकी अभिरुचि, भाषा, ज्ञान और श्रद्धा को पुष्पित पल्लवित करने के लिए खाद -पानी का काम करती है। 

पुस्तक के लिए लेखक को बधाई व शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी 

कथाकार   

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