विश्वामित्र -स्त्री की दृष्टि से रचा गया पुरुष आख्यान

राजा सुत थे विश्वरथ, सुंदर और समर्थ ।

धर्म सहित था भाग्य में, काम मोक्ष औ अर्थ॥

हमारी पौराणिक कथाओं में बहुत कुछ ऐसा है जो अनकहा या अनसुना रह गया है। सदियों से श्रुत परंपरा से जो कथा चली आ रही है, आमतौर पर उसे ही सत्य मान लिया जाता रहा है। क्योंकि अधिकांशतः लोग पुरानी किताबें उठाकर पढ़ने में रुचि नहीं रखते। अलबत्ता समय-समय पर साहित्यकार उसे नई दृष्टि के साथ देखते और प्रस्तुत करते रहे हैं। क्योंकि अधिकांशतः ग्रंथ पुरुषों के द्वारा लिखे गए हैं। इसलिए की लेखिकाएँ उन्हें स्त्री दृष्टि से व्याख्यायित करने के लिए कलम लेकर उतरी। कितने ही उपन्यास हाल में पौराणिक पात्रों को लेकर लिखे गए हैं।

कविता के क्षेत्र में भी कई प्रयोग हुए हैं। उसे शृंखला में ‘विश्वामित्र’ अपने आप में अनूठा है क्योंकि एक स्त्री अपनी दृष्टि से पुरुष पात्र को समझने व समझाने का कार्य कर रही है। विश्वामित्र का चरित चित्रण आसान नहीं है। वे एक राजा है, एक योगी है, और एक प्रेमी भी। एक ऐसा पात्र जिसके इतने सारे रंग हों उसे रचना, आसान नहीं है। जिसने क्षत्रिय धर्म के बंधन, प्रेम के बंधन, सत्ता के बंधन तोड़े हों, उसे छंदों के बंधन में बंधना कहाँ सुहाया होगा। लेकिन सुलेखा जी ने ये मुश्किल काम कर दिखाया। इसके लिए उन्होंने दोहा विधा को चुना है । विश्वामित्र के परिचय में वे लिखती हैं कि-

कुलभूषण था गाधि का रत्ना का था लाल ।

अद्भुत क्षत्रिय तेज से, सदा चमकता भाल ।।

कामधेनु नंदिनी के प्रति भी उनका अनुराग निज हितों से कहीं ऊपर आकाल में तड़पती प्रजा के लिए था। वे एक राजा का धर्म निभाना चाहते थे। लेकिन परिस्थितियों ने संयोग रचा और वे ऋषि वशिष्ठ को समझाने के स्थान पर अधिकार पूर्वक गाय को ले जाने लगे। शायद नियति ब्रह्मऋषि के सामने उन्हें छोटा महसूस करा कर तपस्या के लिए प्रेरित कर रही थी। इसे पढ़ते हुए मुझे मैथलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ याद आई, जहां उन्होंने कैकेयी को सौतेली माँ की कुटिलता से मुक्त कर उनका मानवीय विचलन दिखाकर एक नई दृष्टि दी थी। यहाँ सुलेखा जी लिखती हैं कि

सुनिए मुनिवर राज्य में, भारी पड़ा आकाल।

लाने मुझको नंदिनी, भेजा है महिपाल॥

वशिष्ठ इस दैव योजना को समझते हैं। वे एक जगह अरुंधती से कहते हैं कि

सुनकर भार्या के वचन बोले मुनि वर धीर।

अरुंधती अब जान लो, कुछ बातें गंभीर ॥

ऋषि ऋीचीक का पुण्य है, यह रत्ना का लाल।

तपोव्रती बनना लिखा है इस भूपति भाल ॥

इतिहास को खंगालते हुए उन्होंने विश्वामित्र को अहंकारी और कामांन्ध के टैग से मुक्त करते हुए मानवीय दृष्टि से देखा है। उनके विश्वामित्र की तपस्या रंभा भी भंग नहीं कर पाई । वे मेनका के प्रेम और समर्पण से डिगे। वहीं मेनका के जाने पर विचलित होकर इन्द्र से युद्ध नहीं करने लगे। यहाँ उनके क्रोध का वैसा स्वरूप नहीं दिखता, जैसा आमतौर पर आरोपित किया जाता है।

आई महि पर मेनका, कर अनुपम शृंगार।

देख गाधि सुत रूप को स्वयं गई हिय हार ।।

X x x

देह प्रेम परिणय बिना, आर्यों में है पाप।

स्वीकारें पति रूप में, देवी मुझको आप॥

साहित्यिक परंपरा में पौराणिक पात्रों को देखने के कई तरीके प्रचलित हैं।एक उनके विषय अनुराग को केंद्र में रखना और दूसरा उनके उत्तम कार्यों के साथ उनकी मानवीय बुराइयों के प्रति उदार रहना। किसे क्या अच्छा लगता है ये सोच कर लिखना साहित्यकार का काम नहीं है, न होना चाहिए। उसे अपनी बात तर्क पूर्ण विवेक सम्मत ढंग से रखनी चाहिए। इस लिहाज़ से ये कृति अच्छी बन पड़ी है। वे पूर्वाग्रहों से विश्वामित्र को मुक्ति दिलाती हैं और सिद्ध करती है कि इतिहास में उन्हें समझने में भूल हुई है ।

पहली ही कृति में विश्वामित्र जैसे पात्र को चुनना और उसे खंडकाव्य में दोहों में प्रस्तुत करना किसी भी लेखक के लिए चुनौती है। सुलेखा जी ने न सिर्फ ये चुनौती स्वीकारी है बल्कि उसमें पूरी तरह से सफल हुई हैं।

उनके शुभारंभ की बधाई के साथ अनवरत साहित्यिक यात्रा के लिए अनंत शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी

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