सृजन पथ- व्यक्ति से समष्टि की यात्रा

कविता क्या है? इस विषय पर विद्वान मनीषी आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि, “जब कवि जगत के तमाम भौतिक रूपों और व्यापारों के सामने अपनी पृथक् सत्ता की धारणा से छूटकर—अपने आपको बिल्कुल भूलकर—विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त-हृदय हो जाता है। जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं।”
मुझे लगता है कविता व्यक्ति की निज से समष्टि की यात्रा है। कविता वही सार्थक है, जहाँ कवि अपने मन की कहता है पर पाठक जब पढ़ता है तो उसे लगता है कि बात उसके मन की हो रही है । व्यक्ति से समष्टि की ये यात्रा ही सृजन पथ है, जिस पर हर कवि को चलना ही है। भावों और विचारों का ऐसा ही खूबसूरत साझा संग्रह युवा कवयित्री सुप्रसन्ना झा लेकर आई हैं, जिसमें उन्होंने सृजन पथ पर अपने साथ-साथ अन्य कवियों-कवयित्रियों की कविताओं के पुष्प बिछाएँ हैं।

सृजन पथ- व्यक्ति से समष्टि की यात्रा

सुप्रसन्ना ने अपनी कविताओं में मानव मन के अनछुए कोनों का स्पर्श किया है। इसकी कविताएँ आम दुखों की बानगी नहीं हैं बल्कि दुनिया को देखने समझने की यात्रा है। जैसे माली पूरे बाग में बीज बोता चलता है, कवयित्री का उद्देश्य भी यही प्रतीत होता है कि जो कुछ जाना समझा है उसे बांटते चलना है।
आध्यात्म कहता है कि प्रकृति और पुरुष एक ही आत्म के दो आयाम है जिसपर माया ने पर्दा डाला है। इन्हें हम भले ही जड़ और चेतन कह कर संबोधित करें परंतु जड़ चेतना और चेतन चेतना में कुछ तो साम्य है, जो इनके नियम एक से हैं। कवयित्री इन्हीं अंतरसंबंधों को समझने-समझाने का प्रयास करती हैं- जैसे कविता “सुंदर सा पुष्प” में वे खिले हुए पुष्प की तुलना हंसमुख स्वभाव वाले व्यक्ति से करती हैं। जिस तरह खिले हुए पुष्प को देखकर हम नहीं जान पाते कि वह कितने संघर्ष से खिला है। खिलने की राह में उसने कितनी पीड़ाएँ झेली हैं, उसी तरह से खिले और प्रसन्न मुख लोगों के जीवन के दुखों को समझने के लिए गहरी दृष्टि चाहिए। अंततः विजयी वही है जिसके अंदर परिस्थितियों को संभालने की क्षमता अधिक है –
एक सुंदर पुष्प
सभी को आकर्षित करता है
परंतु विकट परिस्थिति में इसका खिले रहना
हमें एक जीवन संदेश देता है
इसी तरह कविता “पेड़ की शाख” में वे गिरते हुए पत्तों की तुलना, जीवन पथ में छोड़ जाने वाले रिश्तों से करती हैं। वे ज़िंदगी की सच्चाई बयां करती हैं कि जो आज है जरूरी नहीं वो कल हो ही।
सूखे पत्तों से
पेड़ की साख से कुछ रिश्ते झड़ रहें हैं
थोड़ी सी आँधियाँ उड़ा ले जाती है अपने साथ
और हम मौन खड़े देखते रह जाते हैं”
“त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम; देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।“ कहकर भले ही पुरुष ने स्त्री मन को समझने की अपनी ज़िम्मेदारी से पल झाड़ लिया हो पर स्त्री के मन की साध स्त्री बेहतर तरीके से लेती रही है। सुप्रसन्ना जी की स्त्री विषयक कविताएँ इसका प्रमाण हैं। कहते हैं कि स्त्री की एक छठी इंद्रीय भी होती है, जिससे वह खतरों को पहले से ही भांप लेती हैं। कविता “स्त्री की दृष्टि” में वे लिखती हैं –
“स्त्री की दृष्टि बहुत पैनी होती है
वह अपने दायें -बाएँ आंक लेती है लोगों को
सही गलत की पहचान होती है उसमें
कहाँ अर्ध, कहाँ पूर्ण विराम लगाना जरूरी है
वह सब समझ जाती है”
आज की बदली हुई परिस्थिति में जब स्त्री भी निरंकुश पुरुष की भांति होती जा रही है तब वे वह उसे आड़े हाथों लेतीं हैं। वे कहती हैं कि स्त्री को तय करना होगा कि उसे ‘बदला या बदलाव’ में से कौन सी राह चुननी है। साथ में यह भी कहती हैं कि समझदारी और सौहार्द भरा जीवन श्रेयस्कर है।
आओ हम एक दीप जलाएँ
सद्भावना और सदविचार जगाएँ”
X x x
स्त्रियाँ स्नेह की सरिता
सहनशील, ममता मयी हुआ करतीं थीं
किन्तु अब ये हिंसात्मक
द्वेष से भरी, परतिशोध में जलती
दिखाई देती हैं
कवयित्री ने पौराणिक पात्रों को भी नई दृष्टि से देखने का प्रयास किया है । वे गांधारी के आँखों पर पट्टी बांधने का विरोध करते हुए कहती हैं कि गांधारी ने पति धर्म तो निभाया पर माता का धर्म निभाना भूल गई। अगर वे स्वयं पट्टी न बाँधती अपने बच्चों को बेहतर संस्कार दे पातीं। ये परंपरा आज भी चली आ रही है। जिस स्त्री की अपनी कोई दृष्टि नहीं होती, उसका दायरा बहुत सीमित होता है।
गांधारी, जिसने पति धर्म के लिए
अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली
पर क्या पुत्रों के लिए उसका ये निर्णय उचित था
अन्य कवयित्रियों में शकुंतला प्रसाद अपनी कविताओं में जीवन के विविध आयामों को लेती हैं। ‘विपदा” में वे आपदा-विपदा से न घबराकर उससे टकराने का साहस देती हैं। बाल्टी, ढलती किरणें , सौगात या याद में वे जीवन के आस पास देखे सुने अनुभवों को सँजोने का प्रयास करती हैं।
बंद आँखों में सपने
बुनते हैं, पलते हैं
आँखें खोलते ही उन्हें आकार देने का
जतन शुरू हो जाता है
रेखा भाटिया अपनी कविताओं में बदलते समय में माता -पिता का ध्यान रखने वाली बेटियों पर दिल खोलकर लिखती हैं। ‘जीवन के पुरुष” नामक कविता में वे महिलाओं पर हाथ उठाते पुरुषों और स्त्री दुखों का लेखा जोखा प्रस्तुत करती हैं। अंजू झा की कविता “बोनसाई” आगे बढ़ने की होड़ में परदेश गए बच्चों के बोनसाई में तब्दील हो गए माता-पिता के दर्द की बानगी प्रस्तुत करती हैं। अर्चना मिश्र आरशी की कविता ‘बाबूजी’ अच्छी बन पड़ी है। मनजीत शर्मा ‘मीरा’ “पहलगाम” जैसे मुद्दे को लेकर आती हैं।
विवेकानंद ठाकुर में लयात्मकता और छंद मुक्तता दोनों का प्रयोग दिखता है। यथा-
वो यौवन की चढ़ान पर मैं उम्र के ढलान पर
वो रहती एक मकान पर मेरा जीवन दहलान पर
X x x
उत्तुंग शिखर पर रहती वो आराधन शबरीमाला
अलोल करे अल्हड़पन से आलिंग में गुंजामाला
आशुतोष मिश्र की कविता “अब तेरा जाना ही सही रहेगा” एक मार्मिक कविता है। सुरेश वर्मा जी की कविताओं में एक ताजगी है। “जब गाँव छूटता है” में वे लिखते हैं –
जब गाँव छूटता है
तो महज गाँव ही नहीं छूटता
बल्कि एक साथ बहुत सारी चीजें
छूट जाती हैं
श्रीमती मीरा झा की कविताओं में एक रागात्मकता है। थोड़ी आध्यात्म की झलक दिखती है।कई स्थानों पर वाक्य विन्यास गद्य की शक्ल ले लेता है पर वह पूरे मनोयोग से शिल्प की परवाह न करते हुए अपनी बात कहती हैं। मीतू झा की कुछ कविताओं में भाषाई सौन्दर्य प्रभावित करता है। उन्होंने भी समसामयिक ‘पहलगाम’ विषय को उठाया है।
अंत में मैं यही कहूँगी कि सरल -सहज भाषा में लिखी गई ये कविताएँ आम जीवन की बानगी हैं। कहीं समय से टकराते प्रश्न हैं तो कहीं इतिहास की कारा में बंदी उपमाओं को नई दृष्टि से देखने का साहस। हर कवि का अपना औरा है, अपना विजन, जो साझा संग्रह में भी टकराता नहीं है। एक ही विषय पर लिखी गई कविताओं में भी कवियों की दृष्टि अलग है। संपादक का चयन इस मामले में महत्वपूर्ण कहा जाएगा।
मुझे विश्वास है कि नए-पुराने कवियों-कवयित्रियों के साथ बना ये ऐसा सृजन पथ है जिसकी धार समय के साथ पैनी होती जाएगी।
शुभकामनाओं सहित
वंदना बाजपेयी
पुस्तक की भूमिका से
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