खोना भी एक क्रिया है-अनुभवों की पगडंडी पर मन की नब्ज पकड़ती कहानियाँ  

 

उलझन में हूँ खो दूँ उसे कि पा लूँ करूँ क्या

खोने पे वो कुछ और है पाया तो कोई और

इब्राहीम अश्क

“लड़कियां अजीब होती हैं” जैसी कविता की रचनाकार डॉ ज्योत्सना मिश्रा जी ने जब कहानी में पाँव पसारे तो पहले ही कदम पर कविता का लालित्य गद्य में उतरता दिखाई दिया। मेडिकल से जुड़े उनके कार्यक्षेत्र ने संवेदना की भूमि पर किसी के मन की पड़ताल करने की बेहतर समझ दी तो कहानियाँ एक के बाद एक मुखर होती चली गईं। जिसकी मुनादी उन्होंने पहले कहानी संग्रह “खोना भी एक क्रिया है” ने इस पुस्तक मेले में की। सरल भाषा में संवेदना की लुनाई लिए वेरा प्रकाशन से प्रकाशित 153 पेज के इस संग्रह में छोटी-बड़ी 11 कहानियाँ हैं। अपने आस-पास देखी सुनी गई इन कहानियों की खास बात कहीं उनकी किस्सागोई और क्राफ्ट है, तो कहीं अनगढ़ता का सौन्दर्य है, तो कहीं उनके चिकित्सीय अनुभव से उतरे पात्र, संवेदना की चाशनी में पगे। उबाऊ विमर्शों की पगडंडी पर न चलते हुए उन्होंने दिल की कही है, फिर चाहें वो बबलू हो, मनवंती हो या नीमा। हल्का सा रहस्य बनाती हुई आगे बढ़ती कहानियाँ पात्रों के मनोजगत की पड़ताल करती नजर आती हैं और कानपुर का लोक चुपके से उसमें दर्ज होता जाता है।

खोना भी एक क्रिया है-अनुभवों की पगडंडी पर मन की नब्ज पकड़ती कहानियाँ  

 

सबसे पहले बात शीर्षक कहानी खोना भी एक क्रिया है..” पर l एक काव्यात्मक सा शीर्षक जो रहस्य और कौतूहल पैदा करता है, कहानी भी कुछ -कुछ उसी मिजाज की है l

एक व्यक्ति है, जो खो गया है l वह नौकरी के सिलसिले में दिल्ली से चंडीगढ़ के लिए बस में चढ़ता है, पर पहुंचता नहीं l रास्ते में बस थोड़ी देर को रुकी है, शायद वहाँ उतर गया हो, शायद कहीं और चला गया हो, शायद… शायद… शायद l मोबाइल ऑफ है, कोई सुराग नहीं है l कुछ दोस्त हैं उसके पर किसी की उसको ढूँढने में रुचि भी नहीं है l इसलिए पुलिस की भी केस में रुचि नहीं है l

उस खोए हुए लड़के की माँ बार-बार दिल्ली आती है, दोस्तों से उसे ढूँढने में मदद करने को कहती है l कुछ दिन दोस्त ढूँढने की कोशिश करते दिखते हैं फिर वही सुस्ती l अंततः माँ में अपने बेटे को किसी हादसे का शिकार मान लेती है और उसके दोस्त से अपने बेटे की प्रॉपर्टी पर अपना नाम चढ़वाने की बात करती है l

दोस्त उसको श्रद्धांजलि देने के लिए एक होटल में मिलते हैं और व्यक्ति की जिंदगी का राज  खुलता है l वो शुरू से ही सबके काम आने वाला दिलदार इंसान था, जो दूसरों की जिंदगियाँ ठीक करने में वो अपनी जिंदगी तबाह करता चलता है और अवसाद का शिकार होता गया l यानी दोस्त गए, प्रेमिका गई, नौकरी गई, उम्मीदें गई, सपने गए…. कितना कुछ खोता चल रहा है जीवन में l

लेकिन किस कीमत पर… एक अच्छी-सच्ची दुनिया देखने की मासूम सी इच्छा पर l

यहाँ खोना एक सचेतन क्रिया है l ये कहानी हमारे अंदर छिपे स्वार्थ के परदे उतार देती है, अंदर का लिजलिजापन दिखा देती है l कहानी का नायक जब मतलब का नहीं रह गया तो कोई उसे उस शिद्दत से ढूँढना भी नहीं चाहता l

लेकिन सोचिए अगर हमारे अपनों की हकीकत हमारे सामने इस तरह आ जाए तो ?

कहानी  ईशारा करती है कि हम सब खोए हुए हैं, कोई हमें ढूँढना नहीं चाहता l लोग उतना ही मतलब रखते हैं, जितना उनका स्वार्थ है l इसलिए हम भीड़ में भी खोए हुए हैं l कहानी स्पष्ट अंत ना करते हुए लेखिका ने उसे प्रतीकों के साथ छोड़ दिया है, जो मन में खलिश उपन्न करते हैं l

ज्योत्सना मिश्रा और वंदना बाजपेयी

कहानी ‘योग-वियोग’ में अगर नियोग जोड़ दिया जाए तो कहानी अपने शीर्षक से ही सब कह देती है। नियोग, जो अंधे धृतराष्ट्र के जन्म की वजह बना था। जहाँ चाहना केवल वंश वृद्धि की थी, प्रेम और स्वीकारोक्ति या स्त्री की इच्छा का कोई महत्व नहीं था। क्षण भर या योग और फिर सदा का वियोग। क्या सब कुछ इतना मशीनी है। देह से निकली डालें मन वृक्ष से उलझती नहीं हैं? संतान का आगमन माँ के लिए सबसे खूबसूरत पल होता है, लेकिन जब यह कर्तव्य बन कर रह जाए तब दृष्टिहीन (नेत्रहीन नहीं) संतान ही उत्पन्न होगी। कहानी समकाल में आते हुए प्रश्न उठाती है कि जहाँ नियोग स्त्री को मातृत्व के गौरव से युक्त करने के लिए बनाया गया था वहीं इसका दुरप्रयोग राजा-राजवाणों के वंश चलने के लिए स्त्री के ऊपर अत्याचार की हद तक किया गया। परदे के पीछे होने वाला ये अधर्म आज भी जारी है। घुप्प अंधेरे से शुरू हुई ये कहानी बड़ी ही खूबसूरती से रोशिनी पर आकर खत्म  होती है। ये रोशिनी  एक मासूम गरीब लड़की के फैसले की रोशिनी है, जिसका उजाला क्रूर लोगों को अंधेरे में डाल देता है। कहानी में वे जिस तरह से अंधेरे-उजाले का बिंब रचती हैं, प्रभावित करता है। अवांतर कथा में कहानी ओरिएंटेशन की समस्या को भी उठाती है, जो समाज द्वारा स्वीकारे न जाने के कारण कितने मासूमों को एक अतृप्त विवाह की बलिवेदी पर चढ़ा देता  है।

“रेनबो” अस्पताल के अनुभवों से उपजी कहानी प्रतीत होती है। यहाँ केंद्र में किन्नर समाज है। संयोग से इस समय किन्नर विमर्श साहित्य में अपने प्रमुख विमर्श के रूप में उभरा है । अभी कुछ दिनों पहले इसी विषय पर उर्मिला शुक्ल के उपन्यास “मैं बृहन्नला” से पर टिप्पणी लिखी थी। यहाँ भी यही प्रश्न उठता है कि क्या उनके लिए कोई खास समाज होना चाहिए? जहाँ समस्त मानवाधिकारों का हनन हो। कहानी में वे इस मुद्दे को बेहद शाइस्तगी से उठाती हैं। तीन चौथाई कहानी तक पाठक किरण के जीवन और स्त्री जीवन से जुड़ी कथा के सूत्र तलाशता है। पर कहानी जिस तरह खुलती है एक दूसरे को अपनाकर साथ निभाने का एक अलग विमर्श रचती है। अंत में तीन रघु की मुस्कान से कहानी का शीर्षक सार्थक हो जाता है। विभिन्न रंगों की सहज स्वीकृति और साथ देने से ही बनता है आकाश के वितान पार खूबसूरत रेनबो। वस्तुतः दूसरी और तीसरी कहानी एक ही बात कहती हैं कि जिसे जिस रूप में  प्रकृति ने निर्मित किया है उसे वैसा ही स्वीकार न करने से कितनी समस्याएँ उत्पन्न होती है।

“सरवन कुमार और बान मुहब्बतों का” अपने नाम के विपरीत एक बेहद गंभीर कहानी है, जो हमने अपने आस-पास के घरों में अवश्य देखी होगी। पर क्या ठहर कर सोचा भी होगा? जब इस कहानी को पढ़ा तो न जाने कितने चेहरे सामने आ गए, प्रेम के नाम पर इस प्रकार के शोषण को झेलते, तड़पते। प्रशंसा के जाल में इस तरह फँसा दिए गए कि अच्छे बेटे की छवि से निकल ही नहीं पाए। जब भी पुरुष विमर्श की बात आती है तब स्त्री द्वारा पुरुष का शोषण दर्शाया जाता है पर क्या पुरुष द्वारा भी पुरुष का शोषण हो सकता है? परिवार द्वारा भी? इतना चुपचाप पर इतना खौफ़नाक। ये कहानी उन्हीं बिंदुओं पर अंगुली रखती है। कहीं न कहीं ये कहानी आईना दिखाती है और झकझोर के रख देती है। हिन्दी साहित्य में चीजों को एकांगी तरीके से देखने का चलन है। माता-पिता बुजुर्ग हैं तो सही होंगे। शोषण उन्हीं का हो रहा होगा। बड़े भी हैं तो त्याग करते होंगे। लेकिन स्वार्थ की परतें कहीं ज्यादा गहरी हैं। जिसका शिकार सपनों से भरा बारहवीं का छात्र बबलू बनता है। कहानी सेवा के दुष्चक्र में फंसे बबलू की दैहिक आवश्यकताओं की भी सुध लेती है।

खोना भी एक क्रिया है

गृहस्थी वाले बड़े भाई, माँ और पिता यानि बप्पा और किशोर बबलू। एक सामान्य परिवार की कुंडली उस समय बदलती है जब बप्पा गिर जाते हैं और रीढ़ की हड्डी टूटटने से बेड रिडन हो जाते हैं। बड़े भाइयों के पास गृहस्थी है नौकरी है, बबलू की परीक्षाएँ तो अगले साल भी हो जाएंगी। साल दर साल बीतते जाते हैं, श्रवण पूत के रूप में प्रसिद्ध हुए बबलू के कैरियर के सपने ही नहीं विवाह के सपने भी सेवा की भेंट चढ़ जाते हैं। पूरी फैमिली कॉन्सपिरेसी यहाँ आपको देखने को मिलेगी। बाहर श्रवण पूत बबलू घर में मुफ़्त का नौकर है। पर प्रेम कब रोके रुका है? कहानी को न खोलते हुए बस इतना कहना चाहती हूँ की ये कहानी जैसे-जैसे अंत की ओर बढ़ती है बबलू के साथ पाठक भी तड़प उठता है। बबलू की कहानी लिखना किसी कथाकार के लिए आसान नहीं होता। सेवा तो धर्म है और बच्चे तो त्याग करते ही हैं की जगह उस मासूम पीड़ा को सुनना और उसमें बिना छेड़ छाड़  किए परोस देना साहस का काम है। नकारे जाने का भय भी है। सवाल यही है की आखिर पीड़ा का ऐसा कौन सा क्षेत्र है, जहां कलम का प्रवेश निषेध है? हर बबलू की पुकार सुनी जानी चाहिए, इससे पहले की बहुत देर हो जाए।

हंस कथा सम्मान के लिए नॉमिनेट की गई और तीसरा स्थान पाने वाली कहानी ‘बैगनी समंदर” एक अन्य महत्वपूर्ण और सशक्त कहानी है। इच्छाओं से भरा समंदर जो सब कुछ बहा ले जाता है पर सपने नहीं। ये कहानी एक कॉल गर्ल की है। पति की इच्छाओं और एक घर के सपने के कारण रोज थोड़ा मरती थोड़ा जीती स्त्री और उसकी नजर या नजरिए से उपजता जीवन दर्शन। इस कहानी को पढ़कर रजनी मोरवाल जी की कहानी ‘कोका किंग” की भी याद आई, जो पुरुष वेश्याओं पर आधारित थी। इस कहानी की विशेषता इसका क्राफ्ट है। कुछ पंक्तियाँ मन में ठिठकी रह जाती हैं। स्त्री इस झूठी जिंदगी से परेशान भी है, पति की चालाकी भी समझती है, इस काम को छोड़ना भी चाहती है पर….। कहानी का यथार्थवादी अंत समुंदर सा है जो लहरों संग बहा तो ले जाता है पर बार बार उसी किनारे पर पटक देता है।

 

“बिल्लियाँ रो रहीं हैं” छीजते संबद्धों और तार-तार होते रिश्तों को झेलती अवसाद ग्रस्त दो मासूम  लड़कियों की मार्मिक कहानी है। कहानी में बिल्लियों के रोने का कई बार प्रयोग होता है पर जब अंत में रहस्य खुलता है तो दर्द की एक गहरी लकीर खींच देता है। ‘उमस का हिसाब” जानकीपुल पर प्रकाशित और चर्चित हुई एक ऐसी माँ की कहानी है जो अपने बच्चे के टेढ़े होंठों के ऑपरेशन का खर्च निकालने के लिए शालीन, सुशील, संकोची, के सारे उपनाम हटाकर किसी भी हद तक जाने को तैयार है। लेकिन अपनी इच्छाओं के पूरा न होने की आशंका उसे बच्चे के साथ आत्महत्या करने पर विवश कर देती है। यूं आत्महत्या किसी समस्या का निदान नहीं होता पर यह कहानी कई प्रश्न अपने पीछे छोड़ती है। यहाँ भी लेखिका ने यथार्थ को यथार्थ की तरह बरता है। कहानी आत्महत्या के बाद आरंभ होती है। उसमें नायिका अमिता कहीं नहीं है पर एक स्त्री, एक माँ का अवसाद पूरी कहानी पर छाया रहता है। “मनवंती का ब्याह” प्रेम की मीठी चाशनी में पगी एक रोचक कथा है।

 

‘पंडे-पुजारियों और ज्योतिष पर प्रहार करती “चितकबरी छतरी” मनोरंजक कहानी है, जो धार्मिक सौहार्द की ओर ले जाती है। अपने बेटे की नौकरी के लालच में ज्योतिषी के पास गई माँ के चितकबरी छतरी ढूँढने, योग्य पात्र ढूँढने और अंत में नौकरी के लिए इस सारे मोहजाल से मुक्त होने की बानगी है ये कहानी। कुछ बातें जो इस कहानी की बहुत अच्छी और तार्किक लगीं, जैसे ज्योतिषी कहते हैं की छतरी योग्य पात्र को देना, पर नास्तिक को न देना। वह छतरी सकीना को देती है, जिसे जरूरत है और वह पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ती है। उसका तर्क है जब आयरन, कैल्शियम की गोलियां असर करते समय धर्म नहीं देखती तो पुण्य में धर्म कैसा? ये कहानी उस आम भारतीय के नजरिए को भी प्रस्तुत करती है, जहां समाज को इस तरह से बाँट कर नहीं देखा जाता।

 

अंत में यही कहूँगी कि अपने पहले संग्रह से ज्योत्सना मिश्रा जी ने पहली मजबूत दस्तक दी है और एक संभावनाशील रचनाकार के दर्शन हुए हैं। उम्मीद जगी है कि वे आगे भी अपनी कलम को गति देंगी और बेहतर रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करेंगी। चलते-चलते-

खोना हाय क्रिया बनी, रहीं बिल्लियाँ रोय

मनवंती का ब्याह भी, योग-वियोगी होय

योग वियोगी होय, समुंद्र बैगनी प्यारा

क्या था मेरा दोष, कहे बबलू बेचारा

सतरंगी से भाव, कथा कुमकुम में बोना

मांगे कुछ पल रोज, डूब जाना या खोना 

शुभकामनाओं सहित

वंदना बाजपेयी

वंदना बाजपेयी

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