“प्रेम-प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावे सोय॥”
कबीर दास
चर्चित युवा रचनाकार निधि अग्रवाल का कहानी दूसरा कहानी संग्रह ‘प्रेम एक पालतू बिल्ली” पहले कहानी संग्रह ‘अपेक्षाओं के बियाबान” के काफी लंबे अंतराल बाद आया है। रिश्तों और उनकी अवगुंठनों को निधि ने अपनी कलम से खूबसूरती से साधा था। जब इस संग्रह को उठाया तब पहले संग्रह के विस्तारित रूप का अंदाज़ा था। परंतु यह संग्रह पहले से एकदम भिन्न है। निधि का एक अलग रूप देखने को मिलता है। यहाँ सूखे हुए सूरज मुखी के फूल हैं, घर में बनी बैरकें हैं, लहरों के थपेड़ों से किनारे पर पटकी हुई डॉल्फिन है, और बिंबों में साधा बहुत कुछ ऐसा है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि इस संग्रह के पात्र उस तरह से हमारे आस-पास के पात्र नहीं है। अगर कहीं हैं भी तो वे अपनी बनाई अलग दुनिया में इस कदर खोए हैं कि उनसे मिलने उनकी दुनिया में उतरना पड़ता है। कभी वे सहजता से बतियाते हैं तो कभी कपाट बंद कर बैठ जाते हैं। कहानियाँ उनसे दोस्ती करने में समय की मांग करती हैं। अलबत्ता वाक्यों में जीवन से उपजे सहज सुंदर कोटेशन ज्यों के त्यों हैं और कहानियों को गंभीरता प्रदान करने के साथ आकर्षित भी करते हैं। कुछ गुम्फित कुछ पाश्चात्य शैली का अनुकरण करती कहानियाँ निर्मल वर्मा की परंपरा की ओर बढ़ती प्रतीत होती हैं।

कहानी संग्रह पर अपनी बात रखने के लिए ‘हॉलोंकास्ट’ हुए कहानी के अंत में लेखक द्वारा ही लिखे गए इस वाक्य से बेहतर मुझे कोई शुरूआत नहीं लगी l
“यथार्थ कल्पना से अधिक भयावह होता है। अगर आपको कोई कहानी कल्पना मात्र लगती है तो नियति ने जीवन- पुस्तिका का वह पृष्ठ अभी आपके सम्मुख पलटा नहीं है।” -लेखक
अगर दो शब्दों में कहूँ कि इन कहानियों में रिश्तों की उलझन में पहली और दूसरी पायदान का अंतर समझाने वाली चेतन नायिका नहीं है, यहाँ लहरों द्वारा किनारे पर फेंकी गई मरी हुई डॉल्फिन में अपनी परिणति देखती उदास नायिका है तो सूरज और सूरजमुखी के रिश्तों से स्वयं को मुक्त करती जीवन से जूझती नायिका भी।
शीर्षक कहानी “प्रेम: एक पालतू बिल्ली” प्रेम की ध्वनि के भीतर मन की छटपटाहट का एक अलग बिम्ब प्रस्तुत करती हैl कहानी की शुरुआत एक लड़की की खोए हुए को तलाश करने वाली एजेन्सी के एक व्यक्ति से बातचीत के साथ शुरू होती है l
लड़की बरसों पहले मिले उस लड़के से मिलने की इच्छुक है, जो उसे किसी होटल के स्विमिंग पूल पर मिला था, और “मेरी शक्ल मेंढक जैसी दिखती है” कहते हुए स्वीमिंग पूल में कूद गया था। कहानी जैसे जैसे खुलती है तो ज्ञात होता है कि आधुनिक सी दिखने वाली लड़की ने अपने से दोगुनी उम्र के रईस आदमी से शादी की है l उसके पास कहने को सब कुछ है पर एक चीज नहीं है जिसकी हर स्त्री को दरकार होती है l आज वो खुद को अपनी पालतू बिल्ली जैसा महसूस करती हैl
ऐसा कहने के पीछे लड़की के पास अपना वाजिब कारण है… पर उस लड़के ने ऐसा क्यों कहा था, उसकी सारी सोच यहीं पर अटक गई है।
सुनने वाले व्यक्ति का मन भी अतीत की कन्दराओं में उलझा हुआ है। बचपन, लड़कों के झुंड का नदी के पार जंगल में जाना और खरगोश का शिकार। हर रात के ये सपने उसे भी डराते हैं। लड़की की उलझन सुलझाते हुए वो खुद अपनी उलझन से भी रूबरू होता है। अचानक से वो खुद को खरगोश जैसा महसूस करने लगता है।
यहाँ पशु से चेहरे मिलने का बिम्ब उसकी विवशता से दो चार होना है। बिल्ली जैसा दिखना, खरगोश सा या मेंढक सा… कहानी प्रेम के नाम पर किए गए शोषण के परदे उतारती हैl एक कैद, मानसिक कैद जिसे शारीरिक चोटों की तरह सहानभूति भी नहीं मिलती।
लेकिन कभी-कभी एक सहानुभूति भरा हाथ हमें हमारे ही खोल से निकालता है। आखिर इस लड़की का इरादा क्या है?
निधि ने बिना डिटेल में जाए मात्र संकेतों से समलैंगिक संबंधों की ओर इशारा करती हैं.. जिंदगी भर खुद से भागने की वजह का भी। अपनी खोज से बेहतर कोई समाधान नहीं। कहानी के साथ-साथ आए छाप लगाते मजदूर, और घायल कुत्ता का बिम्ब कहानी को गति देते हैं।

कहानी “होलोकस्ट” से गुजरते हुए मुझे भी जयश्री रॉय का उपन्यास आया “थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान आया l उसमें उन्होंने शोषक और शोषित का मुद्दा उठाया है l जहाँ शोषक शोषित को उसकी जगह से विस्थापित कर देना चाहता हैl ये शोषण विश्व राजनीति से लेकर घर की देहरी के अंदर तक हैl उपासना की कहानी ‘सर्वाइवल’,सर्वाइवल ऑफ दा फिटेस्ट की आधारभूमि पर शोषक और शोषित के रिश्ते पर लिखी गई कहानी हैl पर निधि कि कहानी इसी बात को गहन मनोविज्ञान के आधार पर ले जाकर जिसकी सत्ता वो शोषक की जगह मन की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक गुत्थियों पर पाठक को ले जाती हैंl यहाँ शत प्रतिशत दोषी लगता व्यक्ति भी खलनायक नहीं है… वो भी फंसा है कहीं अपने मन के किसी कोर में l एक अलग तरह की होलोकास्ट, जहाँ गर्व से भरे जर्मन नहीं है न ही सर झुकाए खड़े यहूदी, पर बनी हैं बैरकें… जहां घुटन की हद तक तड़पते हैं कैदी, पर हिटलर भी मुस्करा नहीं पाता l कहानी मुझे तीन बिंदुओं पर व्यथित करती है l क्या इतिहास अपने आप को दोहराता है? क्या हम जो करते हैं उसका परिणाम सामने आता ही आता हैं? क्या घर के अंदर एक हिटलर कि उपस्थिति घर को एक दमघोटू गैस चैंबर में बदल देती है? क्या अपराधी जब समझ जाता है, तो भी इच्छित बदलाव उसमें संभव है?
कहानी एक परिवार की है जहाँ एक पिता के विरोध के बावजूद माँ बच्चों को लेकर मायके जाती हैl वहाँ छोटे बेटे की मृत्यु हो जाती हैl पिता इसका दोषी माँ को ठहराते हैं और माँ अपराधबोध से भर जाती हैl सब अपनी -अपनी चुप्पी में कैद हो जाते हैंl जो उनकी दुखद आपात मृत्यु का कारण बनता है l
बड़े होते बच्चे का यह भय…. कालांतर में अपने बच्चों की अतिसुरक्षा के रूप में सामने आता हैl एक स्वस्थ घर में फिर कैंप बन जाते हैं…. और परिणाम…l कहानी का अंत सांकेतिक है, विचलित करता है l कहानी में की स्तरों पर दवंद है l शैली थोड़ी राहस्यात्मक हैl कहानी पढ़कर पाठक प्रश्नों की एक शृंखला से जूझता हैl कुछ पात्र और घटनाएँ उसे जरूर देखी सुनी लगेंगीl जो उसे कहानी से आसानी से जोड़ देंगीl
पहली कहानी “पांचवें पुरुष की तलाश में” कला और कलाकार के अंतरसंबंधों के साथ स्त्री और पुरुष के संबंधों को भी खोलती है। पांचवें पुरुष की दास्तान एक कलाकृति के फ्रेम से होकर गुजरती है। जब स्त्री उस पाँचवे पुरुष को खोज लेती है तो कला कलाकार की तूलिका से आजाद हो जाती हैं, आजाद हो जाते हैं सूरजमुखी सूरज को देखकर ही खिलने से…. और मुक्त हुई स्त्री बढ़ चलती है सूरज मुखी से स्वयं सूरज होने की राह पर। सुंदर पर थोड़े जटिल बिंबों के साथ स्व की खोज महत्वपूर्ण संदेश देती सधी हुई कहानी है। वहीं आज के समय की महत्वपूर्ण समस्या को उठाने वाली दूसरी कहानी “पेड़ों पर उगी प्रतीक्षित आँखें” कुछ अधिक सघन हो गई है। पर्यावरण के मुद्दे को उठाती एक अन्य कहानी ‘पूँछ पर पंख” पूँछ और पंख के अपने अलहदा बिम्ब के कारण विशेष बन पड़ी है। इस कहानी को पढ़ते हुए विनीता परमार की कहानी ‘तलछट की बेटियाँ’ की याद आती है। क्योंकि उसकी ऑनलाइन चर्चा के दौरान ही इस कहानी को पढ़ा था।हमारे अस्तित्व से जुड़ा हुआ यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर बार-बार, लगातार बात होते रहना जरूरी है।
समालोचना में प्रकाशित पिता द्वारा पुत्री के दैहिक शोषण पर आधारित कहानी ‘शैतानी तुरही” अपने शिल्प के कारण पहले ही चर्चित रही है। ढोंगी बाबाओं की पोल खोलती महत्वपूर्ण कहानी “शोक पर्व” अटूट बंधन में प्रकाशित है। यह कहानी जहां अंधविश्वासों और कर्मकांडों पर प्रहार करती है, वहीं पितृसत्तमक समाज में स्त्री की दोयम स्थिति को भी रेखांकित करती है।
222 पृष्ठ का यह कहानी संग्रह अपने कवर पेज से आकर्षित करता है। निधि के पास भाषा और कहन दोनों हैं। पात्रों और कथ्य के चयन में उन्होंने प्रयोग किया है। जीवन की उदासी और ऊब से उपजी ये कहानियाँ मन की एक ऐसी दुनिया में झाँकती हैं जो सबके लिए अलग है, अलहदा है। अंत में वारका बीच पर डॉल्फिन कहानी की एक पंक्ति-
“सुख हमेशा दुख के बोझ तले दबा हुआ ही हम तक क्यों पहुंचता है?”
वंदना बाजपेयी

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