हिन्दुस्तानी मेमने- इतिहास को खोलता, खँगालता विचारपरक उपन्यास

 

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है

जंग क्या मसअलों का हल देगी

आग और ख़ून आज बख़्शेगी

भूख और एहतियाज कल देगी

वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ.अजय शर्मा का उपन्यास ‘हिन्दुस्तानी मेमने” पढ़ने के बाद युद्ध और विनाश के विरोध में लिखी साहिर लुधियानवी जी की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ गई। अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो युद्ध किसी के पक्ष में नहीं होते, न जनता के, न सरहदों के, न उन सैनिकों के जो सियासी फ़ैसलों के कारण युद्ध में झौंक दिए जाते हैं। युद्ध हर हाल में टाले जाने चाहिए पर जब आन पड़े, तो एकजुट होकर प्राणों के उत्सर्ग तक सामना करना ही धर्म है। अभी हाल में आतंकवाद के विरोध में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता से गर्वित आम भारतीय मानस, थोपे जा रहे एक अन्य युद्ध का वीरता पूर्वक सामना करने को तैयार था, लेकिन शांति के बिगुल का भी उसने उतने ही मन से स्वागत किया । ऐसी समकालीन परिस्थितियों में “हिन्दुस्तानी मेमने” जैसे उपन्यास का आना और भी प्रासंगिक हो जाता है।

हिन्दुस्तानी मेमने- इतिहास को खोलता, खँगालता विचारपरक उपन्यास

 

तीन दोस्तों की इस करूण गाथा में युद्ध की विभीषिका है, भारत के विभाजन का दर्द है, आज़ाद हिन्द फौज के उदय और विलय का इतिहास है, और साथ ही देश की तत्कालीन परिस्थितियों पर चिंतन-मंथन भी है। लेखक ने घटनाओं को निष्पक्षता से इतने ब्योरेवार रखा है कि जिन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है उनके लिए बहुत कुछ जानने समझने का अवसर भी है, ये उपन्यास। यूँ “गड़े मुर्दे उखाड़ना” कहावत नकारात्मक रूप से ली जाती है । परंतु इतिहास के संदर्भ में ये पूरा सच नहीं हैं । हमारा वर्तमान सदैव इतिहास से ही आकार लेता है। ऐसे में ये उपन्यास इतिहास से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, जिनकी बुनियाद पर स्वतंत्र भारत ने आकार लिया।

हिन्दुस्तानी मेमने

लेखक ने कहानी में प्रश्नों ऐसे गूँथ दिया है कि वे कहानी का हिस्सा बन गए हैं। लेखक के अनुसार ये प्रश्न वर्तमान की नीव हैं, इसलिए इनसे भागना उचित नहीं। उनमें से कुछ प्रश्न है कि आजाद हिन्द फौज के एक भारत सिद्धांत को दबाकर विदेशी टू नेशन थ्योरी को नेहरू और जिन्ना ने अपने -अपने देश का मुखिया बनने की लालसा में क्यों स्वीकार कर लिया? क्यों हिंदुस्तान की जनता को पहले दंगों और फिर विभाजन की त्रासदी में झोंक दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को आज़ादी दिलाने का सपना देकर झोंके गए भारतीय सैनिकों की सुधि किसी बड़े नेता ने क्यों नहीं ली। अपने देश की आज़ादी का सपना पाले अपनी धरती से दूर ये युवा आजाद हिन्द फौज में भर्ती होकर जिस दम-खम के साथ लड़े बाद में उन्हें वो सम्मान क्यों नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। पाकिस्तान में बाबर की मज़ार पर इंदिरा गांधी का जाना, इमरजेंसी, गरम दल और आज़ाद हिन्द फौज के योगदान को नकार कर गांधी जी को आज़ादी का चेहरा बनाने पर भी प्रश्न उठाए गए हैं? उपन्यास के मूल में कहीं न कहीं ये भी परिलक्षित होता है कि आज के विचारधारा वादी युग में वस्तुतः दोनों तरफ की बात सामने आनी ही चाहिए, इससे जनता सम्यक दृष्टि से इतिहास का आकलन कर सके।

इसके साथ ही उपन्यास में कई रोचक जानकारियाँ भी हैं, जैसे मसूरी का नाम मसूरी क्यों पड़ा या गन हिल को गन हिल क्यों कहते हैं। कहानी में स्केटिंग ग्राउन्ड है, पाकिस्तान की सैर है, मलाया, सिंगापुर,इम्फाल, कोहिमा है, मॉइरांग है। प्राचीन भारत की विषकन्या की तर्ज पर एस टी डी की शिकार लड़कियां है। उन्हीं के बीच में सकुरा है, जो एक फौजी के अडिग निश्चय के सामने परास्त होकर अपनी देशभक्ति की पड़ताल करती है। पक्षियों और लोगों की जिंदगी खत्म कर देने वाली गुलेल है और उसी गुलेल की चोट से जिंदगी बदलने वाली नियाम है। आजाद हिन्द फौज की स्थापना करने वाले कैप्टन मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस की वीरता, प्रतिबद्धता जीत और हार के किस्से हैं।

उपन्यास में कई स्थानों पर विदेशियों के लिए सफ़ेद कौव्वा बिम्ब का प्रयोग किया गया है। जो दो आँखें होते हुए भी एक आँख से देखता है पर उसी आँख को चारों तरफ घुमाकर हर दृश्य पर अपनी पकड़ बनाए रखता है। वहीं कोयल का बिम्ब भी है, जो कौवे के घोंसले में अंडे रख देती है, जिसे कौवी अपने अंडे समझ पाल देती है। लेकिन यहाँ पर लेखक कोयल के अंडों की तुलना भारतीय सैनिकों से करते हैं, जो फिरंगियों के लिए युद्ध लड़ रहे हैं। यहाँ सफ़ेद कौवा चालक है, वह न केवल अंडों को सेता है बल्कि उनकी उड़ान की गति, ऊंचाई, लौट के आने पर भी नियंत्रण रखता है।

लेखक बार-बार हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हैं। वे बाबर को आक्रांता बताते हैं पर भारत के कनवर्टेड मुसलमानों को एक ही शाख के दो फूल कहते है। जिनमें दाहिनी नाक में लौंग पहनना या बाई में, ईश्वर के दरबार में हाथ जोड़ना या पसारना, आदि छोटी-छोटी भिन्नताओं के बावजूद चिंतन की मूल धारा एक ही है। जिसके कारण संत और फकीर एक ही श्रेणी में आकर खड़े होते हैं और एक सा सम्मान पाते हैं। कथा के मुख्य पात्र रहीम और अजीत के माध्यम से लेखक नें यही बात रखने की कोशिश कि है। रहीम, सर्वेश्वर, और अजीत कुमायूँ के गाँव से  लेकर मसूरी और मलाया तक वैसे ही अभिन्न रूप से स्वीकार हैं।  बंटवारे से ठीक पहले ये कैसा स्नेह का बंधन था कि रहीम और अजीत कि पत्नियाँ अपने बेटे बदल लेती हैं। अनवर के हाथ में ॐ खुदवाया जाता है और दमन के हाथ में अल्लाह। जरूरत पर हिन्दू बच्चे को दूध पिलाती मुस्लिम माँ उन दिनों न माँस घर में पकाती है न खाती है। फिर कैसे एक रेखा उनके दिलों को बाँट सकती है? पर बाँटती है। और उस पार गया जिगरी दोस्त रहीम फिर कभी सर्वेश्वर और अजीत से मिल नहीं पाता है।

डॉ अजय शर्मा

लेखक के अनुसार एक शाख के इन दो फूलों को अनुसार इन्हें अलग रखने की सारी कोशिशे सियासी है। अगर सियासी न होतीं तो मुहाजिर या भारत से पाकिस्तान गए भारतीय मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया जाता है? क्यों एक मुहाजिर द्वारा रचे गए राष्ट्र गान को जनता नकार देती है और टू नेशन की आग से जन्में पाकिस्तान में कायदे आजम जिन्ना का सेकुलर सिद्धांत अपने ही देश के मुस्लिमों के बीच नाकामयाब होता है, जबकि भारत विभिन्न धर्मानुयायियों के साथ आज भी सेकुलर देश है। इससे साफ जाहिर है कि ये फूट जब जनता के मन में सियासत द्वारा इस कदर बो दी गई कि अब सियासत भी चाह कर उसे कम नहीं कर सकती। आज भी पाकिस्तान की सारी राजनीति भारत विरोध पर केंद्रित है। एक ही वृहत देश के सैनिक अपने-अपने टुकड़े की ओर से लड़कर अपने भाइयों का खून बहा रहे हैं। एक दूसरे से अनभिज्ञ अनवर और दमन का 65 के युद्ध में एक दूसरे के विरूद्ध खड़े हो जाना, पहचानना, गले मिलना और मार दिए जाना इसी कथा का दुखद विस्तार है। एक देश का सपना सँजोने वाला अजीत अपने ही दोनों बेटों को दो टुकड़ों के बलिदान होते देखना कथा को बहुत मार्मिक मोड देता है।

 

अखंड भारत से खंडित भारत की ओर बढ़ना-बढ़ाना एक रणनीति थी । जैसे लेखक ये समझाने का प्रयास करते हैं, अभी भी समय है, समझ जाओ…। लेखक भारत की डेमोग्राफी को समझे बिना बंद कमरे में बैठकर बनाई गई रेडक्लिफ रेखा पर भी प्रश्न उठाते हैं। जिसने पंजाब को बाँट दिया और नदियों का भी असमान्य बंटवारा किया। नदियों का अधिकतम पानी पाकिस्तान को मिला और उनकी सिचाई के लिए नहरें खोदने का ज़िम्मा भारत के सिर आया। उपन्यास में नेहरू की कुछ नीतियों की भी आलोचना की गई है। लेखक ने 1947 में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए हमले को तथाकथित कबीलाई हमले के स्थान पर सोची-समझी साज़िश बताया है। जिसकी योजना पाकिस्तानी हेडक्वाटरों में बनी। पाकिस्तानी सेना ने गुमनाम जिंदगी बसर कर रहे आज़ाद हिन्द फौज के कई सैनिकों को अपनी सेना में शामिल कर लिया । ये हमला उन्हीं प्रशिक्षित सैनकों द्वारा हुआ था। इमरजेंसी के दौरान प्रेस की आज़ादी छीनने के मुद्दे को भी लेखक ने पूरी शिद्दत के साथ उठाया है । संजय गांधी के निरंकुश व्यवहार को भी रेखांकित किया गया है। वहीं कुछ प्रश्न आज की सत्ता से भी टकराए हैं।

 

उपन्यास का नाम “हिन्दुस्तानी मेमने” एक लोक-कथा से प्रेरित है। कथा कुछ इस तरह है –

एक व्यापारी था । उसके पास एक गधा था और एक मेमना। एक बार गधा कहीं गिर गया और उसकी टांग टूट गई। वो सामान ढोने के काबिल नहीं रहा। घर के एक कोने में पड़ा रहता है। उसे खाना भी कम मिलने लगा । बड़े होते मेमने को उसकी दशा देखकर दुख हुआ। उसने उसे समझाया कि तुम रोज थोड़ा -थोड़ा उठने की कोशिश किया करो। गधे ने उसकी ये बात मान ली। थोड़ी -थोड़ी कोशिश से वह एक दिन वास्तव में उठ खड़ा हुआ। जैसे ही नौकर ने ये दृश्य देखा वह खुशी -खुशी मालिक को बताने गया । मालिक उस समय दोस्तों के साथ बैठ हुआ था। दोस्तों ने खबर सुनकर कहा, “ये तो बहुत बड़ी खुशखबरी है। अब तुम्हारा व्यापार फिर से खड़ा हो जाएगा। इस बात पर तो दावत होनी चाहिए। मालिक ने भी खुशी में झूमते हुए दोस्तों की दावत के लिए घर के मेमने को काटने का आदेश दे दिया।

लेखक यहाँ अंग्रेज़ी सेना में भर्ती भारतीय सैनिकों को उसे मेमने की संज्ञा देते हैं, जो दवतीय विश्व युद्ध के दौरान फिरंगियों के विश्व युद्ध के बाद देश को आज़ाद कर देने के झूठे दावे में फँसकर उनके पक्ष में युद्ध करने को तैयार हो जाते हैं, पर कटना उनकी नियति थी। देश में न उनके लिए कोई हमदर्दी है, न विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों को न भेजे जाने की कोई माँग। अपने देश से हज़ारों किलोमीटर दूर बड़े शूर-वीर सैनिक बस दूसरों के मेमने हो गए थे। पहले फिरंगियों के फिर जापानियों के फिर पाकिस्तानी हुकूमत के।

 

1940 में मलाया भेजे गए भारतीय सैनिकों की इसी त्रासदी से खुलता है इस कथा का दर्दभरा पन्ना। जहाँ अच्छे नंबरों से पास हुए सर्वेश्वर, अजीत, और रहीम अपने गुलेल चलाने की कला के कारण सरकारी नौकरी का ख्वाब दिखा मलाया में विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़ने के लिए भेज दिए जाते हैं। वहाँ वे सादे भेष में हवा, पानी, और सुरंग में जीवन व्यतीत करते जापानियों से युद्ध करने को विवश हैं। जिन जापानियों के हाथों मारे जा रहे हैं, जिन्हें मार रहें, उनसे उनके मूल देश की कोई शत्रुता नहीं है। सर्वेश्वर, अजीत भी पकड़े जाते हैं। अजीत के दुस्साहस के कारण उसकी सजा तगड़ी है।

लेकिन स्थितियाँ पलटती हैं । जापानी शौर्य देखकर फिरंगी भारतीय सैनिकों को उनके हाल पर छोड़कर जहाँ जगह मिलती है वहाँ भाग जाते हैं। इस बात को समझते ही उस समय कैप्टन मोहन सिंह आज़ाद हिन्द फौज ( INI) की नींव रखते हैं। अँग्रेज़ों के लिए लड़ने की जगह सीधे भारत की आज़ादी के लिए लड़ने की बात पर सैनिकों को जोड़ते हैं। जापानियों से संधि की जाती है । सुभाष चंद्र बोस हिटलर से मिलते हैं। युद्ध और विजय की नई रणनीतियाँ बनती हैं।

 

तस्वीर का दुखद पक्ष ये है कि जापानी सैनिक भारतीय सैनिकों पर पूर्ण विश्वास नहीं कर पाते। मलाया से फिरंगियों की वापसी के बाद भी तमाम राजनैतिक-रणनीतिक पहलों के बाद देश से फिरंगियों को हटाने की कमान आई एन आई को मिलती है । मॉइरांग फतह एक मील का पत्थर बनता है। मोईरांग वह स्थान है, जो अंग्रेज़ी शासन से सबसे पहले आज़ाद हुआ। जोश में आया जापानी और आई एन आई युग्म इम्फाल और कोहिमा में भी यही रणनीति अपनाने का प्रयास करता है । पर यहाँ अंग्रेज़ पहले से ही सतर्क थे। उनकी विशाल सेना के आगे इनकी एक नहीं चलती है। उस समय तक पर्ल हार्बर के हमले के कारण जापान की पकड़ विश्व में कमजोर पड़ी थी । ऐसे में जापानी सिपाही भारतीय सिपाहियों को फिरंगियों से भिड़ाकर एक तरह से उनका ढ़ाल की तरह इस्तेमाल करके पीछे से वापस लौटने लगे थे। धीरे -धीरे आज़ाद हिन्द फ़ौज भी विलगित हो गई । लेखक ने इन सभी घटनाक्रमों को ट्रॅकसंगत ढंग से कथा में बुन है ।

बाद में पाकिस्तान ने कश्मीर आक्रमण में भी इन सैनिकों को अपने लिए इस्तेमाल किया। जोश से भरे, ये वीर भारतीय सैनिक हर जगह केवल इस्तेमाल किये गए। क्या इसका कारण ये नहीं है कि भारतीय राजनीति की मुख्य धारा ने इनके वजूद और इनकी समस्याओं को कोई तरजीह नहीं दी। लेखक का प्रश्न है कि जब स्वतंत्रता सबके मिले-जुले प्रयास का फल है। फिर क्यों सबको बराबर मान्यता नहीं दी गई । क्यों सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के रहस्य से अभी तक पर्दा नहीं उठा है? क्या ये सच नहीं है कि इतिहास हमेशा से जीतने वाले के अनुसार लिखा जाता रहा है। चाहे राजतन्त्र हो या लोकतंत्र ।

इन तमाम प्रश्नों के बीच तीन मित्रों विशेषकर अजीत की मार्मिक कहानी चलती है। एक होनहार छात्र, गुलेल चलाने में प्रवीण योद्धा, वीर सैनिक, जो झांसे में आकर पहले पहले फिरंगियों के हित के लिए लड़ता है, बाद में आज़ाद हिन्द फ़ौज के लिए लड़ते हुए जापानियों से धोखा खाता है । जिसकी जवानी भारत में छिपे-छिपे रहने में गुजर जाती है, प्रौढ़ावस्था विभाजन का दर्द झेलते अपने दो बेटों के बिछड़ने के गम और उनकी मृत्यु में, जिसके दुख में उसकी पत्नी भी साथ छोड़ देती है। और बुढ़ापा शासन और सत्ता की ढाई चाल देखते हुए स्मृति के कोटरों में भटकने को विवश है।

 

कहानी में सुकून की तरह दो स्त्रियाँ आती है। एक सकुरा, दूसरी नियाम। सकुरा जापानी फौज से मिली हुई एस टी डी की शिकार सेक्स वर्कर है, जिसका इस्तेमाल फौज विरोधी देश के खिलाफ विष कन्या के रूप में करती है। लेकिन अजीत से मुलाकात उसके हृदय परिवर्तन की रात है। वह फौज से बगावत कर अजीत की मदद के लिए  तैयार हो जाती है। इसके लिए वह फौज द्वारा पेनिसिलींन का इंजेक्शन रोक देने और दर्दनाक मृत्यु का चयन करने से भी नहीं घबराती है। हालांकि अजीत पहले उसके निर्णय पर शक होता है फिर बेबे की बात याद करके स्वीकार कर लेता है।लेखक इसे बेहद खूबसूरती से लिखते हैं-

काली कोयल तू कित गुन काली।।

अपने प्रियतम के हउ बिरहै जाली।।

पिरहि बिहून तू कतहि सुखु पाए।।

जा होई क्रिपालु ता प्रभू मिलाए।।

देखने में ये पंक्तियां काफी साधारण सी लगती हैं, लेकिन इसका मतलब बहुत गहरा है। कोयल एक बिंब के तौर पर ली गई है। यहाँ परमात्मा की तरफ से जीवात्मा से ये कहने का प्रयास किया गया है कि, मैंने तुम्हारे मन और आत्मा को शुद्ध भेजा था। बुरे से बुरा कर्म करते हुए, मन और आत्मा मलिन हो गए और कोयल जैसा काला मन हो गया है। आत्मा तो सबकी ब्रह्म स्वरूप थी, बिना छल-कपट के थी और आनंद इसके स्वभाव में शामिल था। कोयल का मानना है, मेरी पीड़ा का मुख्य कारण वियोग है। मैं उस प्रभु को भूल चुकी हूं, जिसने मुझे नेक काम करने के लिए इस दुनिया में भेजा था।

 

दूसरी स्त्री नियाम है। नियाम मसूरी में स्केटिंग ग्राउन्ड में पहले अजीत के आने का विरोध करती है । झड़प में उसका मंगेतर अजीत पर बंदूक तानता है जवाब में अजीत गुलेल चलाता है । अपने मंगेतर को बचाने में गुलेल नियाम के गाल में लग जाती है। अजीत के लिए ये कहानी पीछे छूट जाती है पर नियाम की ज़िंदगी में यहीं से परिवर्तन आता है। मंगेतर उसके गाल के घाव को कुरूपता मानकर उसे छोड़ देता है। यहीं से उसके मन में प्रेम और आत्मा के प्रश्न जागते हैं। आध्यात्म और कला की ओर झुकाव होता है और मन में अजीत गुरु के स्थान पर स्थापित हो जाता है। आध्यामिक जन्म तो गुरु ही देता है। यही सोचकर वह हर साल एक चित्र अजीत का अवश्य बनाती है। कला की धनी लड़की अपनी कल्पना से हर साल अजीत की उम्र का परिवर्तन दिखाती है। नियाम का अंत उसे आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाता है। हालांकि कुछ पाठकों को ये हिस्सा काल्पनिक लग सकता है, पर जिन्होंने भी डॉ. अजय शर्मा को समग्र रूप से पढ़ा है वह उनका आध्यात्मिक रुझान जानता है। लेखक का अंत: ही बाह्य रूप में कहीं न कहीं प्रकट होता है।

 

कहानी के साथ-साथ लेखक फौजी जीवन की कठिनाइयों पर भी प्रकाश डालते हैं। जैसे मरते हुए साथी को छोड़कर अपनी जान बचानी है। फिर वो फ़ाके करना हो, सुरंग में रहना हो या हवा से अपने घर संदेश भेजना हो । एक मरते हुए जापानी फौजी का जिक्र उपन्यास में बड़ी गहराई से किया गया है। उसके गोलियां लगीं हैं पर वो उनको निकलवा कर एक बार में मरना नहीं चाहता है। अपने देश प्रेम के साथ धीरे-धीरे मौत को गले लगाना चाहता है। शराब के कुछ घूंट पीने की अर्ज उस खुमारी को बढ़ाने की अर्ज है। कहीं शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह याद आते हैं।  वहीं 65 के युद्ध में एक सैनिक के पीछे दूसरा सैनिक खड़ा करना रायफल को बचाने कि जद्दोजहद है।

 

कथा -पटकथा से अलग अजय शर्मा जी के उपन्यासों में एक खासियत देखने को मिलती है कि वो कथा के अंदर कथा बुनते जाते हैं और सूत्र छोड़ते जाते हैं और अंत में उनको समेटकर उपन्यास को विराट आकार देते हैं। इसमें भी उन्होंने इसी शिल्प का प्रयोग किया है। भाषा सरल-सहज है। ये उपन्यास काफ़ी जानकारियों से परिपूर्ण है, साथ ही उपन्यास का बड़ा हिस्सा पात्र के मन में चलता है। स्मृतियों के आलोक में मुख्य पात्र अजीत 1940, 1943, 47, 65, 71 व अन्य में आवाजाही करता रहता है। हमारे आप की तरह कब किस बात से कौन सी स्मृति खुल जाए, कहा नहीं जा सकता। अपनी चिर-परिचित प्रवाह पूर्णता के साथ ये उपन्यास पाठक से इतिहास के गलियारों की सचेत यात्रा की भी माँग करता है। पंजाबी लोकोक्तियाँ, कहावते, लोककथाएँ न केवल उपन्यास को रोचकता प्रदान करती हैं, बल्कि ज़मीन से जोड़ती भी हैं। यहाँ बेबे, ईजा के माद्यम से देश की मिट्टी में गुनी-बसी कई कहानियाँ जानने का अवसर मिलता है। हमेशा की तरह दर्शन और आध्यात्म का पुट कहानी को गहनता प्रदान करता है। मुख्य पात्र अजीत सैनिक है, पत्रकार है और कहानी कविता लिखने वाला लेखक भी। अलबत्ता डॉ. आकाश के आदी पाठकों को इसमें उनकी कमी महसूस हो सकती है।

 

अंत में मैं यही कहूँगी कि आज़ाद हिन्द फौज (INA) के संघर्षों को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास तत्कालीन सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियों पर प्रश्न उठाता है हुआ देश के बंटवारे और एक ही शाखा के दो फूलों  हिंदुओं और मुस्लिमों को बाँटने की सियासी चाल के चेताता हुआ भी उदास कर जाता है।

क्यों हुआ ऐसा? क्यों हम बँट गए? क्यों हम बाँट रहे हैं?

ये तो नहीं होना था…

इतिहास को सँजोते,  खंगालते, एक विचार परक उपन्यास के लिए लेखक को बधाई और शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी

वंदना बाजपेयी

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