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सेंध

सेंध

यूँ तो मंदिर में पूरे नवरात्रों में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है | पर अष्टमी , नवमी  को तो जैसे सैलाब सा उमड़ पड़ता है | हलुए पुडी  का प्रसाद  फिर कन्या भोज | मंदिर के प्रागड़ में ढेर सारी  कन्याएं रंग – बिरंगे कपडे सजी धजी सुबह से ही घूमना शुरू कर देती |इसमें से कई आस – पास के घरों में काम करने वालों की बच्चियाँ  होती | जिन्हें माँ के साथ काम पर जाने के स्थान पर एक दिन देवी बनने  का अवसर मिला था | इसे बचपना कहें या भाग्य के साथ समझौता की वो सब आज  अपने पहनावे और मान – सम्मान पर इतरा  रही थी ये जानते हुए भी की  कल से वही झूठे बर्तनों को रगड़ना है | ” प्रेजेंट ” में जीना कोई इनसे सीखे |
                                        खैर !  बरस दर बरस श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर में बढती जा रही थी | और  कन्याओ की भी |
हलुआ और पूड़ी तो ये देवियाँ  कितना खा  सकती थी | इसलिए थोडा सा चख कर सब एक जगह इकट्ठा हो जाता | जो शाम को सारी  झुग्गी बस्ती का  महा भोज  बनता | हाँ ! नकदी सब अपनी – अपनी संभाल  कर रखती  | शाम को महा भोज में किस को कितनी नकदी मिली इस पर चर्चा होती | जिसको सबसे ज्यादा मिलती वो अपने को किसी रानी से कम न समझती |

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                                                      तो आज भी सुबह से ही सजी – धजी कन्याएं मंदिर में इकट्ठी हो गयीं | श्रद्धालु आते और उस भीड़ में से मन पसंद ९ कन्याओं को  छांट  कर भोजन कराते | दक्षिणा देते | मजे की बात सब को छोटी से छोटी कन्या चाहिए | कन्या जितनी छोटी पुन्य उतना ज्यादा | आज  भी कन्याओं की भीड़ में सबसे ज्यादा तवज्जो उन दो कन्याओं को मिल रही  था जो मात्र ३ या चार साल की रही होंगी | दोनों लग भी तो बिकुल देवी सी रही थी | एक लाल घाघरा लाल चुन्नी ओढ़े थी व् दूसरी हरे घाघरे चुन्नी में थी | भरा चेहरा ,बड़ी – बड़ी आँखें और चहेरे पर  मासूमियत बढ़ाती बड़ी सी लाल बिंदी जो उनकी माताओ ने माथे पर लगा दी थी | दोपहर के दो बज रहे थे | दोनों अभी तक १५ बार तक देवी बन दक्षिणा ले चुकी थीं | उधर १० साल की सुरभि को तो किसी ने पूंछा तक नहीं | दो एक साल पहले तक उसकी भी कितनी पूँछ होती थी | अभी इतनी बड़ी तो नहीं हुई है वो | हां ! कद जरा लंबा  हो गया है | बाबा पर गया है | तो उससे क्या ? सुरभि निराश   हो चुकी थी | उसका बटुआ खाली था , और पेट भी | पर सबसे ज्यादा खालीपन उसके मन में था | वो भी एक अन्याय के कारण |जो वो बहुत देर से गुटक रही थी थी |

कला

                                            तभी   एक पति – पत्नी भीड़ की तरफ आते हुए दिखे | सभी के साथ सुरभि भी उठ खड़ी  हुई | उसे चुने जाने की आशा थी | पर उन्होंने भी सुरभि के स्थान पर उन दोनों बच्चियों को ही चुना | इस बार सुरभि से न रहा गया | और बोल ही पड़ी ,“अंकल जी वो लडकियाँ  नहीं लड़के हैं ” |परन्तु  मंदिर के इतने कोलाहल ,व्रत तोड़ने की जल्दबाजी या फटाफट पुन्य कमाने के लोभ  में किसी  ने सुना ही  नहीं | सुरभि मुँह लटका कर रह गयी |
 मंदिर के प्रांगण में देवी की मूर्ति के ठीक सामने इन मासूम देवियों की कमाई पर देवताओं की सेंध लग चुकी थी | 







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