लिए
हाथ
शिशु
कुंठा के साथ
,समाज लादने लगा
मासूम सपने
लगा डर
,हर सपने के पार
देखा करती
सपनो का
परीक्षाओं का महीना |इस महीने में ऐसी
घटनाएं आम हैं फिर भी आज मन उदास है और मैं जिक्र करना चाहती हूँ उस घटना कि जो रह –रह कर मेरे जेहन
में उभर रही है |दिल्ली में बारहवी कक्षा कि एक छात्रा नें बोर्ड परीक्षाओं से ठीक दो दिन पहले अपने
एपार्टमेंट के आठवे माले से कूद कर आत्महत्या कर ली |दो दिन बाद उसकी फिजिक्स कि
परीक्षा थी | परीक्षा गणित की भी हो सकती
थी ,हिंदी की भी |महत्वपूर्ण ये था कि
परीक्षा थी और उसके साथ था तनाव ,अपनों के सपनों कि उमीदों पर खरे उतरने का |शायद आपको यह घटना याद न हो |जरूरत भी नहीं है
याद रखने कि ,क्योंकि उस दिन आसमान से आग नहीं बरसी थी ,धरती नहीं हिली थी और
अचानक से हवा भी नहीं रुक गयी थी | स्कूल
भी खुले थे बच्चे अपने अभिवावकों ,समाज और टीचर्स के सपनो को नन्हे बस्तों में भर
कर यह बोझ लादे स्कूल गए थे | समाज कि
तुलनात्मक निगाहें अपने –अपने दृष्टिकोण से इन मासूमों को सफल –असफल घोषित करने
में लगी थी |ऐसे में कौन याद रखता कि एक मासूम
जो लाश होते हुए सपनों का बोझ ढो न
सका और सपनों के पार चला गया |
अपने ही माता –पिता के सपनों से इतना भयभीत हैं कि मृत्यु को अंगीकार करना
श्रेयस्कर समझते हैं |ये बच्चों कि उत्तरदायित्वहीनता है या माता –पिता का जरूरत
से ज्यादा उम्मीदें पलना |प्रश्न दर
प्रश्न एक उहापोह कि स्तिथि है मेरे मन में तभी मेरी कामवाली अपने तीन साल
के बेटे के साथ मंदिर से उसके
नन्हे बस्ते का पाटी –पूजन करवा कर आती
है|उसका आग्रह है यह बस्ता उस बच्चे के कंधे पर मैं ही चढ़ाऊ | मैं मुस्कुरा कर
बच्चे के कंधे पर बस्ता चढाती हूँ |उसकी माँ लगातार बोले जा रही है “देखिएगा दीदी
,ये बहुत पढेगा ,हमारी गरीबी दूर करेगा |आज भले ही मैं इसे नमक –रोटी खिलाती हूँ
हूँ ये मुझे पूड़ी –पुआ खिलाएगा |बेटा माँ से चिपक जाता है उसकी आँखों में माँ कि
आँखों के सपने भर गए हैं |हां ! ये उसे करना ही है ये वो करके रहेगा |फिर बच्चा
बस्ता उतार कर रख देता हैं |शायद भारी लग रहा था ………. पर ये भार किताबों का
तो नहीं है |
में चपरासी हैं ,ठीक ५ बजे ऑफिस से आ जाते हैं |
चौथी कक्षा में पढने वाले बेटे बिट्टू
को पढ़ाने बैठ जाते हैं | रात १० बजे तक पढ़ाना है | खेलना नहीं ,खाना नहीं ,
टीवी नहीं घूमना नहीं | बिट्टू बार –बार
खिड़की के बाहर पार्क में अपने हमउम्र बच्चों को खेलते हुए देखता है | दीपक जी गणित के सूत्र समझा रहे हैं ,बेटे के कान बाहर
से आने वाली मुझे छू ,ले कैच पकड़ पर लगे हैं | नन्हा बिट्टू पिट जाता है | आंसुओ
में पिता की कुंठा का गणतीय सूत्र कहाँ समझ आता है |जो समाज को दिखाना चाहते हैं
की वो भले ही असफल रहे हो ,नकारा साबित किये गए हो पर उन्होंने हीरा लाल पैदा किया
है |अपने यारों दोस्तों से अपने अपमान का बदला तो लेना ही है | कहाँ सोचा है इस आग
में नन्हे बैट –बॉल ,लूडो ,सांप –सीढ़ी जल गयी हैं | रात गहराते –गहराते बिट्टू कि
आँखे बोझिल हो रही हैं पर ये नींद से तो
नहीं हैं |
|कालोनी के माता –पिता व् बच्चे उस स्कूल के बारे में सोच भी नहीं सकते |नेहा ने
अपनी उम्र में सरकारी स्कूल से पढ़ाई की |औसत बुद्धि कि नेहा यह मान बैठी कि अगर वो
महंगे स्कूल में पढ़ी होती तो आज उनके हाथ में बेलन कि जगह मोटी –मोटी फाइलें
होती | पर निधि अमीर बच्चों के बीच में खुद को हीन समझने लगी | वो पढ़ाई में
पिछड़ने लगी |माँ ने झूठी शान के लिए झूठ का पहाड़ खड़ा किया मेरी बेटी फर्स्ट आती है
,वो पढने में बहुत तेज हैं ,सब तारीफ़ करते हैं |झूठ का एक बोझ निधि के सर पर सवार
हो गया | नेहा कि शान निधि कि जान पर बन आयी | अकसर निधि कि धडकन बढ़ जाती है वो
पसीने –पसीने हो जाती है |जैसे –जैसे इम्तहान करीब आ रहे हैं उसकी तबियत बिगड़ती जा रही है पर ये किसी शारीरिक बिमारी कि वजह से
तो नहीं |
के इम्तहान का परिणाम निकला है | मेरे पड़ोसी का बेटा १७ वर्षीय रितेश कुशाग्र
बुद्धि है |उसने मेहनत भी बहुत की थी | आस
–पड़ोस सबमें चर्चा थी कि रितेश आई .आई टी जरूर क्रैक कर लेगा |पर परिणाम मनोनुकूल
नहीं रहा |रितेश के घर में मातम का माहौल है |कुछ हद तक समझ में आता है |पर तभी
दूसरा परीक्षा परिणाम आता है रितेश का एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में चयन हुआ है
|घर में अभी भी मातम है | न मिठाई ,न्
बधाई |आने –जाने वाले सहानुभूति जता रहे हैं |मात्र आई .आई टी में न आना एक गुनाह
है | एक होनहार बच्चा जिसने एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में अपनी प्रतिभा के
दम पर प्रवेश पाया है माता –पिता और समाज के आगे अपराधी कि तरह खड़ा है उसकी सफलता
से ज्यादा समाज ने उस पर अन -क्वालिफाइड
का लेवेल चिपका दिया है |रितेश हीन भावना
से ग्रस्त है ,शायद हमेशा रहेगा |रितेश अक्सर रात में घर कि बालकनी में बैठा आसमान
घूरता रहता है पर तारे देखने के लिए तो
नहीं |
पास पढने आती हैं | रीमा अमीर है उसके पास
महंगी किताबे खरीदने के पैसे हैं , घर में पढने के लिए अलग कमरा है ,सब सुख –सुविधायें
हैं |सीमा गरीब है |उसे घर के काम भी करने पड़ते हैं |किताबों वैगेरह कि भी सुविधा
नहीं |दोनों डॉक्टर बनना चाहती हैं |परीक्षा परिणाम आते हैं |सीमा के नंबर अच्छे
है पर उसका चयन नहीं हुआ |रीमा के नंबर बहुत कम होने पर भी चयन हो गया है |वजह साफ़
है रीमा को आरक्षण का लाभ मिला है | क्रीमी लेयर का कानून ताक पर रखा है |होरी अभी भी २ रोटी से जूझ रहा है |
बिटुआ होटल में बर्तन मल रहा है
|रामदुलारी भाई –बहनों को पालने के कारण स्कूल का मुँह भी नहीं देख पाती है पर अमीर रीना आरक्षण का लाभ उठाती है | सीमा
अपनी सहेली को अफलता पर बधाई देती है उसकी आँखों में आंसूं हैं पर यह ख़ुशी के तो
नहीं |
इनमें से कोई भी बच्चा कभी भी छत से छलांग लगा सकता है ,पंखे से लटक
सकता है , नस काट सकता है| शायद कल –परसों ,नरसों इनमें से किसी कि खबर भी
अखबार में आये |आये भी तो क्या ,हम अखबार पढ़ कर एक तरफ रख देंगे उसकी रद्दी पर मोल
–भाव करेंगे पर अपने बच्चों के बस्तों में तुलनाएं व् अपनी इक्षाएं भरते रहेंगे
|पर एक सवाल मेरे जेहन में अभी भी उभर रहा है |ये बच्चे मरना क्यों चाहते हैं ? मरना तो
कोई नहीं चाहता |जो लोग दिन –रात मृत्यु को मांगते रहते हैं वो भी
आत्महत्या नहीं करते फिर इनकी अभी उम्र ही
क्या है |इनकी तो सपने देखने कि उम्र है| आह !दुर्भाग्य इन्हें सपनों ने ही मारा
है |पर इनके अपने सपने नहीं इनके माता –पिता के सपने ,परिवार ,समाज ,नाते –रिश्तेदारों
के सपने | जो बचपन से लाद दिए गए इन पर
बेवजह ,बेतरह |ये सोचे –समझे बगैर कि हर बच्चा एक सा नहीं होता न ही उसके सपने एक
से होते हैं |बड़ों के सपनों में इनके अपने सपने बिखर कर दब गये मर गए
और यह सपनों कि लाशों का बोझ जब न
ढो सके तो ……….. चले गए सपनों के पार
क्योकि बच्चे ही हमारा कल हैं हमारे देश का भविष्य हैं |यह सच है कि बेरोजगारी
हमारे समाज कि खुशियों को दीमक कि तरह चाट रही है ,बच्चों पर रोटी कमाने का दवाब
है पर क्या इतना ज्यादा ?आंकड़े कहते हैं कि दक्षिण के राज्यों में बच्चों ,किशोरों
द्वारा की जाने वाली आत्महत्या का प्रतिशत उत्तर के राज्यों से कहीं ज्यादा है
जबकि वहाँ शिक्षा ,प्रति व्यक्ति आय व्
रोजगार के अवसर ज्यादा है |फिर क्या कारण हो सकता है ?कारण समाज को ढूंढना है
,सरकार को ढूंढना है और सबसे बढ़कर माता –पिता
को ढूंढना है |ये उन बच्चों कि फ़ौज है जिनके माता –पिता शिक्षित हैं और
कहीं न कहीं कुंठित हैं |ये उन माँओ के
बच्चे हैं जिन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी वर्जनाओं के चलते घर कि चौखट नहीं लांघने दी गयी |ये उस समाज के
बच्चे हैं जो अभी भी “भला तेरी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद कैसे “पर अटका है |माता –पिता
अपनी कुंठाएं ,अपने अधूरे सपने मासूमों पर लाद
रहे हैं |जो उन्हें नहीं मिला बच्चा ले कर दिखाए तभी अहम् कि तुष्टि होगी |
ये दौड़ बच्चे के धरती पर पहला कदम रखने से बहुत पहले शुरू हो जाती है |कब पहली बार
पलटा ,कब बोला , कब खड़ा हुआ | समाज द्वारा
एक –एक चीज पर उसके मानसिक विकास और जीवन में सफल –असफल होने कि अलिखित रिपोर्ट
पारित कि जाती है |और क्यों न करे समाज ,यह समाज माता –पिता का समूह ही तो है जो येन केन प्रकारें अपने बच्चो को दूसरों
से श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं |
हैं तो पहल भी हमें ही करनी है | रोजगार के ज्यादा अवसर उपलब्ध हो ये सरकार का कर्तव्य है |इससे कुछ हद तक कोचिंग
सेंटरों कि मोटी फीस व् बच्चों के ऊपर सपनों का दवाब कम होगा | परन्तु मुख्य काम
माता –पिता व् समाज का है |हर माता –पिता को समझना होगा की संतान में माता –पिता के जींस आते हैं पर मन नहीं |हर बच्चा अपने
अनोखे मन के साथ एक अलहदा कृति है उसके मन
कि उड़ान ,उसका आसमान ,उसकी खुशियाँ कहीं अलग हो सकती हैं |दुखद है की माँ अपने
बच्चे कि रुचियों उसकी इक्षाओ और क्षमताओं
को समझते हुए भी उसे वो पाने के लिए प्रेरित करती है जो पड़ोसी कि नज़र में सबसे
अच्छा है| आधे मन से दौड़ी गयी ये दौड़ बच्चे को कहीं का भी नहीं रखती | असफल होने और अपनों कि नज़रों से गिरने का भय
बच्चों को आत्मघाती फैसला लेने को मजबूर
करता है | | यहाँ धयान देने योग्य यह बात
है कि बच्चों को प्रोत्साहन देना व् सफल होने के लिए प्रेरित करना और अपने किसी
ख़ास सपने को पाने का बोझ डाल देना में जमीन आसमान का अंतर है | दुनियाँ का
हर काम अच्छा है|दुनियाँ केवल किसी ख़ास कॉलेज से पढ़े डॉक्टरों ,इंजिनीयरों या किसी
ख़ास प्रोफेसन के लोगों से नहीं चलती है |हर कार्य का अपना महत्व है जिसमें बच्चे का मन रुचता हो उसे उसी के लिए
प्रोत्साहित करना चाहिए | जीवन का आनंद
केवल पैसे और ओहदे में और झूंठी प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं बल्कि उस काम में है जिसमें हमारे
बच्चे का मन जुडा हो ,जब काम
ही खेल हो जाता है तब ही सफलता के द्वार खुलते हैं ….
अपना क्षितिज
कोशिश है ……………. करके देखते हैं
