देहरी के अक्षांश पर – गृहणी के मनोविज्ञान की परतें खोलती कवितायें

देहरी के अक्षांश पर - गृहणी के मनोविज्ञान की परतें खोलती कवितायें

कविता लिखी नहीं जाती है , वो लिख जाती है , पहले मन पर फिर पन्नों पर ….एक श्रेष्ठ कविता वही है जहाँ हमारी चेतना सामूहिक चेतना को व्यक्त करती है | व्यक्ति अपने दिल की बात लिखता है और समष्टि की बात उभर कर आती है | वैसे भी देहरी के अन्दर हम स्त्रियों की पीड़ा एक दूसरे से अलग कहाँ है ?

देहरी के अक्षांश पर – गृहणी के मनोविज्ञान की परतें खोलती कवितायें 

घर परिवार की
धुरी वह
फिर भी
अधूरी वह

मोनिका शर्मा जी के काव्य संग्रह ” देहरी के अक्षांश पर पढ़ते  हुए न जाने कितने दर्द उभर आये , न जाने कितनी स्मृतियाँ ताज़ा हो गयीं और न जाने कितने सपने जिन्हें कब का दफ़न कर चुकी थी आँखों के आगे तैरने लगे | जब किसी लड़की का विवाह होता है तो अक्सर कहा जाता है ,”एक संस्कारी  लड़की की ससुराल में डोली जाती और अर्थी निकलती है “| डोली के प्रवेश द्वार और अर्थी के निकास द्वार के बीच देहरी उसकी लक्ष्मण रेखा है | जिसके अंदर  दहेज़ के ताने हैं , तरह -तरह की उपमाएं हैं , सपनों को मारे जाने की घुटन है साथ ही एक जिम्मेदारी का अहसास है कि इस देहरी के अन्दर स्वयं के अस्तित्व को नष्ट करके भी उसे सबको उनका आसमान छूने में सहायता करनी है | इस अंतर्द्वंद से हर स्त्री गुज़रती है | कभी वो कभी वो अपने स्वाभिमान और सपनों के लिए संघर्ष करती है तो कभी अपनों के लिए उन्हें स्वयं ही कुचल  देती है |

मुट्ठी भर सपनों
और अपरिचित अपनों के बीच
देहरी के पहले पायदान से आरभ होती है
गृहणी के जीवन की
अनवरत यात्रा

                  अक्सर लोग महिलाओं को कामकाजी औरतें और  घरेलु औरतों में बाँटते है परन्तु मोनिका शर्मा जी जब बात  का खंडन करती हैं तो मैं उनसे सहमत होती हूँ  …. स्त्री घर के बाहर काम करे या न करें गृहणी तो है ही | हमारे समाज में घर के बाहर काम करने वाली स्त्रियों को घरेलु जिम्मेदारियों से छूट नहीं है | स्त्री घर के बाहर कहीं भी जाए घर और उसकी जिम्मेदारियां उसके साथ होती हैं | हर मोर्चे पर जूझ रही स्त्री कितने अपराध बोध की शिकार होती है इसे देखने , समझने की फुर्सत समाज के पास कहाँ है |

                           विडम्बना ये है कि एक तरफ हम लड़कियों को शिक्षा दे कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने के सपने दिखा रहे हैं वहीँ दूसरी और शादी के बाद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो अपने सपनों को  मन के किसी तहखाने में कैद कर दें | एक चौथाई जिन्दगी जी लेने के बाद अचानक से आई ये बंदिशें उसके जीवन में कितनी उथल -पुथल लाती हैं उसकी परवाह उसे अपने सांचे में ढाल लेने की जुगत में लगा परिवार कहाँ करता है …

गृहणी का संबोधन
पाते ही मैंने
किसी गोपनीय दस्तावेज की तरह
संदूक के तले में
छुपा दी अपनी डिग्रियां
जिन्हें देखकर
कभी गर्वित हुआ करते थे
स्वयं मैं और मेरे अपने

                            फिर भी उस पीड़ा को वो हर पल झेलती है …

स्त्री के लिए
अधूरे स्वप्नों को
हर दिन जीने की
मर्मान्तक पीड़ा
गर्भपात की यंत्रणा सी है

                   
                    एक सवाल ये भी उठता है कि माता -पिता कन्यादान करके अपनी जिम्मेदारियों से उऋण कैसे हो सकते हैं | अपने घर के पौधे को पराये घर में स्वयं ही स्थापित कर वह उसे भी पराया मान लेते हैं | अब वो अपने कष्ट अपनी तकलीफ किसे बताये , किससे साझा  करे मन की गुत्थियाँ | एक तरह परायी हो अब और दूसरी तरफ पराये घर से आई हो , ये पराया शब्द उसका पीछा ही नहीं छोड़ता | जिस कारण कितनी बाते उसके मन के देहरी को लांघ कर शब्दों का रूप लेने किहिम्मत ही नहीं कर पातीं | मोनिका शर्मा जी की कविता “देह के घाव ” पढ़ते हुए सुधा अरोड़ा जी की कविता ” कम से कम एक दरवाजा तो खुला रहना चाहिए ” याद आ गयी | भरत के पक्ष में खड़े मैथिलीशरण गुप्त जब ” उसके आशय की थाह मिलेगी की किसको , जनकर जननी ही जान न पायी जिसको ” कहकर भारत के प्रति संवेदना जताते हैं | वही संवेदना युगों -युगों से स्त्री के हिस्से में नहीं आती | जैसा भी ससुराल है , अब वही तुम्हारा घर है कह कर बार -बार अपनों द्वारा ही पराई घोषित की गयी स्त्री देहरी के अंदर सब कुछ सहने को विवश हो जाती है |

अपनों के बीच
अपनी उपस्थिति ने
उसे पराये होने के अर्थ समझाए
तभी तो देख , सुन ये सारा बवाल
उसके क्षुब्ध मन में उठा एक ही सवाल
देह के घाव नहीं दिखते
जिन अपनों को
वो ह्रदय के जख्म कहाँ देख पायेंगे ?

                   संग्रह में आगे बढ़ते हुए पन्ने दर पन्ने हर स्त्री अपने ही प्रतिबिम्ब को देखती है | बार -बार वो चौंकती है अरे ये तो मैं हूँ | ये तो मेरे ही मन की बात कही है | माँ पर लिखी हुई कवितायें बहद ह्रदयस्पर्शी है | माँ की स्नेह छाया के नीचे अंकुरित हुई , युवा हुई लड़की माँ बनने के बाद ही माँ को जान पाती है | कितना भी त्याग हो , कितनी भी वेदना हो पर वो माँ  हो जाना चाहती है |

तपती दुपहरी , दहलीज पर खड़ी
इंतज़ार करती , चिंता में पड़ी
झट से बस्ता हाथ में लेकर
उसके माथे का पसीना पोछती हूँ
अब मैं माँ को समझती हूँ

                          देहरी स्त्री की लक्ष्मण रेखा अवश्य है पर उसके अंदर सांस लेती स्त्री पूरे समाज के प्रति सजग है | वो भ्रूण हत्या के प्रतिसंवेदंशील है , स्त्री अस्मिता की रक्षा के लिए आवाज़ उठाती है | बंदूकों के साए ,मनुष्यता के मोर्चे , मानुषिक प्रश्न , आखिर क्यों विक्षिप्त हुए हम आदि अनेक ऐसे रचनाएँ हैं जो घर परिवार को संभालती रसोई औ आँगन के बीच पिसती स्त्री की व्यापक सोच को दर्शाती हैं |

                          कुल मिला कर देखा जाए तो ” देहरी के अक्षांश पर “जिस पर समस्त  सृष्टि टिकी हुई है ,  स्त्री मन की छोटी -छोटी बातें हैं जिनके गहरे और व्यापक अर्थ निकलते हैं | संग्रह की सारी  कवितायें पाठक को बाँध लेने की क्षमता रखती हैं , पाठक कविता पढने के बाद बहुत देर तक उसमें विचरता रहता है |  स्त्रियों को तो ये कवितायें बिलकुल अपनी सी लगती हैं पर मुझे लगता है स्त्रियों के साथ -साथ पुरुषों को भी ये संग्रह अवश्य पढना चाहिए | मोनिका जी जब अपनी बात रखती है तो बहुत उग्र नहीं हो जाती | उनका विरोध भी बहुत नम्र और मर्यादित है | जो बस ठहर कर सुने जाने और उस पर विचार करने की अपेक्षा रखती हैं  | आज स्त्री विमर्श के नाम पर जिस तरह से अमर्यादित साहित्य रचा जा रहा है उससे  आम पाठक जुड़ नहीं पाता क्योंकि वो उसे अपने घर की स्त्रियों की आवाज़ नहीं लगती | किसी भी परिवर्तन की शुरुआत जमीन से जुडी होनी चाहिए | स्त्री -पुरुष समानता की बातें तब आकर लेंगी जब  देहरी के अन्दर कैद स्त्रियों की  सिसकियाँ सुनी जाए | परिवर्तन की शुरुआत घर की देहरी से होनी है |

                   संग्रह का कवर पेज बहुत ही आकर्षक है  जो  अपने आप में बहुत कुछ कह देता है | बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस संग्रह में त्रुटिहीन १०० पेज हैं |  अगर आप अपनी सी लगने वाली  कुछ सार्थक कवितायें पढना चाहते हैं तो यह संग्रह आप के लिए उपयुक्त विकल्प है|

वंदना बाजपेयी

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