आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहानी (विशेषकर हिंदी की प्रारंभिक कहानियों) को ‘लोक-जीवन और यथार्थ’ का दर्पण माना है। उनके अनुसार, सच्ची कहानी वही है जो हृदय को स्पर्श करे, चरित्र का मनोवैज्ञानिक चित्रण करे और समाज को जीवन की वास्तविक दशाओं से जोड़कर ‘लोक-मंगल’ की भावना का प्रसार करे।
समय बदल कहानियों का रूप-स्वरूप बदला। कहीं वे शिल्प और भाषा के स्तर पर कसी गई तो कहीं उनके कहने का ढब ही बदल दिया गया। फिर भी कहानी का मुख्य गुण रहा कि वो अपने समकाल को कैसे दर्ज कर रही है। वहीं एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या रचनात्मकता का पुरुष स्वर स्त्री स्वर से भिन्न हैं? इधर कई साहित्यिक पेजों की रील में सुनने को मिला कि पुरुष कथाकारों के बरक्स स्त्रियाँ नॉस्टेलजिया में कम जाती हैं क्योंकि उनके लिए पिछली सदी की शक्ल कुछ अलग थी। प्रेम के संदर्भ में भी स्त्री स्वर तिलिस्म के इतर अधिक सतर्क दिखता है और प्रेम । इन्हीं प्रश्नों के साथ जून महीने में विभिन्न स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित 6 कथाकारों की 6 कहानियों को लेकर पड़ताल करने का प्रयास किया है। इसमें कथादेश में प्रकाशित बारूद (उर्मिला शुक्ल) मनटुटिया (कमलेश), हंस में कौन सी राह (सिनीवाली) छाया नृत्य (राकेश बिहारी), विगत की व्याधि (प्रियंका ओम), समालोचना में चाबी (कैफ़ी हाशमी) और गोल चक्कर में कॉटन कैंडी (मनीष वैद्य) को लिया है। सबसे पहले उपरोक्त कहानियों की संक्षिप्त समीक्षा और उसके बाद विवेचना।
6 कथाकार 6 कहानियाँ – बदलते समय की दस्तक
चाबी-कैफ़ी हाशमी
युवा कथाकार कैफ़ी हाशमी की कहानी एक चाबी से कई ताले खोलती है। इस कहानी का ताना बाना इस तरह बुना गया है कि मिथक, इतिहास, अतीत और खास आज का समय गूँथा हुआ है। यूं कहानी की शुरुआत का वाक्य “हमारे समय का अभिशाप कई प्रेम-संबंधों का होना नहीं है बल्कि कई सारे लोन का होना है. यह आपको अंदर तक तोड़ देता है.” कहानी का सूत्र दे देता है। फिर भी ये कहानी की विशेषता है कि जानने के बाद भी 25 हजार शब्दों की ये कहानी अपने आप को एक झटके में पढ़वा ले जाती है।
कहानी आज के समय के उस अकेलेपन से जूझती है, जहां लोगों को शहर में खाने-पहनने लायक नौकरी तो मिल गई है पर उनकी इच्छाओं को पंख लग गए हैं। इन इच्छाओं को पूरा करने का आसान सा उपाय है क्रेडिट कार्ड। क्रेडिट कार्ड समस्या नहीं है, समस्या है उसकी ई एम आई। निदान है दूसरा क्रेडिट कार्ड। इस तरह से हर किसी के पास क्रेडिट कार्ड का एक बंडल है। अकेलेपन का कारण ही ये क्रेडिट कार्ड और ई एम आई भरने के लिए पार्ट टाइम जॉब हैं।
कहानी में नायक अशद अपने जन्मदिन के लिए एक ऍप BuddyAtDoor से दो लोगों को बुलाता है। किस्से कहानियों में अपने दादाजी व पिता का किस्सा बताता है। जिनकी मृत्यु 36 वर्ष की उम्र में हुई । कहानी में नायक का भी यह 36 वां जन्मदिन है। इस रहस्य रोमांच के साथ कहानी कहीं न कहीं यह स्थापित करती है कि जो डर गया वो मर गया। तेजी से घटते घटना क्रमों के बीच मृत्यु के देवता का एक बच्ची के रूप में आना डर पर जीत का प्रतीक है। लेकिन क्या ये सदा के लिए है?
इस कहानी की खास बात है नायक के लिए वह की जगह तुम का प्रयोग। तुम सम्बोधन से लगता है कि कहानी हर पाठक के लिए हैं। भले ही कुछ प्रयोग खटके हों फिर भी ये एक याद रह जाने वाली सुंदर कहानी है।

कौन सी राह- सिनीवाली
“देखिये ई धौन्स तो नहीं सहेंगे हम पहले वाला जमाना अब नहीं रहा जब आप हमारे बाप दादा को कहते थे कि उठ त उठ, बैठ त बैठ। वह सब समय गंगा जी में भंसिया गया है इ जबरदस्ती तो नए चलेगा।
उपरोक्त पंक्तियाँ सिनीवाली शर्मा की कहानी “कौन सी राह” की हैं। ये कहानी किसानों को फसल की कटाई के समय मजदूरों के न मिलने से होने वाली दिक्कतों को केंद्र में रखकर बुनी गई है। हालांकि सरकार का आदेश है कि फसल की कटाई और बुवाई के समय मजदूरों को काम न दिया जाए ताकि किसानों को मजदूरों की कमी की समस्या से जूझना न पड़े। परंतु ये योजनाएँ भी हवा-हवाई हैं। दिक्कतें वही जस की तस हैं।
कहानी भोर होने से पहले मसूर की कटाई में लगी महिलाओं की चुहल से शुरू होती है। आखिर हँसी-मजाक काम के बोझ को हल्का कर देता है।
“भक्क चाची! भाभी का साड़ी तो कल्हे मसुरी उखाड़ते हुए देखे थे। सोचे आज जो साड़ी पहिनी होगी ऊ भी तो लहकदार ही होगा। कल त उतना जनानी- मरदाना के बीच में मसुरी कटनी करते हुए खूब चमक रही थी भाभी…”
लेकिन काम खत्म होते ही माहौल बदलता है और खेत के मालिक गोपाल और मजदूर टिनुकिया के बीच विवाद का रूप ले लेता है। थोड़ी देर पहले चूड़ी खनका कर गोपाल को रिझाने का मजाक करने वाली स्त्री उसके ऊपर छेड़छाड़ का आरोप लगा देती है। बात पुलिस तक पहुँच जाती है।
‘चार बोझा के बराबर त अकेला एक बोझा बाँधे हो। वाह रे वाह हमारा खेत और हम ही से धूरतय”
कभी किसानों की जी हजूरी और एक इशारे पर सिर के बल खड़े रहने वाले मजदूरों की तुलना में आज के मजदूरों के बदलते तेवरों को बखूबी दर्शाती है कहानी। ये हिम्मत उसे मनरेगा जैसी योजनाओं से आई है, जिसने उसके लिए समृद्धि के रास्ते खोले हैं, सपने देखने की हिम्मत दी है। वह भी अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। परंतु कहानी सवाल उठाती है कि इसमें किसान कहीं पीछे छूट गया है। उसके लिए लागू योजनाएँ अधिकतर कागजी हैं।
आखिर ऐसी कौन सी राह है जो दोनों को विकास का समान अवसर दे-
“आदमी चाहे आसमान छू ले पर पेट भरने के लिए वह माटी की ओर ही देखेगा। हम मजदूरों और किसानों के बिना पेट नहीं भर सकता।’’
ग्रामीण संस्कृति, लोक भाषा, सहज संवाद अदायगी से आगे बढ़ती कहानी पाठक के लिए ग्रामीण समाज का एक झरोखा खोल देती है और बारीकी से बुनी गई इस कहानी के साथ पाठक भी मसुरी के खेत में घूमने लगता है। इस कहानी के साथ ही सिनीवाली ने काफी दिनों बाद गाँव की ओर रुख किया है जो सुखद है।

विगत की व्याधि- प्रियंका ओम
प्रियंका ओम की कहानी ‘विगत की व्याधि’ मनोरोगों के बारे में फैले कुहासे के भीतर झाँकने का प्रयास करती है। कितनी आसानी से हम अपनों को भी काला, मोटा, छोटा कह देते हैं पर हमारे लगाए ये टैग किसी के मन में कितने गहरे धँस जाते हैं, ये सोचने की फुरसत हमें कहाँ है। कई बार हमारा दबाया हुआ यही कल भविष्य में मनोरोग बनकर आता है। स्त्रियों के मामले में बात और भी गंभीर है क्योंकि अधिकतर स्त्रियाँ घर-परिवार की नींव बचाए रखने के लिए चुप्पी ओढ़ लेती हैं। जबरन दबाई गई विरोध की यह लहरें कालांतर में मन से एक अलग लिपि में सुनी जाती हैं।
स्कित्ज़ोफ़्रेनिया एक ऐसा ही मनोरोग है। इसमें पीड़ित कल्पना और यथार्थ की दुनिया में आता-जाता रहता है। इसके रूप हर मरीज में अलग-अलग होते हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के उपन्यास ‘स्वपनपाश’ में हम इसका एक रूप देख चुके हैं। कार्तिक कॉलिंग कार्तिक, वो लम्हे आदि कुछ फिल्में भी इस विषय पर बनी हैं। फिर भी इस रोग के बारे में जानकारी बहुत कम है और अक्सर हमारे समाज में इसे प्रेत बाधा समझा जाता है।
प्रियंका इसका एक अलग रूप लेकर आई हैं। जीवन की साँझ में एक पत्नी के शक के शिकार बुजुर्ग पति निर्मल जी के प्रति शुरुआत में पाठक की संवेदना बढ़ती है। बच्चे भी माँ की चिक-चिक से तंग आकर घरेलू सुख-शांति के लिए उनके मन की ही करने को कह देते हैं। धीरे-धीरे खुलते हैं अतीत के पन्ने और कुंती देवी के आत्मसम्मान को छीजती परतें।
अंततः मुहल्ले में उड़ती बातों के बावजूद बेटी पल्लवी द्वारा माँ को समझने और इलाज की सोचने का सकारात्मक अंत एक सही शुरुआत के ओर इशारा करता है। कहानी मार्मिकता और संजीदगी के साथ मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती है।

बारूद -उर्मिला शुक्ल
बारूद शब्द में ही विनाश छिपा हुआ है। धर्मसत्ता और राजसत्ता का गठबंधन एक ऐसा ही बारूद है, जो सोचने समझने की शक्ति को छीनकर विकास के रथ को पीछे की ओर मोड देता है। इसी बात का सजीव उदाहरण है, उर्मिला शुक्ल की कहानी बारूद।
कहानी की शुरुआत होती है नायिका दीपशिखा की सरगुजा अंचल में पोस्टिंग से। जिसके बारे में किवदंती प्रचिलित है कि, “सरगुजा गाजम गुज़ा।
युवा दीपशिखा प्रकृति की गोद में जाने के लिए उत्सुक भी है। कहानी की शुरुआत दीपशिखा की यात्रा में आने वाली तकलीफों से होती है और कहानी स्त्री विमर्श की ओर बढ़ती प्रतीत होती है। लेकिन कहानी यू टर्न लेते हुए पाठक को चकित करती है। कई स्थानों पर लेखिका रहस्यात्मक /प्रतीकात्मक भाषा का सहारा लेती हैं। कहानी में पूजा जाने वाला झुंड से छूटा हाथी का बच्चा है, सगुना की दर्दनाक चीखें हैं। एक रंग में रंगी स्कूल की दीवार है, जो पिछली सरकार के समय दूसरे रंग की थी। गाँव की चौक पर सामूहिकता का केंद्र पीपल है जिसे केंद्र बनाकर स्कूल की स्थापना की गई थी पर अब वहाँ पूजने को पत्थर हैं। शिक्षा के नाम पर लड़कियों के लिए सिलाई कढ़ाई है और लड़कों के लिए वो भी नहीं।
“अब न हमारी सरकार रही न हमारी पंचायत। ढहा दिया गया हमारा सपना और उसे मलबे से बना लिया अपना मठ। पीपर का वो पेड़, जो शिक्षा की नींव था, जिसने एक मिसाल बनाया था, अब वो ही पेड़….?
शिक्षा जो अज्ञान के अंधकार को समाप्त करती है, जब उसे ही अंधकार ने घेर लिया हो तो उजास की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। दीपशिखा के सामने अंधकार से बच्चों को निकालने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन हमेशा जीतना जरूरी नहीं होता कई बार सही लड़ाइयों का चुनना भी जरूरी होता है। अगर दुश्मन ड्योढ़ा है, हार जाना तय है तो भी संघर्ष को चुनना ही वीरता का प्रतीक है। कभी निराश होकर लौट जाने को आतुर दीपशिखा धर्मसत्ता के खौफनाक मंसूबों को जानने के बाद वहाँ दीपशिखा सी जलने का फैसला लेकर रुक जाती है।
लोक की बोली बानी और कलेवर में सजी यह कहानी बारूद को निष्क्रिय करने की एक सुखद योजना के साथ सकारात्मक अंत पर पहुँचती है और कहानी के फलक को विस्तार देती है।

मनटुटिया- कमलेश
जिस देश में “कमजोर कि लुगाई मुहल्ले की भौजाई” एक लोकोक्ति के रूप में प्रचलित हो वहाँ अकेली स्त्री का जीवन कितना मुश्किल होगा। फिर चाहे गाँव हो या शहर। अभी हाल में शहर में अकेली स्त्री के जीवन पर फिल्म भी आई है ‘माँ-बहन’। खबरिया चैनल की दृष्टि से दिखाई गई इस फिल्म में चाहें कहानी पटरी से उतरी हो पर अकेली स्त्री की व्यथा को दर्शाने का प्रयास किया गया है। वहीं कथाकार कमलेश जी की कहानी मनटुटिया उसे गाँव की कच्ची पगडंडियों पर उतार कर यथार्थ की बारीक बुनावट से रेशा-रेशा बुनते हैं। कहानी में वह मुसहर जाति की स्त्री को लाते हैं । जो महा दलित में आते हैं पर उसके पीछे सब हैं फिर क्या ब्राह्मण क्या बनिया। एक अकेली स्त्री के साथ कहानियाँ चलती हैं। हर किसी के साथ उसका नाम जोड़ा जाता है। हर कोई उसे प्राप्त करना चाहता है। स्त्रियाँ अपने पतियों को उससे बचाना चाहती हैं। ऐसे में उसका अकेलापन कितना विकराल रूप ले लेता है। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
एक ऐसी ही स्त्री है मनटुटिया जिसका जन्म मन के टूटने का कारण बना और उसके नाम का दुर्भाग्य भी। जिसका मन हमेशा टूटता रहा। पति और बेटे की मृत्यु के बाद गाँव में किस तरह से किस्से उसका पीछा करते हैं उसे बहुत संवेदनशीलता के साथ लेखक ने बुना है। अपने अकेलेपन से लड़ते जरा सा हँस बोल लेना भले ही उसका स्वभाव है पर मर्यादा की रेखा उसने खींच रखी है । कहानी किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति पर संज्ञान भी लेती हैं। अपने परिवार की झूठी इज्जत को बचाए रखने के लिए किसी की हत्या करने से भी गुरेज नहीं। इसका दिग्दर्शन हमें हाल के समाज में खूब दिख रहा है।
कमलेश जी साढ़े हुए काथाकार हैं । गाँव की बोली बानी से जिस तरह का लोकेल खड़ा करते हैं, उससे गुजरना हमेशा सुखद होता है। बेचू, गोलईया फुआ हों या सत्यनारायण और अजय तिवारी। कथारस इस कहानी की विशेषता है। सोचने पर विवश करते अंत के साथ कहानी समाज से सवाल करती प्रतीत होती है कि आखिर क्यों अभी भी हमारे समाज में अकेली स्त्री का जीवन सहज नहीं है? जात-पात की दीवारें स्त्रियों के लिए रात के अंधेरे में टूट क्यों जाती हैं?

कॉटन कैंडी- मनीष वैद्य
बिंबों और प्रतीकों के साथ लोक कथाओं की सुवास मनीष वैद्य जी की कहानियों की विशेषता है। लेकिन उनकी हालिया कहानी ‘कॉटन कैंडी’ सीधी सादी भाषा में मिठास और पन्नी में बंद गुलाबी आसमान के नीचे जीवन की तल्ख सच्चाईयों से रूबरू कराती है। ये जीवन की उन तंग गलियों में ले जाती है, जहां पसीने के नमक से दूसरों के लिए मिठास रची जाती है। बीच में है बदलती हुई दुनिया और बाजार का रूप।
“उस लड़के की आँखों में गुलाबी आसमान तैर गया। नीले आसमान से झाँकते सफ़ेद बादलों के बीच गुलाबी फाहों का एक टुकड़ा उसकी आँखों की पुतलियों में फैल गया। लड़का जहाँ खड़ा था, उसके आसपास तीखी धूप थी लेकिन रूई के उस गुलाबी बादलों वाले हिस्से की छाया में होने से उस पर धूप सीधी नहीं पड़ रही थी”
हम सब ने बचपन में “कॉटन कैंडी” खाई है। ‘बुढिया के बाल’ की आवाज लगाते ये फेरी वाले हमें कमरों से खींचकर बाहर ले आते थे। कहानी एक बच्चे के मार्फत बदले हुए समय को रेखांकित करती है। 13-14 साल के बच्चे की विवशता, पेड़ों की जगह आग उगलती सड़कें, और रंगीन रैपर्स में बंद मिठास लेखक की राडार पर हैं। हमने शायद ही बचपन में इस कहानी को जाने का प्रयास किया होगा। पर लेखक उसे बारीकी से उकेरते हैं।
माँ द्वारा कैंडियों को पन्नी में इस तरह लगाया जाना कि धूप में बच्चे को छाया का आभास दे। बच्चे का खुद लाई हुई कैंडी खाने का मन और फिर मन का पत्थर हो जाना कहानी को सहज भावनात्मकता प्रदान करता है। बच्चे का कैंडी का डंडा कुहनी में दबाकर जेब से पैसे निकालना, सामान देना किसी नट की कला सा प्रस्तुत होता है।
जीवन और घर के तमाम दुखों, बचपन और खेलों से विमुखता के बीच भी सपनों का एक गुलाबी आसमान बच्चे के सिर पर है। 50 रुपये की कैंडी बिक जाए। ऐसा अवसर आता भी है पर बाजार बीच में आकर खड़ा हो जाता है। कहानी का मार्मिक अंत उसे अलग ऊंचाई प्रदान करता है। और पाठक भी उस गुलाबी आसमान के तितिर-बितिर हो जाने को देर तक महसूस करता रहता है।

उपसंहार
उपरोक्त कहानियों में कैफ़ी हाशमी की चाबी और प्रियंका ओम की विगत की व्याधि दोनों के कथानक बिल्कुल अलग हैं पर दोनों में ही अतीत का खौफ हावी है, जो वर्तमान में असुरक्षा बन कर उभर रहा है। चाबी में असद बेतरह डरा है। वह जनरेशनल ट्रामा से गुजर रहा है। दादा और पिता का आर्थिक तंगी के कारण गृह नगर त्यागना फिर मृत्यु। असद को भी अपना छोटा शहर छोड़ कर बड़े शहर आना पड़ता है। लेकिन अब उसके पास क्रेडिट कार्ड का सहारा है। दवा ही विष बनने की तर्ज पर वह क्रेडिट कार्ड के नरक में धँसता चला जाता है। ‘विगत की व्याधि’ में अतीत का अस्वीकार मानसिक व्याधि बन कर उभरा है। स्त्री के शक में असुरक्षा बोध है। वह भी अतीत की यादों से खुश नहीं है चिंतित है।
सिनीवाली की ‘कौन सी राह’ ग्रामीण जीवन के बदले हुए सामाजिक यथार्थ को दिखाती है तो मनीष वैद्य की ‘कॉटन कैंडी’ कस्बाई यथार्थ को। गोपाल मजदूर और किसान की स्थिति में परिवर्तन को लेकर परेशान है। वह सरकार से आशा करता है कि जिस तरह मजदूरों के हक में योजनाएँ अमली जामा पहन चुकी हैं वैसे ही किसानों की भी सुध ली जाए। ‘कॉटन कैंडी’ का बच्चा हताश अवश्य है उसके सामने पूरा बाजार खड़ा है। यहाँ नॉस्टेलजिया घनीभूत तो है पर सिर्फ एक बच्चे की जीविका को बचा लेना का नहीं वरन लोक का कुछ जरूरी बचा लेना का। दोनों कहानियों में पृथक समस्याओं के बाद भी एक स्वर उभर रहा है कि तरक्की के साथ परस्पर संबंधों की जो जड़ें हिल चुकी हैं उन्हें बचाना है। कल के लिए ताकि मिट्टी और मन की मिट्टी उर्वर बनी रहे।
मनटुटिया या बारूद मुसहर (महा दलित प्रजाति) और आदिवासी क्षेत्र की पीड़ाओं के माध्यम से पुराना तोड़ने की बात कही है। फिर चाहें धर्मसत्ता हो, राजसत्ता या फिर सामाजिक व्यवस्था। मनटुटिया जैसी स्त्रियों का जीवन समाज होम किए दे रहा है। उस समाज का निर्माण हम सरगुजा में देखते हैं। जहां समाज को धर्म भीरु बनाया जा रहा है। लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई तक सीमित किया जा रहा है तो लड़कों की आवारगी स्वीकार्य की जा रही है। ऐसे में समता-समानता मूलक समाज का निर्माण कैसे होगा? दोनों कहानियों के मूल में यही प्रश्न है।
अंततः समकालीन मुद्दे स्त्री या पुरुष स्वर को भिन्न नहीं करते हैं। न ही जरूरी को बचा लेने व समता मूलक समाज देखने की इच्छा को। स्त्री या पुरुष रचनाकार अपने समय के प्रश्नों से जूझते हैं । भावनाएँ स्त्री-पुरुष नहीं होती है। न ही परकाया प्रवेश करता लेखक। ऐसे में बदलते समाज की दस्तक देती इन कहानियों के आधार पर कहा जा सकता है कि लेखक की दृष्टि स्त्री या पुरुष न होकर सहज मानवीय दृष्टि होती है ।
वंदना बाजपेयी

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