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बीत जाती पीढियाँ
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बस कुछ संवत्सर बीत जाते थे
पहले कहने को लोकते थे
फिर करने को लोकते थेकहने और करने को लोकने के खेल में
गिरते थे कई सीढियाँ
बस बीत जाती थीं कुछ पीढियाँ.भूल
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मैंने कल जो कहा था
आज सच कहता हूँ
वह एक भूल थीमैं आज जो कह रहा हूं
कल बताऊँगा
वह भी क्या फिर एक भूल होगी.बवंडर
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नदियों में भँवर थे
और डूबने का खतरा था
मुझे तैरना कहाँ आता थाचलना आता था मुझे
तलमलाते पाँव से
पर मैदान में चल रहे थे बवंडरजान गया था गोल घूमती हैं हवायें
चूँकि गोल उड़ रहे थे सूखे पत्ते
और यह भी कि खेत भूत नहीं जोत रहे थे.परेशानी
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हमारे कस्बे में सीधा मतलब निकालते थे लोग
बातों का
परेशानी का सबब था
कि हवाओं में जुमले तैर रहे थे.
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बरसों पहले
सही कहें तो अरसे पहले
जब सदियाँ करवटें बदल रही थीं
किसी नदी के किनारे
कुरते पर टाँकी बटनों की तरह
और कुरते के फैलाव के भीतर ही
हम दम फुलाते थे
और आग उसके भीतर ही सुलगती थी
अलाव में दहकते अंगारे
किसी लाल आँखों की तस्वीर भर थी
जहाँ आँच आँख की कोरों के बाहर नहीं छलकती
जिसमें टांग दी गयी थी
अरसे पहले उकेरी गयी
उदास रंगों वाली एक तस्वीर
जिसके बाहर जाना आज भी निषिद्ध था
जो चौखटे के बाहर सिर निकालते थे
यह जानते हुए भी
कि चौखटे के बाहर लोहे की नुकीली कीलें ठुकी हुई हैं
जो उनके सिर फोड़ सकती हैं.
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और किताबें थीं जो चेहरों पर टंग गयी थीं
हाथों से छूट कर
फड़फड़ा कर
जो बस में मिले थे
सड़क पर
दफ्तर से लौटते हुए
पर झुँझला कर
मैं लौट आता था
माथे पर पड़ी
शिकन की पहली परत से
जहाँ एक भरी- पूरी दुनिया थी
पर उनमें खुशहाली की तीखी खुशबू थी
जब कोई सूँघता पीले पन्ने
और धर्म और स्त्रियों पर अपने राज की लतायें पसार रहा था
दोनों सिर्फ जिन्दा रखे जा रहे थे
पीढ़ियों के लिये
और चाय का स्वाद जुबान पर जाकर चिपक जाता था
जब समझ नहीं आता था
कि सचमुच के जंगल में बाघों की बढती संख्या पर
कैसी प्रतिक्रिया दूँ
हसूँ
रोऊँ
जंगल में बाघ का होना जरूरी था
जहाँ जंगल पसरे जा रहे थे बेतहाशा
और जिनमें बाघों की संख्या बढ़ती जा रही थी
किताबों में जंगल पसर रहे थे
बाघ बढ़ रहे थे.
गरमी के मौसम में भी
भूख भी एक सदाबहार ऋतु थी उस देश की
जहाँ लोग मरते थे सालों भर
न ठंड थी
न लू
और न भूख
जहाँ तर्क जम जाते थे
बर्फ की अतल गहराईयों में दबी हुई थी करुणा
जो तलाशे जा रहे कारणों से दूर पड़ी थी .
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कोई गंजा
किसी के बाल पक गये थे
किसी की मूँछें
पर युवा नहीं रह गयी थी
कोई छरहरी
गुलथुल हो गयी थी
किसी के चेहरे पर झुर्रियों के आने की सूचना थी
समय फैसले सुना रहा था बरसों बाद.