
कौन ? कौन है,
जो दादी पुकार रहा है ?
अरे दादी! मैं, “हामिद”
अरे हामिद!
(ख़ुशी से स्वर भरते हुए )
तू कहाँ चला गया था बेटा ?
देख न.……
कैसे तेरी बाट में ये आँखें
बूढ़ी हो गई है
इक तू ही तो है
जिसपे मुझे भरोसा है
आजकल तो बुजुर्गों को
तो सबने कोसा है
तू इन बूढ़ी आँखों की
बारिश का बोसा है रे
ख़ुशी की थाली में जो तूने
प्यार परोसा है
और आँखों से निहारती हुई)
आखिर….
ग़रीब की ख़ुशी खूंटी पे टंगी रहती है
याद है पिछली दफा तुम्हारे लिए
ईद में चिमटा लाया था
आज भी दिवाली में तुम्हारे लिए
मिट्टी के दीये लाया हूँ
घर कैसे सूना रहने देता
चारों ओर लूटमार और कोहराम है
बगल में छुरी मुँह में राम – राम है
जीना भी क्या जीना बस हाहाकार है
महंगी हो गई दुनिया सब बेकार है
दिखावे की दुनिया में सब जीते है
दूसरों की ख़ुशी में जलते रहते हैं
मिलावट रिश्तों में घर कर गई है
ज़िन्दगी किश्तों में बसर गई है
लोग पता नहीं
कैसे गुज़र बसर कर लेते है
सहिष्णुता को लेकर बवाल मचा हुआ है
ढूँढ रहें है पुरोधा
आखिर कौन सा सवाल बचा हुआ है
पहले हथियारों से लड़ा जाता था
और अब बातों से लड़ा जाता है
बहुत मार है.…बहुत मार है
ऐसा क्यों है दादी
कलियुग है बेटा घोर कलियुग है
यहाँ कोई किसी का नहीं है
दादी, सारा भारत दिवाली मना रहा है
अयोध्या के श्री राम सपरिवार
लंका जीत कर आये थे
तो साकेत नगरी ने
ख़ुशी में दीये जलाए थे
तो मैं भी दीये जलाऊँगा
क्या पता मेरी अम्मी और अब्बा जान
भगवान के यहाँ से वापिस हो आये
दादी सबके घर दीये से जगमगा रहें हैं
ख़ुशी की फुलझड़ी चला सारे खिलखिला रहें है
मेरा भी जी हो आया की मैं भी दीये जलाऊँ
अपनी दादी संग ये ज्योति पर्व मनाऊँ
अपनी दादी संग ये ज्योति पर्व मनाऊँ
जुग जुग जिए मेरे लाल जुग जुग जिए )
सहायक प्राध्यापक
