सुख -दुःख के पार है आनंद

दुख को कोई नहीं चाहता। हर कोई सुख की खोज में भटकता रहता है। यह मान लिए गया है कि दुख के लिए कोई
प्रयास करने जरूरत नहीं होती है। वह तो हमारे आसपास ही रहता है, उसे देखने के लिए गर्दन उठाने की भी जरूरत
नहीं है। लेकिन भारतीय परंपराएं, शास्त्र और दर्शन इससे सहमत नहीं हैं। वे इस बारे में कुछ और ही कहते हैं।
ज्यादातर ग्रंथ एक स्वर से कहते हैं कि सुख हमारा स्वभाव है। वह कहीं बाहर नहीं है।
अष्टावक्र ने तो यहां तक कहा है कि ‘हमेशा सुख से जियो, सुख से उठो और बैठो, तब दुनिया जिसे दुख कहती है,
उसे भी सुख की तरह महसूस करने लगोगे।’
हमारा मन जिस सुख के पीछे पागल है, उसके पीछे धन-संपत्ति का बोध है। ऐश्वर्य उसका लक्ष्य है।
हम यह भूल जाना चाहते हैं कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दुख को भूलने और नकारने की क्षमता
अपने अंदर पैदा करना चाहते हैं। तभी तो ओशो ने कहा था, ‘सुख की खोज एक बुनियादी भूल है। दुख को अस्वीकार
कर सुख को तलाशना गलत है, क्योंकि सुख दुख का ही हिस्सा है। जो ऐसी भूल करते हैं, वे उन लोगों में हैं, जो
जन्म खोजते हैं और मरना नहीं चाहते, जवानी तो खोजते हैं, मगर बूढ़ा होना नहीं चाहते।


भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहा-‘जो मनुष्य इस लगातार बदलते रहने वाले सृष्टि चक्र के हिसाब
से व्यवहार नहीं करता, वह इंद्रियों के वश में ही जीवन काटने वाले प्यासे के समान बिना उद्देश्य का जीवन जीता है।’
आपने ध्यान दिया होगा कि जब हम प्रेमभाव में होते हैं, तब मन और इन्द्रियां तृप्त रहती हैं। वैसे तो जो भी हमारे
पास है, हम उसी में संतुष्ट रहते हैं लेकिन यह अवस्था कुछ देर के लिए ही होती है। इंसान के पास भले ही कितना भी
सुख और वैभव हो जाए, उसको कम ही लगता है और ज्यादा की तलाश बनी रहती है। यही कारण है कि सुख नहीं
मिल पाता।
यदि जीवन में सुख चाहिए तो संतुष्टि भाव में आना ही होगा, वर्ना बहुत कुछ होने पर भी सुख नहीं मिलेगा। एक बार
सोच कर देखिए कि जब कुछ देर प्रेम में आने से ही संतुष्टि मिलती है तो यदि हम हमेशा प्रेमभाव में रहें तो कितना
आनंद मिलेगा! हमेशा प्रेमभाव और एकरस की भावना के साथ रहना ही आत्मा में रहना होता है।
इस तरह आत्मा के भाव से कोई भी काम करने से उसे खुद करने का भाव नहीं आता और इंसान कर्म के बंधन से मुक्त
हो जाता है। वह इंसान सिर्फ होने वाले सभी कर्मों का माध्यम बन कर रह जाता है।
अगर हमें परमात्मा मिल जाए तो हम उससे निश्चय ही अपना शाश्वत सुख न मांग कर धन, संपदा और समृद्धि ही
मांगेंगे या छोटे-छोटे दुखों के निवारण की ही याचना करेंगे। वह इसलिए कि अनेक अभावों, दुर्भावों और प्रभावों में
असहनीय कष्ट झेलते हुए भी हमें संपत्ति में ही सलामती के दर्शन होते हैं।
सत्ता को ही हम अपना सुरक्षा-कवच मानते हैं। स्वजनों के शिकवे-शिकायतों में ही शांति का अनुभव करते हैं।
उपयोगिता के आधार पर बने संबंध ही हमें ऊष्मा और प्रेम के दर्शन कराते हैं। संसार के मायावी जाल में ही हमें
स्वर्ग-सुख की अनुभूति होती है। उस आखिरी कैदी की सम्यक सोच की तरह इस दुखमय संसार से मुक्ति की अनुपम
सौगात मांगने का सुविचार और साहस हमारे अंदर आएगा ही नहीं।
क्योंकि हम इस भ्रम में हैं कि जैसे सूर्य की रश्मियों से रात का अंधकार गायब हो जाता है, वैसे ही हम अपने कृत्रिम
अनुसंधानों से अपने अंदर छाई कलुषता को दूर कर लेंगे। बस यही हमारी सबसे बड़ी भूल है। भौतिक सुख और प्राप्तियां
तो सदा ही अपना रंग-रूप बदलती हैं। एक इच्छा पूरी हुई तो दस जरूरतें और पैदा हो गईं। सुख के संभावित मार्गों पर
जितना चले, उतना दुख ही हाथ लगा।
इसका एकमात्र कारण यह है कि हम पथ से भटक कर उस अलौकिक प्रकाश को भुला बैठे हैं जिसके संबल से अर्जुन ने
विजय का वरण किया था। महाभारत के समय अर्जुन के पास भी मांगने के कई विकल्प थे। लेकिन, उन्होंने सब विकल्पों
को छोड़कर केवल श्री कृष्ण को मांग लिया और अकेले उनको मांग कर सब कुछ प्राप्त कर लिया।
प्राय: हम सभी को सुख की तलाश होती है। हम सभी सुख के लेन-देन के लिए कोई भी कीमत चुकाने को सदैव तत्पर रहते हैं। स्वयं को सुखी बनाने की चेष्टा के साथ ही अपने परिजनों को भी सुखी बनाने की चेष्टा चलती रहती है। मां-बाप संतान को और संतान माता-पिता को, पति पत्नी को, पत्‍‌नी पति को सुखी करने की चेष्टा करती है, किंतु सुखी कोई नहीं होता। इसके विपरीत हाथ में दुख का खुरदरा दामन ही आता है और सुख के क्षणों को पकड़कर रोके रखने की हमारी चेष्टा धूल-धूसरित होकर रह जाती है, तो हमें आश्चर्य होता है।
हम वास्तव में सुख-दुख में से सुख का चयन करते वक्त यह भूल जाते हैं कि ये संपूर्ण सृष्टि परिवर्तन और विनाश के मूलाधार पर टिकी है। इसलिए सुख-दुख सभी परिवर्तन शील क्षण भंगुर है। वास्तव में सुख-दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्के का एक वांछित पहलू हाथ में लेते ही दूसरा पहलू स्वत: हमारे हाथ में आ जाता है। सुख-दुख रूपी गतिमान पहियों में से हम सुख के पहिए को बड़ा करने की चेष्टा करते हैं तो दुख का पहिया स्वत: बड़ा हो जाता है तो हम दंग रह जाते हैं। हमें उस समय इस बात का स्मरण भी नहीं रहता कि असमान पहियों पर गाड़ी नहीं चलती। पहियों को समान होना पड़ता है। यही करण है कि बड़े आदमी का सुख भी बड़ा होता है तो दुख भी बड़ा होता है, जबकि छोटे आदमी के सुख दुख दोनों छोटे होते हैं।
सुख-दुख कालचक्र की वाह्य परिवर्तनशील परिधि-परिस्थिति होते हैं। यही कारण है कि सुख व दुख दोनों हमारे
जीवन में उत्तेजना लाते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जब सुख-दुख दोनों उत्तेजनाएं हैं, तो फिर सुख दुख के पार
क्या है? सुख दुख के पार ही आनंद है। आनंद एक तीसरी स्थिति है, जो सुख व दुख के अतिक्रमण से बोध
स्वरूप प्राप्त होती है। आनंद ही वह शाश्वत स्थिति है, जिसे हमने परमानंद व ब्रह्मानंद आदि कहा है। आनंद के अगाध
सागर में सुख-दुख रूपी टेढ़ी-मेढ़ी नदियां जब विलीन हो जाया करती हैं तब हमें आनंद की झलक मिलती है। इसलिए
हमें छद्मवेशी सुख-दुख का अतिक्रमण कर अपने अंतस में आनंद की खोज करनी चाहिए। इसी में जीवन की सार्थकता है।

ओमकार मणि त्रिपाठी – प्रधान संपादक अटूट बंधन ग्रुप
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