परमात्मा से मित्रता ही साधारण को असाधारण में बदलती है

                                           

परमात्मा से मित्रता ही साधारण को असाधारण में बदलती है

परमात्मा हर पल हम सब के साथ है | वो हमारा अभिन्न  मित्र है | पर हम इस बात को स्वीकार कहाँ करते हैं की हम अकेले होते हुए भी अकेले नहीं है वो परमात्मा हर पल हमारे साथ है | जिस पल हमें यह अहसास हो जाएगा हम भी अर्जुन , मीरा या श्री हुनमान जी कर तरह असाधारण कार्य कर जायेंगे | इस बात को समझाने की सबसे ज्यादा आवश्यकता हमारे बच्चों को है | जो परमात्मा की शक्ति को अपने अन्दर महसूस करते हुए  सहज भाव से असाधारण कामों को अंजाम दे सकते हैं |

पढ़ें कैसे परमात्मा से मित्रता ही साधारण को असाधारण में बदलती है 

संसार में जितने भी महापुरूष हुए हैं वे सभी बचपन में साधारण थे। परमात्मा सबसे महान एवं शक्तिशाली है। आप अपने बालक की इसी सबसे महान एवं शक्तिशाली परमात्मा से मित्रता करा दीजिए। हृदय पवित्र करके परमात्मा की आज्ञा तथा इच्छा को जानने तथा उसके अनुसार प्रभु कार्य करने से ही परमात्मा से मित्रता होती है। इसके लिए हमें बालक को घर तथा विद्यालय में परमात्मा की शिक्षाओं का अर्थ बताना चाहिए। उसे यह बताना चाहिए कि परमात्मा अपना है पराया नहीं और इसलिए परमात्मा की बनायी यह पूरी धरती तथा मानव जाति अपनी है परायी नहीं। वास्तव में मानव जाति की भलाई करना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। प्रभु इच्छा तथा आज्ञा को जानकर लोक कल्याण के लिए असाधारण कार्य करने वाले कुछ महापुरूषों के त्यागमय तथा कष्टमय जीवन के विवरण इस प्रकार हंै:-

(1) न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए:-

अर्जुन को कृष्ण के मुँह से निकले परमात्मा के पवित्र गीता के सन्देश से ज्ञान हुआ कि कर्तव्य ही धर्म है। न्याय के लिए युद्ध करना ही उसका परम कर्तव्य है। उस समय राजा ही जनता के दुःख-दर्द को सुनकर न्याय करते थे। कोई कोर्ट या कचहरी उस समय नहीं थी। और जब राजा स्वयं ही अन्याय करने लगे तब न्याय कौन करेगा? न्याय की स्थापना के लिए युद्ध के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था। भगवानोवाच पवित्र गीता के ज्ञान को एकाग्रता से सुनने के बाद अर्जुन हाथ जोड़कर बोला ‘‘प्रभु अब मेरे मोह का नाश हो गया है और मुझे ईश्वरीय ज्ञान एवं मार्गदर्शन मिल गया है। अब मैं निश्चित भाव से युद्ध करुँगा।’’ अर्जुन ने विचार किया कि जो परमात्मा की बनायी सृष्टि को कमजोर करेंगे वे मेरे अपने कैसे हो सकते हैं? पवित्र गीता के ज्ञान को जानकर उसने निर्णय लिया कि न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए। फिर अर्जुन ने अन्याय के पक्ष में खड़े अपने ही कुल के सभी अन्यायी यौद्धाओं तथा 11 अक्षौहणी सेना का महाभारत के युद्ध में विनाश किया। इस प्रकार अर्जुन ने प्रभु का कार्य करते हुए धरती पर न्याय के साम्राज्य की स्थापना की।

(2) माता देवकी ने मानव उद्धारक कृष्ण को अपनी कोख से जन्म देने की प्रतीक्षा की:-

माता देवकी ने प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और वह एक महान नारी बन गईं तथा उनका सगा भाई कंस ईश्वर को न पहचानने के कारण महापापी बना। देवकी ने अपनी आंखों के सामने एक-एक करके अपने सात नवजात शिशुओं की हत्या अपने सगे भाई कंस के हाथों होते देखी और अपनी इस हृदयविदारक पीड़ा को अत्यन्त धैर्यपूर्वक अपने आंठवे पुत्र कृष्ण के अपनी कोख से उत्पन्न होने की प्रतीक्षा की ताकि मानव उद्धारक कृष्ण का इस धरती पर अवतरण हो सके तथा वह धरती को अपने भाई कंस जैसे महापापी के आतंक से मुक्त करा सके तथा धरती पर न्याय आधारित ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना हो।

(3) मीरा को कृष्ण की भक्ति में अनेक कष्ट सहने पड़े:-

मीराबाई कृष्ण भक्ति में भजन गाते हुए मग्न होकर नाचने-गाने लगती थी जो कि उनके राज परिवार को अच्छा नहीं लगता था। इससे नाराज होकर मीरा को राज परिवार ने तरह-तरह से डराया तथा धमकाया। उनके पति राणाजी ने कहा कि तू मेरी पत्नी होकर कृष्ण का नाम लेती है। मैं तुझे जहर देकर जान से मार दूँगा। मीरा ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था उसने कहा कि पतिदेव यह शरीर तो विवाह होने के साथ ही मैं आपको दे चुकी हूँ, आप इस शरीर के साथ जो चाहे सो करें, किन्तु आत्मा तो प्रभु की है, उसे यदि आपको देना भी चाँहू तो कैसे दे सकती हूँ? इसलिए हमें भी मीरा की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।

(4) प्रभु कार्य किये बिना मुझे कहा विश्राम:-

हनुमान जी ने परमात्मा को पहचान लिया तो वे एक छलाँग में मीलों लम्बा समुद्र लांघकर सोने की लंका पहुँच गये। हनुमान में यह ताकत परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लेने से आ गयी। प्रभु भक्त हनुमान ने पूरी लंका में आग लगाकर रावण को सचेत किया। हनुमान के चिन्तन में केवल एक ही बात थी कि प्रभु का कार्य किये बिना मुझे एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं करना है। हनुमान ने बढ़-चढकर प्रभु राम के कार्य किये। हनुमानजी की प्रभु भक्ति यह संदेश देती है कि उनका जन्म ही राम के कार्य के लिए हुआ था। भक्त प्रहलाद, गाँधी जी, मदर टेरेसा, अब्राहम लिंकन ने अपने त्यागमय तथा सेवामय जीवन द्वारा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(5) बच्चों को इस युग का ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता देकर पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनाये:-

परिवार तथा विद्यालय दोनों को मिलकर बच्चों को भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं का संतुलित ज्ञान कराना चाहिए। बच्चों को यह बतलाये कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है। इसके साथ ही हमें बच्चों को बाल्यावस्था से ही यह संकल्प कराना चाहिए कि एक दिन दुनियाँ एक करूँगा, धरती स्वर्ग बनाऊँगा। विश्व शान्ति का सपना एक दिन सच करके दिखलाऊँगा। परमात्मा की ओर से अवतरित पवित्र पुस्तकों का ज्ञान सारी मानव जाति के लिए हंै। राम ने अपने जीवन द्वारा मर्यादा, कृष्ण ने गीता द्वारा न्याय, बुद्ध ने त्रिपटक द्वारा सम्यक ज्ञान (समता), ईशु ने बाइबिल द्वारा करूणा, मोहम्मद ने कुरान द्वारा भाईचारा, नानक ने गुरू ग्रन्थ साहिब द्वारा त्याग तथा बहाउल्लाह ने किताबे अकदस के द्वारा हृदय की एकता की मुख्य शिक्षायें दी हैं।

 यदि बच्चों को बचपन में ही यह शिक्षा दी जाए की जो सहज भाव से अपने कर्म कोईश्वर के निमित्त  करते हैं व् परमात्मा को मित्रवत मानते हैं तो  वे टोटल क्वालिटी पर्सन बन जायेंगे।भविष्य में हमें ऐसे ही  टोटल क्वालिटी पर्सन की ही आवश्यकता है जो असाधारण कामों को अंजाम दे सकें |
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– डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक, 
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ



शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,  सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ





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