बाजा-बजन्तर
में|
मैं और छुटकू उछंग लेते हैं|
है और सुबह उसके घर छोड़ते ही बाजा बंद हो जाता है और इस समय दोपहर में उसके घर में
घुसते ही बाजा शुरू| छुट्टी वाले दिन तो, खैर, वह दिन भर बजता ही रहता है|
हमारी झोपड़ी की बगल में खड़ी हमारी यह गुमटी इन लोगों के घर के ऐन सामने पड़ती है|
जभी जब इनका बाजा हवा में अपनी उमड़-घुमड़ उछालता है तो हम दोनों भी उसके साथ-साथ
बजने लगते हैं; कभी ऊँचे तो कभी धीमे, कभी ठुमकते हुए तो कभी ठिठकते हुए| अम्मा जो
धमकाती रहती है, “चौभड़ फोड़ दूँगी जो फिर ऐसे उलटे सीधे बखान ज़ुबान पर लाए| घरमें दांत
कुरेदने, को तिनका नाहीं और चले गल गांजने…..”
किराएदार से पूछ चुके हैं हम| हमारीगुमटीपर सिगरेट लेने वह रोज़ ही आता है|
अटपटा लगे रहा? ‘क्यों? कैसे?”
है जब आपकी बबुआइन घर में होती है, वरना नाहीं…..”
बाजा वही बजाती है| वही सुनती है…..”
हमयह भी पूछ चुकेहैं| इन लोग को इधर आए महीना होने को आए रहा लेकिन इस बाबू को गली
छोड़ते हुए हम ने एक्को बार नाहीं देखा है|
चार दफ्तरों में अम्मा झाड़ू पोंछा करती है सभी में दिन भर कम्प्यूटर चला करते हैं|
यूँ तो इन लोग के आने पर अम्मा भी इनके घर काम पकड़ने गयी रही लेकिन इस बाबू ने उसे
बाहर ही से टरका दिया रहाकाम हमारे यहाँ कोई नहीं| इधर दो ही जन रहते हैं|”
कम्प्यूटर है, कम्प्यूटर है| लेकिन एक बात तुम बताओ, तुम मुझे हमेशा बैठी ही क्यों
मिलती हो?”
मोटर गाड़ी के नीचे कुचले गए थे, मेरी जगह छुटकू जवाब दिए रहा|”
रहा, ‘तो बचपन पार हो गया? क्या उम्र होगी इस की? ज़्यादा से ज़्यादा दस? या फिर उस
से भी कम?”
की हूँ और छुटकू बारह का…..”
बिखरती गयी रही, मैं जब ग्यारह साल का था तो मेरा भी एक पैर कुचल गया रहा| लेकिन
हाथ है कि दोनों सलामत हैं| और सच पूछो तो पैर केमुकाबले हमारे हाथ बड़ी नेमत हैं|
हमारे ज़्यादा काम आते हैं| पानी पीना हो हाथ उलीच लो, बन गया कटोरा| चीज़ कोई भारी
पकड़नी हो, उंगलियाँ सभी साथ, गूंथ लो, बन गयी टोकरी…..”
नहीं?” पूछे ही रही मैं भी|
मैं इसलिए नहीं क्योंकि मेरा नकली पैर मेरे असली पैर से भी ज़्यादा मजबूत है| और
मालूम? तुम भी चाहो तो अपने लिए पैर बनवा सकती हो| कई अस्पताल ऐसे हैं, जहाँ खैरात
में पैर बनाए जाते हैं…..”
एक नया सपना जागा रहा| अपनी पूरी ज़िन्दगी में बीड़ी-सिगरेट और ज़रदा-मसाला बेचती हुई
नहीं ही काटना चाहती| यों भी अपने पैरों से अपनी ज़मीन मापना चाहती हूँ| घुटनों के
बल घिरनी खाती हुई नहीं|
फिर हंसे रहा, और मालूम? मेरा तो एक गुर्दा भी मांगे का है, दिल में मेरे पेसमेकर
नाम की मशीन टिक्-टिक् करती है और मेरे मुँह के तीन दांत सोने के हैं…..”
‘हम ने सोना कहीं देखा नाहीं…..”
दांत हैं, दिखाने मुश्किल हैं…..”
होगा?” अपने घुटनों पर नए जोड़ बैठाने को मेरी उतावली मुझे सनसनाएं रही|
नकली पैर पुराना है| तीस साल पुराना…..”
के स्कूल के समय वह आया है, लेकिन उधार…..
है|
पूछता है|
रहा हूँ|”
के नाना नानी का घर है| वहीं पढ़ते हैं| वहीं रहते हैं…..”
और छोटा सातवीं में| इधर कैसे पढ़ते? इधर तो हम दो जन उन की माँ की नौकरी की ख़ातिर
आए हैं| सरकारी नौकरी है| सरकार कहीं भी फेंक दे| चाहे तो वीरमार्ग पर और चाहे तो,
ऐसे उजाड़ में”
कहती हूँ, “वरना म्युनिसिपैलटी हमें उखाड़ न देती? यह गुमटी भी और यह झोपड़ी भी|”
इधर सभी दफ्तर ही दफ्तर,” वह सिर हिलाता है|
दो पैकेट सिगरेट हाथ में थमा देता है|
लगाता है, “इधर इन दो डिबिया में कितनी सिगरेट है? बीस| लेकिन मेरे लिए बीस से ऊपर
है| मालूम है? एक दिन में मैं छः सिगरेट खरीद पीता हूँ और सातवीं अपनी कर बनायी हुई|
छः सिगरेटों के बचे हुए टर्रों को जोड़कर|”
वाला अस्पताल है|” पैर का लोभ मेरे अन्दर लगातार जुगाली करता है| अम्मा की शह पर,
“जयपुर नाम का पैर मिलता है| ताक में हूँ जैसे ही कोई तरकीब भिड़ेगी, तेरे घाव
पुरेंगे| ज़रूर पुरेंगे|”
नाहीं….. कस्बापुर कौन बड़ी जगह है?”
छुटकू धीर खो रहा है| बबुआइन को अपने स्कूल से लौटते हुए हम देखे तो रहे|
हूँ|
हैं|
दरवाज़ा खोलती है और एकदिश धारा की मानिन्द नाक अपनी सीध पर लम्बे-लम्बे डग भर कर
गली से ओझल हो लेती है| इसी तरह दोपहर में दौड़ती हाँफती हुई बंद अपने दरवाज़े पर
अपने कदम रोकतीहै और दरवाज़ा खुलते फिर ओझल हो जाती है| अपने से उसने कभी हमें पास
बुलाए तोरहा नहीं और फिर जितना उसे दूर ही से देखा पहचाना है उसी से उस पर भरोसा
तो नहीं ही जागता है|
है, “सिगरेट का उधार माँगने के बहाने से जा तो सकता हूँ…..”
गुमटी पर चली आती है|
उसकी आवाज़ में ऐंठ है, ठसकहै|
होगा? यह गुमटी है किस की?”
नहीं?”
देख करमुझे ठिठोली सूझती है|
खीझ वह दबा नहीं पा रही, “मुझे तो लगता है, इधर जब भी मेरी नज़र पड़ी है मुझे तुम
अकेले तो कभी दिखाई नहीं ही दिए हो…..”
हैं,” उसे खिजाने में मुझे मज़ा आ रहा है|
धोखा नहीं दे जाता? ज़ोर-ज़बरदस्ती या चकमे से सामान उठा नहीं ले जाता?”
अच्छा, यहबताओ, तुम्हारी माँ कहाँ है? पिता कहाँ है?”
है, यकायक बप्पा और उसका रिक्शा मेरी आँखों के सामने चला आता है| रिक्शे में बप्पा
की नयी घरवाली और दूसरे बच्चे बैठे हैं|
रही है,” और तुम्हारी माँ?”
चली हूँ,” माँ ही अब सब कुछ है…..”
है|
छुटकू मौके का फायदा उठाता है|
सुनने के मेरे पति शौक़ीन हैं, मैं नहीं…..”
फिर आप इतना बजाती क्यों हो?”
बजाते हैं-” फिर खट से पलट कर पूछती है,- “अच्छा एक बात बताओ| बाजा जभी बजता है
जिस समय मैं घर पर नहीं रहती? मेरे पीछे क्या
वे बिल्कुल नहीं बजाते?”
छुटकू हँस पड़ता है “आप इधर होती हैं, बाजा जभी बजता है…..”
गायब हो रही है|”
सवाल टपक रहे हैं, “आप के बाबू का एक पैर नकली हैका? एक गुर्दा मांगे का है का?
दिल में मशीन फिट है का? तीन दांत सोने के हैं का?”
गयी है|
अपने घर की दिशा में लपक ली है|
से कम, अपने से ज्यादा पूछती हूँ, उस का पैर एक नकली नाहीं?”
कहता है, तू यह सोच उस का नकली पैर अगर तीस साल पुराना है तो फिर उस के दूसरे के
बराबर कैसे है?”
बाबू हमें गली में दिखाई देता है|
उतर लिया होगा|
हैं| पहले वाले छोटे बक्से के इलावा एक झोला भी पकड़े हैं|
आया है|
ऐसे ही शुरू हुआ करती है|
गुस्सा छलका जा रहा है| क्यों छकाए रहा यह मुझे?
जोड़ लेना,” अपना झोला वह हमारी गुमटी में टिका रहा है, “इसे उधर अन्दर अभी नहीं ले
जाऊँगा| बाद में यहीं से उठा लूँगा…..”
पूछता है|
कूट खोलने की मुझे बेचैनी है|
बंद कराने? मेरी हर ख़ुशी की तान तोड़ना उसे बहुत ज़रूरी लगता है|”
कम्प्यूटर नहीं है,” अटकल पच्चू में तीर छोड़ती हूँ|
मैंने छोड़ी नहीं थी, मेरी नौकरी ने मुझे छोड़ा था| मेरे साथ और भी कितने लोगों की नौकरियाँगयी
थीं| जिसटी.वी. कम्पनी में हम काम करते थे, वहीबंद कर दी गयी थी| हमारे काम में
थोड़े न कोई कमी थी| बल्कि मुझे तो अपने काम में ऐसा कमाल हासिल था कि कंपनी की जिस
भी टी.वी. मेंकैसी भी खराबी क्यों न होती, मैं फ़ौरन जान जाता था और सही भी कर देता
था| कम्पनी के एम.डी. कम्पनी के चेयरमैन
सभी अफसर मुझे मेरे नाम से जानते थे| टी.वी. में कोई भी शिकायत होती, मेरे ही नाम
की डिमांड आती, लालता प्रसादही को भेजना, वह अच्छा कारीगर है…..”
बजाते हो, आप सुनते हो, छुटकू ने बाजे की कमी बहुत महसूस की है, पिछले पूरे दो दिन
पूरा सन्नाटा रहा है| बाजा एकदम बज ही नहीं रहा|”
भलामानुस हूँ इसलिए बाजा ही बजाता हूँ| कोई दूसरा होता तो उस औरत की कुड़-कुड़ बंदकरनेके वास्ते उस की
गरदन मरोड़ देता| ऐसी बेरहम औरत है, जब से मेरी नौकरी गयी है उसकी कुड़-कुड़ ऐसीशुरू हुई हैकि बस एकदम
बरदाश्त के बाहर है…..”
झोला खोलते हैं| झोले में शराब की कई बोतलें हैं|
बजाए मेरे कान बंद दरवाजे के पीछे की कुड़-कुड़ आवाज़ पकड़ना चाहते हैं|



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