ढलवाँ लोहा

ढलवां लोहा



आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं सशक्त कथाकार दीपक शर्मा जी की कहानी “ढलवाँ लोहा “| ये कहानी 2006 में हंस में प्रकाशित हुई थी | दीपक शर्मा जी की कहानियों  बुनावट इस तरह की होती है कि आगे क्या होगा का एक रहस्य बना रहता है | यह कहानी भी विज्ञान को आधार बना कर लिखी गयी है | लोहे के धातुकर्म (metallurgy) में ढलवां लोहा बनाने की वैज्ञानिक क्रिया से मानव स्वाभाव की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया के मध्य साम्यता स्थापित करती ये कहानी विज्ञान, मनोविज्ञान और साहित्यिक सौन्दर्य का बेहतरीन नमूना है | आइये पढ़ते हैं …

ढलवाँ लोहा 



“लोहा पिघल नहीं
रहा,” मेरे मोबाइल पर ससुरजी सुनाई देते हैं, “स्टील गढ़ा नहीं जा रहा…..”

कस्बापुर में उनका
ढलाईघर है : कस्बापुर स्टील्ज़|

“कामरेड क्या कहता
है?” मैं पूछता हूँ|

ढलाईघर का मैल्टर,
सोहनलाल, कम्युनिस्ट पार्टी का कार्ड-होल्डर तो नहीं है लेकिन सभी उसे इसी नाम से पुकारते हैं|

ससुरजी की शह पर:
‘लेबर को यही भ्रम रहना चाहिए, वह उनके बाड़े में है और उनके हित सोहनलाल ही की निगरानी में हैं…..
जबकि है वह हमारे बाड़े में…..’

“उसके घर में कोई
मौत हो गयी है| परसों| वह तभी से घर से ग़ायब है…..”

“परसों?” मैं
व्याकुल हो उठता हूँ लेकिन नहीं पूछता, ‘कहीं मंजुबाला की तो नहीं?’ मैं नहीं
चाहता ससुरजी जानें सोहनलाल की बहन, मंजुबाला, पर मैं रीझा रहा हूँ| पूरी तरह|

“हाँ, परसों! इधर
तुम लोगों को विदाई देकर मैं बँगले पर लौटता हूँ कि कल्लू चिल्लाने लगता है,
कामरेड के घर पर गमी हो गयी…..”

हम कस्बापुर लौट आते
हैं| मेरी साँस उखड़ रही है| विवाह ही के दिन ससुरजी ने वीणा को और मुझे इधर
नैनीताल भेज दिया था| पाँच दिन के प्रमोद काल के अन्तर्गत| यह हमारी दूसरी सुबह
है|

“पापा,” वीणा मेरे
हाथ से मोबाइल छीन लेती है, “यू कांट स्नैच आर फ़न| (आप हमारा आमोद-प्रमोद नहीं छीन
सकते) हेमन्त का ब्याह आपने मुझसे किया या अपने कस्बापुर स्टील्ज़ से?”

उच्च वर्ग की
बेटियाँ अपने पिता से इतनी खुलकर बात करती हैं क्या? बेशक मेरे पिता जीवित नहीं
हैं और मेरी बहनों में से कोई विवाहित भी नहीं लेकिन मैं जानता हूँ, उन पाँचों में
से एक भी मेरे पिता के संग ऐसी धृष्टता प्रयोग में न ला पातीं|

“पापा आपसे बात
करेंगे,” वीणा मेरे हाथ में मेरा मोबाइल लौटा देती है; उसके चेहरे की हँसी उड़ रही
है|

“चले आओ,” ससुरजी कह
रहे हैं, “चौबीसघंटे से ऊपर हो चला है| काम आगे बढ़ नहीं रहा|”

“हम लौट रहे हैं,”
मुझे सोहनलाल से मिलना है| जल्दी बहुत जल्दी|

“मैं राह देख रहा
हूँ,” ससुरजी अपना मोबाइल काट लेते हैं|

“तुमसामान बाँधो,
वीणा,” मैं कहता हूँ, “मैं रिसेप्शन से टैक्सी बुलवा रहा हूँ…..”

सामान के नाम पर
वीणा तीन-तीन दुकान लाई रही : सिंगार की, पोशाक की, ज़ेवर की|
“यह कामरेड कौन है?”
टैक्सी में बैठते ही वीणा पूछती है|

“मैल्टर है,”
सोहनलाल का नाम मैं वीणा से छिपा लेना चाहता हूँ, “मैल्ट तैयार करवाने की
ज़िम्मेदारी उसी की है…..”

“उसका नाम क्या है?”

“सोहनलाल,”
मुझेबताना पड़ रहा है|

“उसी के घर पर आप
शादी से पहले किराएदार रहे?”

“हाँ….. पूरे आठ
महीने…..”


पिछले साल जब मैंने
इस ढलाईघर में काम शुरू किया था तो सोहनलाल से मैंने बहुत सहायता ली थी| कस्बापुर
मेरे लिए अजनबी था और मेरे स्त्रोत थे सीमित| आधी तनख्वाह मुझे बचानी-ही-बचानी थी,
अपनी माँ और बहनों के लिए| साथ ही उसी साल मैंआई. ए. एस. की परीक्षा में बैठ रहा था|
बेहतर अनुभवके साथ| बेहतर तैयारी के साथ| उससे पिछले साल अपनी इंजीनियरिंग ख़त्म करते
हुए भी मैं इस परीक्षा में बैठ चुका था लेकिन उस बार अपने पिता के गले के कैंसर के
कारण मेरी तैयारीपूरी न हो सकी थी और फिर मेरे पिता की मृत्यु भी मेरे परीक्षा-दिनों ही
में हुई थी| ऐसे में सोहनलाल ने मुझे अपने मकान का ऊपरी कमरा दे दिया था| बहुत कम
किराए पर| यही नहीं, मेरे कपड़ों की धुलाई और प्रेस से लेकर मेरी किताबों की झाड़पोंछ
भी मंजुबाला ने अपने हाथ मेंले ली थी| मेरे आभार जताने पर, बेशक, वह हँस दिया
करती, “आपकी किताबों से मैं अपनी आँखें सेंकती हूँ| क्या मालूम दो साल बाद मैं
इन्हें अपने लिए माँग लूँ?”

“उसके परिवार में और
कितने जन थे?”

“सिर्फ़ दो और| एक,
उसकी गर्भवती पत्नी और दूसरी, उसकी कॉलेजिएट बहन…..”

“कैसी थी बहन?”

“बहुत उत्साही और
महत्वाकांक्षी…..”

“आपके लिए?” मेरे
अतीत को वीणा तोड़ खोलना चाहती है|

“नहीं, अपने लिए,”
अपने अतीत में उसकी सेंध मुझे स्वीकार नहीं, “अपने जीवन को वह एक नयी नींव देना
चाहती थी, एक ऊँची टेक…..”
“आपको ज़मीन पर?”
मेरी कोहनी वीणा अपनी बाँह की कोहनी के भीतरी भाग पर ला टिकाती है, “आपके आकाश
में?”
“नहीं,” मैं मुकर
जाता हूँ|

“अच्छा, उसके पैर
कैसे थे?” वीणा मुझे याद दिलाना चाहती है उसके पैर उसकी अतिरिक्त राशि हैं| यह सच
है वीणा जैसे मादक पैर मैंने पहले कभी न देखे रहे : चिक्कण एड़ियाँ, सुडौल अँगूठे
और उँगलियाँ, बने-ठने नाखून, संगमरमरी टखने|

“मैंने कभी ध्यान ही
न दिया था,” मैं कहता हूँ| वीणा को नहीं बताना चाहता मंजुबाला के पैर उपेक्षित
रहे| अनियन्त्रित| ढिठाई की हद तक| नाखून उसके कुचकुचे रहा करते और एड़ियाँ
विरूपित|
“क्यों? चेहरा क्या
इतना सुन्दर था कि उससे नज़र ही न हटती थी!….. तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती, तेरे
पैर हम क्या देखें?” वीणा को अपनी बातचीत में नये-पुराने फ़िल्मी गानों के शब्द
सम्मिलित करने का खूब शौक है|

“चेहरे पर भी मेरा
ध्यान कभी न गया था,” वीणा से मैं छिपा लेना चाहता हूँ, मंजुबाला का चेहरा मेरे
ध्यान में अब भी रचा-बसा है : उत्तुंग उसकी गालों की आँच, उज्ज्वल उसकी ठुड्डी की
आभा, बादामीउसकी आँखों की चमक, टमाटरी उसके होठों का विहार, निरंकुशउसके माथे के
तेवर….. सब कुछ| यहाँ तक कि उसके मुँहासे भी|

“पुअर थिंग (बेचारी)”
घिरी हुई मेरी बाँह को वीणा हल्के से ऊपर उछाल देती है|

“वीणा के लिए
तुम्हें हमारी लांसर ऊँचे पुल पर मिलेगी,” ससुरजी का यह आठवाँ मोबाइल कॉल है- इस
बीच हर आधे घंटे में वे पूछते रहे हैं “कहाँ हो?” ‘कब तक पहुँचोगे?’ “ड्राइवरके
साथ वीणा बँगले पर चली जाएगी और तुम इसी टैक्सी से सीधे ढलाईघर पहुँच लेना…..”

“डेड लौस, माएलैड,”
ढलाईघर पहुँचने पर ससुरजी को ब्लास्ट फ़रनेस के समीप खड़ा पाता हूँ| लेबर के साथ|


ढलाईघर में दो
भट्टियाँ हैं : एक यह, झोंका-भट्टी, जहाँखनिज लोहा ढाला जाता है, जो ढलकर आयरन
नौच्च, लोहे वाले खाँचे में जमा होता रहता है और उसके ऊपर तैर रहा कीट, सिंडरनौच्च
में- कांचित खाँचे में| स्टील का ढाँचा लिये, ताप-प्रतिरोधी, यह झोंका-भट्टी १००
फुट ऊँची है| आनत रेलपथ से छोटी-छोटी गाड़ियों में कोक, चूना-पत्थर और खनिज लोहा
भट्टी की चोटी पर पहुँचाए जाते हैं, सही क्रम में, सही माप में| ताकि जैसे ही
चूल्हों और टारबाइनों से गरम हवा भट्टी में फूँकी जाए, कोक जल कर तापमान बढ़ा दे- खनिज
लोहे की ऑक्सीजन खींचते-खींचते- और फिर अपना कार्बन लोहे को ले लेने दे| बढ़ चुके ताप
से चूना-पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है और खनिज लोहे के अपद्रव्यों और कोक से मिलकर
भट्टी की ऊपरी सतह पर अपनी परत जा बनाता है और पिघला हुआ लोहा निचली परत साध लेता
है| दूसरी भट्टी खुले चूल्हे वाली है- ओपन हार्थ फ़रनेस| यहाँ ढलवें लोहे से स्टील
तैयार किया जाता है जो लेडल, दर्बी, में उमड़कर बह लेता है और उसके ऊपर तैर रहा
लोह-चून, स्लैग, थिम्बल, अंगुश्ताना में निकाल लिया जाता है|


“क्या किया जाए?”
ससुरजी बहुत परेशान हैं, “आयरन नौच्च खाली, सिंडर नौच्च खाली लेडल खाली, थिम्बल
खाली…..”

“मैल्टर साहब अब
यहाँ हैं नहीं,” लेबर में से एक पुराना आदमी सफ़ाई देना चाहता है, “हम भी क्या
करें? न हमें तापमान का ठीक अन्दाज़ा मिल रहा है और न ही कोक, चूना-पत्थर और खनिज
लोहे का सही अनुपात…..”
ब्लास्ट फ़रनेस में तापमान
कम है, भट्टीढीलीहै जबकि तापमान का २८०० से ३५०० डिग्री फ़ाहरनहाइट तक जा पहुँचना
ज़रूरी रहता है|

पीप होल से अन्दर ग़लने हेतु लोहे पर मैं नज़र दौड़ाता हूँ|
लोहा गल नहीं रहा|
भट्टी की कवायद ही
गड़बड़ है| मेरे पूछने पर कोई लेबर बता नहीं पाता भट्टी में कितना लोहा छोड़ा गया,
कितना कोक और कितना लाइमस्टोन|
ससुरजी केसाथ मैं
दूसरी भट्टी तक जा पहुँचता हूँ|
इसमें भी वही बुरा
हाल है सब गड्डमड्ड|

यहाँ भी चूना-पत्थर,
सटील स्क्रैप और कच्चा ढलवाँ लोहा एक साथ झोंक दिया गया मालूम देता है जब कि इस
भट्टी में पहले चूना-पत्थर गलाया जाता है| फिर स्क्रैप के गट्ठे| और ढलवाँ लोहा
तभी उँडेला जाता है जब स्क्रैप पूरी तरह से पिघल चुका हो|

“कामरेड को बुला
लें?” मैं सोहनलाल केपासपहुँचने का हीला खोज रहा हूँ| उसे मिलने की मुझे बहुत
जल्दी है|
“मैं भी साथ चलता
हूँ,” ससुरजी बहुत अधीर हैं|
सोहनलाल अपने घर के
बाहर बैठा है| कई स्त्री-पुरुषों से घिरा|

“आप यहीं बैठे रहिए,”
ससुरजी को गाड़ी से बाहर निकलने से मैं रोक देता हूँ, “कामरेड को मैं इधर आपके पास
बुला लाता हूँ…..”

भीड़ चीरकर मैं
सोहनलाल के पास जा पहुँचता हूँ|

मैं अपनी बाँहें
फैलाता हूँ|

वह नहीं स्वीकारता|

उठकर अपने घर में
दाखिल होता है|
मैं उसके पीछे हो
लेता हूँ|

फर्श पर बिछी एक मैली
चादर पर उसकी गर्भवती पत्नी लेटी है|

सोहनलाल अपने घर के
आँगन में शुरू हो रही सीढ़ियों की ओर बढ़ रहा है|

मैं फिर उसके पीछे
हूँ|

सीढ़ियों कादरवाज़ा
पार होते ही वह मेरी तरफ़ मुड़ता है| एक झटके के साथ मुझे अपनी तरफ़ खींचता है और
दरवाज़े की साँकल चढ़ा देता है|

सामने वह कमरा है
जिसमें मैंने आठ महीने गुज़ारे हैं|

अपनी आई. ए. एस. की
परीक्षा के परिणाम के दिन तक|

वह मुझे कमरे के
अन्दर घसीट ले जाता है|

“यह सारी चिट्ठी
तूने उसके नाम लिखीं?” मेरे कन्धे पकड़कर वह मुझे एक ज़ोरदार हल्लनदेता है और अपनी
जेब के चिथड़े काग़ज़ मेरे मुँह पर दे मारता है, “वह सीधी लीक पर चल रही थी और तूने
उसे चक्कर में डाल दिया| उसका रास्ता बदल दिया| देख| इधर ऊपर देख| इसी छत के पंखे से
लटककर उसने फाँसी लगायी है…..”

मेरे गाल पर सोहनलाल
एक ज़ोरदार तमाचा लगाता है|

फिर दूसरा तमाचा|

फिर तीसरा|

फिर चौथा|

मैं उसे रोकता नहीं|
एक तो वह डीलडौलमें
मुझसे ज़्यादा ज़ोरवार है और फिर शायद मैं उससे सज़ा पाना भी चाहता हूँ|


अपने गालों पर उसके
हाथों की ताक़त मैं लगातार महसूस कर रहा हूँ|

मंजुबाला की सुनायी
एक कहानी के साथ :

रूस की १९१७ की
कम्युनिस्ट क्रान्ति के समय यह कहानी बहुत मशहूर रही थी; जैसे ही
  कोई शहर क्रान्तिकारियों के क़ब्ज़े में आता,
क्रान्ति-नेताउस शहर के निवासियों को एक कतार में लगा देते और बोलते, “अपने-अपने हाथ
फैलाकर हमें दिखाओ|” फिर वे अपनी बन्दूक के साथ हर एक निवासी के पास जाते और जिस किसी
के हाथ उन्हें ‘लिली व्हाइट’ मिलते उसे फ़ौरन गोली से उड़ा दिया जाता, “इन हाथों ने
कभी काम क्यों नहीं किया?”

मंजुबाला मेरे हाथों
को लेकर मुझे अक्सर छेड़ा करती, “देख लेना| जब क्रान्ति आएगी तो तुम ज़रूर धर लिये
जाओगे|”

और मैं उसकी छेड़छाड़
का एक ही जवाब दिया करता, “मुझे कैसे धरेंगे? अपनी नेता को विधवा बनाएँगे क्या?”

ढलवां लोहा

बाहर ससुरजी की गाड़ी
का हॉर्न बजता है| तेज़ और बारम्बार|
बिल्कुल उसी दिन की
तरह जब मेरी आई. ए. एस. की परीक्षा का परिणाम आया था| और वे मुझे यहाँ से अपनी
गाड़ी में बिठलाकर सीधे मेरे शहर, मेरे घर पर ले गये थे, मेरी माँ के सामने| वीणा
का विवाह प्रस्ताव रखने|
मुझसे पहले सोहनलाल
सीढ़ियाँ उतरता है|
मैं प्रकृतिस्थ होने
में समय ले रहा हूँ| मंजुबाला की अन्तिम साँस मुझे अपनी साँस में भरनी है|
नीचे पहुँचकर पाता हूँ,
ससुरजी अपने हाथ की सौ-सौ के सौ नोटोंवाली गड्डी लहरा रहे हैं, “मुझे कल ही आना था
लेकिन मुझे पता चला तुम इधर नहीं हो| श्मशान घाट पर हो|”
“हं….. हं…..”
सोहनलाल की निगाह ससुरजी के हाथ की गड्डी पर आ टिकी है| लगभग उसी लोभ के साथ जो
मेरी माँ की आँखों में कौंधा था जब ससुरजी नेमेरे घर पर पाँच-पाँच सौ के नोटोंवाली
दो गड्डियाँ लहराई थीं, “यह सिर्फ़ रोका रूपया है| बाक़ी देना शादी के दिन होगा|
वीणा मेरी इकलौती सन्तान है…..”
“मेरे साथ अभी चल
नहीं सकते?” ससुरजी के आदेश करने का यही तरीका है| जब भी उन्हें जवाब ‘हाँ’ में
चाहिए होता है तो वे अपना सवाल नकार में पूछते हैं| विवाह की तिथि तय करने के बाद
उन्होंने मुझसे पुछा था, “सोलह मई ठीक नहीं रहेगी क्या?”
“जी…..” सोहनलाल
मेरे अन्दाज़ में अपनी तत्परता दिखलाता है|
“गुड…..” ससुरजी
अपने हाथ की गड्डी उसे थमा देते हैं, “सुना है तुम्हारे घर में खुशी आ रही है| ये
रुपये अन्दर अपनी खुशी की जननी को दे आओ|”
“जी…..”
“फिर हमारे साथ गाड़ी
में बैठ लो| उधर लेबर ने बहुत परेशान कर रखा है| निकम्मे एक ही रट लगाये हैं, मैल्टर
साहब के बिना हमें कोई अन्दाज़ नहीं मिल सकता, न तापमान का, न सामान का…..”
“जी…..”
“गुड| वेरी गुड|”

मालिकके लिए ड्राइवर
गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है और ससुरजी पिछली सीट पर बैठ लेते हैं|
“आओ, हेमन्त…..”

मैं उनकी बगल में
बैठ जाता हूँ|

ड्राइवर गाड़ी के
बाहर खड़ा रहता है|

“जानते हो?” एक-दूसरे
के साथ हमें पहली बार एकान्त मिला है, “ग़ायब होने से पहले इस धूर्त ने क्या
किया?”
“क्या किया?” मैं
काँप जाता हूँ| मंजुबाला के साथ मेरे नाम को घंघोला क्या?
“लेबर को पक्का
किया, लोहा पिघलना नहीं चाहिए…..”
“मगर क्यों?”
मेरा गला सूख रहा है|
“कौन जाने क्यों?
इसीलिए तो तुम्हें यहाँ बुलाया…..”
“मुझे?”
“सोचा तुम्हारी बात
वह टालेगा नहीं| तुम उसे अपनी दोस्ती का वास्ता देकर वापस अपने, माने हमारे, बाड़े
में ले आओगे…..”
“लेकिन आपने तो उसे
इतने ज़्यादा रुपये भी दिये?”
“बाड़े में उसकी
घेराबन्दी दोहरी करने के वास्ते| वह अच्छा कारीगर है और फिर सबसे बड़ी बात, पूरी
लेबर उसकी मूठ में है…..”
उखड़ी साँस के साथ
सोहनलाल ड्राइवर के साथ वाली सीट ग्रहण करता है|
ज़रूर हड़बड़ाहटरही
उसे|

इधर कार में हमारे
पास जल्दी पहुँचने की|

“तुम क्या सोचते हो,
कामरेड?” ससुरजी उसे मापते हैं, “लोहा क्यों पिघल नहीं रहा? मैल्टक्यों तैयार नहीं
होरहा है?”
“ढलाईघर जाकर ही पता
चल पाएगा| लेबर ने कहाँ चूक की है…..”
सोहनलाल साफ़ बच
निकलता है|



ससुरजी मेरी ओर
देखकर मुस्कराते हैं, “तुम बँगले पर उतर लेना, हेमन्त| कामरेडअब सब देखभाल लेगा|
उसके रहते लोहा कैसे नहीं पिघलेगा? स्टील कैसे नहीं गढ़ेगा…..”

“जी,” मैं हामी भरता
हूँ|

मुझे ध्यान आता है,
बँगले पर वीणा है| उसका वातानुकूलित कमरा है…..

‘वीणा के हाथ कैसे
हैं?’

सहसा मंजुबाला दमक
उठती है|

‘लिली व्हाइट!’

‘और आप उसे मेरी
कतार में लाने की बजाय उसकी कतार में जा खड़े हुए?’

‘मैं खुद हैरत में
हूँ, मंजुबाला! यह कैसी कतार है? जहाँ मुझसे आगे खड़े लोग मेरे लिए जगह बना रहे
हैं?’


दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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दीपक शर्मा जी का परिचय –

जन्म -३० नवंबर १९४६

संप्रति –लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त
सशक्त कथाकार दीपक शर्मा जी सहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं | उन की पैनी नज़र समाज की विभिन्न गतिविधियों का एक्स रे करती है और जब उन्हें पन्नों पर उतारती हैं तो शब्द चित्र उकेर देती है | पाठक को लगता ही नहीं कि वो कहानी पढ़ रहा है बल्कि उसे लगता है कि वो  उस परिवेश में शामिल है जहाँ घटनाएं घट रहीं है | एक टीस सी उभरती है मन में | यही तो है सार्थक लेखन जो पाठक को कुछ सोचने पर विवश कर दे |
दीपक शर्मा जी की सैंकड़ों कहानियाँ विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें इन कथा संग्रहों में संकलित किया गया है |

प्रकाशन : सोलहकथा-संग्रह :

१.    हिंसाभास (१९९३) किताब-घर, दिल्ली
२.    दुर्ग-भेद (१९९४) किताब-घर, दिल्ली
३.    रण-मार्ग (१९९६) किताब-घर, दिल्ली
४.    आपद-धर्म (२००१) किताब-घर, दिल्ली
५.    रथ-क्षोभ (२००६) किताब-घर, दिल्ली
६.    तल-घर (२०११) किताब-घर, दिल्ली
७.    परख-काल (१९९४) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
८.    उत्तर-जीवी (१९९७) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
९.    घोड़ा एक पैर (२००९) ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
१०.           बवंडर (१९९५) सत्येन्द्र प्रकाशन, इलाहाबाद
११.           दूसरे दौर में (२००८) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद
१२.           लचीले फ़ीते (२०१०) शिल्पायन, दिल्ली
१३.           आतिशी शीशा (२०००) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१४.           चाबुक सवार (२००३) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१५.           अनचीता (२०१२) मेधा बुक्स, दिल्ली
१६.           ऊँची बोली (२०१५) साहित्य भंडार, इलाहाबाद
१७.           बाँकी(साहित्य भारती, इलाहाबादद्वारा शीघ्र प्रकाश्य)

ईमेल- dpksh691946@gmail.com

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