ढलवाँ लोहा
रहा,” मेरे मोबाइल पर ससुरजी सुनाई देते हैं, “स्टील गढ़ा नहीं जा रहा…..”
ढलाईघर है : कस्बापुर स्टील्ज़|
है?” मैं पूछता हूँ|
सोहनलाल, कम्युनिस्ट पार्टी का कार्ड-होल्डर तो नहीं है लेकिन सभी उसे इसी नाम से पुकारते हैं|
‘लेबर को यही भ्रम रहना चाहिए, वह उनके बाड़े में है और उनके हित सोहनलाल ही की निगरानी में हैं…..
जबकि है वह हमारे बाड़े में…..’
मौत हो गयी है| परसों| वह तभी से घर से ग़ायब है…..”
व्याकुल हो उठता हूँ लेकिन नहीं पूछता, ‘कहीं मंजुबाला की तो नहीं?’ मैं नहीं
चाहता ससुरजी जानें सोहनलाल की बहन, मंजुबाला, पर मैं रीझा रहा हूँ| पूरी तरह|
तुम लोगों को विदाई देकर मैं बँगले पर लौटता हूँ कि कल्लू चिल्लाने लगता है,
कामरेड के घर पर गमी हो गयी…..”
हैं| मेरी साँस उखड़ रही है| विवाह ही के दिन ससुरजी ने वीणा को और मुझे इधर
नैनीताल भेज दिया था| पाँच दिन के प्रमोद काल के अन्तर्गत| यह हमारी दूसरी सुबह
है|
हाथ से मोबाइल छीन लेती है, “यू कांट स्नैच आर फ़न| (आप हमारा आमोद-प्रमोद नहीं छीन
सकते) हेमन्त का ब्याह आपने मुझसे किया या अपने कस्बापुर स्टील्ज़ से?”
बेटियाँ अपने पिता से इतनी खुलकर बात करती हैं क्या? बेशक मेरे पिता जीवित नहीं
हैं और मेरी बहनों में से कोई विवाहित भी नहीं लेकिन मैं जानता हूँ, उन पाँचों में
से एक भी मेरे पिता के संग ऐसी धृष्टता प्रयोग में न ला पातीं|
करेंगे,” वीणा मेरे हाथ में मेरा मोबाइल लौटा देती है; उसके चेहरे की हँसी उड़ रही
है|
रहे हैं, “चौबीसघंटे से ऊपर हो चला है| काम आगे बढ़ नहीं रहा|”
मुझे सोहनलाल से मिलना है| जल्दी बहुत जल्दी|
हूँ,” ससुरजी अपना मोबाइल काट लेते हैं|
वीणा,” मैं कहता हूँ, “मैं रिसेप्शन से टैक्सी बुलवा रहा हूँ…..”
वीणा तीन-तीन दुकान लाई रही : सिंगार की, पोशाक की, ज़ेवर की|
टैक्सी में बैठते ही वीणा पूछती है|
सोहनलाल का नाम मैं वीणा से छिपा लेना चाहता हूँ, “मैल्ट तैयार करवाने की
ज़िम्मेदारी उसी की है…..”
मुझेबताना पड़ रहा है|
शादी से पहले किराएदार रहे?”
महीने…..”
इस ढलाईघर में काम शुरू किया था तो सोहनलाल से मैंने बहुत सहायता ली थी| कस्बापुर
मेरे लिए अजनबी था और मेरे स्त्रोत थे सीमित| आधी तनख्वाह मुझे बचानी-ही-बचानी थी,
अपनी माँ और बहनों के लिए| साथ ही उसी साल मैंआई. ए. एस. की परीक्षा में बैठ रहा था|
बेहतर अनुभवके साथ| बेहतर तैयारी के साथ| उससे पिछले साल अपनी इंजीनियरिंग ख़त्म करते
हुए भी मैं इस परीक्षा में बैठ चुका था लेकिन उस बार अपने पिता के गले के कैंसर के
कारण मेरी तैयारीपूरी न हो सकी थी और फिर मेरे पिता की मृत्यु भी मेरे परीक्षा-दिनों ही
में हुई थी| ऐसे में सोहनलाल ने मुझे अपने मकान का ऊपरी कमरा दे दिया था| बहुत कम
किराए पर| यही नहीं, मेरे कपड़ों की धुलाई और प्रेस से लेकर मेरी किताबों की झाड़पोंछ
भी मंजुबाला ने अपने हाथ मेंले ली थी| मेरे आभार जताने पर, बेशक, वह हँस दिया
करती, “आपकी किताबों से मैं अपनी आँखें सेंकती हूँ| क्या मालूम दो साल बाद मैं
इन्हें अपने लिए माँग लूँ?”
कितने जन थे?”
उसकी गर्भवती पत्नी और दूसरी, उसकी कॉलेजिएट बहन…..”
महत्वाकांक्षी…..”
अतीत को वीणा तोड़ खोलना चाहती है|
अपने अतीत में उसकी सेंध मुझे स्वीकार नहीं, “अपने जीवन को वह एक नयी नींव देना
चाहती थी, एक ऊँची टेक…..”
मेरी कोहनी वीणा अपनी बाँह की कोहनी के भीतरी भाग पर ला टिकाती है, “आपके आकाश
में?”
जाता हूँ|
कैसे थे?” वीणा मुझे याद दिलाना चाहती है उसके पैर उसकी अतिरिक्त राशि हैं| यह सच
है वीणा जैसे मादक पैर मैंने पहले कभी न देखे रहे : चिक्कण एड़ियाँ, सुडौल अँगूठे
और उँगलियाँ, बने-ठने नाखून, संगमरमरी टखने|
न दिया था,” मैं कहता हूँ| वीणा को नहीं बताना चाहता मंजुबाला के पैर उपेक्षित
रहे| अनियन्त्रित| ढिठाई की हद तक| नाखून उसके कुचकुचे रहा करते और एड़ियाँ
विरूपित|
इतना सुन्दर था कि उससे नज़र ही न हटती थी!….. तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती, तेरे
पैर हम क्या देखें?” वीणा को अपनी बातचीत में नये-पुराने फ़िल्मी गानों के शब्द
सम्मिलित करने का खूब शौक है|
ध्यान कभी न गया था,” वीणा से मैं छिपा लेना चाहता हूँ, मंजुबाला का चेहरा मेरे
ध्यान में अब भी रचा-बसा है : उत्तुंग उसकी गालों की आँच, उज्ज्वल उसकी ठुड्डी की
आभा, बादामीउसकी आँखों की चमक, टमाटरी उसके होठों का विहार, निरंकुशउसके माथे के
तेवर….. सब कुछ| यहाँ तक कि उसके मुँहासे भी|
घिरी हुई मेरी बाँह को वीणा हल्के से ऊपर उछाल देती है|
तुम्हें हमारी लांसर ऊँचे पुल पर मिलेगी,” ससुरजी का यह आठवाँ मोबाइल कॉल है- इस
बीच हर आधे घंटे में वे पूछते रहे हैं “कहाँ हो?” ‘कब तक पहुँचोगे?’ “ड्राइवरके
साथ वीणा बँगले पर चली जाएगी और तुम इसी टैक्सी से सीधे ढलाईघर पहुँच लेना…..”
ढलाईघर पहुँचने पर ससुरजी को ब्लास्ट फ़रनेस के समीप खड़ा पाता हूँ| लेबर के साथ|
भट्टियाँ हैं : एक यह, झोंका-भट्टी, जहाँखनिज लोहा ढाला जाता है, जो ढलकर आयरन
नौच्च, लोहे वाले खाँचे में जमा होता रहता है और उसके ऊपर तैर रहा कीट, सिंडरनौच्च
में- कांचित खाँचे में| स्टील का ढाँचा लिये, ताप-प्रतिरोधी, यह झोंका-भट्टी १००
फुट ऊँची है| आनत रेलपथ से छोटी-छोटी गाड़ियों में कोक, चूना-पत्थर और खनिज लोहा
भट्टी की चोटी पर पहुँचाए जाते हैं, सही क्रम में, सही माप में| ताकि जैसे ही
चूल्हों और टारबाइनों से गरम हवा भट्टी में फूँकी जाए, कोक जल कर तापमान बढ़ा दे- खनिज
लोहे की ऑक्सीजन खींचते-खींचते- और फिर अपना कार्बन लोहे को ले लेने दे| बढ़ चुके ताप
से चूना-पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है और खनिज लोहे के अपद्रव्यों और कोक से मिलकर
भट्टी की ऊपरी सतह पर अपनी परत जा बनाता है और पिघला हुआ लोहा निचली परत साध लेता
है| दूसरी भट्टी खुले चूल्हे वाली है- ओपन हार्थ फ़रनेस| यहाँ ढलवें लोहे से स्टील
तैयार किया जाता है जो लेडल, दर्बी, में उमड़कर बह लेता है और उसके ऊपर तैर रहा
लोह-चून, स्लैग, थिम्बल, अंगुश्ताना में निकाल लिया जाता है|
ससुरजी बहुत परेशान हैं, “आयरन नौच्च खाली, सिंडर नौच्च खाली लेडल खाली, थिम्बल
खाली…..”
यहाँ हैं नहीं,” लेबर में से एक पुराना आदमी सफ़ाई देना चाहता है, “हम भी क्या
करें? न हमें तापमान का ठीक अन्दाज़ा मिल रहा है और न ही कोक, चूना-पत्थर और खनिज
लोहे का सही अनुपात…..”
कम है, भट्टीढीलीहै जबकि तापमान का २८०० से ३५०० डिग्री फ़ाहरनहाइट तक जा पहुँचना
ज़रूरी रहता है|
गड़बड़ है| मेरे पूछने पर कोई लेबर बता नहीं पाता भट्टी में कितना लोहा छोड़ा गया,
कितना कोक और कितना लाइमस्टोन|
दूसरी भट्टी तक जा पहुँचता हूँ|
हाल है सब गड्डमड्ड|
सटील स्क्रैप और कच्चा ढलवाँ लोहा एक साथ झोंक दिया गया मालूम देता है जब कि इस
भट्टी में पहले चूना-पत्थर गलाया जाता है| फिर स्क्रैप के गट्ठे| और ढलवाँ लोहा
तभी उँडेला जाता है जब स्क्रैप पूरी तरह से पिघल चुका हो|
लें?” मैं सोहनलाल केपासपहुँचने का हीला खोज रहा हूँ| उसे मिलने की मुझे बहुत
जल्दी है|
हूँ,” ससुरजी बहुत अधीर हैं|
बाहर बैठा है| कई स्त्री-पुरुषों से घिरा|
ससुरजी को गाड़ी से बाहर निकलने से मैं रोक देता हूँ, “कामरेड को मैं इधर आपके पास
बुला लाता हूँ…..”
सोहनलाल के पास जा पहुँचता हूँ|
फैलाता हूँ|
दाखिल होता है|
लेता हूँ|
चादर पर उसकी गर्भवती पत्नी लेटी है|
आँगन में शुरू हो रही सीढ़ियों की ओर बढ़ रहा है|
हूँ|
पार होते ही वह मेरी तरफ़ मुड़ता है| एक झटके के साथ मुझे अपनी तरफ़ खींचता है और
दरवाज़े की साँकल चढ़ा देता है|
जिसमें मैंने आठ महीने गुज़ारे हैं|
परीक्षा के परिणाम के दिन तक|
अन्दर घसीट ले जाता है|
तूने उसके नाम लिखीं?” मेरे कन्धे पकड़कर वह मुझे एक ज़ोरदार हल्लनदेता है और अपनी
जेब के चिथड़े काग़ज़ मेरे मुँह पर दे मारता है, “वह सीधी लीक पर चल रही थी और तूने
उसे चक्कर में डाल दिया| उसका रास्ता बदल दिया| देख| इधर ऊपर देख| इसी छत के पंखे से
लटककर उसने फाँसी लगायी है…..”
एक ज़ोरदार तमाचा लगाता है|
मुझसे ज़्यादा ज़ोरवार है और फिर शायद मैं उससे सज़ा पाना भी चाहता हूँ|
हाथों की ताक़त मैं लगातार महसूस कर रहा हूँ|
एक कहानी के साथ :
कम्युनिस्ट क्रान्ति के समय यह कहानी बहुत मशहूर रही थी; जैसे ही कोई शहर क्रान्तिकारियों के क़ब्ज़े में आता,
क्रान्ति-नेताउस शहर के निवासियों को एक कतार में लगा देते और बोलते, “अपने-अपने हाथ
फैलाकर हमें दिखाओ|” फिर वे अपनी बन्दूक के साथ हर एक निवासी के पास जाते और जिस किसी
के हाथ उन्हें ‘लिली व्हाइट’ मिलते उसे फ़ौरन गोली से उड़ा दिया जाता, “इन हाथों ने
कभी काम क्यों नहीं किया?”
को लेकर मुझे अक्सर छेड़ा करती, “देख लेना| जब क्रान्ति आएगी तो तुम ज़रूर धर लिये
जाओगे|”
का एक ही जवाब दिया करता, “मुझे कैसे धरेंगे? अपनी नेता को विधवा बनाएँगे क्या?”
का हॉर्न बजता है| तेज़ और बारम्बार|
तरह जब मेरी आई. ए. एस. की परीक्षा का परिणाम आया था| और वे मुझे यहाँ से अपनी
गाड़ी में बिठलाकर सीधे मेरे शहर, मेरे घर पर ले गये थे, मेरी माँ के सामने| वीणा
का विवाह प्रस्ताव रखने|
सीढ़ियाँ उतरता है|
में समय ले रहा हूँ| मंजुबाला की अन्तिम साँस मुझे अपनी साँस में भरनी है|
ससुरजी अपने हाथ की सौ-सौ के सौ नोटोंवाली गड्डी लहरा रहे हैं, “मुझे कल ही आना था
लेकिन मुझे पता चला तुम इधर नहीं हो| श्मशान घाट पर हो|”
सोहनलाल की निगाह ससुरजी के हाथ की गड्डी पर आ टिकी है| लगभग उसी लोभ के साथ जो
मेरी माँ की आँखों में कौंधा था जब ससुरजी नेमेरे घर पर पाँच-पाँच सौ के नोटोंवाली
दो गड्डियाँ लहराई थीं, “यह सिर्फ़ रोका रूपया है| बाक़ी देना शादी के दिन होगा|
वीणा मेरी इकलौती सन्तान है…..”
नहीं सकते?” ससुरजी के आदेश करने का यही तरीका है| जब भी उन्हें जवाब ‘हाँ’ में
चाहिए होता है तो वे अपना सवाल नकार में पूछते हैं| विवाह की तिथि तय करने के बाद
उन्होंने मुझसे पुछा था, “सोलह मई ठीक नहीं रहेगी क्या?”
मेरे अन्दाज़ में अपनी तत्परता दिखलाता है|
अपने हाथ की गड्डी उसे थमा देते हैं, “सुना है तुम्हारे घर में खुशी आ रही है| ये
रुपये अन्दर अपनी खुशी की जननी को दे आओ|”
में बैठ लो| उधर लेबर ने बहुत परेशान कर रखा है| निकम्मे एक ही रट लगाये हैं, मैल्टर
साहब के बिना हमें कोई अन्दाज़ नहीं मिल सकता, न तापमान का, न सामान का…..”
गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है और ससुरजी पिछली सीट पर बैठ लेते हैं|
बैठ जाता हूँ|
बाहर खड़ा रहता है|
के साथ हमें पहली बार एकान्त मिला है, “ग़ायब होने से पहले इस धूर्त ने क्या
किया?”
काँप जाता हूँ| मंजुबाला के साथ मेरे नाम को घंघोला क्या?
किया, लोहा पिघलना नहीं चाहिए…..”
मेरा गला सूख रहा है|
इसीलिए तो तुम्हें यहाँ बुलाया…..”
वह टालेगा नहीं| तुम उसे अपनी दोस्ती का वास्ता देकर वापस अपने, माने हमारे, बाड़े
में ले आओगे…..”
इतने ज़्यादा रुपये भी दिये?”
घेराबन्दी दोहरी करने के वास्ते| वह अच्छा कारीगर है और फिर सबसे बड़ी बात, पूरी
लेबर उसकी मूठ में है…..”
सोहनलाल ड्राइवर के साथ वाली सीट ग्रहण करता है|
उसे|
पास जल्दी पहुँचने की|
कामरेड?” ससुरजी उसे मापते हैं, “लोहा क्यों पिघल नहीं रहा? मैल्टक्यों तैयार नहीं
होरहा है?”
चल पाएगा| लेबर ने कहाँ चूक की है…..”
निकलता है|
देखकर मुस्कराते हैं, “तुम बँगले पर उतर लेना, हेमन्त| कामरेडअब सब देखभाल लेगा|
उसके रहते लोहा कैसे नहीं पिघलेगा? स्टील कैसे नहीं गढ़ेगा…..”
हूँ|
बँगले पर वीणा है| उसका वातानुकूलित कमरा है…..
हैं?’
उठती है|
कतार में लाने की बजाय उसकी कतार में जा खड़े हुए?’
हूँ, मंजुबाला! यह कैसी कतार है? जहाँ मुझसे आगे खड़े लोग मेरे लिए जगह बना रहे
हैं?’
,



Comments are closed.