व्यस्त चौराहे

ये कहानी है एक व्यस्त चौराहे की, जो साक्षी बना  दुख -दर्द से जूझती महिला का, जो साक्षी बना अवसाद और मौन का ,जो साक्षी बना इंसानियत का | कितनी भी करुणा उपजे , कितना भी दर्द हो ,पर ये व्यस्त चौराहे कभी खाली नहीं होते .. लोगों की भीड़ से ,वाहनों के शोर से और साक्षी होने के ..  मौन अंतहीन दर्द की शृंखलाओं से | आइए पढ़ें मीन पाठक जी की एक ऐसी ही मार्मिक कहानी

व्यस्त चौराहे 

जब से आरोही ने ये नया ऑफिस ज्वाइन किया था, शहर के इस व्यस्त चौराहे से गुजरते हुए रोज ही उस अम्मा को देख रही थी। मझोला कद, गोरी-चिट्टी रंगत, गंदे-चिकट बाल, बदन पर मैले-कुचैले कपड़े, दुबली-पतली और चेहरे पर उम्र की अनगिनत लकीरें लिए अम्मा चुपचाप कुछ ना कुछ करती रहती। वह कभी अपना चबूतरा साफ़ करती, कभी चूल्हे में आग जलाती तो कभी अपने सेवार से उलझे बालों को सुलझाती हुई दिख जाती। आरोही जब भी उसे देखती उसके भीतर सैकड़ों सवालों के काँटे उग आते।
कौन है ये? यूँ बीच चौराहे पर खुले में क्यूँ अपना डेरा जमाए बैठी है? छत्त के नाम पर ऊपर से गुजरता हाइवे और दीवारों के नाम पर वो चौंड़ा सा चौकोर पिलर; जो अपने सिर पर हाइवे को उठाये खड़ा था, वही उसका भी सहारा था। अम्मा ने कुछ बोरों में ना जाने क्या-क्या भर कर उसी से टिका रखा था। वहीं छः ईंट जोड़ कर चूल्हा बना था। कुछ एल्युमिनियम के पिचके टेढ़े-मेढ़े बर्तन, प्लास्टिक की पेण्ट वाली बाल्टी और चूल्हे के पास ही कुछ सूखी लकड़ियाँ रखी थीं। यही थी उसकी घर-गृहस्थी।
उसे देख कर आरोही के मन में ना जाने कैसे-कैसे ख्याल आते। वह सोचती कि उम्र के जिस पड़ाव पर अम्मा है, उसके बेटे-बेटियों के बालों में भी सफेदी झाँक रही होगी। उनके बच्चे भी बड़े हो रहे होगें। इसका पति जीवित है भी या नहीं! क्या उसे अम्मा की याद नहीं आती या अम्मा ही सब भूल गयी है ? इतने शोर में यहाँ कैसे रहती है अम्मा ? इन्हीं सब प्रश्नों के साथ आरोही ऑफिस पहुँच कर अपने काम में जुट जाती। लौटते समय फिर से चौराहे पर उसकी आँखें अम्मा को ऐसे तलाशतीं जैसे मेले की भीड़ में कोई अपने को तलाशता है।
उस दिन किसी कारणवश आरोही को ऑफिस से जल्दी लौटना पड़ा। ऑटो से उतर कर चौराहे पर पहुँची तो आदतन उसकी आँखें अम्मा के चबूतरे की ओर उठ गयीं। उसने देखा कि अम्मा कोई कपड़ा सिल रही थी। कुछ सोचते हुए पहली बार आरोही के कदम खुद-ब-खुद अम्मा की ओर बढ़ गए। पास आ कर उसने देखा, अम्मा के सामने ही एक प्लेट पर काली रील रखी हुयी थी और अम्मा बड़ी तल्लीनता से ब्लाउंज की फटी आस्तीन सिलने में जुटी थी। उसने बैग से अपना टिफिन बॉक्स निकाल लिया।
“अम्मा..! प्लेट इधर करना ज़रा।” टिफिन खोलते हुए बोली वह। अम्मा अपने काम में लगी रही। जैसे उसने सुना ही ना हो।
“प्लेट इधर कर दो अम्मा।” आरोही इस बार कुछ जोर से बोली।
उसकी तरफ देखे बिना ही अम्मा ने सुई को कपड़े में फँसा कर रील गिराते हुए प्लेट उसकी ओर खिसका दिया और फिर से सिलाई में लग गई।
“लो, अम्मा !” लंच प्लेट पर रख कर उसके आगे सरकाते हुए आरोही ने कहा; पर अम्मा अपने काम में मगन थी, कुछ न बोली।
लंच यूँ ही अम्मा के सामने रखा रहा और अम्मा अपना काम करती रही। आरोही थोड़ी देर वहीं खड़ी रही; पर जब अम्मा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी तब वह चुपचाप अपने रास्ते हो ली। मन ही मन सोच रही थी कि पता नहीं उसने जो किया वो उसे करना चाहिए था या नही; पर अम्मा के करीब जाने का उसे वही एक रास्ता सूझा था।
अब तो रोज ही आते-जाते कुछ न कुछ उसके आगे रख देती आरोही लेकिन कभी भी ना तो अम्मा ने आरोही की ओर देखा, ना ही उसके कहने पर चीजें अपने हाथ में ली। कभी-कभी तो वह अम्मा के इस रवइए पर खिन्न हो जाती; पर अम्मा के नज़दीक जाने का और कोई ज़रिया उसे दिखाई नहीं दे रहा था। वह करे भी तो क्या !
जब भी वह उसके पास जा कर खड़ी होती तब ना जाने कितनी बार उसका जी चाहता कि वह बात करे अम्मा से। पूछे, कि वह कहाँ से आई है? यहाँ क्यों रह रही है? उसके घर में कौन-कौन हैं? परन्तु अम्मा के व्यवहार से आरोही की हिम्मत न होती और घर आ कर देर तक उसके बारे में ही सोचती रहती।
उस दिन लौटते समय आरोही ने देखा कि अम्मा आने-जाने वालों को उंगली दिखा कर कुछ बोल रही थी। जैसे यातायात के नियमों को ताक पर रखने के लिए उन सबको डाँट रही हो, “सुधर जाओ तुम लोग नहीं तो भुगतोगे।“
जिज्ञासावश आरोही अम्मा की तरफ बढ़ गयी। कुछ और लोग भी उसी की तरह उत्सुकतावश रुक कर उसे देख रहे थे। अम्मा को देख कर आरोही ठिठक गयी। उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे। भौंहें कमान-सी तनी थीं। गले की नसें खिंच कर उभर आई थीं। अम्मा ऊँची आवाज में बोले जा रही थी; पर उसे कुछ समझ नहीं आया। वह चुपचाप देखती रही फिर वहीं बैठे एक रिक्शेवाले से पूछ लिया उसने, “क्या हुआ अम्मा को ?”
“कबहू-कबहू बुढ़िया पगलाय जात। थोड़ो दिमाग खिसको है जाको।” चुल्लू भर मसाला वहीं चप्प से थूक कर अंगोछे से दाढ़ी पर छलका थूक पोछते हुए बोला वह।
सुन कर धक्क से रह गयी आरोही। वह उसे इस हाल में पहली बार देख रही थी। उसे हमेशा चुप-चाप अपना काम करते हुए ही देखा था उसने। वहाँ लोगों के खड़े होने से जाम लगने लगा था। आती-जाती गाड़ियों की रफ़्तार थमने से उनके हॉर्न तेज हो गए थे। तभी चौराहे पर खड़ा सिपाही सीटी बजाता हुए वहीं आ गया। उसे देखते ही वहाँ खड़े सभी लोग तितर-वितर हो गए। गाड़ियों की कतारें रेंगती हुयी निकलने लगीं और थोड़ी देर में ही यातायात पहले जैसा सामान्य हो गया।
रिक्शेवाले की बात सुन कर आरोही के दिल में कुछ चुभ-सा गया था। वह सोचने लगी कि कहीं अम्मा के इस उन्माद के कारण ही तो उसके अपने नहीं छोड़ गये यहाँ या अपने ही छोड़ गए, इस लिए ये ऐसी हो गयी ? यही सब सोचते हुए उदास मन से आरोही घर लौट आयी। घर का काम करते हुए अम्मा का चेहरा आँखों के सामने घूमता रहा। देर रात तक उसी के बारे में सोचती रही।
अगले दिन चौराहे से गुज़रते हुए देखा तो अम्मा अपने चबूतरे पर नहीं थी। उसकी आँखें इधर-उधर तलाश ही रही थीं कि तभी अम्मा बाल्टी में पानी भरे वहीं पास के रेस्टोरेंट की तरफ से आती दिख गयी। उसे देख कर आरोही का चेहरा फूल-सा खिल उठा। आज वह ठीक लग रही थी। उसने पेटीकोट के ऊपर अंगोछा बेल्ट की तरह बाँध रखा था। शायद पेटीकोट को संभाले रखने के लिए।
मन में तुरंत विचार कौंध गया, “क्या सचमुच अम्मा का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है! नहीं,नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो उसे अपने वस्त्रों की सुध तो बिल्कुल ना होती। वह रसोई बनाती है। अपना चबूतरा साफ़ करती है। इधर-उधर से ढूंढ़ कर जलावन लाती है। कंघी से जूँ निकलती है। वह विक्षिप्त नहीं हो सकती लेकिन कल क्या हो गया था उसे ?” सोचते हुए ऑफिस पहुँच कर अपने काम में लग गयी।
दिन पर दिन अम्मा के प्रति उसकी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। शाम को लौटी तो देखा कि अम्मा से दो महिलाएँ खड़ी कुछ बातें कर रही थीं। उन्हें बतियाते देख आरोही स्वयं को रोक ना सकी। उन्हीं के बहाने वह भी अम्मा से बात कर लेगी, इसी लालसा से उधर बढ़ गयी। थोड़ी देर चुप-चाप खड़ी उसकी बातें सुनती रही। अम्मा क्या कह रही थी, वह आज भी समझ नहीं पा रही थी।
“क्या हुआ ?” मायूस हो कर आरोही ने उन महिलाओं से ही पूछ लिया।
“पुलिस वालों ने बहुत मारा है बेचारी को।” उनमें से एक हमदर्दी जताते हुए बोली।
उन दोनों को आरोही से बात करते देख अम्मा भी उसकी तरफ देखने लगी। आज पहली बार अम्मा की आँखें उसकी ओर उठी थीं। उन उदास आँखों से पीड़ा का सागर छलक रहा था। शायद इसी सागर की लहरों ने उसके चेहरे पर असंख्य लकीरें खींच दी थीं। उसने सिपाहियों की तरफ संकेत कर कुछ कहा और पेटीकोट खिसका कर चोट दिखाने लगी। उसकी कमर के नीचे डंडे से मारने के कई निशान पड़े थे। वह घूम कर फिर से कुछ कहने लगी; पर उसका कहा कहाँ कुछ समझ पा रही थी आरोही। वे महिलाएँ भी अनुमान ही लगा रही थीं। क्यों कि चौराहे पर खड़े पुलिसकर्मियों की तरफ उंगली उठा कर वह बार-बार अपनी चोट दिखा रही थी। थोड़ी देर वहीं खड़ी रही आरोही। मन में उन सिपाहियों के लिए क्रोध उमड़ रहा था। ज़रा भी इंसानियत नहीं, कितनी बेरहमी से मारा है! क्या करे वह? जब कुछ समझ नहीं आया तब उसने उन महिलाओं से ही पूछ लिया, “क्यों मारा उन लोगों ने ?”
दोनों ने ना में कंधे उचका दिए। उससे रहा न गया तो वह उनकी तरफ बढ़ गयी। यातायात सुचारू रूप से चल रहा था इस लिए दोनों खड़े बतिया रहे थे। आरोही दनदनाते पहुँच गयी।
“अम्मा को इतनी बेरहमी से क्यों मारा आप लोगों ने ?” एकाएक उसकी आवाज सुन कर दोनों सिपाही चौंक पड़े।
“क्या हुआ, किसकी बात कर रहीं हैं आप ?” उनमें से एक सिपाही बोल पड़ा।
“वो जो सामने अम्मा रहती है, उसे क्यों मारा आप लोगोंने ?”
“अरे ! आप भी किसकी बात कर रही हैं! वो पागल है। आज बीच सड़क पर बैठ गयी थी। जाम लग गया। कुछ लोगों ने हटाने का प्रयास किया तो उनके ऊपर झपट पड़ी। आपको पता भी है? भीषण दुर्घटना घटते-घटते रह गयी, इस लिए उसे..!”
“तो आप एक महिला पर हाथ उठाएँगे?” उनकी बात बीच में ही काट कर बोल पड़ी आरोही।
“इतना सोचने का समय नहीं था मैडम कि वह महिला है या पुरुष! जाइए, हमें अपना काम करने दीजिये।” इस बार रूढ़ हो कर बोला वो। तभी दूसरा सिपाही चौराहे की ओर बढ़ गया। वहाँ जाम लगने लगा था।
“ये क्या जवाब हुआ आपका?” गुस्से से बोली आरोही।
“देखिये मैडम! आपको अगर उसकी बहुत चिंता है तो उसे अपने घर ले जाइए। हम यहाँ यातायात संभालने के लिए खड़े हैं, समाज सेवा के लिए नहीं।” कह कर वह भी चौराहे की तरफ बढ़ गया।
आरोही अपना सा मुँह लिए घर आ गयी। घर का काम ख़त्म कर के रात में लेटी तो अम्मा की चोट आँखों के सामने घूम गई। मन ही मन सोचने लगी कि क्या करूँ अम्मा के लिए..? तभी अचानक कुछ ख्याल आया। वह उठी और धीरे से दूसरे कमरे में जा कर आलमारी से अपना गाउन निकल ली। उसके साथ नहाने और कपड़े धोने के लिए साबुन की बट्टी, चोट पर लगाने का ट्यूब जो आधा से भी कम बचा था और कुछ बिस्किट के पैकेट, ये सब चीजें गाउन में लपेट कर एक थैले में रख कर फिर से जा कर लेट गयी।
अगले दिन ऑफिस जाते समय वह मन ही मन बहुत खुश थी कि अम्मा अब उसे पहचानने लगी है। अब धीरे-धीरे बात करते हुए उसके बारे में सब जान लेगी वह और उसके घरवालों को ढूँढ़ने का प्रयास भी करेगी। यही सब सोचते हुए चौराहे पर पहुँची तो अम्मा अपने दोनों हाथ कमर पर रखे बाँस-सी तनी खड़ी आने-जाने वालों को देख रही थी।
“अम्मा !” उसके पास जा कर आरोही ने पुकारा।
सुन कर वह उसकी ओर घूमी। अभी कुछ और कहती आरोही कि एकाएक वह उसके ऊपर झपट पड़ी। अचानक हुए इस हमले से चीखती हुयी वह कई कदम पीछे हटती चली गयी। डर से काँप उठी वह। दिल नगाड़े-सा बज उठा था। गनीमत थी कि वह किसी वाहन से नहीं टकराई थी नहीं तो इतने व्यस्त चौराहे पर कुछ भी हो सकता था। तभी वहाँ बैठे रिक्शेवालों ने अम्मा को जोर से डपटा; परन्तु अम्मा पर कोई असर नहीं हुआ। अम्मा उस दिन की तरह फिर से आते-जाते लोगों पर उंगली दिखा कर बरसने लगी। तभी उस दिन वाले सिपाही भी दौड़ कर आ गए।
“चोट तो नहीं आयी मैडम?” पूछा उन्होंने।
“नहीं, बच गयी।” हाँफते हुए बोली वह।
आवाज दे कर उन्होंने रेस्टोरेंट से पानी मंगा कर दिया। पानी पी कर थोड़ी संयत हुयी तो उनलोगों से थैला दिखा कर बोली, “अब इसका क्या करूँ ?”
“इसे यहीं रख दीजिये, जब संतुलित होगी तो ये खुद ही ले लेगी। इस समय इसका दिमाग ठीक नही है।” उनमें से एक ने कहा।
उसने धीरे से आगे बढ़ कर थैला बोरे के पास रख दिया और जैसे ही चलने को हुई कि एक पुलिसवाले ने टोक दिया, “अब आप समझीं कि उस दिन ना चाहते हुए भी इसके साथ हमने सख्ती क्यों बरती ?”
“क्या कुछ किया नहीं जा सकता अम्मा के लिए ?” उसकी आवाज में पुलिसवालों के लिए आदर भाव था तो अम्मा की मदद करने का निवेदन भी।
“हमने अपने स्तर पर प्रयास किया था एक बार; पर वृद्धाश्रम वालों ने नहीं लिया। ये कह कर कि इसके पास ना तो कोई आईडी प्रूफ है और ना ही ये मानसिक रूप से स्वस्थ है। हम ऐसे बुजुर्गों को नहीं लेते क्योंकि इससे दूसरे बुजुर्गों को परेशानी हो सकती है।’’
सुन कर मायूस हो गयी आरोही। इन सब में ऑफिस के लिए बहुत देर हो गयी थी। उन्हें धन्यवाद बोल कर तेज क़दमों से आगे बढ़ गयी।
उस दिन आरोही ने ऑफिस में बैठे-बैठे ही अपने उन सभी मित्रों को फोन किया जो सामाजिक संस्थाओं से जुड़े थे। उनसे पूरी बात बताई और कहा कि वे अम्मा के लिए कुछ करें। एक-दो लोगों से आश्वासन भी मिला पर तीन चार महीने बीतने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
देखते ही देखते अक्टूबर का महीना लग गया। उसे चिंता हो रही थी कि सर्दियों में अम्मा इस खुले में कैसे रहेगी। इस उम्मीद से कि शायद कुछ हो सके, आरोही ने फिर से उन मित्रों का फोन खटखटाया। खासकर दिव्या का, जो उसकी कॉलेज फ्रेंड थी और अनेक समाज सेवी संस्थाओं से जुड़ीं थी। फिर से आश्वासन मिला। आरोही जानती थी कि होगा कुछ नहीं पर उससे जो भी हो सकेगा, करेगी अम्मा के लिए। अपना मन बना ली थी आरोही।
तभी अचानक कुछ दिनों के लिए उसे शहर से बाहर जाना पड़ा। लौट कर आयी तो देखा अम्मा वहाँ नहीं थी। कहीं इधर-उधर होगी, यही सोचते हुए दो दिन निकल गए। तीसरे दिन फिर नहीं दिखी अम्मा। शाम को लौटते समय खाली चबूतरा देख कर उससे रहा ना गया। वह उधर बढ़ गयी। वहाँ खड़े रिक्शेवाले से पूछने पर पता चला कि उसने भी कई दिनों से उसे नहीं देखा था। अब तो मन बेचैन हो उठा। कहाँ जा सकती है अम्मा..! इतने महीनों से आते-जाते उसे देखने की आदत-सी पड़ गयी थी। अम्मा से एक अंजाना भावनात्मक रिश्ता भी जुड़ गया था। मन कितना भी काम में लगाती पर बार-बार अम्मा का ख्याल आ जाता। वह अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। अम्मा का चेहरा बार-बार आँखों के सामने घूम रहा था। मन में एक ही सवाल, कहाँ चली गयी अम्मा..!
धीरे-धीरे महीना बीत गया। चौराहे पर उसकी आँखें आम्मा को तलाशती रहीं पर वह नहीं दिखी। मन में अनेकों आशंकाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं।
“कहीं ऐसा तो नहीं कि अम्मा…! नहीं-नहीं।“ जितनी तेजी से यह विचार आता उतनी ही तेजी से मन इसे नकार भी देता। सफाई अभियान वालों ने उसका ताम-झाम भी हटा दिया था। रोज की उसकी वही रूटीन; पर उससे अम्मा गायब थी।
दिसंबर की कड़ाके की सर्दी थी। उस दिन एक विवाह उत्सव में आरोही जैसे ही पहुँची।
“हाय आरोही..!” चौंक कर आवाज की दिशा में देखा उसने। दिव्या थी।
“ओ दिव्या ! कैसी है ?” उसे देख चहक उठी आरोही।
“एकदम मस्त..! तू बता..?”
आरोही अभी कुछ कहती कि वह फिर बोल पड़ी, “बाई द वे तू थी कहाँ? तेरा फोन कितना ट्राई किया, आउट ऑफ़ रीच..!! कहाँ थी ?”
“ओह्ह ! कुछ मत पूछ, कुछ दिनों पहले इलाहाबाद गई थी वहीं एक रेस्टोरेंट में खाने के दौरान छूट गया। जब लौट कर उठाने गयी तो गायब था। पूछा सबसे लेकिन नहीं मिला।”
“तो सीसीटीवी फुटेज देखती ना तुरंत की बात थी, पता चल जता।”
“कहा था यार..! पर जवाब मिला कि वो तो कल बॉस ही दिखा सकते हैं और हमारी वापसी की ट्रेन थी रात की, क्या करती !”
चल छोड़, मैं तो इस लिए कह रही थी कि मैंने बहुत प्रयास कर के सिन्धु जी को मनाया तब जा कर उन्होंने उस बूढ़ी अम्मा को वहाँ से उठवा कर अपने आश्रम में रखा पर अगले ही दिन अम्मा उग्र हो गयी। उनका फोन आया कि वे उसे वहाँ नहीं रख सकतीं। उसके बाद मैंने तुझे कितना फोन किया पर तेरा कुछ पता ही नहीं था। फिर मैंने अपनी जिम्मेदारी पर उनसे कह सुन कर किसी तरह अम्मा को आश्रम की तरफ से ही हस्पताल में भर्ती कराया है।”
“सच्च !” आरोही की आँखों से ख़ुशी छलक पड़ी।
“हाँ रे..! झूठ बोलूँगी क्या तुझसे? तू नहीं जानती कि बुढ़िया कितनी खडूस है ! बिना पैसे अपने आश्रम में किसी भी बुजुर्ग को ऐंट्री नहीं देती। इतना सरकारी अनुदान मिलता है और बड़े-बड़े लोगों से दान भी फिर भी यूँही किसी बुजुर्ग को नहीं रखती वह। समाज सेवा का ढोंग भर है। उसके यहाँ जो भी वृद्ध हैं, वे सब घरों से बेदखल किये हुए ऐसे बुजुर्ग हैं, जिनको आश्रम में रखने के बदले उनके बेटे उसे रकम देते हैं। ये सब अन्दर की बात है, तुझे बता रही हूँ। अपने तक ही रखना, समझी!”
अम्मा हस्पताल में थी। यह सुन कर आरोही का रोम-रोम वसंत-सा खिल उठा था। अम्मा को छत मिल गयी थी। बाकी किसी बात से उसे कोई सरोकार नहीं था। आरोही ने उसका हाथ चूम लिया।
“थैंक्यू दिव्या ! बता नहीं सकती कि मैं आज कितनी खुश हूँ।” कहते हुए आवाज थरथरा रही थी आरोही की।
“वो तो देख ही रही हूँ मैं। न जाने क्यूँ मुझे हमेशा लगता है कि जीवन में हम इतने सारे लोगों से मिलते हैं पर कुछ लोगों से ही क्यूँ आकर्षित होते हैं? या कुछ गिनती के लोगों के साथ ही दिल से जुड़ाव क्यूँ महसूस करते हैं? जानती है ! पिछले जन्म का उनसे हमारा कुछ रिश्ता होता है तभी हमारा मन कहीं न कहीं उनसे जुड़ जाता है नहीं तो सड़क पर इतने सारे लोग डेरा डाले बैठे हैं पर तुझे वह अम्मा ही दिखी।“
“तू मानती है क्या ये सब ?” आँखें बड़ी कर पूछा उसने।
“तू मत मान, मैं तो मानती हूँ। चल अब अपना नम्बर दे। अम्मा जहाँ है, उसका पूरा डिटेल तुझे मैसेज कर देती हूँ। जा कर मिल लेना।” दिव्या ने कहा।
अगले दिन शाम को ऑफिस से जल्दी निकल कर आरोही सिटी हस्पताल पहुँच गयी। थोड़ा सा ढूँढ़ने पर अम्मा मिल गयी। उसके बेड के पास जा कर खड़ी हो गयी वह। अम्मा के सिर के सारे बाल गायब थे। हस्पताल का साफ़-सुथरा गाउन पहने और कंधे तक कम्बल ओढ़े अम्मा लेटी थी। ग्लूकोज चढ़ रहा था। ये सब दिव्या के कारण ही हुआ था। दिव्या वर्षों से निःस्वार्थ समाज सेवा में लगी थी। बड़ी-बड़ी संस्थाओं में उसकी पैठ थी इसी लिए सबका कच्चा-चिट्ठा जानती थी और तभी वह इन लोगों से उसके जैसों के लिए कुछ काम ले पाती थी।
आरोही ने धीरे से अम्मा के सिर पर हाथ रखा, अम्मा ने पलकें उठाईं और सूनी-सूनी आँखों से उसे देखने लगी। तभी जैसे अम्मा की आँखों में ख़ुशी की एक लहर आयी और पलकों के कोरों से छलक गयी। शायद अम्मा आरोही को पहचान गयी थी।
“कैसी हो अम्मा ?” पूछने पर वह कुछ बोलने को हुयी कि तभी आरोही ने उसके होठों पर अपनी उंगली रख दी और सिर हिला कर बोलने के लिए मना की। कुछ देर रुक कर वह स्टाफ नर्स के पास अम्मा के बारे में जानकारी लेने पहुँची तो जो कुछ भी उसने बताया सुन कर चौंक पड़ी। अम्मा की जीभ कटी हुयी थी।
“क्यों कटी थी?” पूछने पर वह बोली कि “सही बात तो वही जानती है पर हो सकता है कि किसी बीमारी या चोट के कारण कटी हो या काट दी गयी हो।” सुन कर एक धक्का-सा लगा था उसे।
“तो क्या इसी कारण उसे..!” सोचते हुए उसका मन काँप गया।
अब आरोही रोज ही ऑफिस के बाद थोड़ी देर के लिए अम्मा के पास चली जाती। धीरे-धीरे अम्मा के भीतर जीवन लौटने लगा था। आरोही को देख कर जब अम्मा मुस्कुराते हुए उसका गाल और माथा सहलाती तब उसे दुनिया जहान की खुशियाँ हासिल हो जातीं लेकिन दूसरे ही पल फिर वही ख़याल मन में कौंध जाता, कैसे पता चले कि अम्मा कौन है? अम्मा पढ़ी-लिखी भी तो नहीं है जो लिख कर ही कुछ बता देती उसे। आख़िर उसकी इस हालत का जिम्मेदार कौन है?
आरोही आज भी इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशते हुए चौराहे से गुज़र रही थी कि चबूतरे की ओर देख कर हतप्रभ रह गयी। एक कृशकाय वृद्ध स्त्री गठरी-सी बैठी ईंट जोड़ कर नया चूल्हा बना रही थी।

मीना पाठक

मीन पाठक

 

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