भ्रम 

भ्रम में जीना कभी अच्छा नहीं होता, लेकिन हम खुद कई बार भ्रम पालते हैं .. बहुत लोग हैं हमारे अपने, बस जरा सा  कह  देंगे तो सबका साथ मिल जाएगा | कई बार हम अपने इस भ्रम को जिंदा रखने के लिए कहते भी नहीं हैं | पर एक दिन ऐसा आता है की भ्रम के इस चढ़ते हुए बोझ से हमारा अपना अस्तित्व तार -तार होने लगता है | उस समय ये भ्रम की गठरी उतार कर फेंक देते हैं |असली सशक्तता वहीं से होती हैं | आइए पढ़ते हैं सुपरिचित कथाकार कविता  वर्मा की बरसों -बरस ऐसे ही भ्रम में जीती लड़की की कहानी ..

भ्रम 

 

गर्मियों के दिन में सूरज उगते ही सिर पर चढ़ जाता है उसके तेवर से सुबह का सुहानापन यूँ झुलस जाता है जैसे गिरे हुए पानी पर गर्म तवा रख दिया गया हो। कहीं से ठंडक चुरा कर लाई हवाएँ भी सूरज की तपिश के आगे दम तोड़ देती हैं। उनका हश्र देख दिल दिमाग मुस्तैदी से काम निपटाने की ताकीद करता है। वैसे भी इतने सालों की अनुशासित जीवन शैली ने मेघना को सुबह टाइमपास करना या अलसाना कभी सीखने ही कहाँ दिया? आँख खुलते ही घर के कामों की फेहरिस्त दिमाग में दौड़ने लगती है और उन्हें पूरा करने की बैचेनी भी। बरसों की आदत और कहीं कोई कोताही होने पर मिलने वाले कड़वे बोल आलस को आसपास भी न फटकने देते।

मेघना अभी घर के काम निपटा कर फुर्सत ही हुई थी कि उसका मोबाइल बज उठा। एक झुंझलाहट सी हुई जब यह विचार आया कि किसका फोन होगा लेकिन फोन बज रहा है तो उठाना तो होगा ही। नए नंबर को देख उसने असमंजस में फोन उठाया दूसरी तरफ एक चहकती हुई आवाज थी “हेलो मेघना कैसी है तू? क्या यार कितने साल हो गए न मिले हुए, बात किए हुए, हमेशा तेरी याद आती है लेकिन तेरा नंबर ही नहीं था मेरे पास।”

दूसरी ओर की चुप्पी से बेखबर वह आवाज अपनी खुशी बिखेरती जा रही थी, जबकि मेघना ने उसी आवाज के सहारे पहचान के सभी सूत्रों को तलाशना शुरू कर दिया था। इतना तो तय था कि फोन उसकी किसी पुरानी सखी का है लेकिन कौन नाम याद ही नहीं आ रहा था। उस तरफ से जितनी खुशी और उत्साह छलक रहा था मेघना उतने ही संकोच से भरती जा रही थी। खुशी की खनक में संकोच की चुप्पी सुनाई ही नहीं दे रही थी और इस खनक पर अपरिचय का छींटा मारने का साहस मेघना नहीं जुटा पा रही थी। तभी शायद चुप्पी ने चीख कर अपने होने का एहसास करवाया और वहाँ से आवाज आई, “अरे पहचाना नहीं क्या मैं सुमन बोल रही हूँ जबलपुर से”  नाम सुनते ही दिमाग में पड़े पहचान सूत्र एक बार फिर उथल-पुथल हुए और कहीं दबा पड़ा नाम सुमन कश्यप सतह पर आ गया।

“अरे सुमन तू कैसी है कहाँ है आजकल और तुझे नंबर कैसे मिला” मेघना के स्वर में भी थोड़ा उत्साह थोड़ी खुशी छलकी जो सायास ही लाई गई थी। जबलपुर से जुड़े सूत्र के साथ बहुत आत्मीयता अब उसमें शेष न बची थी लेकिन उसे प्रकट करना इतना सहज भी न था। कम से कम प्रचलित मान्यताओं के अनुसार तो पुरानी सखी और मायके के नाम का जिक्र प्रसन्न होने की अनिवार्यता थी।

पति बच्चे ससुराल की बातों के बाद आखिर वह प्रश्न आ ही गया जिसकी आशंका मेघना को प्रसन्न नहीं होने दे रही थी। सुमन ने बताया था कि बाजार में बड़ी भाभी मिली थीं और नंबर उन्हीं से मिला है। नंबर के साथ ही उन्होंने कुछ उलाहने भी अवश्य दिए होंगे जानती थी मेघना। वही उलाहने प्रश्न बनकर आने से आशंकित थी वह। अचानक उसे तेज गर्मी लगने लगी जैसे सुमन के प्रश्न सूरज की तपिश लपेट कर उसके ठीक सामने आ खड़े हुए हैं। अच्छा कहकर बात खत्म करने की कोशिश की उसने लेकिन उस तरफ से बात तो अब शुरू होना थी।

“भाभी कह रही थी कि तू मायके नहीं आती दो-तीन साल हो गए ऐसा क्यों, कोई बात हो गई क्या?” सुमन ने कुरेदते हुए पूछा तो थोड़ी अनमनी सी हो गई वह। यह भाभी भी न, हर किसी के सामने पुराण बाँचने बैठ जाती हैं। सुमन ने नंबर माँगा था दे देतीं, मैं मायके आती हूँ नहीं आती बताने की क्या जरूरत थी?

मन में उठते इन असंतोषी भावों को दबाकर वह हँसी की आवाज निकालते हुए बोली “अरे ऐसा कुछ नहीं है पहले संयुक्त परिवार था तो पीछे से सुकेश के खाने-पीने की चिंता नहीं रहती थी, बच्चे भी छोटे थे तो लंबी छुट्टी मिल जाती थी। अब गर्मी की छुट्टियाँ उनकी हॉबी क्लास स्किल क्लास में निकल जाती हैं अब बच्चों को छोड़कर जाना नहीं हो सकता न अभी इतने समझदार भी नहीं हुए हैं। वैसे कभी-कभार किसी शादी में हमें निकलना होता है तो जबलपुर रुक जाती हूँ। और तू सुना कब आई जबलपुर, कब तक रुकेगी? ” मेघना ने बिना रुके प्रश्नों की झड़ी लगाकर बातचीत की दिशा मोड़ दी। लगभग बीस मिनट की इस बातचीत ने मेघना को थका दिया फोन रख कर उसने पूरा गिलास भर पानी पिया और बेडरूम में आकर लेट गई।

 

यादों की गठरी के साथ दिक्कत ही यही है कि अगर उसे जरा सा छेड़ा तो यादें रुई के फाहे सी हवा में तैरने लगती हैं, फिर उन्हें समेट कर वापस बाँधना मुश्किल होता है जब तक उन्हें सहला कर समेटा न जाए। मेघना ने बिस्तर पर लेट कर आँखें बंद की तो अतीत के फाहे उसकी आँखों के आगे नाचने लगे।n

बाईस की हुई थी वह जब उसकी सगाई सुकेश के साथ हुई थी। उसके पहले का जीवन आम भारतीय लड़की की तरह था, होश संभालते ही खाना बनाना, घर के काम करना सिखा दिया गया था। तीन भाइयों की इकलौती बहन थी। यूँ खाने कपड़े की कोई कमी न थी सरकारी कॉलेज में पढ़ाई का विशेष खर्च भी न था लेकिन फिर भी कभी-कभी बहुत छोटी-छोटी बातों में भी लड़के लड़की के बीच का भेद उसे चुभता था। अम्मा खूब पढ़ी लिखी तो न थीं, लेकिन सामाजिकता व्यवहारिकता निभाना खूब जानती थीं। इसी खूबी के चलते बेटी को भी ससुराल में हर हाल में निभाने के लिए तैयार करने की उनकी सोच कई बार फाँस बनकर मेघना के दिल में धँस जाती। कभी-कभी वह शिकायत करती लेकिन सुनने वाला कोई न था। पापा को अम्मा की व्यवहारिकता पर पूरा भरोसा था और भाइयों में उसकी बात समझ सकने की संवेदनशीलता ही कहाँ थी? होती भी कैसे वे बचपन से ही इसे सामान्य व्यवहार की तरह देखते बडे़ हुए थे।

सच तो यह था कि इतने बड़े भरे पूरे परिवार में भी वह कई बार खुद को बेहद अकेला पाती, तो देर रात तक सिरहाने को अपना हमराज बनाकर अपने दुख कह लेती और दो-चार आँसू उसे अर्पित कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर देती। सहेलियों के बीच ऐसी बातें कम ही होती थीं और मेघना का संकोच कभी उनसे अपने दिल की टीस कहने न देता। वैसे भी कहने से होना क्या था? एक बार मुँह से निकली बात कहीं रोकी नहीं जा सकती और अपने परिवार की बातें बाहर करना उसे अच्छा नहीं लगता था। उसके इसी संकोची गुण ने उसका रिश्ता सुकेश से करवाया। एक रिश्तेदार की शादी में देखा था उसे उसकी ननद ने और अपनी तेजतर्रार माँ के लिए उपयुक्त बहू के रूप में उसे पाया था। खुशी से फूली नहीं समाई थी वह। युवा मन में सपने अंगड़ाई लेने लगे थे। पिया से मिलन के सपने, अपने घर के सपने, प्यार भरे एक संसार के सपने। ऐसा संसार जहाँ वह अपनी मर्जी से जी सकेगी। एक ऐसा परिवार जहाँ लोग उसे समझ सकेंगे, उसके दिल में कोई फाँस न गडेगी, कोई टीस न होगी। जहाँ उसे ‘पराई अमानत है’ के भाव से नहीं देखा जाएगा, वह उसका घर होगा, उसका अपना घर। अम्मा बाबू भाइयों के लाड प्यार के बीच भी पराई अमानत होने का भाव उसे सदैव आहत करता रहा उसे जताता रहा कि वह उसका अपना घर नहीं है इसलिए शादी का उसका उत्साह ज्यादा ही था क्योंकि अब उसे अपना घर मिलने वाला था।

 

खुश तो अम्मा बाबू और भाई भी बहुत थे बिना किसी मशक्कत के घर बैठे सुकेश जैसा काबिल लड़का मिल गया था। “नौकरी छोटी थी लेकिन आगे तरक्की की राहें खुली हैं मेहनत करेगा तो आगे बढ़ेगा। परिवार की हैसियत उन्नीस है लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। लड़के का स्वभाव अच्छा है हाँ सास थोड़ी कड़ियल है लेकिन लड़की को निभाना ही पड़ता है और मेघना सीधी-सादी है निभा ही लेगी” मौसी से फोन पर बतियाते हुए कहा था अम्मा ने। अम्मा को अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था उन्हें पता था कि उन्होंने लड़की को लड़की की तरह पाला है बेकार में सिर नहीं चढ़ाया।  मेघना सोचने लगी सिर नहीं चढ़ाया या उसे हर पल एहसास करवाया कि वह पराई है।

 

“मम्मी अब हम थोड़ी देर टीवी देख लें” बेटी की आवाज से मेघना वर्तमान में लौट आई। यादों के फाहे कुछ देर के लिए परे हटा कर वह उठ बैठी। गर्मियों की लंबी दुपहरी बच्चों के लिए उबाऊ हो जाती है कितनी देर खेलें, कितना पढ़े, ज्यादा देर टीवी वह देखने नहीं देती। पिछले तीन सालों से वह मायके नहीं गई है एक दो साल बच्चों ने जिद की लेकिन अब वह भी समझ गए और खुद को आपस में ही व्यस्त रखते हैं। बच्चों के लिए टीवी चालू करके उन्हें सेव परमल देकर मेघना वापस अपने कमरे में आ गई । यादें जब भी अपनी खोह से बाहर निकलती हैं दिल और दिमाग में इतने चक्कर लगाती हैं कि उनका पीछा करते उन्हें ताकते इंसान थक जाता है। न जाने क्या चुंबकीय आकर्षण होता है उनमें कि उनसे नजर हटाना उन्हें अनदेखा करना संभव ही नहीं होता। मेघना उनके इस प्रभाव से दूर जाना चाहती थी। कमरे में आकर उसने एक पल को बिस्तर को देखा जहाँ मीठी कड़वी यादों से भीगे फाहे  बिखरे पड़े थे जैसे उसे चुनौती दे रहे हों कि एक बार गठरी से निकल चुके हैं हम, अब हम से बच कर बताओ तो जानें। क्या करे खुद को सौंप दे इन्हें या एक बार कोशिश करे बचने की। बाहर बच्चों के साथ बैठे या कुछ काम ही निकाल ले। कुछ देर खड़ी सोचती रही मेघना लेकिन वो खुद को खींचकर बाहर न ले जा सकी।

 

प्रथम मिलन की रात ही सुकेश ने उसे अपनी मम्मी के कड़े स्वभाव के बारे में इशारा कर दिया था और उनकी कड़वी बातों को अनसुना करने की हिदायत भी दी थी जिसे उस समय तो वह समझ न सकी लेकिन जल्दी ही उसे उन बातों का मतलब समझ आ गया था। पता नहीं कौन सी ग्रंथि थी उनके मन में कि हर किए काम में मीनमेख निकाल लेती थीं और फिर जो कोसना और बड़बड़ाना शुरू करतीं तो सामने वाले की सात पुश्तों को कोस कर जब तक आँसुओं से न रुला देतीं उनके मन को शांति नहीं मिलती। स्वभाव से संकोची मेघना अपनी सफाई में भी कुछ नहीं कह पाती। सास की शह पर जेठानी दुगना बैर पाले बैठी थीं मेघना से। मेघना की कामों में सुघडता सलीका खटकता था उन्हें और छह को नौ बनाने में महारत हासिल थी। सुकेश उसका चेहरा देख कर ही समझ जाते कि आज अम्मा ने अपनी कुंठा निकाली है। उसे समझाते बहलाते लेकिन उसके कोमल दिल में फाँस की तरह धँस चुके उन नुकीले बोलों को न निकाल पाते।

ऐसे में उसे इंतजार रहता मायके जाने का। भैया लिवाने आते अम्मा सबके लिए सौगातें भिजवातीं पर सास का मुँह फूला रहता। जेठानी सारा काम उसके सिर पर थोप कर कोप भवन में जा बैठती। उनकी नाराजगी रहती कि अब महीने भर उन्हें अकेले खटना पड़ेगा। भैया सब देखते लेकिन निर्लिप्त रहते। बहन की ससुराल में कहते भी क्या? ट्रेन का लंबा सफर मेघना इंतजार करती भैया उससे पूछेंगे कि वह सुखी तो है? उसकी सास जेठानी के व्यवहार के बाबत दो शब्द कहेंगे। उन दो शब्दों में उनकी संवेदनाओं की ठंडक उसके तपते जलते दिल को सुकून देगी लेकिन भैया उससे कुछ नहीं पूछते न कहते।

अम्मा के गले लग कर उसकी रुलाई फूट पड़ती। जिसे बहुत दिनों बाद मिलने पर मन भर आता है कहकर वे टाल देतीं। उसके जाने पर अम्मा अच्छा खाना बनाती भाई शाम को चाट पकौड़ी कचोरी समोसे ले आते। रात में आइसक्रीम खाने या गन्ने का रस पीने जाते। बुआ चाचा मामा मौसी उनके बच्चों की खूब बातें होती हैं अम्मा को सबके सुख दुख पता होते। वह सब की खबरें मेघना को देतीं और वह इंतजार करती रहती कि अम्मा एक बार तो पूछें कि तुम्हारी सास व जेठानी का व्यवहार तो ठीक है?  ऐसा नहीं हो सकता था कि दूरदराज के हर रिश्तेदार के बात व्यवहार की खबर रखने वाली अम्मा मेघना की सास व जेठानी का व्यवहार नहीं जानती हों।

मेघना का इंतजार इंतजार ही बना रहता। अम्मा का प्यार कचोरी समोसे पकवान साड़ी ब्लाउज में बरसता रहता, लेकिन प्यार और सांत्वना के दो बोल उसे कभी सुनने को नहीं मिलते। मायके में अभी भी वह उतनी ही अकेली थी जितनी शादी के पहले। कभी कभी रात में तकिए को ही अपनी व्यथा सुना कर वह आँसू अर्पित करती रहती तब उसे सुकेश की खूब याद आती। वह उसके आँसुओं को अपने दिल में समेट लेता था। उसका मन होता कि वह वापस लौट जाए लेकिन सुकेश मना कर देते। वह कहते “भले वहाँ कोई तुम्हारे मन की बात नहीं सुन रहा हो लेकिन तुम्हारे वहाँ रहने से यहाँ अम्मा और भाभी को यह भ्रम बना रहता है कि तुम्हारा एक और परिवार है। यह भ्रम बना रहने दो, जिस दिन यह भ्रम टूटेगा तुम्हारा जीना मुश्किल कर देंगे दोनों।” उनकी बात सुनकर मेघना काँप जाती वह मायके में ससुराल से ज्यादा परायापन महसूस करती लेकिन इस भ्रम को बनाए रखने के लिए सालों साल एक महीने के लिए मायके आती रही। मायके में सब साथ बैठते ढेरों बातें होती लेकिन जैसे ही मेघना की ससुराल के किसी सदस्य का जिक्र आता अम्मा तुरंत बात बदल देतीं। अपना दिल हल्का करने की एक आस जगने से पहले ही बुझ जाती।

उस रात वह बेहद खिन्न थी सुकेश को लेने आने में एक हफ्ता बाकी था। एक-एक पल पराएपन के बोझ से बोझिल था। वह पानी पीने उठी थी कि बाबू की आवाज सुनकर उसके कदम उनके दरवाजे के बाहर ठिठक गए।  “मेघना की माँ तुम इतनी कठोर क्यों हो जाती हो, जरा मेघना के दिल का हाल जान लोगी तो क्या हो जाएगा? जानती तो हो उसकी सास दुष्ट है बेचारी साल भर में कितना कुछ झेलती है तुम्हारे सहानुभूति के दो बोल उसे हौसला दे देंगे।”

“हौसला नहीं देंगे बल्कि कमजोर कर देंगे, जिन मायके में लड़कियों को पपोला जाता है उन्हें सासरे की कोई बात सहन नहीं होती। हर बात में रोना बिसुरना शुरू कर देती हैं और उठ कर चल देती हैं मायके, मुझे यह तमाशा नहीं चाहिए। “

” अरे लड़की दुखी होगी तो मायके ही तो आएगी न, कह सुनकर दिल हल्का कर चली जाएगी।”

” और नहीं गई तो? सारी जिंदगी छाती पर बैठा रखोगे? तुम्हें सिर्फ बेटी दिख रही है मुझे आगे तीन बहुएंँ भी लाना है। इस तरह आए दिन बेटी के रोने चलेंगे तो बहुएँ न उसकी इज्जत करेंगी और न हमारी। कौन सा सास मारपीट गाली-गलौज करती है जरा कड़वा ही तो बोलती है तो कौन सी नई बात है? हजारों लड़कियाँ सास जेठानी के कुबोल सुनती हैं, हर बात को दिल से लगाना जरूरी है क्या? ”

अम्मा का कुपित स्वर सुनकर दंग रह गई थी मेघना।” हम भी दिए लिए में कोई कमी नहीं रखते मायके के लेनदेन से बहुओं की इज्जत बनी रहती है। थोड़ी बहुत ऊँच-नीच तो चलती रहती है।”

” अरे मैं कहाँ मना कर रहा हूँ लेकिन प्यार से एक बार पास बिठाकर… “बाबू की बात अधूरी ही रह गई।

“देखो जी अब मुझे मत सिखाओ मैंने दुनिया भी देखी है और दुनियादारी भी। लड़की पराई हो गई है अब अच्छा बुरा जैसा भी है उसे वहीं निभाना है। जमाई बाबू अच्छे हैं ध्यान रखते हैं मेघना का। सास भी कब तक बकेगी कल को बूढ़ी होकर खुद ही चुप हो जाएगी। हमारा न बोलना ही ठीक है, मेघना के लिए भी और अपने लिए भी।”

मेघना की वह पूरी रात रोते हुए बीती, इतना परायापन तो उसे अपने ससुराल में पहली रात भी नहीं महसूस हुआ था जितना उस रात उस घर में महसूस हुआ जिसमें उसने उम्र का एक बड़ा हिस्सा गुजारा था। अगले दिन उसकी सूनी आँखों को नजरअंदाज कर अम्मा दही बड़े बनाने में जुटी रहीं। मेघना अम्मा को देखकर सोचती रही कि क्या सचमुच में वे उसकी सगी अम्मा हैं? क्या कारण है कि वह उससे इस कदर पराया पन पाले हैं? क्या लड़की का ससुराल छोड़कर मायके में आ बैठने का डर इतना बड़ा है कि दुनियादारी में निपुण अम्मा प्रेम और सहानुभूति के दो बोल भी मेघना के लिए नहीं जुटा पातीं। या अम्मा को मेघना से कोई डाह है जिसके चलते वे उसे भावनात्मक रूप से अकेला करती रहती हैं। उस दिन गले में खराश होने की बात कहकर मेघना ने दही बड़े की प्लेट परे सरका दी।

मेघना को याद आता है बचपन में उसे गाने का शौक था। कभी रेडियो के साथ कभी अकेले उसकी सुरीली आवाज घर में गूँजती रहती थी। बाबू और भाई उसके सुरीले गले की, उसे याद रहने वाले गाने के बोलों की तारीफ भी करते थे लेकिन तब अम्मा तिनक जातीं।

“सारे दिन बस कूकती ही रहो कोई काम बताना हो तो चार बार कहो तब एक बार सुनती हैं महारानी।” कभी कहतीं “अब बस भी करो क्या सारा दिन चें चें लगाए रहती हो?” धीरे-धीरे मेघना अपने खोल में सिमटने लगी। यूँ उसे खाने

पहनने ओढ़ने की कभी कमी नहीं की अम्मा ने लेकिन ऐसा भी नहीं कि बात मुँह से निकली और पूरी कर दें। भाइयों की कमी बेशी एक दूसरे के कपड़ों से दूर हो जाती उसके कपड़े उसका सामान सिर्फ उसी का होता। घर के काम में हाथ हाथ बँटाना बचपन से शुरू कर दिया था उसने। अम्मा अकेली छह लोगों का परिवार जिनमें तीन तीन लड़के। थक जाती थीं अम्मा और उनका क्लांत चेहरा देखकर मेघना खुद ही जिम्मेदारी से काम करती।

दोनों बच्चे जब हुए तब भी उसे मायके ही भेजा गया और मेघना को मन मार कर आना पड़ा। अम्मा ने खूब ख्याल रखा दूध दलिया हरीरा लड्डू की खिलाई पिलाई मालिश तक का इंतजाम किया। बच्चों का रात बिरात उठना रोना अम्मा साथ खड़ी रहतीं और सवा महीने होते न होते अम्मा फिर अपने रंग में आने लगतीं। “बच्चे को ज्यादा देर गोद में न रखो उसकी आदत बिगड़ गई तो काम कैसे करोगी? थोड़े थोड़े घर के काम करो वहाँ कौन झूला झूलाएगा?  गंदे कपड़े हाथों हाथ धोओ वहाँ कौन नाउन आएगी?” उठते बैठते खाते पीते हर बात में वहाँ की चिंता। वहाँ मेघना को हर मोर्चे पर हर परीक्षा में खरा उतरना है और उसके लिए तैयारी करवाने अम्मा कमरकस के खड़ी रहतीं। उनकी बातें सुन मेघना घबराने लगती, ऐसा लगता है मानों उसे युद्ध के लिए तैयार किया जा रहा हो।

बच्चे के जन्म के बाद अम्मा ने पच में पूरे घर को कपड़े किये। बच्चे के लिए चाँदी की कटोरी-चम्मच, पायल, करधन, सोने की हाय, सास जेठानी को साड़ी सुहाग का सामान, ससुर जेठ और सुकेश को सफारी सूट, फल मेवे मिष्ठान लेकर वे गाजे-बाजे के साथ पहुँची थीं। न जाने क्यों मेघना को लगता रहा कि यह सब अम्मा खुद की व्यवहार कुशलता और ठसक दिखाने के लिए कर रही हैं। उनके देने में एक दर्प दिखता उसे और वह लेने में कभी सहज नहीं होती। इस लेन-देन के बाद सास कुछ दिनों के लिए ठंडी पड़ती लेकिन जेठानी का मुँह फूल जाता। उसे अपनी स्थिति मेघना से कमतर दिखती और खुद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए उसकी जीभ जहर उगलती। कुल मिलाकर मेघना के लिए तो कोई राहत नहीं थी।

अब तक मेघना सुकेश पर इतना विश्वास कर चुकी थी कि वह अपने दिल की बातें उसे कह सके, फिर वह बातें सास और जेठानी की हों या अम्मा की। सुकेश उसकी बात सुनते समझते सांत्वना देते लेकिन घर के सदस्यों के बीच उसके समृद्ध परिवार का भ्रम बनाए रखने की सलाह भी देते और मेघना को मन मसोसकर भी उसे मानना ही होता।

दूसरे बेटे के जन्म के बाद मेघना ने उन्हें पच करने को मना किया था लेकिन अम्मा अड़ गईं कुछ तो करना होगा आखिर बेटा हुआ है। सुकेश ने भी मना किया था लेकिन जमाने का चलन बताकर अम्मा ने उन्हें भी चुप कर दिया।

 

बड़े भैया की शादी की बात चल रही है मेघना ने सुना तो हुलस पड़ी। बड़े भैया का उस पर बहुत स्नेह था। कभी कभार उसको खिन्न देखते तो सब्जी भाजी लाने कभी मंदिर दर्शन के बहाने उसे थोड़ी देर घर से बाहर ले जाते, इधर-उधर की बातें कर उसका मन बहलाते, बस उसके दिल का हाल उसके मन की बात कभी न पूछते। न जाने अम्मा के कड़े निर्देश थे या वे यह बातें करना ही नहीं जानते थे फिर भी इतना तो समझ रहे होते कि मेघना उदास है और यही एक बड़ा सुकून था उसके लिए।

पहली भाभी लाने का चाव मेघना को भी था। उसने फोन पर पूछा था अम्मा से, कौन-कौन सी लड़कियाँ हैं, कहाँ -कहाँ के रिश्ते हैं, कितना पढ़ी लिखी हैं, मुझे भी तो फोटो दिखाओ मोबाइल पर भेज दो। दो बच्चों की माँ हो चुकी थी मेघना तब तक, थोड़ी बहुत दुनियादारी तो सीख ही चुकी थी। अम्मा ने ‘अभी कोई विचार नहीं बना है जब बनेगा तब बताएंगे’ कहकर बात टाल दी। मेघना को पूरी उम्मीद थी कि भैया की शादी तय करने से पहले अम्मा एक बार तो उसकी राय पूछेंगी, लेकिन न सिर्फ उसकी उम्मीद टूटी बल्कि उसने खुद की उपेक्षा का जो कड़वा घूँट पिया उस ने शादी के उसके उत्साह को पूरी तरह खत्म ही कर दिया।

बाबू जी की चिट्ठी आई थी ससुर जी के नाम, जिसमें शादी तय होने की खबर के साथ शादी की तारीख की सूचना भी थी। इसके साथ ही सब कुछ अचानक तय होने के कारण पूर्व सूचना न देने का खेद भी व्यक्त किया गया था। मेघना ने सबकी नजरों में प्रश्न का सामना पत्र की इबारत की आड़ लेकर ही किया, लेकिन हर बार अम्मा की उपेक्षा का दंश उसे कोंचता रहा।

शादी की गहमागहमी में अम्मा को मौसी से कहते सुना था मेघना ने “समधियाने में पहले बताते तो उनके बताए रिश्ते देखने सुनने पड़ते। पसंद आते न आते तो व्यवहार बिगड़ता इसलिए हमने तो मेघना तक को खबर न दी। लड़की पराई हो गई है अपना घर देखे मायके के काम में शामिल हो लेकिन ज्यादा घुसना भी ठीक नहीं।” मेघना सुनकर सन्न रह गई। जो अम्मा नानी मामा मामी ही नहीं मौसियों तक को समझाती रहती हैं कि उन्हें क्या करना

चाहिए क्या नहीं उनका अपनी बेटी को इस तरह पराया कर देने का कलेजा कैसे होता है? अम्मा की बातें मेघना को व्यथित करती रहीं। वह जबरन ओढ़ी मुस्कान के बोझ से थक कर जल्दी ही बेटे को सुलाने के लिए अंदर कमरे में चली गई।

अम्मा ने विदाई में बढ़िया साड़ी, सफारी सूट, बच्चों के कपड़े, मिठाई सब दिया लेकिन मेघना को वह मान नहीं दे पाईं जिसकी उसे चाहत थी। कभी-कभी वह सोचती अम्मा उसके साथ ऐसा क्यों करती हैं क्या वह उनकी सौतेली बेटी है? यह संभावना शून्य थी। उसके जन्म के समय के कई किस्से वह सुन चुकी थी। या अम्मा को चार बेटों की चाह थी और वह अवांछित लड़की है, या अम्मा उसी धुर सोच से पीड़ित हैं कि लड़की पराया धन है और अब कन्यादान होने के बाद तो वह दूसरे घर की हो चुकी है। कारण जो भी रहा हो यह तय था कि अम्मा साल में एक बार आने जाने लेनदेन का व्यवहार कुशलता से निभा रही थीं लेकिन उसके ससुराल के तनावपूर्ण माहौल को देखते हमेशा इस आशंका से जूझतीं कि कहीं मेघना वापस न आ जाए। उसके लिए अब इस घर में कोई जगह नहीं थी। उसके वापस आने से उनका बुढ़ापा उस सोचे हुए तरीके से नहीं व्यतीत होता और उस सुख की तिलांजलि देने के लिए वे तैयार नहीं थीं खुद की जाई बेटी के लिए भी नहीं। अब वह पराई थी और पराए लोग मेहमानों की तरह दो-चार दिन तो अच्छे लगते हैं लेकिन फिर भी घर की महत्वपूर्ण बातों निर्णयों में शामिल नहीं किए जाते। उनसे एक दूरी रखते व्यवहार किया जाता है। मेघना के तनावपूर्ण जीवन की कोई परछाई वे अपने जीवन पर पड़ने नहीं देना चाहती थीं जिससे उनके बुढ़ापे पर कोई असर पड़े, उनका बुढ़ापा किसी भी तरह के तनाव से ग्रसित हो।

वहीं दूसरी तरफ मेघना का ससुराल था जहाँ हर काम में उसका शामिल होना जरूरी था वह घर की बहू थी। बड़े फैसलों के लिए छोटी बहू से कुछ पूछना विचार विमर्श करना बड़ों की समझ को स्वीकार न था। काम करते हुए ताने देना, मीन मेख निकालना, बड़ों का अधिकार था। दोनों जगह पिसती मेघना के आहत मन को सुकेश की बाहों में सुकून मिलता। कभी-कभी वह उसकी स्थिति देख विचलित हो जाता उसे लगता कहीं उसकी छोटी नौकरी, कमजोर आर्थिक स्थिति तो इसका कारण नहीं है, लेकिन वह यह विचार मेघना को देकर उसका तनाव और नहीं बढ़ाना चाहता था।

दूसरे भाइयों की शादी और भतीजे भतीजियों के जन्म के समय तक मेघना मायके से बेजार हो चुकी थी। न उसे वहाँ जाने का उछाह था न लेन देन का। बस एक भ्रम था जिसे बनाए रखना जरूरी था कि उसका मायका है जिसमें उसका मान है उसे हर वर्ष बुलाया जाता है। वहाँ व्यवहार कुशलता है वे उनकी हैसियत से बढ़कर व्यवहार करते हैं। मेघना के सुख दुख में वे साथ खड़े होंगे और यही बात उनके कड़वे व्यवहार पर अंकुश का काम करती।

सास की तबीयत अब ठीक न रहती थी। जेठानी घर पर अपना कब्जा करना चाहती थीं। वे चाहती थीं कि मेघना और सुकेश वहाँ न रहें। सास कमजोर हुई तो जिठानी की जुबान दुगना जहर उगलने लगी जिसका बच्चों पर बुरा असर पड़ने लगा। अंततः मेघना और मुकेश ने बहुत सोच विचार कर अभावपूर्ण परंतु शांत जिंदगी जीने का फैसला करते हुए घर छोड़ दिया।

मेघना ने फोन पर बताया था माँ को कि सुकेश और वह घर से अलग हो रहे हैं। वह तो बताना भी नहीं चाहती थी लेकिन सुकेश ने कहा बताना जरूरी है, उन्हें पता तो चल ही जाएगा फिर उन्हें बुरा लगेगा। अम्मा को तो बताने पर भी बुरा लगा था, “घर में सब के साथ निभाना चाहिए यह क्या कि छोटी-छोटी बातों पर घर तोड़ दो। लोग तो यही कहेंगे कि माँ बाप ने ऐसे संस्कार दिए हैं।” मेघना हतप्रभ थी अम्मा को लोगों की फिक्र है उसकी उसके बच्चों की नहीं, खूब गुस्सा हुई थी वह उस दिन सुकेश पर कि क्यों उसने अम्मा को फोन करने को कहा? उन्हें न उसकी कोई फिक्र थी न है, उन्हें लोगों की पड़ी है या शायद…” कहते कहते रुक गई मेघना। “उन्हें अपने घर की चिंता है, कहीं उनकी बहुएँ भी बेटों को लेकर अलग हो गई तो? लेकिन वे ऐसा क्यों करेंगी? पान के पत्तों सा फेरती हैं अम्मा अपनी बहुओं को। मेघना मायके जाती है तो दो दिन आराम के बाद तीसरे दिन से भाभियों का हाथ बँटाने किचन में ठेल देती हैं। दो बच्चे और वह तीन जनों का बढ़ा काम भाभियों को भारी न पड़ जाए। इसी के साथ भतीजे भतीजियों को नहलाने धुलाने खिलाने की जिम्मेदारी भी उसी की रहती। कभी-कभी उसे लगता मायके आकर वह ज्यादा ही व्यस्त हो जाती है लेकिन बच्चों के प्यार के आगे और कुछ सोचना ठीक नहीं लगता। अम्मा भी सभी को सुनातीं ‘बच्चे तो बुआ को छोड़ते ही नहीं हैं उसी के साथ खाना सोना कहानियाँ सुनना’ अम्मा की बातों में छुपी चालाकी समझ मेघना मुस्कुरा भर देती।

वह अलग घर में रहने चली आई। दो कमरों का छोटा सा मकान किराए पर लिया था उन्होंने। अम्मा के फोन आना अचानक ही बहुत कम हो गए थे। पहले भी बहुत फोन तो नहीं करती थी वह अब तो दो दो महीने हाल-चाल भी न पूछतीं। खैर हाल-चाल तो उन्होंने पहले भी कभी नहीं पूछे अब पूछने का अर्थ होता उसके इस कदम को स्वीकार करना जो तीन बहुओं वाली सास के लिए सर्वथा उचित नहीं था।

उस वर्ष अम्मा ने उसे मायके आने का निमंत्रण नहीं दिया, उत्सुक तो वह भी नहीं थी, लेकिन इतने वर्षों से अपने परिवार का मायके का जो भ्रम पाले हुए थी उसका टूट कर चकनाचूर होना उसे गहरी टीस दे गया। फिर वह सिलसिला उसी ने तोड़ दिया। अब इस भ्रम को बनाए रखने की विशेष आवश्यकता भी नहीं रह गई थी। सुकेश ने किसी तरह उसे संभाला था समझाया था।

सूरज की तपन ढलान पर थी, शाम हो चली थी। बीते सभी बरसों से गुजरते यादों के फाहे अब उसकी संवेदनाओं से भीग कर बैठने लगे थे लेकिन उनका बोझ उसे बैचेन किये था। बच्चे बाहर खेलने जाने की जिद कर रहे थे। वह उठी उनके लिए दूध बनाया और खुद भी बाहर जाने के लिए तैयार होने लगी। आज एक फोन से, टूटे भ्रम के फाहे पूरे घर में फैले थे जिन से बचने के लिए थोड़े समय बच्चों की खिलखिलाहटों के बीच पार्क में बैठना ही ठीक था।

कविता वर्मा

 

कविता वर्मा

 

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