मनुष्य का किसी घर से रिश्ता केवल उसकी छत और दीवारों तक सीमित नहीं होता। घर में बीते वर्षों की हँसी, साझा जीवन के प्रसंग, प्रियजनों की स्मृतियाँ और रोजमर्रा के छोटे-छोटे अनुभव जमा होते रहते हैं। यही कारण है कि घर छोड़ना हमेशा एक जगह से दूसरी जगह जाना भर नहीं होता। कभी-कभी यह अपने ही अस्तित्व के एक हिस्से से दूर हो जाने जैसा होता है। वंदना बाजपेयी की कहानी ‘तृप्ति निवास’ इसी भावभूमि पर आगे बढ़ते हुए वृद्धावस्था, जीवनसाथी के बिछोह, पारिवारिक आत्मीयता और व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्नों को संवेदनशीलता से उठाती है।
अपनी जड़ों की ओर लौटती तृप्ति की कहानी
कहानी की केंद्रीय पात्र तृप्ति है, जिसका जीवन पति मोहित के साथ दिल्ली के मयूर विहार में बीता है। उसका घर, पड़ोसी, नुक्कड़ का मोची, अखबार वाला और घर में काम करने वाली रेवती उसके जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। समय के साथ ये परिचित चेहरे और रोजमर्रा के प्रसंग उसके अपने संसार का हिस्सा बन गए हैं। मोहित की अचानक मृत्यु के बाद तृप्ति जब इन स्मृतियों में लौटती है, तब उसे एहसास होता है कि मनुष्य का जुड़ाव केवल परिवार के सदस्यों तक सीमित नहीं होता। वह अनजाने ही अपने परिवेश के साथ भी गहरे भावनात्मक संबंध बना लेता है।
कहानी के आरंभ में स्मृतियों और भौतिक वस्तुओं के संबंध को रेखांकित किया गया है। किसी की इस्तेमाल की हुई वस्तु, लिखे हुए कागज या चाय का पुराना प्याला बीते समय की अनुभूतियों को फिर से जीवित कर सकते हैं। वस्तुएँ यहाँ निर्जीव नहीं रह जातीं, वे स्मृतियों की वाहक बन जाती हैं। उनके माध्यम से अतीत वर्तमान में प्रवेश करता है। मोहित की मृत्यु का दृश्य तृप्ति के मन में बार-बार उभरता है और सुखद स्मृतियों पर दुख की छाया डाल देता है। लेखिका इस अनुभव के माध्यम से बताती हैं कि किसी प्रियजन को खोने के बाद केवल उसकी अनुपस्थिति नहीं सालती, बल्कि उससे जुड़ी पूरी दुनिया का अर्थ भी बदल जाता है।
हालाँकि, ‘तृप्ति निवास’ का कथ्य पति की मृत्यु से उत्पन्न अकेलेपन तक सीमित नहीं है।गरिमा के घर में कियान की परवरिश से जुड़ा प्रसंग इस स्थिति को विशेष रूप से स्पष्ट करता है। तृप्ति अपने अनुभव के आधार पर बच्चे की देखभाल करना चाहती है, लेकिन गरिमा के घर में उसके सुझावों का वही महत्त्व नहीं रह जाता। डायपर के इस्तेमाल को लेकर उसका असहमत होना एक छोटी-सी घरेलू घटना दिखाई दे सकती है, पर इसके भीतर एक बड़ी समस्या छिपी है। जिस माँ के अनुभवों से कभी बेटी लाभ उठाती थी, उसी माँ की बात अब बेटी के अपने घर में स्वीकार्य नहीं है। तृप्ति अपनी असहमति को दबाकर स्वयं को समझाती है कि बच्चों को अपने ढंग से जीवन जीने और अपने बच्चों को पालने का अधिकार है। लेकिन यह समझौता उसके मन में एक प्रश्न भी पैदा करता है—क्या शेष जीवन भी उसे अपनी इच्छाओं और अनुभवों को इसी तरह दबाकर बिताना होगा?
कहानी का एक सुंदर पक्ष मोहित और तृप्ति के संबंधों का चित्रण है। जिम्मेदारियों से कुछ हद तक मुक्त होने के बाद दोनों अपने लिए समय निकालते हैं। पुरानी फिल्में देखना, किताबों के पात्रों पर चर्चा करना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना और एक-दूसरे की सेहत का ध्यान रखना उनके जीवन में प्रेम के नए अर्थ खोलता है। लेखिका का कथन कि ‘प्यार कब पुराना पड़ता है। हाँ रूप जरूर बदलता है’, कहानी की भावनात्मक धुरी को व्यक्त करता है। प्रेम यहाँ केवल युवावस्था की उत्तेजना या दांपत्य के शुरुआती आकर्षण का नाम नहीं है। वह समय के साथ देखभाल, साथ और एक-दूसरे की जरूरतों को समझने में बदल जाता है। इस चित्रण के माध्यम से लेखिका उस धारणा को भी चुनौती देती हैं, जिसमें उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की भावनात्मक और प्रेमपूर्ण जरूरतों को गौण मान लिया जाता है।
मोहित की मृत्यु के बाद तृप्ति का बच्चों के घर में रहना और अंततः दिल्ली लौटने का निर्णय कहानी को एक नई दिशा देता है। मिसेज राव के साथ बातचीत उसे अपने जीवन पर नए सिरे से विचार करने का अवसर देती है। वह समझती है कि बच्चों का भय अपनी जगह है, लेकिन उस भय के कारण वह अपने वर्तमान को पूरी तरह दूसरों की इच्छाओं के अनुसार नहीं ढाल सकती। सत्तावन वर्ष की उम्र में वह स्वयं को असहाय नहीं मानती। उसे सहायता की आवश्यकता भविष्य में पड़ सकती है, लेकिन भविष्य की संभावनाओं के डर से वर्तमान की स्वतंत्रता छोड़ देना उसे स्वीकार नहीं है।
शीर्षक ‘तृप्ति निवास’ भी इसी संदर्भ में अर्थवान हो उठता है। यह घर केवल एक पते का नाम नहीं, तृप्ति के जीवन, संबंधों और पहचान का प्रतीक है। पति के साथ बिताए वर्षों की स्मृतियाँ यहाँ मौजूद हैं, लेकिन घर का महत्त्व केवल अतीत में नहीं है। यह तृप्ति को अपने वर्तमान पर अधिकार देता है। वह अपने घर लौटकर केवल खोए हुए समय को याद नहीं करना चाहती, बल्कि शेष जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।
कहना गलत नहीं होगा कि वंदना बाजपेयी की ‘तृप्ति निवास’ अंततः वृद्धावस्था को निष्क्रिय प्रतीक्षा का समय मानने वाली सामाजिक दृष्टि पर प्रश्न उठाती है। यह कहानी बताती है कि जीवनसाथी की मृत्यु के बाद भी जीवन समाप्त नहीं हो जाता और बच्चों के प्रति प्रेम का अर्थ अपनी स्वतंत्रता का त्याग करना नहीं है। बुजुर्गों को सहारा चाहिए, लेकिन उस सहारे के साथ सम्मान, निजता और निर्णय लेने का अधिकार भी चाहिए।
-चारुमित्रा, रांँची (झारखंड)

*यह कहानी हिंदी अकादमी, दिल्ली की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ के मई 2026 अंक में प्रकाशित हुई है।
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