नीलिमा शर्मा की कविताएँ

सुपरिचित साहित्यकार संपादक नीलिमा शर्मा जी की कविताएँ अपने आस-पास के बिंबों, रूपकों में ढलती सहज अभिव्यक्तियाँ हैं। कभी  निराशा से लड़ती तो कभी  फुनगी भर जिजीविषा समेटे ऑस की बूंदों से नहाए हरे पत्ते सी । संभवतः पाठक भी इनमें अपना अक्स देख लेता है। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ

नीलिमा शर्मा की कविताएँ

 

मैं बहुत पहले बोल सकती थी,
पर मैंने निभाना चुना।
मेरे शब्द
रसोई के धुएँ में,
अलमारी के कोने में,
और रात के आख़िरी पहर
खुद से की गई बातों में
रह गए।

मैंने हर रिश्ते को
पूरी ईमानदारी से जिया,
बस खुद को
थोड़ा टालती रही।

मेरे भीतर
एक स्त्री थी
जो रोई नहीं
क्योंकि उसे
मजबूत होना सिखाया गया था।
अब बोल देती है ज़ोर से l

और एक आत्मा थी
जो जानती थी
यह चुप्पी स्थायी नहीं है।

अब
मैं आवाज़ में नहीं बोलती,
लेकिन जो लिखती हूँ
वह लौटकर
मेरे पास नहीं आता
वह किसी और के
अंदर जाकर
ठहर जाता है।

मैं अब
सबको समझने की कोशिश नहीं करती।
कुछ बातों को
बस लिख देती हूँ।

और यह लिखना ही
मेरा बच जाना है।

X X X

खुशी

उदासी के बादल
जब मन की छत पर
धीरे से उतर आते हैं,
तब उम्मीद
नंगे पाँव
दरवाज़े खटखटाती है।

मुस्कुराहट
कुंडी खोलकर
उसे भीतर बुला लेती है,
जैसे कह रही हो
अभी सब खत्म नहीं हुआ।

आत्मीयता
दीपक की तरह
कोने में जलती है,
और स्नेह
बिना कुछ पूछे
पास बैठ जाता है।

फिर उदासी
बादल नहीं रहती,
वह
हल्की फुहार बनकर
मन को भिगो देती है
ताकि खुशी
अंकुरित हो सके।

X X X

दोहरापन्

हम पौधे लगाते हैं
तस्वीर खिंचवाने के लिए,
और पेड़ काटते हैं
ज़रूरत के नाम पर
यह सदी की सबसे सभ्य हिंसा है।

एक नन्हा पौधा
मुट्ठी भर मिट्टी में
भविष्य का भरोसा मांगता है,
और एक पेड़
कुल्हाड़ी पड़ते ही
पूरे अतीत के साथ गिरता है।

पौधा लगाते वक़्त
हम बहुत कोमल हो जाते हैं,
पेड़ काटते वक़्त
बहुत व्यावहारिक
संवेदनाओं का यह दोहरा माप
धरती को सबसे ज़्यादा चोट देता है।

हमें पेड़ काटने से डर नहीं लगता,
क्योंकि वह बोलता नहीं,
चिल्लाता नहीं,
बस गिरते वक़्त
धरती को थोड़ा और खाली कर देता है।

पौधे लगाना आश्वासन है,
पेड़ काटना अपराध
और हम दोनों के बीच खड़े होकर
खुद को सभ्य कहते रहते हैं।

X X X

दिसम्बर की आखिरी पूरी रात
और पौष का महीना
ठण्ड है कि थमती नहीं
कोहरे के आँचल में दुबकी
मेरी यादें ठिठुर रही हैं

जिन्दगी की पगडंडियाँ
कब चौड़ी सड़कों पर खुली
कब सकरी हुईं फिर से
यंत्रवत सी अनजाने में अनचाहे ही

कितनी बार रुदन फूटे
जब जब अपने छूटे
रुदाली सी अंखियाँ बरसीं
तस्वीरों से मिलकर उनकी कई बार

कितनी मुस्कान बिखरी लबो पर
कितनी बार खिलखिलाए खुलकर
अपने बरसों बाद मिले तो
छल छल नीर बहा अँखियों से

तेरह साल बीत चले हैं
सब कुछ अर्पण करके तुझको
अब सबकुछ मेरा हो गया
खुद को जगा के भीतर मुझको
नए सपनों की जोत जली

दिसंबर के आगोश में
खिल उठी मुरझाई कली मन की
नववर्ष की नूतन बेला में
जाते हुए दिसंबर को
मेरा आखिरी सलाम!

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