हिंदी साहित्य के केंद्र में भोगे हुए यथार्थ को दर्ज करने की परंपरा रही है। यह भोगा हुआ यथार्थ चाहें निजी हो या किसी सूचना पर आधारित, किसी घटना से प्रेरित, या किसी खबर जनित संवेदना से कथारूप में हस्तांतरित। फिर भी पूर्णतः यथार्थ अक्सर कहानी का आकार नहीं ले पाता। लेखक उसमें उचित अनुपात में कल्पना का एक मिश्रण करता है। यही लेखक की दृष्टि होती है। कहानी का सकारात्मक या नकारात्मक अंत कहानी को नहीं मूलतः लेखक के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। क्योंकि हर दुखांत के बाद भी मनुष्य जीवन सुखों के कतरे ढूँढता हुआ आगे बढ़ता है और सुखांत के पश्चात दुख आना तय है।
सम्पा- एक स्त्री के अदम्य साहस और विश्वास की गाथा
इसके आलोक में जब सत्य घटना पर आधारित चर्चित कथाकार संजीव पालीवाल व कलम की धनी मीनाक्षी चौधरी द्वारा लिखित ‘सम्पा’ से गुजरती हूँ तो एक अलग ही तरह का अनुभव होता है। एक पंक्ति में कहूँ तो ये कहानी है ‘दिए की और तूफान की’। भावनात्मक उद्वेग, जटिलताओं, संघर्ष की स्याही से लिखी इस कथा की सीवन इतनी बारीक है कि कथावाचक शैली में लिखी कथा आत्मकथा सा आभास देती है। जटिल भावनाओं में डूबती उतराती सम्पा जैसे शब्दों में धडक उठती है और अपने जीवन के छोटे-बड़े हर संघर्ष को पाठक से साझा करने पर आमादा हो जाती है। इतना इस कदर की पाठक ‘सम्पामय’ हो जाता है। एक विधा में दूसरी विधा की आवाजाही का साहित्यिक प्रयोग इस पुस्तक को विशेष बनाता है। एक खास बात यह भी है कि लेखक द्वय द्वारा लिखित होने पर भी दोनों का काम पृथक-पृथक ढूंढ पाना असंभव है। अपनी भाषा शैली विकसित कर चुके किसी भी लेखक के लिए यह कार्य निश्चित तौर पर चुनौती पूर्ण होता है।
पुस्तक की बात करूँ तो सरल सहज भाषा में लिखी गई संघर्ष की यह कथा मूल रूप से प्रेरक है। रहस्य रोमांच के साथ आगे बढ़ती कथा में प्रथम प्रेम कि सुवास भी है, पुत्री हठ भी है, और परिवार व समाज की एकता का मजबूत संबल भी। कहानी के केंद्र में है सम्पा। हरियाणा के गाँव की भोली-भाली मासूम सी लड़की। जिसकी दुनिया भरोसे की मिट्टी से बनी है। जिसे भरोसा है खुद पर, अपने प्रेम पर और अपने हठ पर भी। एक फोन कॉल से शुरू हुई कहानी एक स्त्री की शक्ति और प्रेम पर विश्वास की मोहर है। संकट काल में उसी की याद आती है जिससे हम सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं और सबसे ज्यादा शक्ति सम्पन्न समझते हैं। ऐसा ही भरोसा तो था पति रवींद्र का जिसका जहाज सोमालिया के लुटेरों द्वारा बंधक बना लिया जाता है, जो मदद की गुहार में एक अन्य बंधक की पत्नी मधु शर्मा से कहता है, “किसी तरह से सम्पा को बता देना वह जरूर कुछ न कुछ करेगी।” सम्पा विश्वास की यही डोर थाम कर उस पाथ पर चल पड़ती है, जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता है।

अतीत और वर्तमान के मध्य आवागमन करती हुई कहानी रोचकता बनाए रखती है। जिस कहानी का अंत पहले से पता हो उसे बहाव लाने के लिए लेखक द्वय ने डिटेलिंग का सहारा लिया है। कल्पना की गुंजाइश कम करते हुए छोटी-बड़ी हर घटना को दर्ज किया है। इसमें कथा के साथ-साथ हम जानते चलते हैं फिरौती की रकम से संबंधित भारत के कानून के बारे में। शिपिंग कंपनी और नेताओं के ढुलमुल रवैये के बारे में। मीडिया और जन-सहयोग की ताकत के बारे में और राजनीतिक दाँवपेचों के साथ ही पाकिस्तान और भारत के संबंधित प्रकरण पर अलग रवैये कानूनी विषमताओं के बारे में भी। कहानी पढ़ते हुए लगा कि कम से कम सम्पा के साथ उसका परिवार पिता, भाई, ससुर, खाप पंचायतें और जन सहयोग था कोई अन्य लड़की क्या अपने संघर्ष को अंजाम तक पहुंचा पाती। यहीं से व्यवस्था के ऊपर कठोर प्रश्न मन में उपजते हैं और हम सम्पा के साथ आ खड़े होते हैं, “किसी भी सरकार के रहते आम आदमी को सुरक्षित महसूस होना चाहिए।“ यही सरकार उत्तरदायित्व है और कामयाबी भी।
सम्पा के अतरिक्त अन्य स्त्री पात्र भी सशक्त है फिर चाहें सम्पा की माँ हों या सास। सम्पा की माँ बेटी की पसंद के विवाह के समय पिता की अनिच्छा से टकरा जाती हैं। स्थान-स्थान पर वे अपनी बेटी को उचित परामर्श देती हैं। अपने इकलौते बेटे के विकट परिस्थितियों से घिरे होने के बावजूद भी सम्पा की सास घर के सामान्य कार्यों में सहजता से लगी रह कर सब को धैर्य के साथ मसले को हल करने का मनोबल देती हैं। यहाँ तक कि जब मुहल्ले की स्त्रियाँ उनसे कहतीं हैं कि बेटा नहीं आएगा तो युवा सम्पा भी यहाँ टिकेगी नहीं तब भी वे सम्पा के सामने विचलित नहीं दिखती हैं और उसी प्रकार अपने कामों में लगीं रहतीं हैं। एक पुत्रवधू के रूप में सम्पा भी उनके इन गुणों के प्रति खिंचाव महसूस करती है। सास-बहु के दरकते संबंधों के मध्य स्त्री ही स्त्री की शक्ति है के सूत्र वाक्य हमारे लोक जीवन का आधार रहें हैं। वहीं अवांतर कथा से यह भी संदेश जाता है कि परिवार और समाज के साथ को बचाए रखने की अपने हिस्से की आहुति देने की कला हम भूलते जा रहें हैं और विपत्ति में अकेले पड़ते जा रहें हैं।

सम्पा की तुलना पौराणिक सावित्री से की जा सकती है, जो यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाई थीं। सम्पा एक मुश्किल लकीर को पार करती है जहाँ वे अपने पति के बहकते कदमों को क्षमा करती है। इस प्रकरण पर मुझे प्रेमचंद की “स्वर्ग की देवी” कहानी याद आ गई। पुस्तक इस प्रसंग के साथ पुरुषवादी सोच पर प्रहार करती है और सम्पा की मनोदशा के साथ ही स्त्री मनोविज्ञान की बारीक परते भी उधेड़ती है। यथा: सम्पा की आत्मा को बस एक जादू की झप्पी की जरूरत थी उसे वह अपनापन चाहिए था जो बचपन के खत्म होने के साथ ही उसके पापा से कहीं खो गया था। ये बात हमारे भारतीय घरों की उस कमी पर हाथ रखती है कि उम्र के साथ पिता और पुत्री का सहज स्नेहिल संवाद समाप्त होते जाना स्त्री को हमेशा के लिए दूसरे के वैलिडेशन की चाहना की भट्टी में झोंक देता है। आज बड़े शहरों में पिता का स्वरूप बदला है पर अभी भी छोटे शहरों और गाँवों में यह दूरी बनी हुई है। एक स्थान पर पूनम को समझाती सम्पा उसे सोशल मीडिया के भ्रम जाल से दूर रहने को कहती है तो पूनम बड़ी मासूमियत से प्रश्न करती है कि, “फिर आपका जजमेंट कैसे फेल हो गया?” वहीं भाई के संवाद रिश्तों और नातों के बीच के बारीक भेद को बताते हैं। इस मार्मिक प्रसंग और उससे उबरते हुए संघर्ष और विजय की कथा के साथ ही सम्पा का उद्देश्य के प्रति समर्पित होने का संकल्प कहानी के अंत को विस्तृत आयाम देता है।
अंत में यही कहूँगी कि समुद्री डाकुओं पर लिखी गई अन्य कथाओं के विपरीत एक अबला के सबला बनने की कथा पढ़ी जानी चाहिए ताकि सनद रहे कि शक्ति हमारे अंदर ही है और विपरीत परिस्थिति में उसे जगाना ही नारी से नारायणी हो जाना है।
वंदना बाजपेयी

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