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फंदे – फंदे बुनती है प्यार

गर्मी का दरवाज़ा बंद होते ही आसमान के झरोखे से उतर आई है गुलाबी सर्दी | जिसके आते ही पुराने दीवान कुलबुलाने लगे | फिर से निकल आये स्वेटर , कम्बल और रजाइयां और साथ ही साथ पिछले साल संभाल कर रखी गयी सलाइयाँ |खरीद कर आ गई नयी ऊन | फिर से पड़ गए फंदे कुछ उलटे कुछ सीधे , मिलाये जाने लगे रंग , कुछ चटख कुछ शांत , चंचल हो उठी मौन अंगुलियाँ , सरपट दौड़ती लगी किसी संगतराश की तरह , ढालने लगी आकार आकार , पत्थर से नहीं मुलायम धागों से ……… और बुने जाने लगे स्वेटर |

स्वेटर और स्त्री का बहुत अनोखा रिश्ता है |सलाइयाँ उलटे – सीधे फंदे और ढेर सारे रंग | जिनमें चुनती है अपने मन का रंग | शायद अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए | तभी तो ६ साल की पिंकी जो अभी ठीक से दो का पहाड़ा भी पढना नहीं सीख पायी है , माँ के बगल में बैठ कर स्वेटर सीखने की जिद्द करती है | नन्हीं कलाई को सलाई भारी लगती है | फिर भी उलटे सीधे फंदे चलाने ही हैं | बुनना है गुडिय के लिए स्वेटर | अरे जब सब सर्दी में स्वेटर पहनेगे तो क्या उसकी गुड़ियाँ सूती कपड़ों में जाड़े में ठिठुरेगी | ये उसकी चिंता – फिकर है या स्नेह दिखाने का तरीका | पता नहीं | उसे तो बस इतना पता है की रूपा , डौली , सुधा सब की गुड़ियां स्वेअतर पहनेंगी | फिर मेरी ही क्यों न पहने | उसे सीखना है तो सीखना है | बुनना है तो बुनना है …. बस |
समय पंख लगा कर उड़ता है | पिंकी किशोरी बनती है फिर युवा और फिर वृद्ध हो जाती है | न जाने कब उसकी गुडिया की जगह छोटा भाई , पिता , पति , बेटा व् पोता ले लेता है पता ही नहीं चलता | बहुत कुछ बदल जाता है , नहीं बदलते हैं तो बस ऊन के धागे सलाइयाँ , फंदे कुछ उलटे कुछ सीधे |जो सर्दी आते ही अपनी पैठ बना ही लेते हैं | जिनमें उलझ – उलझ कर बहुत कुछ सुलझा देता है नारी मन | कभी सोंचा है कैसे ?
आज बाज़ार में एक से एक ब्रांडेड स्वेटर मिल जाते हैं , औरतें भी घर बाहर संभाल रही हैं | जिसके कारण हमेशा समय की कमी पड़ी रहती है | फिर भी सर्दियाँ आते ही न जाने क्यों पड़ ही जाते हैं फंदे | कभी गुड्डू के पापा के लिए हाफ स्वेटर , कभी पिताजी के लिए मफलर और समय कम हुआ तो छोटू के दस्ताने ही सही | कहाँ से निकालती हैं इसके लिए समय और क्यों ? इस क्यों पर ही आज राह चलते ठिठक गयी थी मैं | ये क्यों ही तो पूंछा था एक बच्चे ने स्वेटर बिनती हुई अपनी माँ से | मासूम से शब्द झंकृत हो उठे थे | जब उसने माँ के गले में बाँहें डाल कर कहा था ” मम्मा ,आप इतना थक जाती हो , फिर स्वेटर क्यों बुनती हो ? बाज़ार से खरीद लेते हैं | बदले में बिना कुछ बोले मुस्कुरा उठी थी उसकी माँ |
सच का हौसला फेस् बुक पेज 
बताती भी तो क्या बच्चा समझ पाता | ये तो बस औरतें ही जानती हैं की औरतें स्वेटर नहीं बुनती | बुनती हैं दुआएं , बुनती हैं आशीर्वाद , बुनती हैं ढेर सारा स्नेह | जिनकी गर्माहट से भर जाता है सारा घर | भला बाज़ार के स्वेटर इनका क्या मुकाबला करेंगे |और देखों न के बोड पर थिरकती मेरी अंगुलियाँ भी बेचैन हो उठी ……….. बुनने को कुछ स्नेह , कुछ गर्माहट |
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जिस तरह एक स्वस्थ रिश्ते की नींव आपसी विश्वास और समझदारी पर टिकी होती है, उसी तरह परिवार की आर्थिक सेहत के लिए भी सूचित और सतर्क फ़ैसले ज़रूरी हैं। डिजिटल युग में नए-नए वित्तीय विकल्प लगातार उभर रहे हैं, और जो लोग इनकी बारीकियों को समझना चाहते हैं, वे अक्सर bitcoin sázení जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी पढ़ते हैं। हालाँकि, यह कभी न भूलें कि सट्टेबाज़ी में हमेशा जोखिम शामिल होता है और इसे कभी भी आय या पैसा कमाने के भरोसेमंद साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए — बेहतर यही है कि ऐसे विकल्पों में केवल उतना ही शामिल हों, जितना आप खोने का खर्च उठा सकते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर किसी जानकार से सलाह ज़रूर लें।