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राजगोपाल सिंह वर्मा की कवितायें


राजगोपाल सिंह वर्मा की कवितायें



                   
             राजगोपाल सिंह वर्मा की कवितायें भावों की गहनता
तक जाकर कुछ पड़ताल करती हैं, वहां से कुछ ठोस निकालती है और सीधी –सादी भाषा में
पाठकों के सामने प्रस्तुत कर देती हैं | गंभीर बात को सरल शब्दों में कहना इनकी
विशेषता है जो सहज ही पाठक के ह्रदय पर अमिट छाप छोड़ती हैं| 


राजगोपाल सिंह वर्मा की कवितायें 





१ . दर्प का आवरण
———


सुनहरी धूप की किरणों से,
न जाने कैसे…
पक जाती हैं वह…
गेहूं की बालियां…
जो दमकती हैं एकबारगी,
खरे सोने की तरह…
कतार में ऐसे खड़ी…
लहलहाती हों…
जैसे झूमते हुए स्वागत में…
हां,
कुछ बौरा-सी जाती हैं…
जब वह पक चुकी होती हैं…
पूरी तौर पर…
और,
होती हैं आतुर…
अपनी जमीं से…
बिछुड़ने के लिए,
सही तो है…
फिर सहलायेगा कोई…
संजोयेगा जतन से..
मन से…
मिलेगा आदर भी…
निवाला बनने से पहले…
और गर घुन लगी तो…
निकृष्ट माने जाओगे…
तुम भी खूबसूरत-से
सुनहरे दानों…
और फेंक दिए जाओगे…
कचरे के ढेर में…
तब,
बीनेगा कोई तुम्हें…
फिर से,
अपना निवाला बनाने के लिए,
शायद कुछ ख़ास श्रम से…
पर तब तक…
कुछ भरम तुम्हारा टूटेगा…
यकीनन…
कि सोना नहीं हो तुम..
पर,
कौन कहता है कि…
कुछ कम हो तुम…
क्योंकि,
तुम दे सकते हो…
जो तृप्ति…
स्वर्ण का गुण तो वह नहीं…
आवरण ओढ़ता है वह मात्र…
दर्प का…!
कुछ मिथ्या अवधारणाओं का…
जबकि तुम…
जीवन देते हो…
और देते हो ऊर्जा…
निरन्तर,
असीमित और ,
देदीप्यमान…
सपनों के जीवन-दान की !


पढ़िए -बदलते हुए गाँव


२.

अलग है स्त्रियों का प्रेम

—-


स्त्रियों का प्रेम
पुरुषों से
बिल्कुल अलग होता है,
जब पुरुष
प्रेम पींग बढ़ाता है,
स्त्री उसे संशय से
देखती है,
हां,
सिर्फ संशय…
उसके भावों पर,
कुछ अभिव्यक्तियों पर
या फिर उसकी
बड़ी-बड़ी बातों पर,
प्रेम की परिभाषाओं पर !


स्त्री आसानी से भरोसा
नहीं करती पुरुष पर…
आरम्भ में,
पर जब करती है तो
पूरा करती है और
करती रहती है…
अपनी टूटन के
आखिरी सिरे तक,
महीन कमज़ोर-से धागों के
स्वतः दरकने तक,
द्वैत से अद्वैत का
यह सफरनामा
360 अंश पर पहुंचकर
पूरा होता है…
उसके लिए,
वह पसंद करती हैं
इश्क़ रूहानी…
और पुरुष का प्रेम…
पहले देह तकता है !
वह समझता है कि
पा लिया है स्नेह उसने स्त्री का
तब वह हो जाता है…
स्वछंद, उच्छ्रंखल
और बेपरवाह,
उस प्यार से जो मिला था उसे
न जाने किस कर्म के
पुरुस्कार में,
हमेशा ही,
या अकसर ऐसा होता है,
और स्त्रियां ही शिकार होती हैं
पुरुषों की कुछ
अतिरेक व्यंजनाओं की,
कुछ किस्सों-कहानियों की
और न जाने कितने
सच्चे-झूठे वादों की,
और फिर कहते हैं न…
कि स्त्री लज़्ज़ा है, मर्यादा है
और कुल का मान है… !


पुरुष जब अपना…
सौ प्रतिशत झोंक देता है
तब स्त्री कहीं जाकर
धीमे-धीमे…
सकुचाती हिरणी-सी
अपने एक अंशांस से
जुड़ती है…संशय के साथ,
एक-एक कदम उठाती है
धड़कनें साथ नहीं देती अक्सर
पर,
प्रेम की बात है न
और जानते हो न आप,
प्रेमल सम्बन्धों को जिंदा
रखने के लिए
तोड़ सकती है वह
जन्म-उत्पत्ति के भी संबंध,
यदि पढ़ी है उसने
आपके दृगों में
स्नेह की पाती,
और पुरुष…
न जाने क्या करता है,
क्या अर्थ रखते हैं
यह प्रेम संबंध उसके लिए,
कुछ भी तो अप्रत्याशित नहीं
जुड़ जाने के बाद…
जिसे कहते हैं
जन्मान्तरों के बंधन,
पर मिलता क्या है…
प्रताड़ना…दरकना…
आरोप…अनचाहे से,
फिर अंततः टूटना और
वह सब जो स्त्री के लिए
सोच्य भी नहीं!
प्रेम वह करता है…
निर्वहन स्त्री करती है,
प्रेम और तृष्णा..
दोनों का निर्वहन करना
आसान है क्या ?
और फिर
प्रेम का अनचाहा निर्वहन
या अपराधबोध तुम्हारा
क्या वही है अशेष स्त्री को
जो रहे प्रतीक्षारत,
बिछा कर पलकें हर पल..?




पढ़िए -बदनाम औरतें



नमन तुम्हें, हे गर्व महान !







३.

नमन तुम्हें, हे गर्व महान !

—–


सृष्टि का जो आधार है,
है उद्गम जिसका पावन
पर्वतों की श्रृंखला से,
ब्रह्म रूप धारिणी…
ब्रज संस्कृति की तुम
जननी कहलाती,
सूर्यदेव की गर्वीली पुत्री,
मृत्यु देव यम की प्रिय भगिनी
श्रीकृष्ण की परि….
हे कालिंदी,
यमुना भी तुम,
भक्ति की बहती
निर्झर सरिता हो तुम!


तुम समेटते हो अंचल में
न जाने कितने
निर्मल-से जल स्रोत,
कहीं टोंस को
करती आत्मसात,
या ले चलती कमलाद
और अस्लौर,
कहाँ हिमालय
और कहाँ इलाहाबाद,
तुमने जन्मे मथुरा के तट,
स्मृति तुम में ही है सरस्वती की
और संभाला कृष्ण गंगा को
तुमने ही तो सिर्फ !


तुमको बाँध लिया दिल्ली ने,
किया नियंत्रित प्रवाह,
पर सोचो क्या रुक पाया…
निर्मल तुम्हारा स्वभाव,
वृन्दावन को किया पल्लवित,
मथुरा को गौरवान्वित,
श्रीकृष्ण हुए आसक्त
शाहजहाँ की बनी प्रेरणा तुम,
ताजमहल भी नतमस्तक है,
हो बटेश्वर का तुम धर्म,
कर चम्बल को आत्मसात
हो जाती तुम भी विस्तीर्ण,
चलती रही साथ-साथ
मिली प्रयाग में जाकर तब…
संगम तुम कहलाई,
स्वभाव तुम्हारा है,
सहेजना सबको,
जब देखा किया समाहित,
स्नेह-नीर बांटा यूँ ही
बस हर पल!
तुमने शरण दी सेंगर को,
और किया सम्मान बेतवा का,
तुमने दिया जीवन केन को,
तुमसे हुई श्रद्धानत
नदी जो कहलाती सिंध !


बहता निर्मल पानी हो,
मात्र यह नहीं है भ्रम हमारा,
तुम हो वाहक संस्कृति की,
तभी कहलाता…
पुरातन सभ्यता,
यह गौरवशाली देश हमारा
पूज्य हो तुम,
श्रद्धेय तुम,
दुःख को सबके
हरने वाली
पवित्र हो तुम
हो प्राचीन तुम्हीं,
यमुना ही हो न तुम !


-राजगोपाल सिंह वर्मा





राजगोपाल सिंह वर्मा
————–


पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर शिक्षा. केंद्र एवम उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में प्रकाशन, प्रचार और जनसंपर्क के क्षेत्र में जिम्मेदार वरिष्ठ पदों पर कार्य करने का अनुभव.


पांच वर्ष तक प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका “उत्तर प्रदेश “ का स्वतंत्र सम्पादन. इससे पूर्व उद्योग मंत्रालय तथा स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार में भी सम्पादन का अनुभव.


वर्तमान में आगरा, उत्तर प्रदेश में निवासरत. विभिन्न राष्ट्रीय समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, आकाशवाणी और डिजिटल मीडिया में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में लेखन और प्रकाशन तथा सम्पादन का  बृहद अनुभव.  कुल लगभग 800 लेख आदि प्रकाशित. कविता, कहानी तथा ऐतिहासिक व अन्य विविध विषयों पर लेखन.


 ई-मेल: rgsverma.home@gmail.com)



लेखक व् कवि

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