कन्यादान

कन्यादान -गलती हमारी है
इन
दिनों शादियों का मौसम चल रहा है और पिछले कई सदियों से शादियों में कुछ बदला है तो बस उनका ताम झाम. बाकि सब कम ज़्यादा वैसा की वैसा. दूल्हा बारात लेकर आएगा, तोरण मारकर विजयी महसूस करेगा और बेटी का बाप उसे अपनी  कन्या
दान में दे देगा….. और साथ ही दान में देगा अनगिनत चीज़ें , सामान और नकद.

कन्यादान -गलती हमारी है


कन्या तो हर शादी में एक सी और एक ही होती है ….. पर शादियां उनमे मिलने वाले बाकी दान दहेज़ के हिसाब से छोटी और बड़ी हो जाती हैं. सिर्फ यह सुनने के लिए की उन्होंने कितनी बढ़िया और बड़ी शादी की लड़की के घर वाले दहेज़, नकद, कपड़ों, गहनो, में कोई कमी नहीं छोड़ते….. इस तरह देने लेने में कोई कमी नहीं रहती

कुछ छूट नहीं जाता ……. कमी तो छूट जाती है बस लड़की के दिल में …… जाने कितनी और क्या क्या ….जड़ों से निकल कर दूसरी जगह लगाओ तो कुछ पौधे फिर खिल उठते हैं कुछ कभी नहीं खिल पाते ….. निर्भर करता है उन्हें नयी जगह पर कितना खाद पानी और धूप  मिलीजो नहीं खिल पाते, जिनको अपने हिस्से की खाद पानी धुप नहीं मिलती वो मुरझा जाते हैं, औरतें पौधा नहीं होती, नहीं हो सकती, अगर हो सकती तो दिखा भी सकती अपना मुरझाना, झुलसजाना, सूख जाना, अकेले पड़ जाना…… जड़ों से अलग होकर फिर से हरा होने की चुनौतियांऔर उन चुनौतियों में कभी जीतना और कभी हार जाना  पितृसत्तात्मक व्यवस्था
का सबसे क्रूर संस्कार ही है कन्यादान…….

अपनी बेटियों को जिनका पूरा संसार आप हैं, आप खुद से सिरे से अलग कर दें, यही नहीं उस पर अपने सारे अधिकार त्याग दें, और उस पर जाने कितने अधिकार औरों को दे दें, उस का खुद पर जो अधिकार है उसे गौण समझें…… इन सबसे कहीं अच्छा तो यह है की आप जितना रुपया पैसा उसकी शादी पर लगाना चाहते हैं वो सब देकर उसे एक दिन हमेशा हमेशा के लिए घर से निकाल दें…. उसे पराधीन बनाकर खुद से अलग करना और फिर कहना की ज़माना क्रूर है……. ज़माना क्रूर नहीं है हम बेटियों के लिए क्रूर तो खुद माता पिता हैं ….. जो बराबरी का व्यवहार करते करते एक दिन अचानक बेटी और बेटे में इतना बड़ा अंतर कर देते हैं और भेज देते है बेटी को  अपने
से दूर सदा के लिए……………
जो
सदियों की कहानी है, आज की हक़ीक़त भी वही है……. मेरे दोस्त, मेरी बुआएं, मेरी माँ, मेरी चाची, मेरी दादी, मेरी बहने और मैं खुद …… हम सब दान में दिए जा चुके हैं……. हम सब वस्तुएं हैं….नहीं


मेरी नज़र में दोष बहार वालों का नहीं, ससुराल वालों का नहीं, लड़के के रिश्तेदारों का नहीं, सारा दोष उन माँ बाप का है जो व्यवस्था के आगे कमज़ोर पड़े, उन लड़कियों का है जिन्होंने अपने आप को सामान समझने की मौन सहमति दी, लड़की के उन सब रिश्तेदारों और घर वालों का है जो उसकी शादी में नाच गाना और खुद का मनोरंजन करके चलते बने…… कब तक हम सामने वाले पर उंगली उठाते रहेंगे……. कब करेंगे खुद से वो सारे प्रश्न जो बाकी की तीन उंगलियां हम पर दागे हुए है…… दोष हर उस बुआ का है जो घर आकर भाई को नसीहत देती है की बेटी का ब्याह कर उसे अपने घर का करो ….. समाज वाले  बातें
बनाने लगे हैं…. दोष हर उस ताऊ का है जो बेटी को कुछ बनते और करते देख कहता है की ज़्यादा कुछ बन गयी तो फिर शादी ब्याह में बड़ी दिक्कत आएगी , दोष हर उस माँ का है जो कहती है की अब क्या लड़की को घर में ही बिठाना है जीवन भर, दोष उस भाई का है जो अपनी बहन के स्वतंत्र ख्यालों और विचारों को बर्दाश्त नहीं कर पाता |


 सबसे अधिक दोष उस लड़की का है जो अपने विचारों का साथ देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती……….हाँ दोष हम लड़कियों का है …… हम यह जानते हुए की हमारे साहस के अनुपात में हमारा जीवन बढ़ेगा और संकुचित होगा ….. हम हिम्मत नहीं कर पाते ….. हम बनाने देते हैं खुद को एक खूबसूरत और फायदे भरा सौदा/ पैकेज ….. हमारे ही नाम पे हम होने देते हैं नकद रुपयों का आदान प्रदान, और दोनों पक्षों में से किसी को भी फ़िक्र नहीं होती की उन्होंने हमारे स्वाभिमान को किस तरह चूर चूर कर दिया होता है|


हम लडकियां होती हैं दोषी की हम तैयार नहीं होती जीवन भर एक ऐसे साथी का इंतज़ार करने के लिए जो हमें कम से कम एक पैकेज बनने दें…. हमें हमारी गरिमा और गौरव के साथ मिले. हम ही तो बना देती है एक कमज़ोर आज्ञाकारी पुत्र को अपने जीवन का परमेश्वर.. गलती किसीकी नहींहमारी हैभले ही हम ऐसे माहौल में रहती हों जहाँ हमारा आत्मविश्वास तोडना सामाज का पसंदीदा शग़ल रहा हो …… पर उसे टूटने देने की गलती फिर भी हमारी है…… हमारे जीवन के निर्णयों में कोई कितना भी हस्तक्षेप करे पर अंतिम निर्णय खुद लेने की गलती हमारी है….. प्यार प्रेम और सम्मान के नाम पर मांगी गई सो कुर्बानिया रास्ता रोक के खड़ी हों पर उस राह पे कुर्बान होने की गलती हमारी है…… कोई भी दोषी नहीं हो सकता हमारी स्वाभिमान को तोड़ने का …… 


क्योंकि अपने मान, अपनी गरिमा, और स्वाभिमान को अलहदा रख रीति रिवाजों के नाम पर दान में जाने की गलती भी हमारी है…..

अपर्णा परवीन कुमार 

लेखिका

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