नीली गिटार
स्वतंत्रता दिवस पर शहर में एक विशेष समारोह का आयोजन किया जाता है|
चढ़ाई जाती हैं| उनकी जीवनी व जीवन-चर्या के अनेक प्रसंग सांझेकिए जाते हैं|
संग्राम में रही उनकी भागीदारी की….. सन् १९४२ के ‘करो या मरो’ आन्दोलन के अन्तर्गत कैसे उन्होंने
अपने तीन साथियों के संग अपने गाँव की पुलिस चौकी पर भारतीय तिरंगा फहराया था और
दो साल जेल काटी थी…..
उनकी पुलिस सेवाकी….. जिसमें सन् १९४७ के एकदम बाद उन्हें एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता
सेनानी होने के नाते बिना कोई परीक्षा दिए भारत सरकार ने डिप्टी पुलिस निरीक्षक के
पद पर उन्हें भरती कर लिया था….. उनकेचौबीसवें ही साल में…..
उनके ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन की, जो व्रत उन्होंने सन् १९४८ में भूमिविहीन रहे
स्कूल अध्यापक अपने पिता कीअकाल मृत्यु पर लिया था| अनाथ रह गए अपने चार भाई-बहनोंके
भरण-पोषण हेतु| साधनविहीन रहे अपने ताऊ-चाचाकी सहायता हेतु…..
चरित्र बल की, उनके आत्म-निग्रह की, उनकेसूत्र-वाक्यों की, उनकेसाहसिक कार्यों की,
उनके ऊँचे आदर्शों की…..
छेड़ी जाती…..
जाती है…..
समेटे…..
विराजमान थी जब माँ मुझे मामा के पास छोड़ने गयी थीं|
मेरी नवमी जमात पूरी होते ही|
टपकी?” माँ ने मामा से रोष जताया था|
मित्र थे|” मामा बोले थे, विधुर थे| लड़की का इलाज करवाते-करवाते-करवाते कंगाल हो
चुके थे| खुद भी बीमार थे| जान लिए थे वह बचेंगे नहीं| लड़की को लेकर चिंतित थे|
तभी मैंने कहा, लड़की मैं रख लूँगा…..”
में क्यों?” हम माँ-बेटे ने कजली को मामा के कमरे के दूसरे एकल पलंग पर ही बिछे
पाया था|
चौकसी की जरूरत है, उसकी माँसपेशियाँ पल-पल कमजोर पड़ती जा रही हैं| क्या मालूम
कहाँ की कौन सी माँसपेशी कब अपनी हरकत खो बैठे? दिल की? फेफड़े की? चेहरे की? हाथ
की? पैर की? दिन में तो अर्दली उसे देखे रहते हैं मगर रात में उसे देखने वाला कोई
नहीं…..”
तो उसे सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं छोड़ आते? वहाँ देखने को तमाम डॉक्टर रहेंगे,
नर्सेंरहेंगी…..”
वहाँ?” मामा बिफरे थे, “कैसे छोड़ आऊँ वहाँ? जब मैंने उसके मर रहे बाप से वादा किया
है, अब वह मेरी देखभाल में रहेगी? तो?”
उसे तुम्हारे कमरे में यों नहीं लेटना-सोना चाहिए|” माँ ने कहा था|
नहीं है| केवल एक जीव है| समझ लो वह हमारे ताऊजी की कोई बीमार गाय है| जिसे देखभाल
की, इलाज की, चारा-पानी की जरूरत है…..”
कि उन दिनों मामा के गाँव में उनके ताऊजी उधर बीमार गऊओं को अपने दालान में हाँक
लाते रहे थे, उनका इलाज भी करवाया करते और उन्हें चारा-पानी भी देते-दिलवाते|
थीं| शायद डर भी गयी थीं| मामा कहीं नाराज हो गए तो उनके साथ मुझे भी हमारे गाँव
विदा कर देंगे| मेरी पढ़ाई पूरी नहीं करवाएँगे|
मामा से भय तो खाते ही थे| मौके-बेमौके उनके तेवर भी बदलते-बिगड़ते रहते| किसी को
महत्व देने पर आते तो उसे आकाश पर जा बिठलाते| मगर मिजाज खराब होता तो उसी की
मिट्टी पलीद कर देते| मौजी इतने कि मन में मौज होती तो मुट्ठी भर सोना भी दे सकते,
वरना मुट्ठी बाँधने पर आते तो लाख कहने-समझाने पर भी मुट्ठी ढीली न करते|
जाने के बाद मिला|
आदेश पर, “लड़की को साढ़े दस पर फलों का रस पिलाना है और साढ़े बारह पर सब्जियों का
सूप| खाना वह मेरे आने पर खाएगी| मेरे साथ…..”
में पूरे पैंतालीस मिनट बाकी थे किन्तु मैंने उसी समय अर्दली से रस निकालने की
प्रक्रिया की जानकारी ले ली| मामा के घर में उस समय बिजली की मिक्सी तो थी नहीं|
प्लास्टिक का एक उपकरण था, जिस पर छीली हुई मौसमी के टुकड़े बारी बारी से रखकर
भींचे और परे जाते थे और रस निकल आता था|
जब कम लगा तो गिलास भरने के लिए मैं तीन मौसमी काम में लाया| अर्दली की आनाकानी के
बावजूद| हालाँकि रस बनाने में मैंने उसकी सहायता किंचित भी न ली थी|
यह रस पिलाना है|” कजली के पलंग के पास जाकर मैंने गिलास उसकी तरफ बढ़ाया|
है?” वह मुस्कुरायी, “इतना ज्यादा?”
मेरी ओर देखने को भी मना कर गयी हैं?” वहहँसी|
उसने सुन लिया था जो मेरी माँ जाते समय मुझे फिर कह गयी थी- “उसलड़की के पास फटकना
भी मत| क्या मालूम कब उसकी साँस टूट जाए और आफत तुम पर आन पड़े?”
बहुत तेज हैं| आँखेंएक नजर में सामने वाले के दिल का पूरा नजारा ले सकती हैं और कान
दूर से भी किसी की कनफुसकी की कानाबाती पकड़ सकते हैं|”
रख दो| तुम्हें पहले मुझे बिठाना होगा|”
बाहों में उसे समेटा उसने अपना सिर मेरी छाती पर ला टिकाया और बोली, “सिरहाने की
तरफ दो तकिए लगाओ मेरी टेंक के वास्ते…..”
जमाए उसके शरीर की गंध मेरी नासिकाओं से टकराती रही| वह गंध माँ की गंध से बहुत
भिन्न थी| बहुत तेज और उग्र| उसका वजन भी माँ से लगभग एक तिहाई से भी कम रहा होगा|
माँ स्थूल व गोल-मटोल थीं, जबकि कजली कृशकाय थी, एकदम हड्डियों का ढाँचा| उसका
चेहरा भी अलग था| माँ के चेहरे से कहीं ज्यादा कोमल व सुहावना|
उसने मुझे अपने निकटस्थ रखा| गिलास मेरे हाथ में रहा और उसके होठों तक निर्दिष्ट
करते रहे उसके हाथ|
ही अर्दली ने तैयार किया किन्तु कजली के पास मैं ही लेकर गया|
पिलाने| बीच-बीच में उसके कंधों व धड़ की ऐंठन वफड़कन को सँभालते हुए|
मामा आए कजली मुझे अपने बारे में काफी कुछ बता चुकी थी| उसकी इस बीमारी ने उसकी
ग्यारहवीं की जमात में जोर पकड़ा था| उसका स्कूल उससे छुड़वाते हुए| मृत्युके हाथों माँ
उसने अपने तीसरे वर्ष में गंवाई थी और पिता अपने इसी तेईसवें वर्ष में| अभी बारह
दिन पहले| अस्पताल में, जहाँ उनके दाखिल हो जाने पर मामा उसे अपने साथ लिवा लाए
थे| पिछले तीन वर्ष से कैन्सर ने उन्हें घेर रखा था और अपने जीवनकाल के अन्तिम दो
माह उन्होंने उसी अस्पताल में बिताए थे|
पिला दिया था|” दोपहर में मामा के घर में कदम रखते ही मैंने उन्हें अपनी
आज्ञाकारिता का प्रमाण देना चाहा था, “और रोज भी पिला सकता हूँ|”
लिए, “रोज क्यों? तुम यहाँ पढ़ाई करने आए हो और कल से तुम अपना पढ़ने जाओगे| एक
इन्टर कॉलेज की दसवीं जमात में दाखिला लोगे| उस कॉलेज के प्रिंसिपल से बात पक्की
करके ही आ रहा हूँ|”
क्या वह भाँप लिए थे कजली के सानिध्य में बिताए उन एकाध घंटों ने मेरे भीतर एक
प्रेमोन्माद का सूत्रपात कर दिया था?
अपने उस इन्टर कॉलेज जाने जरूर लगा था मगर कॉलेज के बाद की पूरी दोपहरें मेरी कजली
के साथ ही बीता करतीं|
तो कभी साँप-सीढ़ी का खेल|
इसी शहर में आन खरीदे थे| माँ के दिए रुपयों से|
अच्छा होता वह तकियों का सहारा लेकर अपने पलंग पर बैठ लेती और पासा भी फेंकती और
अपनी गिट्टियाँ भी आगे बढ़ाने में सफल हो जाया करती| मुझे अपने ही पलंग पर सामने
बिठलाकर|
लेने देता| जिस पर वह हँसती और मैं निहाल हो जाता|
में रहती, वह मुझे अपने पिता द्वारा खरीदी गयी एक काव्य-पुस्तक थमा देती और उसमें
से मुझे अपनी पसंद की कविताएँ पढ़ने को बोलती|
स्टीवेंज़और कजली की मनपसंद कविता रही, ‘द मैन विद द ब्लू गिटार’|
बार पढ़ी थी कि मुझे उसका एक अंश भी कंठस्थ हो गया था|
ब्लू गिटार
थिंग्ज एज दे आर’|
एज दे आर|
ब्लू गिटार|
‘तुम्हारे पास एक नीला गिटार है|
वह नहीं रहने देते, जैसी वे होती हैं|
‘चीजें ही वैसी नहीं रहतीं
गिटार पर पहुँचती हैं…..’)
बीसवीं-बाईसवीं बार पढ़ते समय मेरा आनन्दातिरेक कजली से पूछ ही बैठा, “वह नीली
गिटार तुम ही तो नहीं हो जिसके पास आते ही सब बदल जाया करता है?”
अपना प्रश्न दाग दिया, “और मैन कौन है? बाबा या तुम?”
हो उस गिटार में झनक कौन लाता है? बाबा या मैं?”
ही….. जभी चीजें वह नहीं रह पातीं जैसी वे वास्तव में हुआ करती हैं…..”
मेरा हुलास मुझसे दूर निकल भागा था और विद्वेष मेरे निकट आन खिसका था|
देखना-सुनना मैंने जभी शुरू किया|
सन्दर्भ में|
और मैं बेशक उस सन्दर्भ में एक ही ‘पेज’ पर थे, एक ही पृष्ठ पर, मगर हम उसे सदृश
रूप में पढ़ नहीं रहे थे|
कुटुम्ब-परिवार से सर्वथा असम्बद्ध होने के नाते, कजली बाहरी व्यक्ति तो हम दोनों
के लिए थी किन्तु उस बात के रहते एक ओर जहाँ मेरा पन्द्रह-वर्षीयरूढ़िगत संकोच मुझे
निरुद्देश्य कजली को स्पर्श करने की आज्ञा नहीं देता था, वहीँ उसके साथ मामा का
स्पर्श, अकसर उच्छृंखलहो उठता और कई बार निरंकुश भी|
कि कजली भी उनके उस व्यवहार-वैचित्र्य से अप्रसन्न नहीं होती|
नवयौवना बन जाती| इश्कबाजी के हाथ-भाव दिखलाती हुई| चोचलहाई लिये| प्रत्यक्ष रूप
से न सही, किन्तु अप्रत्यक्ष ढंग से तो निश्चित ही|
वर्ष में मैं रत्यात्मकता का प्रारंभिक ज्ञान भी न रखता था किन्तु यह अवश्य समझ
रहा था कि दुनिया-भर को नियम-विनियम का बोध करवाने वाले मामा सुविदित अनुशास्ता न
थे; कजली से उनका सरोकार निष्काम न था, निर्दोष न था| सदोष था, कामुक था|
विस्मयकारी व्यवहार जरूर मेरी समझ से बाहर रहा था| किन्तु पश्चदृष्टि से आज मैं
अनुमान लगा सकता हूँ, मामा द्वारा उपलब्ध हो रहे अपने इलाज व भरण-पोषण के लिए आभार
प्रकट करने का कजली के पास शायद वही एक-मात्र साधन रहा था या फिर शायद अपने रोग के
कारण यौनिकता से सर्वथा अनभिज्ञ रही कजली को मामा की प्रियोपेक्षित वह विषयासक्ति
भाती ही रही थी| तिस पर मामा के पास पद था, धन था, प्रतिष्ठा थी, साधन थे, सम्पर्क
थे और उनके ‘इशारे मात्र’ से तमाम डॉक्टर घर आ जाया करते, कजली का कष्ट दूर करने|
उसमें प्राण डालने| नवीन जीवन का संचार करने और वह अभी जीनाचाहती थी| दीर्घकाल तक
जीना चाहती थी| ऐसे में अपनी बीमारी की कौंध तथा स्त्री-लिंग लक्षण की चौंध कैसे न
वह आगे बढ़ाती? एक फ्रांसीसी कहावत भी है, देयर इज ऑलवेज वन हू किसिज एन्ड वन हू
ऑफर्ज़ द चीक| (कोई चुम्बन तभी लेता है जब दूसरा अपना गाल पेश करता है)
कि कजली व मामा का वह पारस्परिक उताप व उत्साह मुझसे देखते न बनता| देखते ही मेरा
चित्त बंटने लगता, चित्त पर कभी दुख चढ़ता तो कभी क्रोधोन्माद|
भी कि समृद्ध, सम्पन्न व सुलाभी मामा अपनी हर इच्छा फलीभूत करने का सामर्थ्य रखते
थे जब कि मेरे अधिकार में कुछ नहीं था|
हुए वे अल्पकालीन पल जिनमें मैं कजली को लूडो अथवा साँप-सीढ़ी अथवा कविता-पाठ में
मग्न रखने में सफल हो जाया करता|
बावजूद क्योंकि पहली बार मामा ने जब मुझे कजली के पलंग पर उसके साथ लूडो खेलते हुए
पाया था, तोवह मुझे पीट दिए थे, ‘यहाँ तुम पढ़ने आए हो या लड़की की बीमारी बढ़ाने? अब
यह खेल-तमाशा बंद…..’
अपर्याप्त भी रहते तथा अनिश्चित भी| जैसे ही मामा की जीप का हॉर्न गेट पर बजता मुझे
तत्काल पलंगका सामान समेटकर लोप हो जाना पड़ता|
गल-फाँसी भी बने|
महाविपत्ति लाए|
बिछाए बैठे थे और कजली का पासा उसे एक ऊँची सीढ़ी चढ़ा ही रहा था कि मामा अपने कमरे
में आन खड़े हुए| दबे कदमों से| अपनी जीप से उस दिन वह गेट के बाहर ही उतर लिए थे
और हॉर्न बजा ही न था|
कजली की तो साँस ही फूली मगर मेरे हाथ भी फूले और पाँव भी|
साँप ही आन सूंघा| अपने बोर्ड से मुझ पर लपकता हुआ| सांगोपांग| साथ ही त्रास इतना
गहरा मन में आ बैठा कि ‘मानस’ की पंक्तियाँ मानो साकार हो उठीं-
विधित्रास घनेरी,
केरी…..’
पर झपटने में उन्होंनेएक पल न गंवाया और कान से पकड़कर मुझे पलंग से नीचे ला पटके|
बाप का यह धींग यहाँ धींग-धुकड़ी के लिए आया है….. मेरे नाम पर कालिख लगाने आया
है….. धिक्कार है उस दिन को जब मैंने बहन का कहा बेकहा नहीं किया..”
जभी उनकी लात-मुक्की के बीच कजली अपनी हांफ के हिलाव-ढुलाव के साथ चिल्लायी,
“…..इसकानहीं| यह तो चिलबिला भोला बालक है| मैंने बुलावा भेजा तो यह आ गया…..”
यह चले आए? भूल गए मैंने इन्हें यहाँ आने के लिए मना कर रखा है?” मामा अपनी
आक्रामकता में तर्रारें भर लाए और कजली को उसमें मौखिक रूप में सम्मिलित कर बोले,
“औरतुमने उसे बुलवा भेजा! बताओ, किसलिए बुलवा भेजा? अपने राग-रंग के लिए? या फिर
किसी आंट-सांट के लिए?”
कजली हिलगी|
चलाऊँ? रात में सो-सो कर मैं उठूँ? भोज मैं खिलाऊँ? भरण मैं करूँ? और, सुद्धां तुम
इसके संग बनाओ?” मामा दहाड़े|
मत करिए| आपकीअलगागुजारी सह सकती हूँ मगर इस अल्हड़ का दुर-दुर फिट-फिट होना नहीं
देख सकती…..”
लगी|
तत्काल रोक लिए| और कजलीकी ओर लपक लिए| “तुम ठीक नहीं क्या?”
सांस उखड़ने लगी|
डॉक्टर साहब को बुला लाता हूँ|” मामा की मारपीट से पहुँचायी गयी सभी चोटें भूलकर
मैं दौड़ लिया|
क्षेत्र में मामा का मकान था, उसी की बगल में सरकारी अस्पताल के एक डॉक्टर रहते थे
जो पहले भी कजली को देखने कई बार घर पर आ चुके थे|
उन्हीं की संगति में कजली को उसी समय अस्पताल ले जाया गया| मामा की सरकारी जीप
में|
साथ अर्दली को बिठलाया गया, मुझे नहीं|
में काटी| गेट की तरफ नजरें गड़ाए-गड़ाए|
प्रतीक्षा में|
पौ फटने पर आया, “भैया जी, साहब आपको उधर अस्पताल में बुला रहे हैं…..”
जीप पर सवार हो लिया|
मैंने पूछा| घर में सभी जन कजली को दीदी ही कहा करते|
पुराना रोग है| इस बार उन्हें लेकर जाएगा…..”
मुझे रोते हुए मिले|
दोनों जान लिये थे|
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किट्टी पार्टी
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