दहेज़ नहीं बेटी को दीजिये सम्पत्ति में हक

                   

दहेज़ नहीं  बेटी को दीजिये  सम्पत्ति में हक



हमारी तरफ एक कहावत है , “ विदा करके माता उऋण हुई,
सासुरे की मुसीबत क्या जाने” अक्सर माता –पिता को ये लगता है कि हमने लड़के को
सम्पत्ति दी और लड़की को दहेज़ न्याय बराबर , पर क्या ये सही न्याय है ?



 दूसरी कहावत
है भगवान् बिटिया ना दे, दे तो भागशाली दे |” यहाँ भाग्यशाली का अर्थ है , भरी
पूरी ससुराल और प्यार करने वाला पति | निश्चित तौर पर ये सुखद है , हम हर बच्ची के
लिए यही कामना करते आये हैं करते रहेंगे , पर क्या सिर्फ कामना करने से सब को ऐसा
घर मिल जाता है ? 




 विवाह क्या बेटी के प्रति माता पिता की जिम्मेदारी का अंत हो जाता है | क्या ससुराल में कुटटी -पिटती बेटियों को हर बार ,अब वो घर ही तुम्हारा है की घुट्टी उनके संघर्ष को कम कर देती है ? क्या विवाह के बाद बेटी के लिए मायके से मदद के सब दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाने चाहिए ? 


दहेज़ नहीं  बेटी को दीजिये  सम्पत्ति में हक 



आंकड़े कहते हैं  घरेलु महिलाओं
द्वारा की गयी आत्महत्या , किसानों द्वारा की गयी आत्महत्या के मामलों से चार गुना
ज्यादा हैं | फिर भी ये कभी चर्चा का विषय नहीं बनती न ही नियम-कानून  बनाने वाले कभी इस पर खास तवज्जो देते हैं |
उनमें से ज्यादातर 15 -39 साल की महिलाएं हैं , जिनमें विवाहित महिलाओं की संख्या 71% है | ये सवाल हम सब को पूछना होगा कि ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि महिलाएं
मायका होते हुए भी इतनी असहाय क्यों हो जाती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में
मृत्यु को गले लगाना ( या घुट –घुट कर जीना ) बेहतर समझती हैं ?





बेटियों को दें शिक्षा  


 मेरे ख्याल से बेटियों को कई स्तरों पर मजबूत
करना होगा | पहला उनको शिक्षित करें , ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें | इस लेख को पढने वाले तुरंत कह सकते हैं अरे अब तो हर लड़की को पढ़ाया जाता है | लेकिन ऐसा कहने वाले दिल्ली , मुंबई , कानपुर , कलकत्ता आदि बड़े शहरों के लोग होंगे | MHRD की रिपोर्ट के मुताबिक़ हमारे देश में केवल ३३ % लडकियां ही 12th का मुँह देख पाती हैं | दिल्ली जैसे शहर में किसी पब्लिक स्कूल में देखे तो ग्यारहवीं में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना नें एक तिहाई ही रह जाती है | गाँवों की सच्चाई तो ये हैं कि 100 में से एक लड़की ही बारहवीं का मुँह देख पाती है | इसकी वजह है कि माता -पिता सोचते हैं कि लड़कियों को पहले पढ़ने में खर्च करो फिर दहेज़ में खर्च करो इससे अच्छा है जल्दी शादी कर के ससुराल भेज दो , आखिर करनी तो शादी ही है , कौन सी नौकरी करानी है ? अगर नौकरी करेगी भी तो कौन सा पैसा हमें मिलेगा ? ये दोनों ही सोच बहुत खतरनाक हैं क्योंकि अगर बेटी की ससुराल व् पति इस लायक नहीं हुआ कि उनसे निभाया जा सके तो वो उसे छोड़कर अकेले रहने का फैसला भी नहीं ले पाएंगी | एक अशिक्षित लड़की अपना और बच्चों का खर्च नहीं उठा पाएगी, मजबूरन या तो उस घुटन भरे माहौल में सिसक -सिसक कर रहेगी या इस दुनिया के पार चले जाने का निर्णय लेगी | 



बेटी में विकसित करें आत्मसम्मान की भावना 



 घर में भाई –बहनों में भेद न हो , क्योंकि ये छोटे –बड़े भेद एक बच्ची के मन में
शुरू से ही ये भावना भरने लगते हैं कि वो कमतर है | कितने घर है जहाँ आज भी बेटे को प्राइवेट व् बेटी को सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया जाता है , बेटे को दूध बादाम दिया जाता है , बेटियों को नहीं | कई जगह मैंने ये हास्यास्पद तर्क सुना कि इससे बेटियाँ जल्दी बड़ी हो जाती हैं , क्या बेटे जल्दी बड़े नहीं हो जाते ? कई बार आम मध्यम वर्गीय घरों में बेटे की इच्छाएं पूरी करने के लिए बेटियों की आवश्यकताएं मार दी जाती हैं | धीरे -धीरे बच्ची के मन में ये भाव आने लगता है कि वो कुछ कम है |  जिसके अंदर कमतर का भाव आ गया
उसको दबाना आसान है ,मायके में शुरू हुआ ये सिलसिला ससुराल में गंभीर शोषण का रूप ले लेता है तो भी लड़की सहती रहती है क्योंकि उसे लगता है वो तो सहने के लिए ही जन्मी है |  पूरे समाज को तो हम नहीं  बदल सकते पर कम से कम अपने घर में तो ऐसा कर
सकते हैं |



बेटी को दें सम्पत्ति में हिस्सा 







 जहाँ तक सम्पत्ति की बात है तो मेरे विचार से को सम्पत्ति में हिस्सा
मिलना चाहिए , उसके लिए ये भी जरूरी है कि दहेज़ ना दिया जाए | ऐसा मैं उन शिक्षित
लड़कियों को भी ध्यान में रख कर कह रही हूँ जो कल को अपने व् बच्चों के
जीविकोपार्जन कर सकती हैं | कारण ये है कि जब कोई लड़की लम्बे समय तक शोषण का शिकार
 रही होती है , तो पति का घर छोड़ देने के
बाद भी उस भय  से निकलने में उसे समय लगता
है , हिम्मत इतनी टूटी हुई होती है कि उसे लगता है वो नहीं कर पाएगी … इसी डर के
कारण वो अत्याचार सहती रहती है | 



जहाँ तक दहेज़ की बात है तो अक्सर माता –पिता को
ये लगता है कि हमने लड़के को सम्पत्ति दी और लड़की को दहेज़ न्याय बराबर , पर क्या ये
सही न्याय है ? जब कोई लड़की अधिकांशत : घरों में जो दहेज़ लड़की को दिया जाता है उसमें
उसे कुछ मिलता नहीं है | माता –पिता जो दहेज़ देते हैं उसमें 60: 40 का अनुपात होता
है यानि तय रकम में से 60% रकम ( सामान , साड़ी , कपड़ा , जेवर केरूप में ) लड़की के
ससुराल जायेगी और 40 % विवाह समारोह में खर्च होगी | सवाल ये है कि जो पैसे विवाह
समारोह में खर्च हुए उनमें लड़की को क्या मिला ? यही पैसे जब माता –पिता अपने लड़के
की शादी के रिसेप्शन में खर्च करते  हैं तो
उसे लड़के को दी हुई रकम नहीं मानते हैं | 



कुछ जो अपने को उदार समझते हैं वो लिए
जाने वाले दहेज़ में से कुछ  कम ले कर अपने
रिशेप्शन का भार  लड़की वालों पर डाल देते
हैं | खैर जो भी सामान लड़की ले कर आई है वो ससुराल का हो जाता है | जेवर और
कपड़े  ही लड़की के हिस्से में आते हैं उनमें
भी जेवर अगर आ सके तो , मैंने ऐसे कई विवाह देखे हैं जहाँ विवाह टूटने की स्थिति
में कोर्ट द्वारा सामान लौटाए जाने का निर्णय देने पर भी ससुराल वाले सारा सामान
तोड़ कर देते हैं जो किसी भी तरह से इस्तेमाल में नहीं आता | 



वैसे भी दहेज़ एक बार दिया
जाता है , वो भी उस समय जब ससुराल में लड़की बिलकुल नयी व् अकेली होती है , वो उस
पैसे में से कुछ भी निवेश नहीं कर पाती , लेकिन अगर उसके पास सम्पत्ति में हिस्सा
है तो बेवजह पिटने , शारीरिक मानसिक अत्याचार की स्थिति में एक कड़क फैसला  लेने की हिम्मत कर  सकती है | 



बहुत से लोग ये तर्क रख सकते हैं कि बेटियों को तो पहले से ही कानूनन ये हक मिला है | जी हाँ , जरूर मिला है पर उसका प्रयोग कितनी लडकियां कर पाती हैं | कई ऐसी लड़कियों की आपबीती सुन चुकी हूँ , जिनके माता -पिता के पास ज्यादा पैसा है वो शादी से पहले ही लड़की से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं कि , ” मैं सम्पत्ति पर अपना हक छोड़ रही हूँ | ” वैसे भी ज्यादातर माता -पिता आज भी दहेज़ ही देते हैं | जब ससुराल में बेटी की स्थिति ख़राब होती है तो वो मायके से संबंध बिलकुल भी नहीं बिगाड़ना चाहती क्योंकि नए सिरे से खड़े होने के लिए उसे भावनात्मक संबल की भी जरूरत होती है | ऐसे में कानूनी अधिकार काम नहीं आते |इसके लिए सामजिक पहल की जरूरत है , शुरुआत अपनी ही बेटी से करनी होती है | 


ये हमारी बेटियाँ है , अगर हम चाहते हैं कि वो हमेशा खुश रहे तो पुरानी परम्पराओं को तोड़ कर नए सामाजिक सुधार हमें ही करने होंगे | 


वंदना बाजपेयी 


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