पड़ोसी


कहानी -पड़ोसी





घर वालों से दूर , परिवार वालों से दूर जब हम किसी अजनबी शहर में अपना घोंसला बनाते हैं तो हमारी सुख में दुःख में जो व्यक्ति सबसे पहले काम आते हैं वो होते हैं पड़ोसी ….एक अजनबी शहर में एक नया परिवार बनने लगता  है , पड़ोस में शर्मा जी , अजहर चाचा , रोजी ताई आदि आदि … ये वो लोग होते हैं जो रक्त से हमारे ना होते हुए भी हमारे हो जाते हैं …पर क्या यूँ ही मात्र कहीं रहने से सारा पड़ोस हमारा हो जाता है या एक रिश्ता बनाना और सींचना भी पड़ता है ….

कहानी -पड़ोस 









ज्योहि फोन की घंटी बजी,मैने लपक कर फोन उठा लिया,शायद इसी Call का
इन्तजार था।सामने से
समधिन
जी का फोन था!जैसे ही उन्होने बताया
,बेटी
हुई है
,हमारे घर लक्ष्मी आयी है,पोती के रूप मे! सुनकर मन मयूर प्रसन्नता से झूम उठा।



रात से ही बिटिया
ऐडमिट थी डिलीवरी वास्ते। बडी चिन्ता हो रही थी उसकी
,किसी काम मे मन नही लग रहा था।बार-बार ईश्वर के आगे
हाथ-जोड विनती कर रही थी
,जच्चा-बच्चा
सुरक्षित हो बस।ऐसे कठिन समय मे कुछ भी हो सकता था
,क्योकि
समय पूरा हो चुका था
,डाक्टर
की दी डयू डेट
निकल
रही थी।बच्चे की जान को खतरा हो सकता था इसी डर के चलते
सासु मां ने समय पर ऐडमिट करवा दिया था। डाक्टर ने समय कि नाजुकता को देखते हुऐ आपरेशन से
डिलीवरी करा दी थी।अब बेटी की कुशलता जानकर मन शान्त हो गया था।





कैसी होगी,मेरी
बिटिया की बिटिया
,कुछ
सोच मन अतीत के पन्नै खोलने लगा था
,मेरी
ये बिटिया भी बडे मेजर आपरेशन से ही हुई थी।पर
,मेरी
बेटी पैदा होने
से
पूर्वमेरा पहला बच्चा नार्मल घर पर हुआ था।मेरा
पूरा प्रयास था कि मेरा दूसरा बेबी भी नार्मल डिलीवरी
से हो
,पर ऐसा हो ना सका। ये तीस साल पहले की बात है,मै अपने पति संग बेटे सहित कम्पनी के दिये मकान मे
यानि कैम्पस मे रहती थी
,पर
डिलीवरी से पहले जांच हेतु मशहूर डाक्टर उषा गुप्ता के पास नियमित रूप से जाती
थी।सब कुछ नार्मल था।मै निशिन्त थी।
 





एक बार
डाक्टर ने मुझसे पूछा
उषा
:-यहां कौन रहता तुम्हारे संग
?

मै:-जी,यहां तो मै अपने पति व बेटे संग रहती हूं। 
उषा:-मेरा मतलब,डिलीवरी
के समय
,तुम्हारे ससुराल वाले,या कोई
और रिश्तेदार…..
 

मै
:-जी
,यहां तो कोई नही रहता,सब
बहुत दूर-दूर है।

उषा:-फिर
तुम मेरे नर्सिंग होम के जनरल वार्ड मे तो नही रह पाओगी
,! 

मै :-जी
उषा
:-तुम्हे अलग से कमरा लेना पडेगा
,क्योकि
तुम्हारे पति जनरल वार्ड मे नही जा सकते
,वहां
पुरूष ऐलाऊड नही है।तुम अकेली कैसे रहोगी।

मै
:-पर उसका तो खर्चा बहुत होगा वो मै नही दे पाऊगी।
 

उषा :-कोई बात नही,कुछ तो
करना पडेगा.
,तुम्हे
मै एक अलग छोटा कमरा दे दूगी
,वो
मंहगा नही पढेगा।



पढ़िए -मेरी दुल्हन 


समय
पंख लगाकर उडता रहा
,और मै
लेबर पेन ले रही थी।पर ये क्या……दर्द लेते -लेते मेरा प्लस्न्टा भी कट-कट कर
यूरिन मे आने लगा।
मेरी
ऐसी हालत देख डाक्टर उषा भी घबरा गयी!उन्होने तुरन्त अपने सर्जन पति मिस्टर गुप्ता
को आवाज दी और स्टाफ को ओ०टी (आपरेशन थियेटर) तैयार करने का निर्देश दिया। रात के
तीन बज रहे थे।तुरन्त ऐनीथिसया के डाक्टर को फोन किया!मुझे डाक्टर ने दो टूक शब्दो
मे बता दिया
, “तुम्हारा
मेजर आपरेशन करना पढेगा
,”।पर
तभी मैनै दलील दी कि मेरा पहला बच्चा तो नार्मल हुआ है!तभी डाक्टर बोली-ऐसा है मै
कोई रिस्क नही ले सकती
,बलीडिगं
हो रही है मां अथवा बच्चे मे किसका खून बह रहा है कह नही सकती
,हो सकता है मै मां अथवा बच्चे मे से किसी एक को बचा
पाऊ!





मेरे पति को देहली के औखला से ब्लड लाने को रवाना कर दिया।उस समय खून केवल
देहली मे ही मिलता था।खून लेने जाने से पहले मेरे पति ने डाक्टर से कहा-डाक्टर आप
कोशिश कीजिये और दोनो को बचाईये
,मां भी
बच्चा भी !डाक्टर ने फार्म पर हस्ताक्षर करवा लिये थे।हमारे पास एक बेटा तो था
,पर उसके संग खेलने वाली एक बेटी चाहते थे।




पढ़िए -हकदारी





आनन-फानन मे
डाक्टर ने आपरेशन करके मुझे व मेरी बच्ची दोनो को
बडी होशियारी से बचा लिया था।मै व बच्ची दोनो अब खतरे से बाहर थे और हमे आई०सीयू मे शिफ्ट कर
दिया था।रात तक मेरे पति खून की बोतले लेकर लौट आये थे
,एक ओर मेरी बाजु मे ग्लूकोज लगाया गया तो दूसरी बाजु
मे खून चढाना शुरू कर दिया।





आधी रात के बाद मुझे होश आया,तभी मैने पास बैठी नर्स से पूछा,सिस्टर मुझे क्या हुआ है, बेटा या बेटी, ???नर्स ने मेरी ओर बडे प्यार से देखा,और मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुऐ पूछा,आप की क्या इच्छा थी?मैनै
कहा
,बेटी होगी,तो
मेरा परिवार पूरा हो जायेगा। ठीक  
,बेटी
ही हुई है आपको।खुश हो जाये आप।इस तरह आपरेशन हो जाने के बाद मैने एक सप्ताह
अस्पताल मे गुजारा।







जिस
कैम्पस मे रहती थी वहां रहने वालो सभी के संग मेरा बडा प्यार था।एक दूसरे के संग
दुख-सुख बांटना मुझे खूब भाता।हर त्यौहार को हम मिलकर मनाते चाहे वो हरियाली तीज
हो या दिपावली।लेन-देन भी खूब होता खाने का।मै अस्पताल मे हूं सुनकर सभी कालोनी की
औरते मेरे पास पहुंचने लगी
,बडी
भीड सी जुट गयी मेरे कमरे मे!जब भीड हुई तो शोर भी होना ही था
,लाजिमी।जब डाक्टर राऊड पर आयी तो मुझसे मुखातिब होकर
बोली-“तुम तो कह रही थी
,मेरा
यहां कोई रिश्तेदार नही रहता
,……. पर
सबसे ज्यादा भीड तो तुम्हारे कमरे मे हो रही है……
??मैनै डाक्टर को बताया-ये सब मेरे पडोसी है,जरुर,पर ये
मेरे लिये किसी परिवार से कम नही।।
 





मै
जितने दिन अस्पताल मे रही
,किसी
ना किसी के घर से मेरे पति
का व
मेरा खाना पहुंचता रहा। कोई मेरा बंधा दूध उबालकर पहुंचा रहा।कोई मेरे खाने के
बर्तन धो देता।एक सप्ताह कैसे गुजर गया पता भी नही चला था। एक परिवार से भी बढकर
था मेरा पडो़स
,जिन्होंने
दुख की घड़ी मे मेरा पूरा साथ दिया
, और आज
मेरी उसी बेटी की बेटी हुई थी
,अगर उस
दिन डाक्टर उषा मेरी बच्ची को नही बचा पाती तो ……क्या
?मै आज ये दिन देख पाती,?







अपनी
बेटी की बेटी यानि अपनी नातिन को देखने की चाह मे मै बडे उत्साह से उठ खडी हुई
,और वहां जाने से पूर्व की खरीददारी करने के लिये
तैयार होने लगी।मन मे एक उत्साह व उमंग बडी हिलोरे ले रहा था उस नन्ही सी परी को
गोद मे लेने हेतु।



रीतू गुलाटी 


                 

लेखिका





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