माँ का दमा
उन्हें आ घेरती हैं, ‘इधर कपड़े वाले कारख़ाने में एक ज़नाना नौकरी निकली है. सुबह की
शिफ़्ट में. सात से दोपहर
तीन बजे तक. पगार, तीन हज़ार रूपया. कार्तिकी मज़े से इसे पकड़ सकती है…..’
जतलाते हैं.
हैं, ‘घोंघी चौबीसों घंटे अपनी घूँ घूँ चलाए रखती है दम पर दम.’ पापा का कहना सही भी है.
तिस पर मुहल्ले भर के कपड़ों की सिलाई का काम पकड़ी हैं. परिणाम, उनकी सिलाई की मशीन
की घरघराहट और उनकी साँस की हाँफ दिन भर चला करती है. बल्कि हाँफ तो रात में भी उन
पर सवार हो लेती है और कई बार तो वह इतनी उग्र हो जाती है कि मुझे खटका होता है, अटकी
हुई उनकी साँस अब लौटने वाली नहीं.
हैं, ‘मुझे फुर्सत है?’
सत्रह वर्ष से. जब वे इधर बहू बनकर आयी रहीं. मेरे दादा की ज़िद पर. तेइस वर्षीय
मेरे ताऊ उस समय पत्नी से अधिक नौकरी पाने के इच्छुक रहे किन्तु उधर हाल ही में
हुई मेरी दादी की मृत्यु के कारण अपनी अकेली दुर्बल बुद्धि पन्द्रह वर्षीया बेटी
का कष्ट मेरे दादा की बर्दाश्त के बाहर रहा. साथ ही घर की रसोई का ठंडा चूल्हा.
हालाँकि ताई के हाथ का खाना मेरे दादा कुल जमा डेढ़ वर्ष ही खाये रहे और मेरे ताऊ
केवल चार वर्ष.
होगा?’ पापा पूछते हैं.
नहीं भेजना चाहिए’, मैं उन दोनों के पास जा पहुँचता हूँ, ‘कपड़े की ब्लीचिंग में
तरल क्लोरीन का प्रयोग होता है, जो दमे के मरीज़ के लिए घातक सिद्ध हो सकता है…..’
डपटते हैं, “तू क्या हम सबसे ज़्यादा जानता, समझता है? मालूम भी है घर में रुपए की
कितनी तंगी है? खाने वाले पाँच मुँह और कमाने वाला अकेला मैं, अकेले हाथ…..”
मैं कह देता, आपकी अध्यापिकी के साथ-साथ माँ की सिलाई भी तो घर में रूपया लाती है…..
माँ की पैरवी करता हूँ. पापा और बुआ दोनों ही, माँ से बहुत चिढ़ते हैं. ताईकी तुलना
में माँ का उनके संग व्यवहार है भी बहुत रुखा, बहुत कठोर. जबकि ताई उन पर अपना लाड़
उंडेलने को हरदम तत्पर रहा करती हैं. माँ कहती हैं, ताई की इस तत्परता के पीछे उनका
स्वार्थ है. पापा की आश्रिता बनी रहने का स्वार्थ.
दीदी’, घर के अगले कमरे में अपनी सिलाई मशीन से माँ कहती हैं, ‘मुझेकोई परेशानी
नहीं होने वाली…..’
चचेरी बहन हैं. पापा के संग उनके विवाह की करण कारक भी ताई ही रहीं. तेरह वर्ष
पूर्व. ताऊकी मृत्यु के एकदम बाद.
करता हूँ’, पापा कहते हैं, ‘नौकरी कब शुरू की जा सकती है?’ अगले ही दिन से माँ
कारखाने में काम शुरू कर देती हैं.
गयी हैं.
और शाम तीन बजे के बाद, जब हमारा सन्नाटा टूटता भी है, तो भी हम पर अपनी पकड़ बनाए
रखता है. थकान से निढाल माँ न तो अपनी सिलाई मशीन ही को गति दे पाती हैं और न ही
मेरे संग अपनी बातचीत को. उनकी हाँफ भी शिथिल पड़ रही है. उनकीसाँस अब न ही पहले
जैसी फूलती है और न ही चढ़ती है.
मेरे अंदर जड़ जमा रहा है, मेरे संत्रास में, मेरी नींद में, मेरे दु:स्वप्नमें…..
आधी छुट्टी हो जाती है…..
जिस ऊँचे बुर्ज पर लटक रहे
रिसेस की समाप्ति की घोषणा करते समय वह नीचे गिर पड़ा है. उसकी मृत्यु के विवरण देते
समय हमारे क्लास टीचर ने अपना खेद भी प्रकट किया है और अपना रोष भी, ‘पिछले दो साल
से बीमार चल रहे उस हथौड़िए को हम लोग बहुत बार रिटायरमेंट लेने की सलाह देते रहे लेकिन फिर भी वह रोज
ही स्कूल चला आता रहा, घंटा बजाने में हमें कोई परेशानी नहीं होती…..’
माँ के कारखाने का रुख करता हूँ. माँ ने भी तो कह रखा है, उधर कारखाने में काम करने
में मुझे कोई परेशानी नहीं होती…..
है. गेट पर माँ का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है वे दूसरे हॉल में मिलेंगी जहाँ
केवल स्त्रियाँ काम करती हैं. जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूँ. यह दो
भागों में बँटा है. एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाईगयी ओटी हुई कपास मशीनों पर चढ़ कर
तेज़ी से सूत में बदल रही हैं तो दूसरे भाग में बँधे सूतके गट्ठर करघों पर
सवार होकर सूती कपड़े का रूप धारण कर रहे हैं. यहाँ सभी कारीगर पुरुष हैं.
करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है. भाप की
मेरी नाक और आँखें बहने लगती हैं. थोड़ा प्रकृतिस्थ होने पर देखता हूँ भाप एक चौकोर
हौज़ से मेरी ओर लपक रही है. हौज़ में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियाँ नीचे भेजी जा रही हैं.
स्त्रियाँ हैं. उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं. ऑपरेशन करते
समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे.
हूँ.
होता हूँ.
स्त्रियाँ जमा हैं : कपड़े की गठरियाँ खोलती हुईं, थान समेटती हुईं…..
पहचाना है, उनके चेहरे से नहीं.
नितान्त अजनबी है : निरंकुश और दबंग.
माँसपेशियाँ ऊँची तान में हैं…..
है…..
नाच रही है मानो उनमें बिजलियाँ दौड़ रही हों…..
हूँ…..
रौबदार एक महिला आवाज़ माँ को टोकती है…..
हैं? उनके पास इतनी हँसी कहाँ से आयी? या उन्हीं के अन्दर रही यह हँसी? जिसे उधर
घर में दबाए रखने कीमजबूरी ही हाँफ का रूप ग्रहण कर लेती है?
आदेश दे रही है, ‘अपने हाथ जल्दी-जल्दी चलाओ. ध्यान से. कायदे से. कपड़े में तनिक
भी सूत नहीं रहना चाहिए. ब्लीचिंग के लिए आज यह सारा माल उधर जाना है…..’
उन्मत्त वाक्यांश मुझ तक चला आता है.
यह वाक्य रचना माँ दिन में कई बार दोहराती हैं: पापा की हर लानत पर, बुआ की हर
शिकायत पर, ताई की हर हिदायत पर…..
साथिन माँ से पूछती हैं, ‘इस तानाशाह का?’
हैं, ‘लेकिन इस कार्तिकी की जेठानी का भला न करे, जिसने देवर के पीछे पति को स्वर्ग
भेज कर इसके लिए नरक खड़ा कर दिया…..’
औंधा दिया है,’ माँ कहती हैं, ‘वह नरक अब मेरा नहीं है. उसका है. मेरा यह कारखाना है,
मेरा स्वर्ग…..’
उलझा है, अनजानी एक हिचकिचाहट मुझ पर घेरा डाल रही है…..
दूरी पर हूँ…..
बढ़ने के बजाए विपरीत दिशा में उठ लिए हैं…..
दीपक शर्मा
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