मेंढकी
मालकिन की रिहाइश से लौटी तो सिर पर एक पोटली लिए थी,
कपास माँग लायी हूँ…”
कपास की खेती जमकर होती थी और मालिक के पास भी कपास का एक खेत था जिसकी फसल शहर के
कारखानों में पहुँचाने से पहले हवेली के गोदाम ही में जमा की जाती थी।
करेंगे?” हाथ के गीले गोबर की बट्टी को अम्मा ने दीवार से दे मारा।
रोकड़?” मैं ताव खा गया। मालिक के कुत्ते की सेवा टहल के बदले में जो पैसा मुझे हाथ
में मिलता था, वह घर का खरचा चलाने के लिए नाकाफ़ी रहा करता।
ज्यादा सोच-भाल नहीं सकती”,
गुस्से में अम्मा निम्मो को मेंढकी का नाम दिया करती। तभी से जब छह महीने पहले वह
इस घर में उसे लिवा लायी थीं। निम्मो की आँखें उन्हें मेंढकी सरीखी गोल-गोल लगतीं,
‘कैसे बाहर की ओर निकली रहती है!’ और निम्मो की जीभ उन्हें
लंबी लगती, ‘ये मुँह के अंदर कम और मुँह से बाहर ज़्यादा दिखाई दिया करती है…’
बोल रही हो”-निम्मो हँसी-जब भी वह अम्मा से असहमत हो, हँसती ज़रूर “मेंढकी की
बुद्धि छोटी नहीं होती। बहुत तेज होती है। जिसे वह अपने अंदर छिपाये रहती है।
जगजाहिर तभी करती है जब उसकी जुगत सफल हो जाए और जुगती वह बेजोड़ है। चाहे तो पानी
में रह ले और चाहे तो खुश्की पर। चाहे तो पानी में रह ले और चाहे तो कूद कर पेड़ पर
जा चढ़े। और यह भी बता दूँ, मेंढकी जब कूदने पर आती है तो कोई अंदाजा नहीं लगा सकता
वह कितना ऊँचा कूद लेगी…”
की पीठ पर मैंने लात जा जमायी टनाटन- “कूद कर दिखाना चाहती है तो कूद… कूद… अब
कूद…”
साथ मेरे कई कसैले अनुभव जुड़े थे। अपने पिता के हाल-बेहाल के लिए मैं मेंढक को भी
उतना ही जिम्मेदार मानता था जितना मालिक को जिसके पगला रहे बीमार कुत्ते ने मेरे
पिता की टाँग नोच खायी थी और जब डाक्टर ने इलाज, दवा, टीके मँगवाने चाहे थे तो
मालिक ने मुँह फेर लिया था। ऐसे में बेइलाज चल रहे मेरे पिता का दर्द बेकाबू हो
जाता तो वह मेंढकों की खाल के जहरीले रिसाव का सहारा ले लिया करते। उस रिसाव को
अपने घाव पर लगाते-लगाते चाट भी बैठते। कभी कभी तो मेंढक की खाल को सुखा कर धुँधाते
भी। अपने नशे की खातिर। ताल से मेंढक पकड़ने का काम मेरा रहा करता, उनकी इकलौती
संतान होने के नाते।
निम्मो के सर से उतरा नहीं। अगले दिन, बेशक मजदूरी ही लायी, कपास नहीं। हाँ, अपने
कंधों पर एक चरखा जरूर लादे रही, “मालकिन का है। उसे लोभ दे कर लायी हूँ, पहली दरी
उसी के लिए बिनुंगी…”
त्योरी चढ़ आयी। “अब तुझे दरियाँ ही दरियाँ बनानी हैं? घर का काम-काज मेरे मत्थे
मढ़ना है?”
पहले जैसी ही करती रहूँगी। दरियाँ मैं अपनी नींद के टाइम बिनुंगी…”
पाते ही वह अपनी पोटली वाली रुई से जा उलझी उसे धुनकने और निबेड़ने ताकि उसे चरखे पर
लगाया जा सके।
चलता रहा और सुबह हम माँ-बेटे को रुई की जगह सूत के वह दो गोले नज़र आए जिनके अलग
अलग सूत को वह एक साथ गूँथ रही थी एक मोटी डोरी के रूप में।
और भी नये नज़ारे लाया।
लच्छों को सरकंडों के सहारे हल्दी या फिर मेंहदी या फिर नील के घोल में डुबोती हुई
मिली तो कभी उन रंगे हुए लच्छों के सूख जाने पर उनकी डोरी बँटती हुई।
उस दिन सामने आया जब हमने एक सुबह लगभग चार फुटी दो बाँसों के सहारे नील-रंगी सूत
को लंबाई में बिछा पाया। जमीन से लगभग ६ इंच की ऊँचाई पर। अपने आधे हिस्से में
हल्दी रंगी चोंच और पैर वाली मेंहदी रंगी चिड़ियाँ लिए जिन्हें निम्मो लंबे बिछे
अपने ताने पर इन दो धागों को आड़े तिरछे रख कर पार उतार रही थी।
है क्या?” अम्मा मुझसे भी ज़्यादा हैरान हो आयी थी।
आज पूरी कर ले जानी है मालकिन को दिखाने के वास्ते कि उधार ली गयी उसकी कपास मेरे
हाथों क्या रूप रंग पाती है। जभी तो उससे और कपास ला पाऊँगी…”
होगी? किधर जाएगी?” मैंने पूछा।
मेहनत का फल लायेगी…” निम्मो ने अपनी गरदन तान ली। उसके सर में एक अजानी मजबूती
थी, एक अजाना जोश। ऐसी मजबूती और ऐसा जोश उसने हमारे नजदीकी के पलों में भी कभी
नहीं दिखाया था।
गया। एक अजीब खलबली मेरे अंदर आन बैठी थी।
ही खींच लाएगी। मेरे बप्पा के हाथ की इस माप की दरी का दाम तो सौ से ऊपर जा
पहुँचता…”
रूपया?” अम्मा की उँगली उसके दाँतों तले जा पहुँची।
जुलाहे बाप से कभी मिले नहीं थे।हमारी शादी से पाँच साल पहले ही वह निमोनिया का
निवाला बन चुका था अपने पीछे सात बेटियाँ छोड़ कर जिनमें निम्मो तीसरे नंबर पर थी
और उस तारीख में कुल जमा चौदह साल की।
दोनों देखेंगे। मुझे भी मिलेगा। जरूर मिलेगा। मालूम है? जहान छोड़ते समय हम बहनों
में से बप्पा मेरा ही हाथ पकड़े थे। मुझे ही बोले थे- अपनी कारीगरी तेरे पास छोड़ जा
रहा हूँ… इसे बनाए रखना…”
दूसरे का मुँह ताकने लगे।
जादू था, जादू”, निम्मो का सुर चढ़ आया- “किसी भी रंग के ताने पर अलग-अलग रंगों का
बाना वह ऐसा बिठलाते कि सूत के अंदर से फूल खिलखिलाते, पेड़ लहराते, मोर नाचते, बाघ
दहाड़ते…”
तब मानें जब वह रोकड़ लाए”, मैंने भी सुर चढ़ाकर निम्मो को ललकारा- “ऐसे फ़ोकट में
कपास जोड़कर चिड़ियाँ उड़ाने और हाथ फोड़ने से क्या लाभ?”
लाएगी। बस इस दरी के पूरी होने की देर भर है…” निम्मो अपने धागों में लौट गयी।
की रिहाइश से लौटते ही उसने हम माँ-बेटे को पास बुलाकर अपनी धोती के पल्लू में
बंधे रुपए गिन डाले- “पूरे सौ हैं। मालकिन मेरे काम पर इतनी रीझी कि मुझ से तीन
दरियाँ और बनवाना चाहती हैं…”
संभाले और बोलीं- “मगर तू सौ पकड़ कर कैसे चली आयी? मोल तो पूरा माँगती। कारोबार
में लिहाज कैसा?”
जी, एडवांस”, निम्मो हँस पड़ी, “अभी और वसूलना बाकी है। बता आयी हूँ, अब की एक दरी
अस्सी रुपये की पड़ेगी…”
इसी में लगी रहा करोगी?” मुझे अपनी फ़िक्र सताने लगी। जिस बीच उसने अपनी वह पहली
दरी तैयार की थी, उसने मेरी तरफ से अपना ध्यान पूरी तरह से मोड़ रखा था।
लाभ हमीं को तो पहुँचना है। जितना रूपया बनाएगी, हमारे लिए ही तो बनाएगी”- निम्मो
के हर दूसरे मामले में मुझ जैसी सोच रखने वाली अम्मा उसकी बुनाई वाले मामले में
मुझ से अलग सोचती थी।
अपने कुत्ते-घर की जाली बदलने का काम मुझे सौंप रखा था।
पिछवाड़े बनी हमारी कोठरी वाले दालान के एक कोने में बना था और कुत्ते को उसमें तभी
बंद किया जाता था जब मालिक ने अपने खास मेहमानों को उससे दूर रखना होता था। कुत्ता
था भी भेड़िया-नुमा जर्मन शैफर्ड। पुराने उस कुत्ते ही की नस्ल का जिसकी मौत मेरे
पिता की मौत के आगे-पीछे ही हुई थी, पिछले साल।
छत लोहे की थी और दीवारें दमदार लकड़ी की छितरी हुई पट्टियों की। उन पर उस समय मैं
नयी जाली ठोक रहा था।
में मुझ से कुछ दूरी पर अपनी बुनाई पर लगी थी। पूरी तरह से उसमें निमग्न।
कील छूट कर निम्मो की बुनी जा रही दरी पर जा गिरी।
को सीधी बनाए रखने में लगा है। दरी वाली वह कील उठा कर मेरे पास ले आओ” –मैंने
निम्मो को आवाज़ दी।
अपने फंदों में फँसे पड़े हैं। मेरी यह तीसरी दरी बस पूरी ही होने जा रही है” –निम्मो
ने पट से मुझे जवाब दे डाला।
चाहिए कील चाहिए” –उसकी बेध्यानी मुझसे सही नहीं गयी।
एक कील है क्या? मैंने बताया तो है मुझे यह दरी आज ही पूरी करनी है। मालकिन कहती
हैं इसे पूरा करने पर ही वह मुझे मेरा बकाया पकड़ाएगी…”
छोड़ कर मैं उसकी दिशा में दौड़ आया –“तू और तेरी बुनाई। इसे छोड़ती है या मैं इसे
छुड़ाऊँ।”
उलझाना –दोनों हाथ के अपने सूत समेत वह बुनी जा चुकी दो तिहाई अपनी उस दरी पर जा
बिछी, ‘वरना यह दरी पूरी न हो पाएगी…”
करूँगा”, मैं उसके हाथों पर झपट लिया।“छोड़ दो मुझे! छोड़,
दो वरना मैं ताल में जा कुदूँगी…”
छोडूँगा” –आपे से बाहर हो रहे मेरे हाथ चार-फुटी उस बाँस को लिपटे हुए धागों से
बाहर खींच लाए।
चिल्लायी, “अम्मा जी, हमारी दरी गयी। हमारी दरी गयी…”
कोठरी के अंदर सब देख-सुन रही अम्मा हमारी ओर बढ़ आयी। हम पति-पत्नी के झगड़ों के
समय वैसे वह अपने कान-आँख बंद ही रखा करती थीं।
बीच में मत पड़ना। वरना मुझसे कोई बड़ा कांड हो जाएगा…” मैंने अम्मा को चेताया।
जाएगी”-मैंने चार-फुटी वह बाँस दूर जा फेंका- “और आज से मेरे घर में बुनाई एकदम
बंद…”
ताल में जा कुदूँगी”-निम्मो दरी से उठ खड़ी हुई।
कूद जा” –चिनग रही मेरी चिनगारियाँ बाहर छूट आयीं।
ताव, मालिक के गेट की ओर निकल पड़ी।
चिल्लायी, ‘रोक उसे। मेंढकी तो वह है ही, सच में जा कूदेगी…’
कूदना है” –निम्मो के सूत वाले गोले मैंने जमीन पर पटक मारे।
ले डूबी। उसकी मौत को एक हादसे का नाम दिलाने में मालिक ने मेरी पूरी मदद की और
मैं पुलिस की पूछताछ से साफ बच निकलने में कामयाब रहा।
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