जैसे होने की उत्त्पत्ति ना होने से होती है , जीवन की मृत्यु से और प्रकाश की अन्धकार से …वैसे ही कई बार विलपत स्मृतियाँ उस समय के अँधेरे में और स्पष्ट होकर दिखाई देने लगतीं है जब परिस्थितियाँ हमें दुनियावी चीजों से ध्यान हटा अंतरतम में झाँकने को विवश कर देती हैं | ये कहानी ऐसी ही विस्मृत स्मृतियों की है जो कई साल बाद मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद चेतन मन के अंधकार में अवचेतन मन की गहराई से ना केवल प्रकट हुई बल्कि स्पष्ट भी हुईं | एक बार बचपन की स्मृतियों में अपने अंधे -माता -पिता को याद करते हुए अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिले | अवचेतन द्वारा उत्तर दिया जाना शोध का विषय हो सकता है पर खानी का विषय स्त्री शोषण की वो दास्ताँ है जिसे उस समय वो बच्चा भी नहीं समझ पाया था |
कुँजी
मेरे ऑपरेशन के दौरान जब मेरी आँखें अंधकार की निःशेषता में गईं तो उसकी कौंध मेरे
समीप चली आई…..
रही हैं, अपने स्वभाव के विरुद्ध…..
बाबा हॉल की पट्टीदार खिड़की की पट्टी हाथ में पकड़े हैं
और माँ को नीचे फेंक रहे हैं…..
गई मुझे?
माँ की मृत्यु ने अपनी धुँध का पसारा खिसका दिया था क्या?
ने ऑपरेशन की प्रक्रिया से प्रेरित मेरी आँख की पीड़ा कोपीछे धकेलने की ख़ातिर मुझे
इस मानसिक दहल की स्थिति में ला पहुँचाया था?
बैठाता है : माँ की मृत्यु हुई, 28 फरवरी, 1956 की रात और मेरा ऑपरेशन हुआ 28
फरवरी, 2019 की शाम…..
लौटता हूँ…..
“वह कुँजी मुझे चाहिए ही चाहिए…..”
“वह कुँजी मेरे पास रहेगी. मेरे बाबूजी की अलमारी की है. मेरी संपत्ति है…..”
नाना संगीतज्ञ थे. नामी और सफ़ल संगीतज्ञ. रेडियो पर प्रोग्राम देते, संगीत-गोष्ठियों
में भाग लेते. विशिष्ट राष्ट्रीय कार्यक्रमों में बुलाए जाते.
1942 में, उन्होंने अपनी पुश्तैनी इमारत की ऊपरी मंजिल पर अपना विद्यालय स्थापित
किया : सुकंठी संगीत विद्यालय. बोर्ड के निचले भाग पर लिखवाया : शिष्याओं के लिए
पृथक कक्ष एवं पृथक शिक्षिका की व्यवस्था.
पढ़ाती थीं. वे नाना की इकलौती संतान थीं और ‘सुकंठी’ उन्हीं का नाम था. अपने नाम
के अनुरूप उनके कंठ में माधुर्य और अनुशासन का ऐसा जोड़ था कि जो भी सुनता, विस्मय
से भर उठता.
सत्रह वर्षीय बाबा नाना के विद्यालय में गाना सीखने आए तो नाना ने उन्हें अपने पास
धर लिया. बीस वर्षीया अपनी सुकंठी के लिए बाबा उन्हें सर्वोपयुक्त लगे थे. बाबा
अंधे थे. अनाथ थे. सदाचारी थे. तिस पर इतने विनम्र और दब्बू कि प्रतिभाशाली होने
के बावजूद अहम्मन्यता की मात्रा उनमें शून्य के बराबर थी.
थ्री’ कहा करते. ‘नेपोलियन टू’ इसलिए नहीं क्योंकि वह उपाधि वे माँ को पहले दे
चुके थे.
सफ़लता और दृढ़निश्चय का पर्याय माना जाता था और नेपोलियन की परिश्रम-क्षमता का एक
किस्सा नाना सभी को सुनाया करते :
ऊँघने लगे तो नेपोलियन ने उन्हें डांटा , ‘हमें जागते रहना चाहिए, अभीतो सिर्फ़ दो बजे हैं.
अपने वेतन के बदले में हमें पूरा-पूरा काम देना चाहिए.’
‘ईश्वर ने बोनापार्ट बनाया और फिर आराम से चला गया.’
नाना, माँ और बाबा को बराबर की रही, लेकिन बाबा रात को देर में सोते थे और सुबह
देर से उठते थे. इसकेविपरीत नाना और माँ रात में जल्दी सोने के आदी रहे और सुबह
जल्दी जग जाने के.
मुख्य बिंदु भी शायद यही रहा. आज स्वीकार किया जा रहाहै कि हममें से कुछ लोग फ़ाउल्ज(चिड़ियाँ), मॉर्निंग पीपल (प्रातः कालीन जीव)
होते हैं और कुछ आउल्ज(उल्लू), नाइट पीपल(रात्रि
जीव). किंतु बाबा को माँका जल्दी सो जाना अग्राह्य लगता. शायद इसीलिए उन्होंने
शराब पीनी शुरू की. नाना के जीवनकाल में छुपकर और बाद में खुल्लमखुल्ला.
वर्ष. मेरी प्रारंभिक स्मृतियाँ उषाकाल से जुड़ी हैं :
पानी के भरे चम्मच से…..
हुए बादाम से, जोरात में भिगोए जाते थे…..
गिने जा रहे और हस्तांतरित हो रहे रुपयों और सिक्को से…..
पत्तरों की स्लेट के बीच काग़ज़ रखते हुए माँ के हाथों से…..
पत्तरों में बने गड्ढों पर काग़ज़ दबाते हुए माँ के स्टाइलस से…..
अच्छा जानती थीं.
मैंने अपने गणित के अंक और अंग्रेजी अक्षर अपने स्कूल जाने से पहले ब्रेल के
माध्यम से सीख रखे थे. और ब्रेल मुश्किल भी नहीं. इसके कोड में तिरसठ अक्षर और
बिंदु अंकन है. प्रत्येक वर्ण छह बिन्दुओं के एक सेल में सँजोया जाता है, जिसमें
दो वर्टीकल, सीधे खानों में एक से लेकर छह ‘रेज्ड डॉट्स’ की पहचान से उसका विन्यास निश्चित किया जाता है.
मैं नाना के पास सोने लगा था…..
में…..
पर बनी चार दुकानों के ऐन ऊपर बना वह हॉल नाना ने तीन कक्षों में बाँट रखा था, दो
छोटे और एक बड़ा. हॉल में चार आदम-कद, पट्टीदार खिड़कियाँ थीं, जो सड़क की तरफ़ खुलती
थीं और हर एक खिड़की के ऐन सामने बीस फुट की दूरी पर एक-एक दरवाज़ा था जो अन्दर आँगन
में खुलता. बड़ाकक्ष दो खिड़कियाँ और दो दरवाज़े लिए था और दाएँ-बाएँ के दोनों कक्ष
एक-एक खिड़की और एक-एक दरवाज़ा. बाएँ कक्ष में नाना ने विद्यालय का दफ़्तर खोल रखा था
और दाएँ कक्ष को वे निजी, अनन्य प्रयोग में लाते थे. उसी कक्ष में उनका पलंग था.
उनके कपड़ों की घोड़ी थी, उनकी किताबों का रैक था, उनके निजी संगीत वाद्य थे और वह
अलमारी जिसमें रूपया रहता था और जिसकी कुँजी वे अपनी जेब में रखा करते थे.
उनकी थी लेकिन सब कुछ माँ के नाम था, विद्यालयक्या, मकान क्या, दुकानें क्या. और
सारा हिसाब-किताब भी माँ ही रखा करतीं. दुकानों के किराए और बकाए का; विद्यालयकीफ़ीस
और निधि का; नौकर लोग के वेतनका; बाबा के जेब-खर्च का; पंसारी, बजाज और दर्ज़ी के
बिल का; मेरे स्कूल की किताबों, बैगऔर बस के व्यय का.
आँगन पार कर माँ इधर हॉल के बीच वाले कमरे में चली आतीं. यहीं उन्होंने अपना मंदिर
बना रखा था. अपनी शिष्याओं को संगीत भी वे यहीं सिखाती थींऔर बाबा के रूठने पर इधर
सो भी जातीं. बाबा उधर आँगन पार बने अपने कमरे में रहते थे. उधर तीन कमरे थे.
बायाँ बाबा का, दायाँ रसोई घर और बीच वाला विद्यालय का, जहाँ पुरुष जन संगीत सीखते
थे. यह कमरा और हॉल के बीच वाला कमरा इस तरह एक-दूसरे के ऐन सामने पड़ते थे.
चेतावनी के आई. स्नानगृह में स्नान करने गए. वहाँ ठोकर खाई या फिसले, किसी को नहीं
मालूम. माँ को केवल उनका धड़ाम से गिरना सुनाई दियाऔर समस्या यह कि स्नानगृह की
सिटकनी अंदर से बंद थी. जब तक माँ ने बाबा और रसोइए को जगाकर स्नानगृह का दरवाज़ा
खुलवाया, नाना अपना शरीर त्यागचुके थे.
अधिकार में लेने का आग्रह बाबा ने उसी भोर से शुरू कर दिया.
डॉक्टर इधर बुलवाया है. उसकी फ़ीस देनी होगी…..”
अंधे थे लेकिन दोनों सदैव स्वतःस्फूर्त रहे- शरीरसे भी और चित्त से भी. दोनों के
हाथ-पैर पूरी तरह से उनके अधीन रहा करते. बिना कोई सहारा लिए, बिना कभी डगमगाए वे
घर-भर में स्वच्छंद घुमते फिरते, उठते-बैठते. चित्त भी दोनों का बराबर- आत्मकेंद्रित
और स्वसंगत!
चिंतातुर, शोकाकुल उस अवस्था में भी माँ अपने को सँभाले रहीं, “आप अपना देखिए…..”
माँ ने मुझसे टेलीफ़ोन की अपनी कॉपी मँगवाई और उसमें से एक नंबरखोजकर मुझे टेलीफ़ोनमिलाने
को कहा.
ने मुझसे टेलीफ़ोन पर बृजभान काका को पूछा और बोली, “उन्हें बताइए, मास्टरजी नहीं
रहे. वे तत्काल इधर चले आएँ…..”
दुकानों में बृजभान काका की दुकान उन दिनों अच्छी पनप रही थी. उनके पास मरफ़ीरेडियो
की एजेंसी थी और उनके रेडियो खूब बिकते थे.
ही माँ ने नाना की सारी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी. दाहकर्म की, फूल चुनने की,
तेरहवीं के भोज की.
बीतते ही बाबा ने माँ को फिर घेर लिया, “मुझे कुँजी दो. मुझे ठेकेदारको रूपया देना
है. नई सीढ़ियाँ बनवानी हैं. सड़क की तरफ़ से. उधर हमारे ग्राहकभटक जाते हैं…..”
कहाँ है?” माँ चिल्लाईं. चारों दुकानों के दोनों किनारे घिरे थे.
विरोध माँ और बाबा पहले भी करते रहे थे; माँ उग्र स्वर मेंऔर बाबा दबे स्वर में.
किंतुनाना की मृत्यु के बाद बाबा का विरोध कर्णभेदी स्वर में फूटने लगा था, सो वे
भी चिल्ला उठे, “बृजभान की दुकान ख़ाली करवाएँगे और उस जगह अपनी सीढ़ी बनवाएँगे…..”
दृढ़ स्वर में कहा, “कभी नहीं. वैसे भी हमारी सीढ़ियाँ अहाते में ठीक हैं. बृजभान
काका की दुकान कभी नहीं छेड़ी जाएगी…..”
हमारी सीढ़ियाँ अहाते में स्थित थीं. अहाता सड़क की दुकानों के पीछे था; महाकाय एवं
कुंडलित. हमारी सीढ़ियों के अतिरिक्त उसमें ऊपरी मंजिल के दूसरे मकानों की सीढ़ियाँ
भी रहीं. साथ ही कई बेतरतीब, बे-सिर-पैर, ठसाठस, सटे-सटे मकान.
हैं? पिछले पैरों पर खड़ीं? उन्हें तो हमें बदलना ही बदलना है. बृजभान को यहाँ से
हटाना ही हटाना है….. रस्सी-वस्सी सब दूर फेंक देनी है…..”
सीढ़ियों के दरवाज़े पर दुफंदी साँकल लगवा रखी थी जिस पर दोतरफ़ी रस्सी बँधी थी. रस्सी के दोनों सिरे ऊपर हमारे आँगन में
टँगी एक खूँटी पर टिके रहते. दरवाज़ा हमें खोलना
होता तो रस्सी का पहला सिरा अपनी तरफ़ खींचलेते, बंद करना होता तो दूसरा.
हैं. उन्हें नहीं बदला जाएगा…..” माँकी दृढ़ता दुगुनी हो ली.
है?” बाबा दुगुने वेग से चिल्लाए, “सीढ़ियाँ वे ठीक नहीं हैं. ख़तरनाक हैं. वाहियात
हैं. हमें नई सीढ़ियाँ चाहिए ही चाहिए…..”
जानते,” माँ ने बाबा को चुनौती दी, “वरना ऐसे नहीं कहते, ऐसे नहीं सोचते. कानून
जानते होते तो मालूम रहता, मकान-मालिक की मर्ज़ी के बिना मकान की एक ईंट तक हिलाई
नहीं जा सकती…..”
परिवार का मुखिया पति होता है, मकान का मालिक पति होता है…..” बाबा ने माँ की
चुनौती खारिज़ कर दी.
रखिए,” माँ के पास अपना तर्क था, “मेराकानून मुझे सँभाल लेगा…..”
मुँह के बल गिरोगी…..” बाबा के पास धमकी थी.
रहे. बाबा ख़ुलेआम शराब पीते और माँ को एलानिया आएँ-बाएँ, बुरा-भला सुनाते. कुँजी
को लेकर.
दे क्यों नहीं देतीं?” एक दिन सूर्य-नमस्कार के समय मेरा धैर्यहार खाने लगा.
की बहुत भूख़ है. कुँजी मिलते ही मुझे मार डालेंगे…..”
1956 की सुबह मुझे धूप ने जगाया था, माँ ने नहीं.
चौंका था…..
चूक गया?
अवस्था में माँ आँगन में लेटी थीं और सड़क बुहारने वालीमाँ-बेटी पास बैठी आपस में
कानाफूसी कर रही थीं.
मैंने पूछा. हमारे घर के अंदर वे पहली बार आई थीं.
लगाने आई तो बिटिया हमें वहाँ गिरी पड़ी मिलीं…..” बेटी की माँ बोली.
जाने के लिए?
मेरे शरीर में उतरने लगी.
जा लेटा.
जाने के लिए…..
वहाँ से,” दोनों माँ-बेटी अपनी जगह से मुझे दुलराईं. मुझे छूने का साहस उनमें न था. छुआछूत का अनुपालन कर रही थीं वे.
की आवाज़ आँगन में उतरी.
पास आ लेटे हैं….. वहाँसे उठ नहीं रहे…..”
ने मुझे पुकारा.
खोलीं.
इधर आओ,” बाबा के स्वर में क्रोध छलका.
बेटी बोली, “नासमझ हैं, कुछ नहीं जानते…..”
बाबाने उन्हें डाँटा, “बख्शीश के
वास्ते?”
बेटीकी माँ नेकहा, “मगर समझ तुमसे बड़ी रखती हैं. मौतकी मर्यादा बख्शीशसेऊपरहै…..”
बेटी ने कहा.
मुझसे करते न बना.
जिसके एक कोने में माँ इस अलमारी की कुँजी बाँधे रखती थीं.
दीपक शर्मा
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