रिश्तों पर अर्चना त्रिपाठी जी की कविताएँ

अगर कहानी ठहरी हुई झील है तो कविता निर्झर | कौन सा भाव मानस की प्रस्तर भूमि पर किसी झरने के मानिंद कब  प्रवाहित हो चलेगा ये कवि भी नहीं जानता और एक कविता गढ़ लेती है आकार |अर्चना त्रिपाठी जी की कविताओं में यही खास बात है कि  वो बहुत ही सरल सहज भाषा में अपने मनोभावों को व्यक्त करती हैं |आज पढिए विभिन्न रिश्तों को समेटे अर्चना त्रिपाठी जी की कविताएँ | ये कहीं टूटते हुए रिश्तों की खनक है तो कहीं अजन्मी बेटी की पुकार , कहीं प्रेम रस की फुहार तो कहीं तनहाई का आर्तनाद और तकनीकी से भी तो एक रिश्ता है है तभी तो वह कह उठती हैं “दिनों दिन तकनीकी के विकास का गुल खिल रहा….

रिश्तों पर अर्चना त्रिपाठी जी की कविताएँ

टीस

रिश्तों पर पड़ी
कड़वाहट की धूल को
वक्त की हवा
भले ही उड़ा दे
पर वह ,
उस दरार को भरने में
कभी सक्षम नहीं होगी,
जो कड़वाहटों ने बना दी ।

उस दर्द की टीस
कम नहीं होती
बरसों-बरस ।
वह टीस
कराह उठती है ,
जब कभी
किसी आयोजन में आपको
अपने रिश्ते दिखते हैं ।
अपने मुल्कों के लोग दिखते
लोगों के जरिए,रिश्तों की
याद दिलाई जाती है।
वे रिश्ते तब कहां होते
जब वही सुईयाँ चुभोते हैं
वक़्त का लंबा सफर
गुजर जाता है,वक्त नहीं लौटता

कहते हैं,वक्त
हर घावों को भर देता है
मेरा कहना है,वक्त
कुछ घावों को,
नासूर बना देता है
अतः उस घाव के अंग का,
कट जाना ही बेहतर है
रिश्तों का दिया दर्द,
वक्त नहीं कर पाता कमतर
अतः रिश्तों का टूट जाना ही है
बेहतर,बेहतर,बेहतर

 

भ्रूण

अति अति सुंदर, अति सुंदर

कृति हो तुम, इस सृष्टि की

क्योंकि………..क्योंकि

रचा है मैंने तुम्हें,

भूत हो तुम मेरा………..

वर्तमान,

वर्तमान भी तुम ही हो मेरा

अति सुंदर……….

कृति हो तुम इस सृष्टि की

क्योंकि, क्योंकि

पुनः जी रही हूँ मैं तुममें

तुममें पूरी हो रही है

मेरी अधुरी तमन्नाएँ

भविष्य…………….

मेरा भविष्य

तुम ही तो हो, वह भी मेरा

करूँगी, साकार

अपने सपनों को तुममें।

न रहकर भी

रहेगी सदा मैं, तुम्में

किंतु मेरे अपने ही

नहीं चाहते तुम्हें आने देना

इस धरती पर

नहीं चाहते, साकार होने देना

मेरे सपनों को

क्योंकि, क्योंकि तुम भ्रूण हो,

मादा भ्रूण

मेरी हसरत

तुम मेरी बेटी हो, भावी बेटी

बावजूद तमाम विरोधों के

लाउँगी मैं तुम्हें

इस पृथ्वी पर

भगीरथ के गंगा की तरह

जनूँगी, बनूँगी मैं तुम्हें

कुंती के कर्ण की तरह

जननी मैं तुम्हें, मैं तुम्हें मैं तुम्हें

अवश्य, अवश्य, अवश्य ।

 

आहें

तुम मेरी तकलीफों से
बेखबर
अपने में मशगूल,
मैं, अपने और
अपनी तन्हाई से गमगीन
ख़दश हैं रफ्ता – रफ्ता…
तुम्हारी ये बेरूखी,
हमारे रिश्ते का
इनसेदाद न कर दे…
जिंदगी सहरा न बन जाए,
जिसमें खुशियों के दरख्त हों
न अरमानों के गुल
उड़ेंगी सिर्फ दो रूहों की
जर्रा-ए-आहें
सहरा-ए-जिंदगी में

हौसला

उम्मीदों के आकाश से
कटी हुई पतंग की तरह
वास्तविकता के धरातल पर
ऐसी गिरी…….!
कि कहीं कोई ठहराव नहीं दिखता
नहीं दिखता कोई आशियां
जहां मेरा ठिकाना हो
हौसले का तिनका का बटोर
मुझे स्वयं ही
अपने उम्मीदों का घरौंदा
तैयार करना होगा
अकेले, तन्हा………!
जहां मैं अपने उद्देश्यों को
साकार कर, सजा कर
अपने उस झोपड़े में रह सकूं
पुनः तन्हा, तन्हा
और तन्हा……… ही
और जीने को प्रेरित करेगी
हौसले की किरण।

तकनीक तरक्की या त्रास्दी

दिनों दिन तकनीकी के विकास का गुल खिल रहा,
प्रेम पतझड़ के, पल्लव बन गिर रहा!
नाम, पद, पहचान नहीं नम्बरों में बंट गए।
तकनीक ने दी त्रासदी, ऐसी की अखियाँ तरस गई
बातें तो होती रहीं, मिलने को अखियाँ बरस गई
दूर थे पर पास दिलों के
अब पास होकर दूर
दिल की दूरी बढ़ती गई
थे स्नेह प्रेम मानव के मीत
दिन वो आज हैं बने अतीत
गांधी ने देखा स्वप्न था

सब स्वरोजगार हों और आत्मनिर्भर भी
भौतिक सुख भोग रहे नैतिकता नष्ट हुई
सत्य और सत्य व अहिंसा की रट लगाते
हिंसा व असत्य की पगडंडियाँ बनती गईं
इतनी बनी, इतनी बढ़ी
दर, दर दरारें, दिल की दिवार तक दड़क गई
मिसाइलें बना बना, मिसाल कायम कर रहे
मानव तो बने नहीं, मानव-बम बन गए
प्रवंचना विजय की, पर विजय हुए नहीं
यंत्रो का दुरुपयोग कर
घट घट घटती गई, मन की देख मानवता
आँखों को दिखती हैं कम, आपस की एकता
तकनीक की ये त्रासदी, ऐसी की अखियाँ तरस गईं
बातें तो होती रहीं, मिलने को अखियाँ बरस गई
सुख साधानों से मिली शान्ति, विश्व अशान्ति बढ़ती गई
महलों और कारखानों से क्षणिक सुकुन भले मिले
लघु व कुटीर उद्योग टूटते गए, दुश्मनी की देख बस्तियां बसती गई
ऐसी नहीं थी सोच गांधी की, थी कभी नहीं
पर कहते हैं जब तक है साँस
लोगों रखो विश्व शान्ति की आश और सोचे सभी
है ये क्या …… ? तकनीकी की तरक्की या त्रासदी?

सुकून

नित्य मिलना तुम्हारा
कुछ इस कदर
बदली से आतप का चमकना
मेघों को मध्य चाँदनी का छिटकना
छिटककर पुनः मेघों में सिमटना

इस लघु क्षण में तुम्हे
जी भर निहारने की चाहत

पहचानना समझना तुम्हें अपनाने
की चाहत

देता है भरपूर सुकून
खुद का
खुद से सवाल
तुम वही हो
जिसकी तलाश थी
इंतजार था

मंद मुस्काता वह
रूप तुम्हारा

पूनः देता ऐसा सुकूँ
मिट गई हो जैसे

चिर तृष्णा किसी की

सोचता हूँ-काश !
थम जाते वो क्षण

तुम्हारा वह ह्रदयस्पर्शी चितवन
मैं देखती, देखती बस देखती
पाती शाश्वत सुकून

अर्चना त्रिपाठी

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