डेढ़ सेर चाँदी

 

अंत हीन दुख, निराशा, पीड़ा अवसाद की ओर धकेलते हैं और अगर घनघोर निराशा की बीच आस की अंतिम किरण भी डूब जाए तो व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन कैसे संभाले l नईका के साथ भी यही हुआ l मैं बात कर रही हूँ अभी हाल में घोषित हुए रमाकांत स्मृति पुरुस्कार से सम्मानित आशा पांडे जी की कहानी ‘ढ़ेर सेर चाँदी’ की l

कहानी में नईका के जीवन में जब दुख एक बार दस्तक देता है, तो उजास के लिए कोई छेद नहीं छोड़ता l क्योंकि उसका दुख ईश्वर प्रदत्त नहीं है, उसका दुख अपनों द्वारा दिए जाने वाले धोखे का दुख है, तो सरकार द्वारा दिए जाने वाले धोखे का भी l मनुष्यता के पतन का दुख है l जिसकी पृष्ठभूमि में दुख और अवसाद में बौराए इंसान को पागल करार देने वाला समाज है l

आशा जी ग्रामीण जीवन और आम मानवीय  मनोभावों की बारीकियों को, सच्चाईयों को इस तरह से सहजता के साथ उकेरती हैं उनकी  कहानी अपने व्यापक संदर्भ में याद रह जाती है l

एक अच्छी कहानी और पुरस्कार के लिए आशा जी को बधाई

डेढ़ सेर चाँदी

किवाड़ उढगा था। नइका कोहनी से किवाड़ ठेल कर अँगनाई में पहुँची। अँगनाई के कोने में बंधी दोनों बकरियां उसे देख कर मिमियाने लगीं। दिन भर से अकेला पड़ा भग्गू भी उठकर खटिया पर बैठ गया। नइका का हाथ घास और बबूल की टहनियों से भरा था। मिसिर के यहाँ से आते-आते उसने रास्ते से बकरियों के लिए टहनियाँ तोड़ी थीं। बकरियाँ पिछले दो-चार दिन से खूँटे पर ही बंधी हैं बेचारी। संझा-सबेरे बाहर ले जाकर चराने का मौका नहीं मिल रहा है नइका को। अभी दो दिन और ऐसे ही चलेगा।

घास और टहनियों को बकरियों के आगे डाल कर नइका ने पंजीरी-बताशे की गठरी को पीढ़े पर रखा और बाल्टी रस्सी लेकर कुँए पर हाथ-मुँह धोने चली गई। ठंडे पानी से छीटे मार-मार कर मुँह धोया, हाथ-पैर धोए,भरी बाल्टी आँगन में लाकर रखी और आँचल से मुँह पोछते हुए ओसारे में आकर बैठ गई।

अँगनाई में ही छान उठाकर दो ओसारे निकाल लिए हैं नइका ने। दो कच्ची कोठरी और दो छनिहर ओसारे का उसका ये घर भीतर घुसते ही उसे सुकून से भर देता है। कितना भी थककर चूर हो गई हो पर अपनी  अँगनाई में आते ही उसकी आधी थकान खुद-ब-खुद चली जाती है।

सुबह जब से गई थी, तब से एक मिनट की भी फुर्सत नहीं मिली थी उसे। इतना बड़ा कार्यक्रम आने-जाने वालों की इतनी भीड़! बैठती भी तो कैसे ? मिसिर काका बहुत भरोसा कर उसे बुलाते हैं,अगर वह भी बैठ जायेगी तो काम कैसे चलेगा? खड़े-खड़े दोना भर पंजीरी-बताशा फाँक कर पानी पी लिया था उसने और लगी रही बासन माँजने में, झाड़ू लगाने में।

वहीं पुरबहिन और चमेला जांगर चुरा-चुराकर इधर से उधर भाग रहीं थीं। पाँच-छह दोना पंजीरी फाँक गईं। जो भी उधर से प्रसाद बाँटते हुए  निकलता, उसी के सामने हाथ पसार देतीं। अखंडरामायण पाठ के बैठक से पहले सत्यनारायण की कथा हुई थी। उसी का प्रसाद बंट रहा था। दिन भर लोग आते रहे। प्रसाद कम पड़ जाता तो! किसी की इज्जत की जरा-सी परवाह नहीं है इन लोगन को, अगला भरोसा किये बैठा है और ये लोग उसकी इज्जत लेने पर उतारू हुई हैं। भगवान से भी नहीं डरतीं ये लोग– नइका का मन वितृष्णा से भर गया।

साँझ धुंधलाने लगी। संझबाती की बेला में बैठकर सुस्ताने से काम नहीं चलेगा- नइका ने मन ही मन सोचा और घुटने पर हाथ रखकर उठी, चूल्हे के पास काँच की एक ढिबरी पड़ी थी। उसमें तेल आधी शीशी से भी कम था। नइका ने शीशी को उठाकर देखा- आज का काम किसी तरह से चल जायेगा। कल के लिए व्यवस्था करनी पड़ेगी। रामअजोरवा को कितनी बार कहा था कि बचवा, खम्भे से तार खींच कर एक लट्टू मेरे आँगन में भी लटका दो। मिट्टी के तेल का खर्चा तो कुछ बचता पर मुए ने नहीं सुना। नइका मन ही मन बड़बड़ाते हुए ढिबरी जलाकर अँगनाई के गौखे पर रख आई। वहाँ से दोनों ओर ओसारे में उजियारा फ़ैल गया।

भग्गू फिर ‘गों-गों’ करने लगा। नइका ‘गों-गों’ के अलग-अलग सुरों को पहचानती है। समझ गई कि उसका पति भूखा है। वह पंजीरी-बताशा,हलुवा-पूड़ी की गठरी उठा लाई। भग्गू की खटिया पर बैठकर  खोलने लगी। उस धुंधलके में भी नइका ने भग्गू की आँखों की चमक को देख लिया, मन-ही मन मुस्कराई- इसी चमक को देखने के लिए ही तो उसने वहाँ कौर-भर भी कुछ नहीं खाया था। सब उठा लाई थी। मिसिर काका ने हलुवा ज्यादा दिलवा दिया था। काकी तो देने में कुछ आना-कानी कर रहीं थीं पर काका ने डपट दिया। ‘दे दो उसे भरपूर,गुंगवा (भग्गू) के लिए ले जाएगी’। नइका धन्य हो गई थी। इसीलिए तो मिसिर काका की एक आवाज पर दौड़ी चली जाती है। गुंगवा को पूड़ी के साथ अचार अच्छा लगता है। नइका ने हिम्मत की– ‘काकी फाँक दो फाँक अचार भी दे देतीं।’ काकी ने मुस्कुराते हुए बिना उसे झिड़के तीन-चार फांक अचार लाकर पूड़ी के ऊपर रख दिया।

नइका खाने की गठरी खोल रही थी। भग्गू ने सिरहाने से आधा प्याज और नमक निकाल लिया। नइका सबेरे उसे प्याज रोटी देकर गई थी। उसी में से कुछ बचा लिया था भग्गू ने।

नइका मुस्कराई—‘रक्खो उसे,अचार लाई हूँ पूड़ी के साथ।’

भग्गू गों-गों करके हंसने लगा। भग्गू की हंसी नइका के कलेजे में धंस गई। इकलौता भग्गू माँ-बाप का बहुत दुलारा था। दोनों जून उसे थाली में दाल-भात, रोटी- तरकारी, सब चाहिए थी। जब नइका इस घर में ब्याह कर आई थी तब इस घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। डेढ़ बीघा खेत का मालिक था उसका ससुर। माँ,बाप,बेटा तीनों जुट कर खेती करते। बाहर भी मजूरी करते। घर में अनाज भरा रहता। भाजी-तरकारी तो भग्गू घर के अगवारे-पिछवारे की जमीन में ही बो देता। लौकी, तरोई , करेला आँगन की छान पर खूब लदे रहते। सास खुश होकर कहतीं, “मेरे बेटे के हाथ में बहुत बरक्कत है, ऊसर-पापड़ में भी बीज छीट देता है तो धरती सोना उगलने लगती है।”

अब यही भग्गू …!

नइका ने थाली में पूड़ी,अचार और हलुवा रख कर भग्गू के आगे सरका दिया। भग्गू खाने लगा। थोड़ी देर बाद जब मन कुछ तृप्त हुआ तब उसका ध्यान नइका की ओर गया। उसने इशारे से नइका को भी खाने के लिए कहा। नइका ने दो-चार पूड़ी, थोड़ा-सा हलुवा,दोना भर पंजीरी और बताशा भग्गू की थाली में और रख दिया। खुद बची हुई पूड़ियों को अचार से खाने लगी। दोनों के खा लेने के बाद भी कुछ पूड़ियाँ बची रह गईं। नइका ने उसे सुबह के लिए ढक कर रख दिया। दिनभर की थकान से उसका शरीर टूट रहा था। अँगनाई में रखी खटिया को बिछाकर उसने ढिबरी बुझायी और लेट गई।

चैत महीने का दूसरा पाख (पक्ष) ही शुरू हुआ है। लेकिन गर्मी ने गाँव को घेर लिया है। हवा ऐसी रूठी है कि पेड़ के पत्ते भी नहीं हिल रहे हैं। नइका ने अपने आँचल से हवा करते-करते सोचा—अब गर्मी दिन-ब-दिन बढ़ने लगी है, कल बक्से से बेना-पंखी निकाल लेगी।

पड़ोसी रामअंजोर का बेटा किसी बात पर जिद्दियाया है। पूरा घर उसे मनाने,चुप कराने में लगा है।

रामअंजोर की माँ और नइका का गौना एक-दो रोज आगे-पीछे ही आया था। साल भर के भीतर ही रामअंजोर पैदा हो गया था। अगर भग्गू उस दिन बाजार न गया होता तो आज नइका का घर-आँगन भी बच्चों से गुलजार होता।

नइका के सीने में एक टीस उठी, जिसे दबाते हुए उसने करवट बदल ली।

कितने बरस बीत गए उस बात को !

एक दिन भग्गू बाजार गया था। नइका खाना बनाकर आँगन में, और सास घर के बाहर बैठी भग्गू का इंतजार कर रही थीं।  उसके ससुर खा-पीकर लेट गए थे, लेकिन कुछ-कुछ देर में आवाज लगाकर पूछ लेते कि भग्गू आया कि नहीं ? रात बीतती रही,नइका और उसकी सास ने कौर नहीं तोड़ा। बस, उदास और उनींदी आँखों से भग्गू का इंतजार करती रहीं। भग्गू कभी-कभी बाजार में चढ़ा लेता था। हो सकता है आज कुछ अधिक चढ़ा ली हो और कहीं पड़ा सो रहा हो। सास बार-बार नइका को यही कहकर दिलासा दे रही थी।

रात बीत गई। घड़ी भर दिन भी चढ़ आया। भग्गू घर नहीं लौटा। भग्गू का बाप बाजार जाकर सब जगह छान-बीन कर आया। पता चला कि शराब की दुकान पर तो भग्गू कल गया ही नहीं था। दो दिन ,दो रात बीत गए। भग्गू का कहीं पता न चला। सास-बहू छटपटाती हुईं देवी-देवताओं से मनौतियाँ मान रही थीं। ससुर गाँव-गाँव, बाजार-बाजार घूमता हुआ भग्गू को खोज रहा था।

पूरे तीन दिन बाद भग्गू बिसेसर मिसिर को जिला अस्पताल के सामने दिखा था। बौराया हुआ-सा इधर-उधर घूम रहा था। मिसिर अपनी गाड़ी में बैठाकर उसे गाँव ले आये। वह इतना डरा था कि घर आते ही अँधेरी कोठरी में जाकर दुबक गया। माँ ने उसका हाथ-मुँह धुलाया। खाना खिलाया। वह कई दिनों तक धीरे- धीरे पूछ कर बड़ी मुश्किल से इतना जान पाई कि बाजार में कुछ लोगों ने उसे जबरन अपनी जीप में बिठा लिया था। जीप सड़क पर न चलकर किसी सुनसान राह पर आगे बढ़ गई थी। रात के अँधेरे में भग्गू रास्ता नहीं समझ पा रहा था। तीन-चार घंटे इधर-उधर घुमाने के बाद किसी घर के सामने उसे उतारा गया। पूरी रात और दूसरे दिन का पूरा दिन उसे कमरे में बंद रखा गया। तीसरे दिन दोपहर में अस्पताल ले जाकर उसकी नसबंदी कराकर छोड़ दिया गया। इस बीच कई पेपर में उससे अंगूठा लगवाये गए। वे लोग कौन थे ? उसे किस जगह बंद रखे ? किस अस्पताल में ले गए थे ? इन प्रश्नों का एक भी उत्तर भग्गू के पास नहीं था। उसकी आवाज नहीं फूट रही थी। बमुश्किल एकाध शब्द बोल पा रहा था।

बस, उस दिन के बाद से भग्गू न काम पर गया, न अँधेरी कोठरी की खटिया छोड़ी। धीरे-धीरे वह पूरे गूंगे में बदल गया।

भग्गू के माँ-बाप ने सभी उपाय किये। ओझा,वैद्य, पीर,फकीर, यहाँ तक की सरकारी अस्पतालों के भी चक्कर लगाते रहे। पर न जाने कैसा डर समा गया था भग्गू के भीतर जो निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। अंत में हारकर बैठ गए सब।

कितने साल बीत गए! पहाड़ से दिन एक-एक कर बस सरक रहे हैं।

नइका करवट बदलने का सोच ही रही थी कि तभी खट्ट-सी आवाज हुई। अँधियारा पाख है। रामअंजोर के दुआरे खड़े बिजली के खम्भे पर लगे बल्ब की रोशनी का एक छोटा टुकड़ा नइका की अँगनाई में भी पसरा है। नइका ने सिर उठाकर बकरियों की ओर देखा। तीनों चुपचाप बैठी हैं। भग्गू लघुशंका के लिए उठा है। सहारे के लिए वह लाठी लेता है, उसी की आवाज थी। नइका  निश्चिन्त हो  करवट बदल लेती है। रामअंजोर का नाती अभी तक जिद्दियाया है। पूरा घर लगा है उसे मनाने में…। रामअंजोर की माई पनाति देख रही हैं ! खटिया से मचिया, मचिया से खटिया हुमकती रहती हैं। पतोह,नतोह उनके आगे-पीछे घूमती हुई सेवा टहल करती रहती हैं।…सब अपने-अपने करम !

नइका ने एक लंबी साँस ली।

कहते हैं, भाई-पट्टीदार का हिस्सा डकारना आसान नहीं होता, पचाना मुश्किल हो जाता है ; पर रामअंजोर का बाबा तो सब डकार गया ! डेढ़ बीघा खेत की मालकिन नइका इसी रामअंजोर के बाबा और बाप की करतूत से बिन खेती की हो गई है। आधा बीघा खेत उसके ससुर ने भग्गू की दवा-पानी के लिए  रामअंजोर के बाबा के पास गहन रक्खा था। बड़ा भरोसा था उसे अपने चचेरे भाई पर। भाई ने भरोसा भी तो यही दिलाया था, कहता था – ‘तू मेरा भाई है, तेरे खेत गहन रख के मैं पैसे दूँ, वह भी भग्गू की दवाई के लिए, ये बात मुझे हजम नहीं हो रही है, पर मेरे घर के लोगों और रामअंजोर की माई को तो तू जानता है। मेरी जान खा जायेंगे ये लोग| बाकी इतना भरोसा रख कि तू पैसा नहीं लौटा पायेगा तब  भी मैं तेरी जमीन लौटा दूँगा। ये बात तेरे-मेरे बीच में पक्की समझ।”

नइका के ससुर ने भाई की बात को पक्की समझ लिया। लम्बे समय तक भग्गू का इलाज करने के बाद भी जब उसकी तबियत में कुछ भी सुधार नहीं हुआ तो मजूरी से जोड़े पैसे को बचाकर गाहे-बगाहे भाई को लौटाने लगा था। कितना पैसा लौटा पाया था ये तो नइका को नहीं पता किंतु ससुर को कई बार ये कहते हुए सुना था कि अब अधिक कर्ज नहीं बचा है। साल दो साल में जमीन छुड़ा लूँगा मगर भगवान को तो कुछ और मंजूर था। भग्गू की चिंता उसे खाए जा रही थी। देखते ही देखते ससुर ने खटिया पकड़ ली।

घर की हालत ख़राब होने लगी। अकेली सास खेती नहीं करवा पा रही थी। मजबूर होकर उसके ससुर ने बचे हुए खेत को भी भाई को ही अधिया पर दे दिया। इस तरह पूरा खेत रामअंजोर के बाबा के कब्जे में चला गया।

सास,ससुर के मरने के बाद नइका के मन में कई बार आया कि अपनी खेती वह खुद करवाए। खेती से फुर्सत के दिनों में इधर-उधर मंजूरी भी कर ले। दो जन ही तो बचे हैं – कुछ खेती से, कुछ मजूरी से – बीत जाएगी जिन्दगी। अब तक रामअंजोर का बाबा भी स्वर्ग सिधार चुका था। पर रामअंजोर का बाप खेत को न सिर्फ हथियाए रहा, बल्कि साल-दो साल बाद अनाज देना भी बंद कर दिया। जब नइका ने आधे अनाज की मांग की तब उसने बैनामा-पट्टे का कागज लाकर नइका के आगे पटक दिया-“देख ले इन कागजों को, इतने दिन से तेरी भुखमरी पर रहम खा कर दे रहा था अनाज…नेकी का तो जमाना ही नहीं है… आधा अनाज मांग रही है..!”

नइका के लिए कागज पर लिखा, काला अक्षर भैंस बराबर था। अगल-बगल के लोगों ने कागज देख कर उसे बताया कि उसके ससुर ने रामअंजोर के बाप को सारी जमीन बेंच दी थी। सुनते ही नइका जड़ हो गई, काटो तो खून नहीं। कई महींने लगे, उसे संभलने में। लोगों ने उससे कहा कि पेपर की जाँच करवा ले, असली हैं या नकली। पर नइका किसके बूते जाँच करवाती। और जाँच करवाने की भी क्या जरुरत ? वह तो समझ ही रही थी कि ये सारे पेपर नकली हैं। संतोष कर लिया उसने।

सोचते हुए फिर से करवट बदल ली नइका ने पर अधिक देर लेटे नहीं रह सकी। उठकर बैठ गई खटिया पर। मन कसैला हो आया। थोड़ी देर बैठी रही फिर अँगनाई के एक कोने में ढंके गगरे से कटोरा भर पानी लिया और एक-दो घूंट पीकर बचे पानी से हाथ-मुँह धोया।  इधर-उधर देखा फिर आकर लेट गई |

मिसिर के यहाँ आज रामायण का समापन है। होम-हवन के बाद भोजन की व्यवस्था है। नइका बरतन मांज कर उठी है। मिसिर काका बाहर पानी देवार (छिड़क) रहे हैं। नइका बाल्टी लोटा उनके हाथ से लेकर पानी देवारने लगी। रामायण का सम्पुट गाया जा रहा है –‘सुफल मनोरथ होई तुम्हारे, राम-लखन सुनि भये सुखारे’

पानी छिड़कते-छिड़कते नइका के होंठ बुदबुदाने लगे-  सुफल मनोरथ होई तुम्हारे …, सीधे भगवान का आशीर्वाद मिला है मिसिर काका को। तीन साल से उनका नाती डाक्टरी में दाखिला की पढ़ाई कर रहा था लेकिन पास नहीं हो पा रहा था। काका ने अखंडरामायण का पाठ करवाया और दाखिला होने पर फिर से पाठ करवाने का मानता मान लिया। देखो तो भगवान की किरपा, उसे दाखिला मिल गया ! काकी कह  रही थीं कि बड़ी शक्ति है रामायण में। कोई भी इच्छा मन में रख कर पाठ करवा लो, शर्तिया पूरी हो जाएगी।

‘सुफल मनोरथ होई तुम्हारे …  बस,गुंगऊ बोलने लगते।

नइका का मन हुलस गया—बोलने लगें, तो क्या बोलेंगे गुंगऊ! पहले जैसे प्रेम-मनुहार की बातें या इतने दिन की घुटन!

दिन भर सोचती रही नइका कि मिसराइन काकी से पूछे कि पाठ करवाने में कितना खर्च लगता है,  पर हिम्मत नहीं जुटा पाई | अखंड पाठ है ! बड़े लोग करवा सकते हैं ये पूजा, नइका कहाँ से करवा पायेगी।

डेढ़ सेर चांदी बेचकर हो पायेगी ये पूजा! मिसराइन काकी से पूछकर अंदाज लग सकता है। … दिन भर वह इस असमंजस में रही कि पूछूं या न पूछूं। शाम को उसने निर्णय लिया कि दो-चार दिन बाद जब सारे मेहमान चले जायेंगे तब अकेले में वह काकी से पूछेगी।

डेढ़ सेर चांदी …

उसकी माँ यही बताती थीं | माँ के गहने थे…। उसकी विदाई में चौबीस लच्छे,करधनी, तथा हाथ का तोड़ा उतार कर पहना दिया था माँ ने नइका को। कुल डेढ़ सेर चाँदी में बने थे वे  गहने। चाँदी भी माँ के गौने के साल की ! एकदम खरी, कोई मिलावट नहीं | अब कहाँ मिलती है ऐसी चाँदी।

अच्छी चाँदी के इतने जेवर पहन कर जब नइका उतरी थी तो उसकी सास दंग रह गई थी। बड़े गर्व से जेठानियों,देवरानियों को सुनाते हुए बोली थी, ‘सचमुच की लक्ष्मी आई हैं मेरे घर | समधी ने इतना दिया कि मेरा घर भर गया। डेढ़-दो किलो चांदी पहन कर उतरी है मेरी बहू। यहाँ तो पाव-डेढ़ पाव चांदी में ही उतर आती हैं बहुएँ।’

नइका सास की बात याद करके मुस्कुरा उठी। तमाम मुसीबतें आईं पर सास ने उसके गहने नहीं बिकने दिये। उनके न रहने पर नइका ने भी अपने गहनों को हिफाजत से रक्खा। जब खेत छिन गये तब यही गहने पूंजी के रूप में उसके पास बचे। नइका ने कोठरी में गड्ढा खोदकर, मिट्टी की एक मेटिया में गहनों को रख कर, मेटिया गड्ढे में गाड़ दी थी। और उसके ऊपर अपना बक्सा रख दिया था।

अब अगर ये गहने काम आ जाएँ ! भग्गू की आवाज के सामने इन गहनों का क्या मोल ?

कितने बरस हो गए भग्गू की बोली सुने ! ब्याह कर आई थी तो भग्गू के होठो से फूल झरते थे। नइका की कोठरी महकती रहती थी। साल भर ही रही थी वो भीनीं महक, उसके बाद सब उजड़ गया। अब तो गूं-गां के सिवा कुछ निकलता ही नहीं भग्गू के मुँह से।

आज भी मिसिर काका के घर से परोसा मिल गया है। पूड़ी, कचौड़ी, कोहड़े की भाजी, पीसी शक्कर–भर पूर दिया है काकी ने। कल भी खाना न बनाये तो इसी से काम चल जायेगा।

भग्गू जब खा-पीकर सो गया तब नइका एक हाथ में ढिबरी, दूसरे में खुरपी लेकर कोठरी में गई। आज वह गहनों को देखकर अंदाज लगाना चाह रही थी कि अखंडरामायण के लिए ये गहने पर्याप्त होंगे या नहीं। लोहे का बक्सा उठाते ही वह दंग रह गई। वहाँ की मिट्टी भुरभुरी और खुदी हुई लग रही थी। बक्सा एक ओर रखकर वह हाथ से मिट्टी हटाने लगी मगर मेटिया न दिखी। नइका की धड़कन बढ़ गई। घबराई हुई वह दोनों हाथों से मिट्टी हटाने लगी। पूरा गड्ढा साफ हो गया किन्तु गहने नहीं मिले। वह भागी-भागी भग्गू के पास आई। भग्गू गहरी नींद में सो रहा था। नइका ने उसे झिंझोड़ कर जगाया। भग्गू चौंक कर उठ बैठा। कुछ देर लगी उसे बात को समझने में। फिर लाठी का सहारा लेकर वह नइका के पीछे-पीछे कोठरी में गया। खाली गड्ढा देख,वहीं सिर पकड़ कर बैठ गया। नइका कोठरी का एक-एक सामान टटोलने लगी। कहीं बक्से में तो नहीं रख दिया था..? या फिर झोले में ..? कहीं गौखे की डलिया में तो नहीं डाल दिया था..? या फिर यहाँ से हटा कर कहीं दूसरी जगह तो नहीं गाड़ दिया था…? नइका का दिमाग काम नहीं कर रहा है। पूरी रात दोनों ने घबराते हुए जागकर बिता दी।

दूसरे दिन अगल-बगल में खबर फैल गई कि नइका के घर से डेढ़ सेर चाँदी चोरी हो गई। रामअंजोर की माँ आँचल से मुँह ढककर हँसी—“पेट भरने का ठिकाना नहीं, डेढ़ सेर चाँदी गाड़ कर रखी थी। लगता है, पगला गई है… गुंगवा की तरह नइका भी।”

रामअंजोर की माँ की बातों में दम है। सभी मुस्की मार-मार कर मजा ले रहे हैं।

मिसिर काका सुबह से नइका का इंतजार कर रहे थे। बहुत काम फैला है उनके घर। एक-दो दिन लगेंगे सभी चीजों को सही जगह पर रखवा देने में। इंतजार करते-करते थक गए तो नइका के घर तक चले आये। रामअंजोर की माँ की बात मिसिर काका को भी सही लगी— डेढ़ सेर चाँदी वह भी नइका के घर ! कभी कोई गहना उसके शरीर पर दिखा तो नहीं! दुःख झेलते झेलते बउरा गई है।

मिसिर काका अपने घर लौट आये। रामअंजोर की माँ भग्गू की अँगनाई में बैठी हैं। बाकी सब अड़ोसी-पड़ोसी नइका को झूठी घोषित कर अपने-अपने काम-धंधे पर चले गए। भग्गू भौचक-सा कभी नइका को कभी रामअंजोर की माँ को देख रहा है। अचानक नइका उठी और भग्गू का गला पकड़ कर बोली—‘बता मुझे ,तूने किस-किस को बताया था कि घर में चाँदी रखी है?  बता जल्दी नहीं तो मैं गला दबा दूँगी। नाशपीटे…! मेरे न रहने पर ये लोग कौरा डाल देते हैं, उसी पर सब उगल दिया ? …अब गूंगा बन कर बैठा है ? …खोदकर दे आया चाँदी ? बोल जल्दी नहीं तो मार डालूँगी आज तुझे।’

रामअंजोर की माँ ने दौड़कर नइका की पकड़ से भग्गू की गरदन छुड़ाई और रोष में बोलीं—“सचमें पगला गई हो नइका,कुछ तो लाज-लिहाज रक्खो, क्या-क्या बके जा रही हो, कुछ होश है ?…हम चुपचाप सुन ले रहे हैं तो तुम बढ़ी जा रही हो ?”

“चुपचाप नहीं सुनोगी तो क्या करोगी? है ताकत बोलने की ? तुम लाज-लिहाज सिखाने आई हो मुझे? तुम ? …अरे हम दोनों का मांस भी नोचकर खा जाओगी न, तब भी तुम्हारा पेट नहीं भरेगा। …बड़ी मया दिखाने आई हो…चली जाओ यहाँ से।”

“हाँ-हाँ चली जा रही हूँ। गुंगवा की खातिर आती हूँ यहाँ। दिन-दिन भर पड़ा रहता है बिना खाए पिए, नहीं देखा जाता, रोटी देने आ जाती हूँ। तुम्हारे स्वभाव से तो कोई तुम्हारी डेहरी न डाके … नेकी का तो जमाना ही नहीं रहा।” रामअंजोर की माँ बड़बड़ाती हुई उठकर चली गईं।

नइका कुछ देर तक रामअंजोर की माँ को कोसती, गरियाती बैठी रही फिर उठकर भग्गू के सामने कल की बची हुई पूड़ी लाकर पटक दी। ‘लो , भकोसो, नहीं तो पूरे गाँव में हल्ला हो जायेगा कि मैं दिन-दिन भर तुम्हें खाना नहीं देती हूँ।”

भग्गू थाली एक ओर सरकाकर सिर नीचे किये बैठा रहा। नइका फिर से कोठरी में जाकर गहना खोजने लगी। जहाँ गहने को गाड़ कर रखी थी वहां फिर से खोद डाली। झोला,अलगनी,गौखा,सब जगह  फिर-फिर से खोज डाली। वह कभी आँगन में आती है तो कभी कोठरी में जाती है। एक पल को भी चैन नहीं मिल रहा है उसे।

जब नइका कोठरी से आँगन में आती है तो बकरियाँ उसे देख कर मिमियाने लगती हैं। रात से एक                                  ही स्थान पर बंधी, भूखी-प्यासी बकरियां नइका का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए बस मिमिया ही सकती हैं। भग्गू भी भूखा है। पूड़ी से भरी थाली उसके पास ही पड़ी है पर खाए कैसे? नइका का रोना,बड़बड़ाना, गरियाना लगातार जारी है। ऐसे में गले के नीचे कौर उतारना आसान है क्या…!

रात उतरने लगी है। नइका थककर आँगन में बैठी है। ओसारे में एक ओर कल की बची बबूल की टहनियाँ पड़ी हैं। जो लगभग सूख गई हैं। नइका ने उठकर सूखी टहनियों को बकरियों के आगे डाल दिया और नमक प्याज लाकर भग्गू की थाली में पटक दिया। दिन भर का भूखा भग्गू चाहता है कि नइका भी कुछ खा ले। पर नइका पानी पीकर वहीं बैठ गई। भग्गू भूख से छटपटा रहा था। वह पूड़ी में नमक लगाकर धीरे-धीरे खाने लगा। नइका कुछ देर तक भग्गू को खाते हुए देखती रही फिर बड़ी नरम आवाज से उसने भग्गू से पूछा– ‘सच बता,तूने मेरा गहना किसको दिया ?’

भग्गू ने गूं-गा करके सिर हिलाया कि किसी को नहीं दिया। नइका ने फिर नरमी दिखाई। ‘अच्छा ये बता, तूने रामअंजोर की माँ को बताया था कि गहना बक्से के नीचे गाड़ कर रखा है ?’ भग्गू ने सिर नीचे कर लिया।

नइका चिल्लाई—”नाशपीटे,अब मुंडी नीचे करने से क्या फायदा..? लुटवा दिया हरामी ने..।” कुछ देर शांत बैठी नइका फिर से भग्गू और रामअंजोर की माँ को गरियाने लगी…।

एक एक कर दिन बीतने लगे किंतु नइका का दुःख, क्षोभ, गुस्सा कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था। अब वह धीरे-धीरे खाने-पीने,उठने-बैठने, सोने- जागने का भी होश खो बैठी। रामअंजोर की माँ भग्गू और नइका को रोटी दे आती जिसे नइका कभी खा लेती और कभी पलट कर उनके ही मुँह पर फेक देती। पूरे गाँव में रामअंजोर की माँ की सज्जनता की चर्चा जोरों पर है—चचेरी जेठानी का इतना प्रेम !

नइका चिल्लाती—“ये इनके प्रेम का ही नतीजा है जो आज हम लोग इस हाल में पहुँच गए” पर अब नइका की सुनता कौन है! अब वह पागल करार दे दी गई है। बच्चे उसे देखते ही चिल्लाते हैं— ‘तुम्हारे घर में चोर घुसा, चोर घुसा, गहना लेकर भाग गया’ …नइका डंडा लेकर दौड़ती है। डंडा फेक कर बच्चों को मारती है। बच्चे खिलखिला कर हँसते हुए भाग जाते हैं। नइका चिल्लाते हुए कुछ दूर तक उनका पीछा करती है।

नइका को चिढ़ाने का एक नया खेल बच्चों को मिल गया है।

 

…भग्गू अब ठीक से गुंगुवा भी नहीं पाता है।

आशा पाण्डेय

आशा पाण्डेय

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