प्रतियोगी परीक्षाएँ और कोचिंग इंडस्ट्री का कुटिल खेल- डॉ. निधि अग्रवाल

 

दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी मांगों के साथ आए छात्रों ने हर संवेदनशील मन को झकझोरा है। समस्या के मूल को सोचने-समझने पर विवश किया है। प्रश्न पूछना जहां एक स्वस्थ लोकतंत्र कि नींव है वहीं समस्याओं पर बौद्धिक चिंतन भी आवश्यक है ताकि देश समुचित समाधान की ओर बढ़ सकें। इसी क्रम में पढिए चेतना को झकझोरता डॉ. निधि अग्रवाल का, जो डॉ . होने के साथ-साथ चर्चित साहित्यकार और  माँ भी हैं  इस मुद्दे पर समस्या की परते खँगालता का ऐसा ही विचारपरक लेख –

प्रतियोगी परीक्षाएँ और कोचिंग इंडस्ट्री का कुटिल खेल- डॉ. निधि अग्रवाल

एक पिता जंतर मंतर पर बैठा है। सोनम वांगचुक को उम्मीद से देखता हुआ। सोनम को ले जाया गया तो बिलख उठा। सोनम के राजनैतिक, सामाजिक, पारिवारिक पहलुओं को उसके आंसू नहीं जानते, उसके आसूं अपने बच्चे की दारुण स्मृतियों में भीगे हैं।
नीट परीक्षा के दबाव में उसके बच्चे ने मृत्यु को चुन लिया था। उसका बेटा अब नहीं लौटेगा लेकिन वह वहां बैठा है कि सरकार सुनिश्चित करे कि कोई और बच्चा उसके बेटे की राह न जा सके।

इस पिता को लोग ज्ञान दे रहे हैं कि बच्चे को स्ट्रांग बनाना था, असफल होना सिखाना था, बच्चे पर दबाव नहीं बनाना था। ये वे लोग हैं जो फेसबुक पर चंद लाइक कम होने पर बौखला उठते हैं। किट्टी पार्टी में गेम न जीतने पर लड़ते हैं, मोहल्ला कमेटी का अध्यक्ष न बनने पर गाली गलौच करने लगते हैं। न इन्होंने न इनके बच्चों ने कभी कोई प्रवेश परीक्षा दी है न इन्हें उसका तनाव पता है फिर भी इन्हें ज्ञान बांटना है। बच्चों को तनाव हैंडिल करना सिखाना,असफलता स्वीकारना सिखाना सही है लेकिन अगर परीक्षा में बैठने वाले 99.99 छात्र अवसाद और तनाव महसूस करते हैं तब उस परीक्षा प्रणाली को तत्काल बदलने की जरूरत है। और ऐसी परीक्षा में चेकिंग में हुई कोताही या पेपर लीक तनाव को कई गुना बढ़ा देता है। कोचिंग माफिया कई स्तरों पर सक्रिय हैं।

पेपर आउट का मसला बहुत पुराना और बहुकोणीय है। 1988 में 10-12 छात्रों के साथ एक कमरे में शुरू हुए दिल्ली और कोटा के कोचिंग संस्थान दस साल के भीतर पूरे शहर में होर्डिंग्स के जरिए छा गए। आरंभ में यहां से चयनित छात्रों के पीछे मेधा, परिश्रम और उचित मार्गदर्शन रहा होगा लेकिन अगले दस सालों में कोटा, दिल्ली बहरानपुर जैसे कई शहर ‘industry’ में बदल गए। आईआईटी और एम्स का टॉपर अपने नाम करने की, अधिक से अधिक सेलेक्शन की, विभिन्न कोचिंग संस्थानों में जंग छिड़ गई। एक चयन पर चार कोचिंग अपने दावे करते विज्ञापन देने लगीं।

प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने से पहले ये अपनी पृथक प्रवेश परीक्षा लेने लगे और रैंकिंग के हिसाब से बैच बनने लगे। टॉप बैच के जरूरतमंद छात्रों को मुफ़्त हॉस्टल और शिक्षा मिलती है, सबसे अच्छे शिक्षक इस बैच के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं जबकि बाकी बैच वैसी सुविधा नहीं पाते। पहली नज़र में यह मेधावी और गरीब बच्चों के लिए सरहानीय प्रयास लगता है लेकिन यह पूरा व्यवसाय है और व्यवसाय में नैतिकता के लिए स्थान नहीं बचता। कोई आश्चर्य नहीं कि इन कोचिंग संस्थानों ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA ) तक पहुंच बना परीक्षा पत्र निर्धारण में तेजी से अपनी जगह बनाई और विगत वर्षों में ये प्रवेश परीक्षा, संबंधित कोर्स से भी अधिक मुश्किल हो चलीं।

हर साल कुछ ऐसे प्रश्न शामिल रहते हैं जिनका उत्तर ग्यारहवीं बारहवीं की टेक्स्ट किताबों में नहीं मिलता। यही प्रश्न मेरिट निर्धारित करते हैं। कोचिंग संस्थान पेपर प्राप्त कर, अपने टॉप बैच को उसका अभ्यास कराते हैं और उत्तम रिजल्ट के होर्डिंग्स लगाकर लाखों बच्चों को आकर्षित कर, भारी फीस वसूलते हैं।

इनके चमकदार विज्ञापनों के मोह में बच्चे अपने घर, शहर से दूर अवसाद की राह चले आते हैं। जहां निरंतर परीक्षाएं होती हैं, हर परीक्षा के साथ उनका बैच बदलने की संभावना। टॉप बैच में जगह बनाने का, रैकिंग पाने का सतत् दबाव बच्चों पर बना रहता है। एक परीक्षा पास करने के लिए अनगिनत परीक्षा देते ये बच्चे कई कई बार गहन अवसाद से गुजरते हैं और इन्हें संभालने वाला कोई नहीं होता। सहमे हुए माता पिता में से कुछ, प्रवेश परीक्षा की तैयारी की अवधि में बच्चे के साथ बने रहने के लिए शहर बदल रहे हैं, कितनी ही माएं अपनी नौकरी छोड़ कोटा आदि शहरों में बच्चे के साथ रह रही हैं हालांकि यह साथ भी बच्चे की जीवन रेखा की कोई गारंटी नहीं। बारहवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए ली जा रही एक प्रवेश परीक्षा आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और भावनात्मक हर पहलू पर भारी पड़ रही है लेकिन संबंधित अधिकारी और मंत्रालय आंख-कान मूंदे बैठे हैं।

स्थिति यूं बदत्तर हो चली है कि कोचिंग संस्थानों ने पहले ग्यारहवीं और बारहवीं के साथ इस तैयारी को लादा और बच्चों को स्कूलों से दूर कर दिया और अब बड़े शहरों में यह तैयारी छठी कक्षा से हो रही है। प्रधानमंत्री मन की बात में छात्रों से कहते हैं दिन में दो बार इतना भागो दौड़ो कि पसीना पसीना हो जाओ। ये बच्चे पूछते हैं कि किस समय? प्रवेश परीक्षाएं नासा के प्रोजेक्ट्स जैसी जटिल हो गई है, स्कूल-कोचिंग, बोर्ड परीक्षा-प्रवेश परीक्षा के बीच यह बच्चे श्रम से नहीं तनाव से पसीना पसीना हैं। तनाव से टूटकर जब बच्चे जीवन को अलविदा कह देते हैं तो सरकार कह देती है कि पैरेंट्स दबाव न बनाए बच्चों पर, जबकि पेरेंट्स के दबाव में पच्चीस प्रतिशत बच्चे भी वहां नहीं होते।

सच यह है कि प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते सौ प्रतिशत बच्चे कुम्हला जा रहे हैं। सरकार कदम उठाती है कि नॉन गोइंग स्कूल मान्य नहीं होंगे। इसका लाभ क्या होगा? बच्चों पर दोहरा भार पड़ेगा बस। कोचिंग भी जाओ और स्कूल भी। चलिए बड़े शहरों में तो कोचिंग ने स्कूलों से टाईअप कर रखा है लेकिन छोटे शहरों, गांव-कस्बों के बच्चों का क्या? सरकार मूल समस्या नहीं देखती। प्रवेश पत्र को ग्यारहवीं बारहवीं की किताबों के निर्धारित दायरे में रखा जाए तो कोचिंग संस्थानों की जरूरत न रहेगी, शहर नहीं छोड़ना पड़ेगा, हर बच्चे पर आर्थिक मानसिक दबाव कम हो जाएगा।

डिजिटल हुंकार भरने वाली सरकार कैरियर ऑप्शन की एक हेल्प साइट बना सकती है। स्ट्रेस से जूझते बच्चों के लिए ऑनलाइन काउंसलर उपलब्ध करा सकती है। इन सब व्यवस्थाओं के बारे में कौन सोचे जब व्यवस्था इतनी चूक चुकी की प्रवेशपत्र टॉप बैच के दायरे से मुक्त हो खुले बाजार और व्हाट्सअप ग्रुप्स में बिक चला। पेपर रद्द हुआ, दुबारा परीक्षा ली गई , तनाव और बढ़ गया। कोई बच्चा एडमिशन कार्ड भूल जाता है, कोई लेट हो जाता है, पिता पछाड़ खाकर गिर रहा है… ऐसे मार्मिक दृश्य हर सेंटर से आते हैं हर साल लेकिन कोई समिति इस तनाव को कम करने पर विचार नहीं करती। सरकार को साल में दो बार परीक्षा पर विचार करना चाहिए। बच्चों के भीतर ‘जल्द एक दूसरा मौका’ और ‘कई प्रोफेशन और भी हैं ’ जैसे आश्वासन भरे होने जरूरी है।

निधि अग्रवाल

निधि अग्रवाल

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