बहुत समय पहले की
बात है एक राजा अपने मंत्रियों के साथ देश का भ्रमण कर रहा था | ज्यादातर लोग अपनी
किसी ना किसी समस्या से परेशान थे और उसी
में उलझे हुए थे | वही उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला जो बहुत खुश था | वो दिन भर खेत
में कड़ी मेहनत कर घर लौटता था | उसके कमाई तो ज्यादा नहीं थीं पर आवश्यकताएं सब
पूरी हो रहीं थी | घर में प्रेम और विश्वास था | उसके घर के बाहर तक उनके हंसने की
आवाजें आती थीं |
ने राजा से कहा ,” राजन समझ में नहीं आ रहा कि ये व्यक्ति इतना खुश क्यों है ?
प्रजा में ज्यादातर लोग धनाभाव का रोना रो रहे हैं पर यह अल्प आय में ही संतुष्ट
है | परिवार में भी खुशहाली व् सामंजस्य है | हमारे पास इतना धन है फिर भी हम इसकी
तरह से खुश नहीं है | आखिर इसका कारण क्या है ?
हुए कहा , “ ये व्यक्ति इसलिए खुश है क्योंकि ये 99 क्लब का सदस्य नहीं है | “
ने समवेत स्वर में पूछा |
करो एक थैले में 99 सोने के सिक्के लाकर इसके दरवाजे के बाहर एक थैले में रख दो
…. फिर देखना खेल |
ने उठ कसर दरवाजा खोला तो एक थैला रखा हुआ दिखाई दिया |
कर देखा तो चौंक गया … उसमें ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं थीं |
शुरू किया | 50 तक पहुंचा था कि बीच में पत्नी आ गयी | संख्या भूल गया | पत्नी को
मौन रहने का इशारा कर फिर से गिनना शुरू किया |
मुद्राएं देखकर चहकने लगे | गिनने में फिर व्यवधान आया |
डांट कर चुप कराया | फिर से गिनना शुरू किया | बड़ी मुश्किल से एक घंटे में वो गिन
पाया कि 99 स्वर्ण मुद्राएं हैं |
में कुछ भूल हुई है कोई 99 क्यों देगा सौ क्यों नहीं | फिर से गिना … फिर गिना
… 99 ही थीं |
कहीं गिर गयीं होंगी | उसने ढूँढने की कोशिश की | सहायता के लिए पत्नी व् बच्चों
को भी बुलाया | पर मुद्रा नहीं मिलनी थी तो नहीं मिलनी थी | दोपहर हो गयी | खेत
में भी पानी देने नहीं जा सका था | बहुत ही निराश मन से उसने वो 99 स्वर्ण
मुद्राएं अपनी अलमारी में रख लीं और मन ही मन सोचने लगा कि अब और मेहनत करूंगा और
इन्हें पूरी 100 कर लूंगा |
अधिक मेहनत करने लगा | दोपहर का खाना भी नहीं खाता , काम में ही लगा रहता |
अलबत्ता शाम को आकर अपनी मुद्राएं गिनना नहीं भूलता |
मुद्राएं कम मिलीं | वो आगबबूला हो गया | फ़ौरन पत्नी को बुलाया |
इन्हीं में से दो ले लेते हैं | मैंने दो मुद्राओं में से ये परदे , खाने का सामान
व् एक अंगूठी खरीदी है |
गया वो पत्नी पर पहली बार हाथ उठा कर बोला , “ नालायक औरत तेरे पास तो खर्च करने के आलावा
कोई काम नहीं है | मैं कितनी मेहनत से इन्हें जमा कर रहा था और तूने बिना सोचे
समझे दो उड़ा दी |
स्वर्ण मुद्राएं जमा करनी थीं | उसने मेहनत दुगनी कर दी |
कि दो मुद्राएं और कम हो गयीं हैं | इस बार वो मुद्राएं लेने वाले बच्चे थे |
से कहा , “ पिताजी स्कूल की तरफ से आयोजन था | हमने अच्छे कपड़े लिए व् चंदे के लिए
भी रूपये दिए | उसी में वो दो मुद्राएंमुद्राएं खर्च हो गयीं |
गुस्से का परवार ही न रहा | अब उसे पूरी पांच मुद्राएं जमा करनी थी | सोच कर उसके
दिमाग की नसे फटने लगीं | गुस्से में
चिल्लाते हुए उसने अपने बच्चों की पिटाई शुरू कर दी | बच्चे मम्मी बचाओ , मम्मी
बचाओ , चिल्लाने लगे | बच्चों को बचाने के चक्कर में दो हाथ माँ को भी लग गए , वो
गिर गयी , उसका सर फट गया | माँ का खून देखकर बच्चे पिता पर चिलाने लगे | पूरे घर
में कोहराम मच गया |
अपने मंत्रियों के साथ उस घर में पहुंचा |
जो आदमी अपने परिवार के साथ इतना खुश रहता था | आज उसके घर में इतनी अशांति बिखरी
हुई है | आखिर उन स्वर्ण मुद्राओं ने ऐसा क्या कर दिया ?
गया |
प्रेरक कथा है , जो हम सब को जीवन का आइना दिखाती है | हम सब भी कुछ जोड़ने के
चक्कर में आज की खुशियाँ छोड़ते रहते हैं … मसलन
तो उसमें है … इसलिए उसके बाद खुश होऊंगा |
स्कूल में सिलेक्शन हो जाए उसके बाद खुश
होऊँगा |
बाद खुश होऊंगा |
ख़ुशी तो तब आएगी |
मेंट के बाद की चीज है |
क्लब के सदस्य हैं जो अपनी खुशियाँ कल पर टालते रहते हैं …. इसलिए हमेशा ख़ुशी की
कमी पड़ी रहती है | परिवार में झगडे होते हैं , मानसिक अशांति होती है , कई बार काम
की अधिकता में शरीर के प्रति लापरवाही इतनी हो जाती है कि अनेक रोग घेर लेते हैं |
प्रतीक्षित ख़ुशी मिलती है तब तक हम उसे भोगने लायक ही नहीं बचते या हमारे रिश्ते
टूट चुके होते हैं | ऐसी ख़ुशी का क्या फायदा कह कर हम तब भी दुखी ही होते हैं |
अभी छोटी –छोटी ख़ुशी पकड़ने की , उसको सँभालने की उसका मजा लेने की | आज का उगता
सूरज , आज का डूबता सूरज , आज के बादल , ठंडी हवा या जाड़े की नर्म धुप सब विशेष है
| उनका मजा आज ही लिया जा सकता है … कल नहीं | याद रखिये ९९ का 100 कभी नहीं
होगा … पर हम 100 बनाने के चक्कर में कभी 99 का आनन्द भी नहीं ले पायेंगे|
आपको ख़ुशी हुई हो तो कमेंट कर हमारी भी ख़ुशी बढाइये |
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