सुरक्षित

कहानी -सुरक्षित

मृत्यु भय ग्रसित व्यक्ति को पाराधीनता स्वीकार करने में भी सुरक्षित महसूस  होता है | हालांकि ये पराधीनता अपनाने के कई कारण हो सकते हैं पर सुरक्षा सबसे प्रमुख है | जानवर भी इसके अपवाद नहीं | पढ़िए ज्ञानदेव मुकेश जी की कहानी ……….

लघुकथा -सुरक्षित 

रात अंधेरे एक तेंदुआ गांव में घुस आया और रहर के खेत में जा बैठा। दीनू काका अहले सुबह शौच पर जा रहे थे। उनकी नजर तेंदुए पर पड़ी। वे सिहर गए। वे लोटा फेंककर उल्टे पांव भागे। बस्ती में आते ही उन्होंने शोर मचा दिया। घर-घर में तेंदुए का दहशत व्याप गया। माओं ने बच्चों को गोद में छुपा लिया। कई मर्दों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लेकिन कुछ मर्दों ने हिम्मत जुटाई।

 हाथों में लाठियां लीं और शोर मचाते हुए रहर की खेत की तरफ बढ़े। उनके हाथों में लाठियों की ताकत थी, मगर दिलों में भय का राज था। उन्होंने रहर के खेत को दो तरफ से घेर लिया। मगर उनमें आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

पढ़िए ज्ञानदेव मुकेश जी की लघुकथा –छुटकारा  

   क्षितिज से निकलकर सूरज चढ़ने लगा। प्रकाश चारो तरफ फैल गया। लेकिन तेंदुआ कहीं नजर नहीं आ रहा था। इस बीच किसी ने वन विभाग को सूचना दे दी। विभाग के कर्मचारी एक पिंजड़ा लेकर गांव की तरफ बढ़ चले। तभी खेत के एक छोर से तेंदुए के दौड़ने की आवाज मिली। ऐसा लगा जैसे वह हमला करने बढ़ा हो। कुछ मर्द बिदक गए। मगर शेष लाठियां पटकते हुए आगे बढ़ने लगे।

 रहर की झाड़ियों  में घुसते ही तेंदुआ दिख गया। मर्द डर रहे थे। मगर उसी डर में आगे बढ़ रहे थे। तेंदुआ कुछ कदम आगे आता तो कुछ कदम पीछे चला जाता है। लोग डरते-डरते ही सही उसे मारने के लिए अंतिम हमला करने आगे बढ़ गए।

   तभी वन विभाग अपना पिंजड़ा लेकर हाजिर हो गया। कर्मचारियों ने पिंजड़ा का दरवाजा खुला रख छोड़ा था। वन विभाग के लोग बंदूकें लिए हुए थे। एक छोर से उन्होंने भी तेंदुए को घेर लिया। डर उनमें भी समाया हुआ था। लाठियों और बंदूको के बीच तेंदुआ भी अब डर रहा था। वह भागा। तभी उसके सामने पिंजड़ा आ गया। गेट खुला था। बदहवासी में वह खुले गेट से पिंजरे में घुस गया। वन विभाग के लोगों ने दौड़कर गेट बंद कर दिया।

  गांव और वन विभाग के लोगों ने राहत की सांस ली। उनका डर खत्म हुआ। मगर सच यह था कि िंपंजरे में आने के बाद तेंदुआ खुद को कहीं ज़्यादा महफूज़ महसूस करने लगा था।

                                            -ज्ञानदेव मुकेश 
                                न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी,

                                    पटना-800013 (बिहार)
                                 

                               

लेखक -ज्ञानदेव मुकेश

                                             

     
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