कहानी – मंगत पहलवान
‘कुत्ता बँधा है क्या?’ एक अजनबी ने
बंद फाटक की सलाखों के आर-पार पूछा|
रहा- कुत्ते से सावधान!
मेरी बाइक रुक ली| बाइक मुझे उसी सुबह मिली थी| इस शर्त के साथ कि अकेले उस पर सवार
होकर मैं घर का फाटक पार नहीं करूँगा| हालाँकि उस दिन मैंने आठसाल पूरे किए थे|
जा रहा है|’ मैंने कहा|
एक दूसरे की मदद लेकर उसे ज़रूर नहलाया करते| उसे साबुन लगाने का जिम्मा बाबा का
रहता और गुनगुने पानी से उस साबुन को छुड़ाने का जिम्मा माँ का|
अजनबी हँसा- ‘यह लोगे?’
नोट उसने निकाला और फाटक की सलाखों में से मेरी ओर बढ़ा दिया|
उसका मुँह ताकने लगा|
पड़ी मुझे|
फिर हँसने लगा|
लेकिन याद नहीं आया मुझे, कहाँ|
जवाब देने से बचा लिया|
सुनकर इधर आ रही माँ हमारी ओर बढ़ आयीं| टेलीफोन के कमरे से फाटक दिखाई देता था|
आगन्तुक हँसा|
से दूर| मैं चिल्लाया, ‘मेरा बाइक| मेरा बाइक…..’
ही माँ खड़ी हुईं|
चला आया…..|’
थपथपा रहे थे| जो सींग के समान हमेशा ऊपर की दिशा में खड़े रहते|
दिया था- ‘भेड़िए और कुत्ते एक साझे पुरखे से पैदा हुए हैं|’ तीन साल पहले वही इसे
यहाँ लाए रहे- ‘जब तक अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई करने हेतु मैं यह शहर छोडूँगा, मेरा
वुल्फ़ आपकी रखवाली के लिए तैयार हो जाएगा|’ और सच ही में डेढ़ साल के अन्दर वुल्फ़
ने अपने विकास का पूर्णोत्कर्षप्राप्त कर लिया था| चालीस किलो वजन, दो फुट ऊँचाई, लम्बी
माँस-पेशियाँ, फानाकर सिर, मजबूत जबड़े, गुफ़्फ़ेदार दुम और चितकबरे अपने लोम चर्मके
भूरे और काले आभाभेद|
इतनी देर क्यों लग जाती है?’ माँ झाल्लायीं- ‘अब क्या बताऊँ कौन है? ख़ुद क्यों
नहीं देख आते कौन आया है? वुल्फ़ को मैं नहला लूँगी…..|’
मैं भी उनके पीछे हो लिया|
अजनबी के हाथ में उसका बीस का नोट ज्यों का त्यों लहरा रहा था|
बाज़दावे की कापी मेरे पास रखी है| उसका पालन न करने पर तुझे सज़ा मिल सकती है…..’
ने बाबा की बात पर तार्किक ध्यान न दिया औरबेखटके फाटक की सलाखों में से अपना नोट
मेरी ओर बढ़ाने लगा|
ने मुझे अपनी गोदी में उठा लिया- ‘वरना अपने अलसेशियन से तुझे नुचवा दूँगा…..|’
मैंने बाबा के कंधे अपनी बाँहों में भर लिए|
कचहरी सज़ा सुनाती है…..|’
रखेगा…..|’
बजनी बंद हो गयी और बाबा आँगन में लौट लिए|
पैकेट केसाथ|
मुझे पुकारा, ‘आज तेरा जन्मदिन है|’
लिया|
पूछा|
नहीं मालूम मैं यहाँ आई हूँ| यही मालूम है मैं बाल कटवा रही हूँ…..|’
‘जन्मदिन का इसे बीस रूपया दे रहा था, हमने भगा दिया…..|’
हँसी गायब ही गयी|
पुकारा- ‘देख, तेरे लिए एक बहुत बढ़िया ड्रेस लायी हूँ…..|’
लिया|
उन्हें टोका- ‘आठवाँ महीना है तेरा| पागल है तू?’
बेपरवाही से हँसी- ‘याद नहीं, पिछली बार कितनी भाग-दौड़ रही थी फिर भी कुछ बिगड़ा था
क्या?’
अपनी ज़िम्मेदारी है’-माँ नाराज़ हो ली- ‘इस बार मैं तेरी कोई ज़िम्मेदारी न लूँगी…..|’
बैठीं- ‘आप बुलाइए इसे| आपका कहा बेकहा नहीं जाता…..|’
देखा|
पहुँचा|
जीजी ने अपने पैकेट की ओर अपने हाथ बढ़ाए|
चीज़ से मुझे चिढ़ रही| तभी से जब से मेरे मना करने के बावजूद वे अपना घर छोड़कर उस
परिवार के साथ रहने लगी थीं, जिसका प्रत्येक सदस्य मुझे घूर-घूर कर घबरा दिया करता|
ने पैकेट की नयी कमीज और नयी नीकर मेरे सामने रख दी- ‘देख तो, कितनी सुंदर है|’
कमरे में टी.वी. पर क्रिकेट मैच देख रहे थे- ‘कौन देखेगा?’
पास से उठ गयीं- ‘और कौन देखेगा?’
लिए उठ खड़ा हुआ|
आया रहा?’ जीजी धीरे से फुसफुसायीं|
फुसफुसाहटों में बात करतीं|
लिए और जीजी के निकट चला आया| उस अजनबी के प्रति मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों बनी
हुई थी|
फिर फुसफुसायीं- ‘इधर, मेरे पास आकर बैठ| मैं तुझे सब बताती हूँ…..|’
के बारे में मेरी जानकारी अच्छी रही| बड़े भैया की वजह से जिनके बचपन के सामान में
उस समय के बड़े कुश्तीबाज़ों की तस्वीरें तो रहीं ही, उनकी किशोरा’वस्था के ज़माने की
डायरियों में उनके दंगलों के ब्यौरे भी दर्ज रहे| बेशक बड़े भैया अब दूसरे शहर में
रहते थे, जहाँ उनकी नौकरी थी, पत्नी थी, दो बेटे थे लेकिन जबभी वे इधर हमारे पास आते
मेरे साथ अपनी उन डायरियों और तस्वीरों को ज़रूर कई-कई बार अपनी निगाह में उतारते
और उन दक्ष कुश्तीबाज़ों के होल्ड (पकड़), ट्रिप(अड़ंगा) और थ्रो (पछाड़) की देर तक
बातें करते|
मेरी पुरानी कमीज के बटन खोलने लगीं- ‘और वेट क्लास में सुपर हैवी-वेट…..|’
याद आ गया| अजनबी मंगत पहलवान ही था| उसकी तस्वीर मैंने देख रखी थी| दस साल पहले,जो
भी और जितनी भी कुश्तियाँ उसने लड़ी थीं, हर मुकाबले में खड़े सभी पहलवानों को हमेशा
हराया था उसने| बड़े भैया की वे डायरियाँ दस साल पुरानी थीं, इसीलिए इधर बीते दस
सालों में लड़ी गयी उसकी लड़ाइयों के बारे में मैं कुछ न जानता था|
अचम्भे से अपने हाथ फैलाए|
हँस कर जीजी न मेरी गाल चूम ली और अपनी लायी हुई नयी कमीज़ मुझे पहनाने लगीं|
है?’
कमरे के अंदर चली आयी- ‘वुल्फ़ की भौंक देखी? अब तुम इसे लेकर इधर ही रहना| उसी तरफ़
बिल्कुल मत आना…..|’
ध्यान बाँट दिया| नयी कमीज़ के बटन बंद कर रहे उनके हाथ अपनी फुरती खोने लगे| चेहरा
भी उनका फीका और पीला पड़ने लगा|
छुड़ाकर मैंने बाहर भाग लेना चाहा|
की फुसफुसाहट और धीमी हो ली- ‘पहले इधर चलोगे?’
हिलाया|
मंगत पहलवान वुल्फ़ के साथ गुत्थमगुत्था हो रहा था| उसके एक हाथ में वुल्फ़ की दुम
थी और दूसरे हाथ में वुल्फ़ के कान| वुल्फ़ की लपलपाती जीभ लम्बी लार टपका रही थी और
कुदक कर वह मंगत पहलवान को काट खाने की ताक में था|
पहला दामाद इधर उत्पात मचाए है…..|’
को अपना दामाद कहा क्या? मतलब, जीजी की एक शादी पहले भी हो चुकी थी? और वह भी मंगत
पहलवान के संग?
की ओट में, ड्योढ़ी की दिशा में आँखें गड़ाए खड़ी माँ को पुकारा|
बाँहों का सहारा दिया और उन्हें अंदर सोने वाले कमरे की ओर ले जाना चाहा|
रास्ते गिर गयीं और लहू गिराने लगीं टाँगों के रास्ते|
दोस्त पहुँचे वुल्फ़ निष्प्राण हो चुका था और मंगत पहलवान ढीला और मंद|
का आधा शरीर लहू से नहा चुका था|
स्कूल न भेजा| बाद में मुझे पता चला उस दिन की अखबार में मंगत पहलवान
कीगिरफ्तारीके समाचार के साथ हमारे बारे में भी एक सूचना छपी थी-माँ और बाबा मेरे
नाना-नानी थे और मेरी असली माँ जीजी रहीं और असली पिता, मंगत पहलवान|
दीपक शर्मा
यह भी पढ़ें …




Comments are closed.