हिस्टीरिया एक ऐसी बिमारी है जिसमें व्यक्ति अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है | ऐसा उनके साथ होता है जो बहुत ही दवाब में जीते हैं | कई बार आम लोग इसे मिर्गी समझ लेते हैं | परन्तु उससे अलग है | महिलाएं इसकी शिकार ज्यादा है |जब मन एक सीमा से ज्यादा दवाब नहीं सह पाता तो हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं | या मरीज स्वयं ही इन दौरों को लाने की कोशिश करता है | ऐसा वो दूसरों को अपने कब्जे में लेने या उनसे अपनी बात मनवाने के लिए करता है | परन्तु यहाँ बात मानने वाले लोग अपने होते हैं जो भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं | परन्तु अगर ये जुड़ाव ना हो …? किसी दूसरे इंसान को अपने कब्जे पर लेने की चाहत क्या -क्या करवाती है …पढ़िए दीपक शर्मा जी की कहानी कब्जे पर में …
कब्ज़े पर
कुछ समय बाद पापा मुझे मेरी नानी के घर से अपने पास लिवा ले गए.
स्टेप-मॉम है,” अपने टॉयलेट के बाद जब मैं लाउन्ज में गई तो पापा ने मुझे
स्टेप-मॉम से मिलवाया. वे मुस्करा रही थीं.
अजनबियों से पहचान बढ़ाना मैं जानती हूँ.
अँगूठी क्या सोने की है?” स्टेप-मॉम मेरी माँ की एक अच्छी साड़ी में मेरी माँ के
गहनों से लकदक रहीं.
है,” मैंने कहा.
के समय जब माँ की अँगुली से यह अँगूठी उतारी गई थी तो फफक कर मेरी नानी ने यह
अँगूठी मेरे बाएँ हाथ के बीच वाली बड़ी अँगुली में बैठा दी थी- “इसे अब उतारना मत.”
सोना पहनना ठीक नहीं,” स्टेप-मॉम ने अपने हाथ मेरी अँगूठी की ओर बढ़ाए, “कोई भी
सोने के लोभ में तुम्हारे साथ कैसा अनर्थ कर सकता है.”
उतारूँगी.” मैंने अपने दाएँ हाथ से अपनी अँगूठी ढक ली.
ने कहा.
स्टेप-मॉम ने अपनी मुस्कान वापस ले ली, “आपने नहीं कहा था, आशु के हाथ वाली अँगूठी
मेरी है?”
ने दोहराया, “आओ खाना खाएँ.” हमारे खाने की मेज हमारे लाउन्ज के दूसरे कोने में
रही. खाना मेज पर पहले से लगा था. खाने की मेज पर हम तीनों एक साथ बैठे.
तुम्हारी स्टेप-मॉम ने खाना बहुत मेहनत से तैयार किया है,” पापा ने मेरी प्लेट में
चावल परोसे.
मैंने कहा.
पापा मेरे साथ नरमी दिखाएँ, मुझे ज़रूर ‘थैंक यू’ बोलना चाहिए.
स्टेप-मॉम को थैंक-यू बोलो.” पापा ने अपनी टूटरूँ-टू शुरू की, “तुम्हारी स्टेप-मॉम
बहुत ही अच्छी, बहुत ही भली, बहुत ही सुशील और बहुत ही सुंदर लड़की हैं…..”
हुए भी मैंने स्टेप-मॉम की तरफ़ अपने बोल लुढ़का दिए. माँ कहती थीं पापा का कहना
मानना बहुत ज़रूरी है.
स्टेप-मॉम ने नींबू
का अचार दोबारा लिया….. अकस्मात् मुझे अचार बना रही माँ दिखाई दे गईं. माँ का
पुराना सूती धोती का वह टुकड़ा दिखाई दे गया जिसे मैंने झाड़न बनाकर नींबू पोंछने के
लिए इस्तेमाल किया था…..
गिने थे,” मैंने कहा, “वन टू वन हंडरड एंड फोर……”
है?” स्टेप-मॉम ने अपनी भौंहें ऊपर कीं, “मुझे बताया गया था तुमने कभी स्कूल का
मुँह नहीं देखा है.”
मैंने कहा.
में भी तुम्हारी मदद करेगी,” पापा ने स्टेप-मॉम को ख़ुश करना चाहा.
अपनी अँगूठी न देगी, मैं उससे कोई मदद न लूँगी,” स्टेप-मॉम अपनी ज़िद भूली नहीं.
खाना छोड़कर मैं अँगूठी की तरफ़ देखने लगी. अँगूठी की दिशा से एक हिलकोरा उठा और
मुझे हिलाने लगा. मेरे समेत मेरी कुर्सी लड़खड़ाई.
पापा अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए, “आशु को अपनी माँ की तरह मिरगी के दौरे पड़ते हैं.
मैं आशु को सोफ़े पर लिटाकर अभी आया.
पापा ने मुझे नरमी से उठाया और लाउन्ज के सोफ़े पर धीरे से लिटा दिया. माँ की
बड़बड़ाहट मैं हूबहू अपनी ज़बान पर ले आई, “नर्क, नर्क, नर्क, मैं यहाँ न रहूँगी. यह
नर्क है, नर्क, नर्क, नर्क……”
बोलती थीं?” स्टेप-मॉम सहम गई.
खाने की मेज पर लौटकर पापा ने दोहराया, “मिरगी के रोगी को अकेले छोड़ देना बेहतर
रहता है……”
सकती,” स्टेप-मॉम की आवाज़ फिर डोली, “ऐसी हालत में कोई खाना खा सकता है भला?”
के बीच मैं जानती रही, पापा ज़रूर खाना खा सकते थे….. पापा ज़रूर खाना खा रहे
थे….. माँ की मिरगी के दौरान पापा हमेशा खाना खाते रहे थे……
ने पापा के ऑफिस जाते ही मुझे मेरे कमरे में आ घेरा, “यह अँगूठी उतार दो.”
उतारूँगी,” मैंने कहा, “इसमें माँ की रूह है इसे मैं अपने से अलग नहीं कर सकती.”
उतारोगी, मिरगी का दौरा डाल लोगी तो मैं तुम्हें यहाँ न रहने दूँगी. अस्पताल में
फेंक आऊँगी. वहाँ डॉक्टर तुम्हें बिजली के ऐसे झटके लगाएँगे कि तुम अपने झटके भूल
जाओगी.”
के पास जाऊँगी. यहाँ नर्क है, नर्क, नर्क, नर्क, मैं यहाँ न रहूँगी.”
नहीं डरती,” स्टेप-मॉम मुझ पर झपटीं. “आज मैं तुझसे यह अँगूठी लेकर रहूँगी.”
में मैंने स्टेप-मॉम के बाल नोच डाले. माँ को नोचते-खसोटते समय पापा हमेशा माँ के
बालों से शुरू करते. फ़िरक कर स्टेप-मॉम ने एक फेरा लिया और मुझे जबरन ज़मीन पर पीठ
के बल उल्टा कर दिया.
माँ की तरह मैं काँपी और बड़बड़ाई, “मौत-मौत, मौत, मुझे मौत चाहिए. मौत, मैं मौत
चाहती हूँ, मौत, मौत, मौत……”
देखा. कुछ स्त्रियाँ माँ को स्नान दे रही थीं. हाथ में साबुन लगाए स्टेप-मॉम के
हाथ माँकी अँगूठी उतारना चाह रहेथे, लेकिन अँगूठी माँ की अँगुली पर जा बैठी, सो
बैठी रही थी, टस से मस न हुई थी.
पापा ने पूछा.
ने कहा.
पापा फलवाली छुरी उठा लाए, सफ़ेद दस्तेवाली छुरी.
पापा ने माँ की अँगुली काटी. अँगुली ककड़ी की फाँक की तरह माँ के हाथ से अलग हो गई
थी. माँ के हाथ ने खून का एक कतरा भी नहीं बहाया. “अँगूठी मुझे दीजिए.” स्टेप-मॉम
ने अँगूठी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, लेकिन पापा ने स्टेप-मॉम का हाथ नीचे झटक दिया और
अँगूठी मेरे हाथ में पहना दी, “अब इसे उतारना मत.”
स्टेप-मॉम के साथ हाथापाई नहीं करनी चाहिए.” शाम को पापा ने मेरे साथ सख्ती दिखाई.
छीनना चाहती थीं.” मैंने अपनी अँगूठी पर अपने दाएँ हाथ की अँगुलियाँ फेरीं.
के पास ले जा रहे हैं,” स्टेप-मॉम ख़ुशी से मुस्कराई.
जाने दीजिए, पापा.” केबल पर मेरा मनपसंद गाना आ रहा था, “यह गाना मुझे बहुत अच्छा
लगता है.”
लिया है,” स्टेप-मॉम ने मुझे सुनाया. “मिरगी का एक ऑपरेशन होता है-प्रीफ्रंटल
लौबोटमी- खोपड़ी में गड़बड़ी पैदा करने वाले खंड को ऑपरेशन द्वारा बाहर निकाल दिया
जाता है और फिर मिरगी के दौरे ख़त्म हो जाते हैं.”
करवाऊँगी, पापा. मैं सिर्फ़ स्टेप-मॉम को डराने के लिए झूठ-मूठका नाटक करती थी…..
माँ की तरह.” मैं रोने लगी.
पापा अपनी टूटरूँ-टू वाली आवाज़ से बाहर निकल आए, “मिरगी के बारे में मैं तुमसे
ज़्यादा जानता हूँ. जिस ऑपरेशन की तुम बात कर रही हो उसके बारे में डॉक्टर दो मत
रखते हैं. आमतौर पर वह ऑपरेशन ग्यारह साल से छोटे बच्चों पर किया जाता है और हमारी
आशु अब अपने चौदहवें साल में है. इस उम्र में इसका ऑपरेशन हुआ तो इसकी याददाश्त
चली जाएगी. इसका दिमाग़ कुछ भी नया सीख न पाएगा.”
स्टेप-मॉम ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया, “किस बेदिमाग़ के दिमाग़ की बात कर रहे हैं?
जिसके दिमाग़ की हत्थी कुदरत ने शुरू से ही उसके हाथ में नहीं रखी? उठिए, चलिए,
डॉक्टर से सब पूछ लेंगे.”
मैं ज़मीन पर लोटने लगी, “मैं डॉक्टर के पास न जाऊँगी. मुझे मिरगी नहीं है…..”
……………………….
बताया?” माँ ने पूछा.
पापा ने अपने दाँत पीसे, “घर जाते ही अपनी पत्नी के कान उमेठो, उसके मुँह पर थूको,
उसने तुम्हें उल्लू बनाया है, तुम्हारा रूपया और समय बरबाद किया है.”
है,” माँ सिकुड़ी.
बोलती है?” पापा चीखे. “स्कैनिंग इनसेफेलोग्राम सब डॉक्टर कई बार देखे और पलटे और
हर बार उसने यही कहा, तुम्हारी पत्नी को कोई रोग नहीं. उसके दिमाग़ का दायाँ
हेमिस्फियर, उसके दिमाग़ का कौरपस केलोजम सब सही काम कर रहे हैं, कहीं मिरगी का एक
भी लक्षण नहीं.”
माँ ने अपना माथा पीटा, “यह कैसी भनभनाहट है जो हर समय मेरी कनपटियों पर हथौड़े
चलाती है और मैं अपने होश खो बैठती हूँ?”
स्वार्थ की आवाज़ है. अपनी ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए तुम बीमार होने का ढोंग
रचाती हो.”
हँसने लगीं, “स्वार्थ? हे भगवान अगर मैंने कभी भी स्वार्थ दिखाया है तो तुम अभी
इसी पल मेरे प्राण हर लो, मेरी साँस खींच लो.”
सुनेगा,” पापा जोश में आ गए और फलवाली छुरी उठा लाए, सफ़ेद दस्तेवाली छुरी………… …………………
पापा,” मेरी हिचकी बँध गई, “छुरी मत लाना.”
नहीं, कोई फंतासी नहीं.” मुझे ज़मीन से उठाकर सोफ़े की तरफ़ ले जा रहे पापा ने मुझे
एक ज़ोरदार हल्लन दिया.
पापा.” अपनी हिचकियों के बीच मैं बड़बड़ाई, माँ के एक्सीडेंट वाले दिन मेज पर से
फलवाली छुरी आपने उठाई थी, माँ ने नहीं. माँ की कलाई आपने काटी थी, माँ ने
नहीं……”
आत्महत्या यह स्वीकार नहीं कर पा रही,” स्टेप-मॉम के साथ अपनी टूटरूँ-टूँ वाली
आवाज़ पापा वापस ले आए. “इसकी बेहतरी के लिए शायद वह ऑपरेशन ज़रूरी है.”
स्टेप-मॉम ज़ोर से हँसी, “इसके ऑपरेशन से हमारी बेआरामी भी दूर होगी. बात-बात पर
इसका यों कब्ज़े पर से उतर जाना मेरी बर्दाश्त के बाहर है.”
नोचने के लिए मैंने उठना चाहा मगर उठ न पाई. क्या मैं माँ की तरह अडोल हो गई थी?
दीपक शर्मा
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