गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 9

आत्मकथा लेखन में ईमानदारी की बहुत जरूरत होती है क्योंकि खुद के सत्य को उजागर करने के लिए साहस चाहिए साथ ही इसमें लेखक को कल्पना को विस्तार नहीं मिल पाता | उसे कहना सहज नहीं होता | बहुत कम लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं | बीनू दी ने यह साहसिक कदम उठाया है | बीनू भटनागर जी की आत्मकथा “गुज़रे हुए लम्हे “को आप अटूट बंधन.कॉम पर एक श्रृंखला के रूप में पढ़ पायेंगे |

गुज़रे हुए लम्हे -परिचय

गुजरे हुए लम्हे -अध्याय 1

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 2

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 3

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय चार

गुज़रे हुए लम्हे अध्याय -5

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 6

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 7

गुजरे हुए लम्हे -अध्याय-8

अब आगे ….

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 9:ग्वालियर छोड़ना

(दिल्ली 1992 से 96)

 

इस समय तक ग्वालियर में सिर्फ चाचा जी चाची जी रह गये थे। शशि बीबी का बेटा जो दसवीं के बाद से ग्वालियर में ही पढ़ा था, इंजीनीयरिंग करके दिल्ली में नौकरी करने लगा था। शशि बीबी (बड़ी ननद) के पति रवि भाई साहब सेवानिवृत्तहो कर सिंदरी (बिहार) से लखनऊ आ चुके थे। तनु कॉलिजके अंतिम वर्ष में थी।

 

इसी साल होली से कुछ पहले परिवार को एक बहुत बड़ा झटका लगा जिसने सब को हिला दिया। आधी रात को पता चला कि सड़क दुर्घटना में नीता के पति की मृत्यु हो गई थी । वह होली मनाने अपने घर रायपुर जा रहे थे। सिर की चोट ने वहीं प्राण ले लिये, नीता के हाथ में ज़रा सी खरोंचे आईं, बच्ची और नीता के देवर को कोई चोट नहीं लगी। उनकी जीप एक खड़े हुए ट्रक से टकराती हुई निकली तो उनके सिर को आघात लगा था। नीता की शादी को केवल आठ साल हुए थे और ढाई साल की बेटी थी। नीता के पति के निधन की सूचना सबसे पहले हमें ही मिली। ग्वालियर में केवल दुर्घटना की सूचना दी गई थी,उनके निधन की नहीं।

 

उन दिनों दिनेश भैया गुरु तेग बहादुर अस्पताल से सऱदर जंग अस्पताल में आ गये थे और लक्ष्मी बाई नगर में रह रहे थे परन्तु जयश्री की नौकरी अभी भी पूर्वी दिल्ली में थी, बच्चे भी वहीं पढ़ रहे थे इसलिये वह अपने माता पिता के साथ रह रही थी। दक्षिण दिल्ली तबादले की कोशिश थी और अगले सत्र में बच्चों को भी द.दिल्ली के स्कूल में दाखिला करवाना था। ये सब यहाँ बताना ज़रूरी है क्योंकि आगे आने वाले घटनाक्रम में ये बातें महत्वपूर्ण होंगी।

 

मृत्यु  की सूचना पाते ही हम दिनेश भैया के यहाँ गये,  जो होना था हो चुका था,  अब क्या करना है यह विचार करना था। उमा दीदी भी वहाँ जाना चाहती थीं। नागपुर से कुछ घंटे की सड़क यात्रा करनी थी। इन्होंने अपना दिनेश भैया और उमा दी का रेल आरक्षण  करवा लिया था, उसी ट्रेन से मैं और उमा दी के पति ब्रजेश भाई  साहब भी चले, पर हम ग्वालियर उतर गये, चाचा जी और चाची जी को संभालने के लिये । अभी तक उनको मृत्यु की सूचना नहीं दी गई थी।  जयश्री हमारे और अपने बच्चों की देखभाल करने हमारे घर आ गई थी ।

 

ग्वालियर पहुँचकर मैंने जो नज़ारा देखा उसकी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। दुख से ज़्यादा चाची जी को क्रोध था जिसमें उन्होंने शब्दों की सभ्य सीमा को पार करके अपने दोनों बेटों को कोसना शुरू कर दिया था, जो मेरे लिये तो असह्य थापरंतु मौका ऐसा था कि मेरे लिये चुप रहना ही सही था। अड़ौसी पड़ौसी रिश्तेदारों की संवेदनायें स्वाभाविक था, कि उन  ही के साथ थीं। मुझमें सुनने का साहस नहीं रहा तो मैंने दूसरे कमरे में जाकर शरण ली।

 

उनका निशाना उनके दोनों लायक बेटे थे जो उस समय दुनिया के सबसे बुरे बेटे बने हुए थे। उनको सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि दोनों उन्हें लेकर नहीं गये, दूसरी शिकायत थी कि पैसे बचानेके लिये ट्रेन से गये, हवाई जहाज़ से जाना चाहिये था। उनकी दोनों ही शिकायत वाजिब नहीं थी। उन दोनों का स्वास्थ्य सफ़र के लायक नहीं था, यदि उन दोनों को ले जाते तो इतनी जल्दी नहीं पहुँच सकते थे।

 

जहाँ तक हवाई जहाज़ से जाने का सवाल था उन दिनों ए.टी.ऐम.  क्रैडिट कार्ड डैबिट कार्ड नहीं होते थे। एयरलाइंस की बुकिंग के लिये पैसे निकालने के लिये सुबह बैंक खुलने की प्रतीक्षा करनी पड़ती।इंटरनैट नहीं था, ट्रैवल एजैंसी बहुत कम होती थी और हमें उनके बारे में कुछ मालूम नहीं था। रेलवे में होने के कारण सुबह की ट्रेन का आरक्षण तुरंत मिल गया, संबंधित अधिकारी को पैसे बाद में भिजवा दिये गये। जहाँ वे रहते थे वहाँ के लिये नागपुर स्थित सहकर्मियों ने कैब का भी प्रबंध पहले ही कर दियाथा। आख़िरी बात शिकायत में विरोधाभासथा!यदि उन्हें ग्वालियर से लेना ही था तो हवाई जहाज़ से कैसे जाते!  अतः उनकी किसी भी शिकायत में दम नहीं था, गहरा दुख था पर यह दुख उनके बेटों ने नहीं दिया था, प्रभु इच्छा थी, जिसके आगे किसी की नहीं चलती, पता नहीं कौन सी कुंठाये और शिकायतें मौक़ा पाकर लावा की तरह ज्वालामुखी से फूट रही थीं।

 

अभी तक मैं अवसाद और व्याकुलता (depression& anxiety) से पूरी तरह उभरी नहीं थी,यहाँ के वातावरण ने मुझे फिर अँधेरों में ढकेल दिया था। मैंने सबसे अलक थलक अपने को एक कमरे में बंद कर लिया था, तीन चार दिन सिर्फ चाय और पार्ले जी बिस्किट पर रही थी। जब दोनों भाई वहाँ से लौटे तो बिना समय गँवाये उसी समय ये मुझे लेकर  पहली उपलब्ध ट्रेन से दिल्ली आ गये।  यहाँ मेरा इलाज चल ही रहा था।जितने दिन मैं ग्वालियर रही दिनेश भैया के एक डाक्टर मित्र ने मेरा बहुत ध्यान रखा, दवाॉइयों का प्रबंध किया औरनींद काइंजैक्शन भी लगाना पड़ा था। ये वही मित्र थे जिन्होने तनु के पैदा होने के समय भी मेरा बहुत ख़याल रखा था।

 

कुछ दिनों से यह बात चल रही थी कि चाचा  जी और चाची जी का अब ग्वालियर में रहना मुश्किल है और अब वह दिल्ली आकर रहेंगे। वे दोनों निश्चय कर चुके थे कि उन्हें दिनेश भैया और जयश्री के साथ रहना हैं क्योंकि डॉक्टर बेटे के साथ रहने में बुढ़ापे की बीमारियों में सुविधा रहेगी।  दिनेश भैया का ठिकाना सुनिश्चित होने की प्रतीक्षा थी, इसी बीच यह दुर्घटना हो गई।  अब दुख की इस मानसिक अवस्था में ग्वालियर उन्हें नहीं छोड़ सकते थे। नीता से भी एक बार मिलवाने के लिये नीता को दिल्ली लाना और फिर वापिस छोड़कर आना ज़रूरी था।

 

सरोजनी नगर का हमारा घर बहुत छोटा था, सुविधाजनक था इसलिये इतने साल वहाँ रहते रहे थे। तनु तो बाहर के बरामदे में पढ़ती थी, जहाँ से हर आने जाने वाला गुज़रता था। होली का समय था अप्रैल में यूनिवर्सिटी के आख़िरी साल की परीक्षा थी। मैं चाहती थी ये लोग परीक्षा के बाद आयें। मैंने कहा कि एक महीने लखनऊ चले जायें शशि बीबी के पास या दिल्ली में उमा दी के यहाँ रह लें पर दोनों ही तैयार नहीं हुई। अजीबो ग़रीब बहाने बना दिये। मुझसे कहा गया कि क्या माता पिता के रहते बच्चे नहीं पढ़ते मैंने कहा बिलकुल पढ़ते हैं यदि वे वहाँ पहले से रह रहे हों परन्तु परीक्षा के समय बदली हुई परिस्थितियों में ढालना मुश्किल होता है, गमी के समय लोगों का आना जाना भी लगा रहेगा।वही हुआ बेटियाँ बातें बना  के  चली गईं और वे सीधे हमारे घर आये। ग्वालियर में इतना सुनने के बाद मेरा उन्हें देखने का भी मन नहीं था। अपने को समझाया अंदर से क्षोभ था पर उनके लिये व्यवस्था तो करनी ही थी। सहानुभूति के लिये लोग आते जाते रहे। तनु पढ़ती रही परीक्षा भी दी। नीता को लेकर ये आये छोड़ने दिनेश भैया गये। इसी बीच नीता के ससुर चल बसे शायद बेटे का ग़म ही ले गया।

 

धीरे धीरे सब सामान्य हो रहा था परन्तु ग्वालियर से उनकी पुरानी गृहस्थी एकदम उखाड़ना भी इतना आसान नहीं था। दो  तीन बार कभी ये कभी दिनेश भैया उन्हें लेकर ग्वालियर गये वहाँ कुछ सामान बाँटा कुछ बेचा। हम लोगों के घरों में सामान की जगह ही नहीं थी जैसे तैसे एक मेज़ रक्खी वह भी कटवानी पड़ीथी। घर खाली करने के बाद मकान बेचना भी आसान नहीं था ।दोनों भाई अपने कामों में अति व्यस्त होने के बावजूद इन कामों के लिये समय निकाल रहे थे। मकान के जो दाम लग रहे थे वह चाचा जी और चाची जी को  कम लग रहे थे। ये दोनों चाहते थे कि काम निपटे क्योंकि समय की कमी थी। ये बात चाचा जी और चाची जी को  पसंद नहीं आ रही थी। एक बार चाचा जी ने कहा तुम ही लोगों के लिये तो कर रहे हैं, इन दोनों ने कहा फिर तो कुछ परेशान होने की ज़रूरत नहीं है,हमें कुछ नहीं चाहिये। वातावरण का तापमान कुछ बढ़ा रहता था और मैं  जयश्री इस बात में चुप ही रहते थे।

 

एक रिश्तेदार ग्वालियर में रहते थे जो प्रॉपर्टी का ही काम करते थे उनके ज़रिये मकान बेचने का निश्चय किया। उन्होंने एक दो चक्कर दिल्ली के लगाये, इन लोगों को जाना नहीं पड़ा और जैसे तैसे वह मकान बिक गया। अब चाचा  जी चाची को लगा कि उन रिश्तेदार ने कमीशन ली होगी। इन्होंने समझाया कि ये उनका काम है, मेहनत की है तो कमीशन लेना उनका हक है, ली भी है तो ग़लत क्या है। हर व्यापारी जान पहचान के लोगों से यही कहता है कि उस डील में उसने कुछ नहीं कमाया। उसने मुनाफा लिया तो भी ठीक है, ये उसका व्यवसाय है और आपके लिहाज़ में नहीं लिया तो भी ठीक है। आपका काम हो गया बस इतना काफ़ी है ,परन्तु इसके कारण घर में बेवजह तनाव बना रहा। अपनी ज़रूरतों के लिये लगभग 60% पैसा अपने पास रख के बाकी उन्होंने तभी अपने 6 बच्चों में वितरित कर दिया। दिनेश भैया का लक्ष्मी  बाई नगर का घर हमारा सरोजनी नगर का घर पास ही था।  अब जयश्री भी आ गई थी तो ये लोग वहाँ रहने चले गये थे। कुछ समय बाद दिनेश भैया को ईस्ट किदवई नगर में फ्लैट मिल गया था। बैडरूम तो दो ही थे पर कुछ बड़ा था। बच्चे ड्राइंग रूम में पढ़ लेते थे।

 

तनु का कालेज हो गया था दो साल प्रथम श्रेणी के अँक थे इस बार अंतिम परीक्षा में कुछ अंको से प्रथम श्रेणी छूट गई। इकनाॉमिक्स ऐम. ए, जे.ऐन.यू मे मिल गया था पर ये कम्प्यूटर में कुछ करना चाहती थी इसलिये साउथ ऐक्सटैंशन में ऐन. आई. आई. टी में दो साल के डिप्लोमा के लिये दाख़िला ले ले लिया। समय बीत रहा था तनु को छोड़ने साउथ ऐक्सटैंशन जाने आने के बीच कभी कभी जयश्री के घर कुछ देर के लिये रुक जाती थी । चाचा जी और चाची बीच में कभी कभी कुछ सप्ताह हमारे यहाँ आकर भी रुक जाते थे। दोनों का व्यवहार  किसी से बुरा नहीं था पर चाची जी एक बेचारगी का लबादा ओढ़े रहती थी। बहुओं का साथ बैठाना अभी भी उनकी मानसिकता में नहीं बैठा था।  हम लोग अब सिर नहीं  ढकते थे, सलवार सूट पहनते थे, ये बात पचाना भी उनके लिये मुश्किल था। हम वैसी बहुएं नहीं थे जिनकी उन्होंने कल्पना की होगी कि सिर ढक के खनकती चूड़ियों के साथ, सिंदूर भरी माँग होगी, बहू उनके पैरो में तेल लायेगी या पैर दबायेगी।  बहुओं का दर्जा सास ननद से नीचे होता है, ये बात स्वयं वे कह चुकी थीं। चाचा जी को न जाने कौन सा कष्ट साल गया था कि बेटे के घर में आराम से रहते हुए एक बार उन्होंने कहा  ( बहुत लोग कहते हैं) कि बेटियाँ सदा अपनी रहती हैं बेटे शादी के बाद पराये हो जाते हैं। मेरे अंदर तक आग लग गई थी, जी में तो आया कि अभी कहूँ कि  सामान बाँधे और किसी भी बेटी के यहाँ चले जायें पर हम दोनों बहुएं ऐसी नहीं थी,  अपमान सहकर भी रिश्तों का मान रखा ।

 

एक बार मुझे उन दोनों को अपने घर से दिनेश भैया के घर छोड़ना था, मैंने कहा आप दोनों में से कोई एक आगे आ जाये,पर दोनों ने मना कर दिया कि और कहा वे पीछे ही बैठेंगे। भला बहू के बग़ल में कैसे बैठते! मैं अंदर तक छिल गई थी। ये हमेशा ऐसी बातों को अनदेखा अनसुना करने को कहते थे, पर मैं ऐसा नहीं कर पा रही थी। जब भी कोई और ड्राइविंग सीट पर होता था तो सबसे पहले चाचा जी आगे ही बैठना चाहते थे। मैं मान भी लूँ कि उन्हें आगे की सीट खाली होने के शिष्टाचार के बारे में नहीं पता था तो भी मेरे कहने पर तो आगे आ सकते थे। जब बहुओं को आप इज़्जत नहीं देंगे तो आपको इज़्जत मिलेगी कैसे?  हाँ फ़र्ज़ अदायगी में कभी कोई कमी नहीं की न मैंने न जयश्री ने।

 

आत्मकथा सिर्फ घटनाओं का ब्यौरा नहीं होती। यहाँ भावनायें, संघर्ष, किरदारों का संप्रेक्षण और संवेग भी होते हैं। आत्मकथा लिखने वाले का सच्चा नज़रिया होती है इसलिये लिखना शुरू किया है तो सच ही लिखना पड़ेगा। सच कभी कभी कड़वा होता है, पर आत्मकथा लिखने के लिये ये जोखिम उठाना पड़ेगा,अन्यथा आत्मकथा पर आधारित उपन्यास लिखा जा सकता था, जिसमें थोड़ा झूठ थोड़ी कल्पना मिलाकर उसे रोचक बनाया जा सकता है।

 

कमी कहीं न कहीं मुझमें भी रही होगी क्योंकि जो जैसा है उसे वैसा ही मैं स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मेरे अंतर्मन में कहीं न कहीं कुछ धाव रिस रहे थे। दवाइयाँ दर्द निवारक का काम कर रहीं थी, जिससे सब सामान्य लगता था, पर भीतरी परतों में जो दर्द पाल रखे थे उनका जड़ से इलाज होना बाकी था।

 

लखनऊ में हमारा मकान बन चुका था। भाभी और चाची जी की बहुत इच्छा थी कि गृह प्रवेश किया जाये।1993 में अक्तूबर के महीने में  यह काम संपन्न हुआ। लखनऊ में हमारी जान पहचान के तो बहुत लोग नहीं थे। मेरे दोनों भाई और बड़ी ननद लखनऊ में ही थे। नीता को छोड़कर बाकी सभी परिवार के लोग आये जिन्हें मेरे दोनों भाइयों के घर ही ठहरना था। भाभी किसी केटरर को भी मुख्य लंच का ऑर्डर नहीं देना चाहती थीं बल्कि एक कुक का इंतज़ाम किया था जिसको सब सामग्री लाकर देनी थीं। दोनों घरों में दो दिन मेहमानों के ठहरने की  व्यवस्था करनी थी,इसलिये मैं एक सप्ताह पहले ही लखनऊ चली गई। भैया के बाहर वाले कमरे में किराये दार रहते थे जो रंगकर्मी कलाकार थे। रात को वे ज़ोर ज़ोर से संवाद रटते थे और अभ्यास करते थे। मेरी नींद पूरी नहीं हो पाती थी। दिन में सब प्रबंध करने होते थे। जब तक गृह प्रवेश का समय आया मैं काफ़ी थक चुकी थी।येदो दिन पहले चाचा जी चाची जी और ये बच्चों के साथ पँहुच गये। दिनेश भैया रमा दीदी को सुरेन भैया के घर ठहराया था। उमा दी और भाई साहब कहीं और ठहरे थे। दोनो भाभियों का काम बहुत बढ़ गया था पर वे दोनों सब ख़ुशी ख़ुशी कर रहीं थीं। मैं जितना सहयोग कर सकती थी कर रही थी।

 

यद्यपि मेरी आस्था दयालबाग़राधास्वामी सत्संग में कभी नहीं थी ,पर भैया की आस्था का मान रखने के लिये एक दिन पहले नए मकान में हमने सत्संग किया। किसी बाहर के मेहमान को आमंत्रित नहीं किया, दोनों घरों में जितने लोग ठहरे थे वही लोग थे। इतने लोगों का खाना तो बनना ही था, हमने उसका प्रबंध बाहर से नए मकान में कर लिया था। सत्संग की बात सुनकर चाचा  जी ने कहा कि हमें  सत्संग करवाने की क्या ज़रूरत है। हमें उन्हें यह भी समझाना पड़ा कि मकान बनवाने में भैया का कितना सहयोग रहा है और ये आयोजन भी मेरे दोनों भाइयों के घर से हो रहा है इसलिये उनको मान देने के लिये केवल एक घंटा आप वहाँ बैठ सकें तो अच्छा है।

 

अगले दिन हवन पूजन और मुख्य आयोजन था कुल 50-60 लोग होंगे।  भोजन बनाने की वहीं व्यवस्था थी। पूजा के समय मैं, ये और चाचा  जी चाची जी तो हवन के लिये आगे बैठे थे। मैं वहाँ से उठ नहीं सकती थी। ये देखकर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि दोनों भाभियाँ लगातार चाय पानी की व्यवस्था में लगी हुईं थी ।चाची  जी अपने दामादों और बेटियों को बार बार आवाज़ देकर बुलाती रहीं कि हवन में आगे आकर आहूति दें पर मेरे दोनों भाई या भाभी से किसी ने ऐसा नहीं कहा।  मैं क्रोध में थी, मुझे सूझा ही नहीं कि मुझे  ही उन्हें बुला लेना चाहिये था। किसी और से ऐसी उम्मीद क्यों करना……… और फिर उस उम्मीद से ख़ुद को दुखी करना,संभवतः मेरा ही व्यक्तित्व दोष था। अपने व्यक्तित्व के इस दोष को मैंने बाद में बहुत सुधारा है।

 

हवन पूजा के बाद भाभी ने चाची जी से कहा कि वे बड़ी हैं इसलिये सबसे पहले वे हमें टीका लगाकर आशीर्वाद दें, चाची जी ने कहा वे लोग टीका नहीं करेंगे सब लोग पहले ही उपहार दे चुके हैं। ये सही था कि वे सब उपहार दे चुके थे, जो रिवाज था उसके मुताबिक  100-50 रु से टीका करने में क्या जाता। अब भाभी को भी कुछ बुरा लगा और उन्होंने कहा कि वे लोग करें न करें पर भैया भाभी टीका भी करेंगे और उपहार भी देंगे। भैया तो मज़ाक करते रहते थे, धीरे से मुझसे बोले कि तुम्हारी बारात का दूसरी बार स्वागत किया है। पूजा के समय जितनी फोटो खींची गई कहीं मेरे भाई भाभी नज़र नहीं आये। बाद में हमने उनके साथ एक तस्वीर खींचीथी।

 

शाम तक सब लोग शशि बीबी के घर चले गये थे। अगले दिन हमें भी रात की ट्रेन से दिल्ली के लिये रवाना होना था। हमारे साथ चाचा जी चाची जी को आना था। बाकी लोग एक दो दिन रुककर लखनऊ से जाने वाले थे। जब घर से चली तो मैं बहुत थका हुआ महसूस कर रही थी। स्टेशन पहुँचने से पहले ही मैं सो गई…………. या बेहोश हो गई। मुझे स्टेशन पर किस तरह पहुँचाया गया और अगले 7-8 दिन कैसे बीते मुझे नहीं पता. मैं शायद गहरी नींद में रही परन्तु घर वालों ने जो बताया वह अलग ही व्यवहार था।मैं किसी को पहचान नहीं रही थी, कभी कोई गाना गुनगुना लेती पर अपने से कट चुकी थी बेतुकी आवाजें निकाल रही थी। लखनऊ स्टेशन पर दिनेश भैया चाचा  जी चाची जी को छोड़ने आये थे। उनका टिकट बनवा लिया और अपने साथ ले लिया था ।चाचा जी चाची जी को उमा दी के घर भिजवाया था। जयश्री भी अगले दिन आ ही गई और मेरी देख भाल में लग गई थी।मुझे मनोचिकित्सक को दिखाया गया दवाइयाँ दी गईं। सात आठ दिन बाद मुझे होश आया परन्तु मैं वे आठ दिन भूल चुकी थी, जो परिवार पर बहुत भारी पड़े थे। मैं धीरे धीरे सामान्य हो रही थी परंतु दवाइयाँ लम्बे समय तक चलनी थीं। मेरी बीमारी से मुझसे ज्यादा परिवार के और लोग घबराये हुए थे।

 

जब हम जवान होते हैं तो बहुत सी सामाजिक बुराइयों के बारे में सोचते हैं पर कुछ कर नहीं पाते क्योंकि परम्परा के नाम पर हमारा मुंह बन्द करा दिया जाता है।  दहेज जैसी ही उसकी चचेरी बहन भात की परम्परा है। नाम अलग अलग समुदायों में अलग अलग अलग होंगे पर किसी न किसी रूप में ये परम्परा शायद सभी जातियों में है। कभी इसका औचित्य भी रहा होगा जो अब समाप्त हो चुका है। पहले माता  पिता की चल अचल संपत्ति में बेटियों का कोई हिस्सा नहीं होता था। बेटियों को पढ़ाया भी कम ही जाता था, इसलिये समय समय पर उपहार या नकद देकर ससुराल में उनकी मान प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये ये परम्परायें बनी थीं। बेटियों के बच्चों के विवाह तक नाना नानी जीवित हों या न हों इसलिये भात की परम्परा निभाना मामा का कर्तव्य हो गया।

 

दिव्या की शादी में तो ये गुवाहाटी से जल्दबाजी में आये थे तो हम पर इसके लिये कोई दबाव नहीं बनाया गया न हम इस रस्म में शामिल हुए और न हमसे कोई उम्मीद की गई बस ये ही कहा कि जो कुछ करना था नाना नानी ने कर दिया। अब 94 में शशि बीबी के बेटे अनुराग और 96 में उमा दी के बेटी प्राची की शादी में भी भात देने के सवाल उठे। हमारे इनकार के बाद भी रस्म तो हुई ही पर मैंने उसमें शिरकत नहीं की,क्योंकि मेरा विरोध परम्परा से था।10- 15 हज़ार रु के ख़र्च से नहीं। हर शादी में वाजिब उपहार या नकद तो दिया ही था।

 

इन परम्पराओं को तोड़ना इतना आसान नहीं होता, अपनों का छुपा आक्रोश सहना पड़ता है,  जिसके लिये मानसिक दृढ़ता की जरूरत होती है, अपनी बात पर टिके रहने के लिये बहुत सी मानसिक शक्ति व्यय करनी पड़ती है। ऐसे में एक तरफ़ कुआँ और दूसरी तरफ़ खाई वाली स्थिति हो जाती है। एक तरफ़ आपके अपने आपसे  नाराज़ होते हैं दूसरी तरफ़ आप अपनी विचारधारा  के विपरीत कुछ करते हैं तो आप अपनी नज़र में गिरने लगते हैं।

 

मुझे लगता था कि जब हम ‘देने’ वाले पक्ष में होते हैं तो परम्परा को तोड़ना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन जब हम ‘लेने’ वाले पक्ष में होते हैं तो लेन देन की इन परम्पराओं को आसानी से तोड़ सकते हैं,मेरी ये धारणा आगे जाकर बिलकुल निर्मूल सिद्ध हुई।इसके बारे में उचित संदर्भ गे साथ अगले किसी अध्याय में अवश्य चर्चा करूँगी।

 

जब अपूर्व नवीं कक्षा में आया तब हमने सरोजनी नगर से ऐस.पी. मार्ग की कालोनी में शिफ्ट किया। तनु तो कॉलिज पूरा कर ही चुकी थी अब अपूर्व के लिये स्कूल दूर हो गया परंतु अब बड़े मकान में जाने का मन बना लिया था। हमने भूतल पर मकान माँगा था पर वहाँ कायदा था कि पहले आपको प्रथम तल पर मकान मिलेगा तब आप भूतल के हकदार होकर उसकी लाइन में लगेंगे। सरकारी कायदे क़ायदा मानने वालों के लिये ही होते हैं, भले ही उनकी कोई भी समस्या हो, जो कायदा नहीं मानते उनके पास,क़ायदा न मानने के सब तरीके होते हैं।  हम इंतज़ार करने को भी तैयार थे पर हमें बताया गया कि कायदा है, वही करना होगा। शुरू में हमें ऊपर ही जाना पड़ा। डेढ़ साल वहाँ निकाला, परेशानी तो थी, ख़ासकर काम के बाद तनु जब लौटती तो सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल होता था,बेहद थक जाती थी। नीचे का मकान मिला तब तक अपूर्व दसवीं में आ गया था। नीचे का घर पास वाले ब्लॉक में ही मिल गया था।

 

बचपन में तनु को लेकर हम जगह जगह इलाज के लिये घूम चुके थे। अब के इसके किसी दोस्त ने बताया कि विशाखापट्टनम में कोई डॉक्टर है जो ऐसे बहुत से लोगों का इलाज कर चुका है। हमने सोचा अपने मन से तो बहुत कर लिया अब यह कुछ चाहती है तो उसे भी ज़रूर करेंगे, उस समय इंटरनैट नहीं था पर रेल का नेटवर्क पूरे भारत में है। वहाँ से पता किया उस डॉक्टर के बारे में तो यही पता चला कि इस किस्म के मरीज़ वहाँ दूसरे शहरों से भी बहुत आते हैं।

 

गर्मियों की छुट्टियों में हम वहाँ गये और रेलवे के गैस्ट हाउस में रुके। डाक्टर के साथ समय पहले ही नियुक्त करवा लिया था। डॉक्टर से मिले, उसने कोई आश्वासन तो नहीं दिया पर कहा कि कई ऑपरेशन करने पड़ेंगे और बार बार वहाँ आना पड़ेगा। वहाँ पर इस तरह के मरीज़ बहुत गंभीर और गंदी जगहों पर सड़कों पर पड़े हुए थे। कुछ डॉक्टर से मिलने के लिये, कुछ ऑपरेशन कराने के लिये। पूरा वातावरण गंदगी भरा था। मैं वहाँ मूर्छित होकर गिर पड़ी थी। कुछ देर बाद होश आ गया। तब हमने निश्चय किया कि वह सही जगह नहीं है। ऑर्थोपैडिक सर्जन अगर कुछ कर सकते हैं तो दिल्ली में ही क्यों नहीं विशाखापट्टनम में क्यों!

 

विशाखापट्टनम में आसपास की जगह देखी, रोज़ समुद्र  तट पर जाकर बैठ जाते, आते जाते जहाज़ देखते रहते थे। शॉपिंग की…….. दो दक्षिण भारत की सूती साड़ियाँ ली थीं जो अभी कुछ दिन तक मेरे पास थीं। तीन दिन बाद दिल्ली वापिस चल दिये।

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बीनू भटनागर

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