छोटी सी उलझन

स्त्री विमर्श के इस दौर में एक मांग पुरुष विमर्श की भी उठने लगी है | ऐसा रातों -रात नहीं हुआ पर ये सच्चाई  है की  पुरुष भी शोषण का शिकार हो रहे हैं | कई  बार वो जान बूझ कर परिवार की शांति के लिए चुप रह जाते हैं वहीं से मानसिक शोषण शुरू होता है |भले ही आप और हम उसे विमर्श की श्रेणी में रखे या न रखे पर इस पर बात जरूर होनी चाहिए | “छोटी सी उलझन’ एक ऐसी ही कहानी है |

छोटी सी उलझन

कहाँ गलती हो गई मुझसे?” रेखा का ऐसा रूप देखकर विकास सकते में था। सात वर्षों के वैवाहिक जीवन में आज पहली बार उसे एहसास हुआ कि कहीं उससे गलती तो नहीं हो गयी।
आज वो अपने कमरे में अकेला लेटा यही सोच रहा था। एक छोटी सी बात का बतंगड़ बन गया था, सुबह वो ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था तभी रेखा ने बात छेड़ दी।
“कहा ना मैंने कि गाँव की जमीन बेचकर यहाँ शहर में जमीन ले लेते हैं पर तुम्हारे कान पर तो जूं ही रेंगती।” रेखा की हर बात मानने वाला विकास उसकी ये बात सुनकर भड़क उठा—
“आजकल रोज यही बात लेकर क्यों झिक-झिक करती हो? कितनी बार कहा मैंने की वो जमीन ही है जो हमें हमारे गाँव से जोड़कर रखे हुए है, कान खोलकर सुन लो मैं अपनी जड़ों से कटकर नहीं रह सकता, समझी ना तुम?”
विकास का लहजा सुनकर वो तिलमिला गयी, आखिर क्यों ना तिलमिलाए, विवाह के सात वर्षों में पहले कभी विकास ने उससे इस तरह से बात नहीं  की थी। अपनी बात की अवहेलना उससे सहन नहीं हो रही थी। वो उठी और चिल्लाते हुए बोली—
“रहो तब अपनी जड़ों के साथ मैं कुहू को लेकर मम्मी के यहाँ जा रही।” कहने के साथ ही वो अपना और कुहू का सामान पैक करने लगी। विकास भी बिना कुछ बोले आफिस के लिए निकल गया।

   शाम को जब विकास आफिस से वापस आया तो रेखा सच में बेटी को लेकर अपनी माँ के घर चली गयी थी। अकेला विस्तर पर लेटा विकास पंखे को एकटक देखे जा रहा था। नींद उसकी आँखो से कोसों दूर थी। बचपन से लेकर अबतक का अतीत उसकी आंखों के सामने से गुजर रहा था।
पिताजी गाँव में स्कूल मास्टर थे और माँ एक गवईं गृहणी। मां का अनपढ़ होना पिताजी के लिए जीवन भर का कलंक हो गया था, जिसे मिटाने के प्रयत्न में वो हमेंशा मां का तिरस्कार करते रहे। पिताजी जी की दृष्टि में मां जीवन भर केवल एक नौकर ही रही। जब वो छोटी-मोटी भूलों पर भी मां को बुरी तरह लताड़ देते, तो फिर घर या बच्चे के विषयों में मां को कैसे शामिल करते। विकास ये सब देखते हुए बड़ा होता रहा और मां को कभी चुप रहते तो कभी पानी सर से ऊपर निकल जाने पर पिताजी से लड़ते हुए भी देखा।
विकास के कोमल मन पर मां की स्थिति का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने कभी भी किसी स्त्री को स्वयं से नीचा नहीं समझा।
विवाह के बाद उसने अपनी पत्नी को वो सारे मान सम्मान देने की भरसक कोशिश की जो उसकी माँ को कभी नहीं मिले। इसके लिए मित्रों और स्वजनों से अक्सर उसे कटाक्ष भी सुनने पड़ते रहे थे, जैसे- “बीवी से तो इसकी फटती रहती है”,..”बिना बीवी की सहमति के एक कदम नहीं उठाता”… सबसे प्रसिद्ध वाक्य- “जोरू का गुलाम है” आदि। वो सबकी बात हँसी में उड़ा देता क्योंकि उनकी बातों से अधिक उसे अपनी गृहस्थी प्यारी थी।
अच्छे शहर में अच्छी नौकरी, एक समझदार और सुघड़ जीवनसाथी…जिंदगी अच्छी चल रही थी। मां और पिताजी भी बहुत खुश थे। बस जब वो पत्नी के साथ गाँव जाता तो पिताजी उसे एक ही बात समझाते कि औरतों को ज्यादा सर नहीं चढ़ाना चाहिए। वो उनकी बात पर कुछ बोलता नहीं बस मुस्कुरा कर टाल जाता। उसे एक आत्मसंतुष्टि थी कि उससे जुड़े उसके सारे रिश्ते खुश हैं।
रेखा भी एक सुलझी स्त्री थी। घर परिवार और रिश्तों में अच्छा संतुलन बनाकर रखती। पिता के सेवानिवृत्ति के बाद वो मां पिताजी को अपने साथ ही शहर ले आया, रेखा ने कोई आपत्ति नहीं की बल्कि उनकी देख-रेख बहुत अच्छे से कर रही थी।
इसी बीच उसके गर्भवती होने पर घर में खुशी का माहौल रहने लगा। गर्भावस्था से लेकर कुहू के जन्म के बाद तक मां ने दोनों की देखरेख बहुत कुशलता से सम्भाल ली थीं जिससे वो भी बिल्कुल निश्चिंत हो गया था।
बेटी के जन्म के बाद से स्थिति कुछ बदलने लगी, विकास को रेखा के व्यवहार में एक अलग तरह का आभास मिलने लगा। उसने उसकी धीरता को भीरुता समझना आरम्भ कर दिया। अब तो घर के सभी निर्णय रेखा द्वारा ही लिये जाने लगे, उसे केवल सहमति का मुहर लगाना होता। घर के निर्णय तक तो सही रहा पर अब तो वो बाहर के निर्णय भी स्वयं लेने लगी, विकास घर में शांति बनाए रखने के लिए थोड़ी फेरबदल के साथ उसके निर्णयों पर चलने भी लगा,  जबकि अभी तक कोई भी निर्णय, उनदोनों की सहमति से, आपस मेें बात करके लिया जाता रहा था।

बेटी क्या खाएगी, क्या पहनेगी, उसे किस वस्तु की आवश्यकता है, मां को कितने की साड़ी आनी चाहिए पिताजी का इलाज किस डॉक्टर से करवाना है, उसे क्या पहनना है, किस रिश्ते पर अधिक ध्यान देना है किसपर नहीं देना है, ये सभी निर्णय रेखा द्वारा लिया जाने लगा था।
यहाँ तक भी ठीक था पर उसे पहली बार बुरा तब लगा जब पिताजी के आकस्मिक निधन के बाद अंतिम संस्कार के लिए रेखा ने गाँव में मृत्युभोज करने के लिए मना किया।
“क्या जरूरत है गाँव में जाकर इतनी तामझाम करने की?” रेखा ने विरोध किया।

“कैसी बात करती हो वहीं पिताजी के सभी परिचित हैं, सारे नाते रिश्तेदार हैं, अगर वहाँ नहीं करेंगे तो दुनिया क्या कहेगी।” वो पहली बार रेखा से रूखे शब्दों में बात किया था।

“देख लो, तुम्हारे भले के लिए ही कह रही थी। क्योंकि ये वक़्त और पैसे दोनों की बर्बादी है।” अनमने मन से रेखा ने कहा था।
ऐसे ही एकदिन कुहू के स्कूल के लिए बात उठी-
“बगल में एक प्ले स्कूल है हम कुहू का एडमिशन वहीं करा देते हैं….”
“नहीं, मेरी बेटी ऐरे गैरे स्कूल में नहीं पढ़ेगी, सिन्हा जी की बिटिया जिस स्कूल में जाती है वहाँ बहुत अच्छी व्यवस्था है, कल ही उनकी पत्नी बता रहीं थी।” रेखा उसकी बात काटते हुए बोली।
“यार! अभी इतनी छोटी बच्ची को उतना दूर भेजने की क्या जरूरत है? थोड़ी बड़ी हो जाने दो फिर उस स्कूल में डाल देंगे।” उसे समझाते हुए विकास बोला।
“नहीं कुहू का एडमिशन उसी स्कूल में होगा, मैंने कह दिया ना।” आखिर में रेखा के जिद के आगे उसे झुकना पड़ा।
ऐसे ही ट्यूशन टीचर रखने की बात पर भी दोनों की बहस हो गयी थी। पर होता वही जो रेखा कहती। आज जो हुआ विकास को  उसकी उम्मीद नहीं थी कि रेखा अपनी जिद मनवाने के लिए घर छोड़कर चली जायेगी। खुद से जूझते हुए उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर गलती कहाँ हुई? आज उसके ही घर में उसके अस्तित्व के कोई मायने नहीं दिख रहे थे। उसे बार-बार पिताजी की बात याद आ रही थी।
वो उठ बैठा, बोतल से पानी पिया और लेट गया, सोना चाहता था पर नींद भी रेखा की तरह उससे रूठ गयी थी शायद।
औरतों के साथ अन्याय होता आ रहा है ये तो सबने अपनी आँखों से देखा है पर आज वक़्त बदल रहा है, आज की पीढ़ी के पढ़े लिखे अधिकांश आदमी औरतों को बराबर समझ रहे, हर जगह साथ में काम कर रहे चाहे घर हो या बाहर। उसने भी रेखा को कभी कम नहीं समझा जबकि लोगों द्वारा उसका मजाक भी बनता रहा। तो क्या उसकी समझौतावादी प्रवृति ने उसे आज यहाँ लाकर खड़ा कर दिया? स्त्रीवादी सोच की नजर क्या कभी इस दिशा में भी पड़ेगी?

कविता सिंह

भनक

उसका जवाब

एक डॉक्टर की डायरी – उसकी मर्जी

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