भीतर बहुत भीतर- विवेक मिश्र की कहानी पर प्रतिक्रिया

 

 विवेक मिश्र जी एक जाने-माने कथाकार हैं। उनकी कहानियों में विषय और शिल्प का वैविध्य देखने को मिलता है, तो लोक की बोली-बानी और किस्सागोई भी। मैंने उनकी कई किताबें पढ़ीं हैं। ‘गुब्बारे’, और ‘गिलहरियाँ बैठ गई’, ‘घड़ा’, ‘थर्टी मिनट्स’ , ‘कारा” आदि कहानियाँ अभी भी जेहन में वैसी ही बसी हैंl जहाँ ‘कारा’ में उन्होंने बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग किया था वहीं “भीतर बहुत भीतर” में वे अलहदा शिल्प लेकर आए हैं। किसी अमूर्त चित्रकला सी चलती ये कहानी धीरे-धीरे खुलती है और पाठक को अपनी जकड़ में ले लेती है। कहानी का शिल्प इसके मूल पाठ के अंतर्गत कई अन्य पाठों की स्वीकृति भी देता है। प्रस्तुत है  हंस में प्रकाशित उनकी कहानी ‘भीतर बहुत भीतर” पर मेरे विचार 

विवेक मिश्र जी की हंस में प्रकाशित कहानी ‘भीतर बहुत भीतर’ पर प्रतिक्रिया

               स्त्री विमर्श और पितृसत्ता ये ऐसे विषय हैं जिनपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन विवेक जी की ये कहानी एक पुरुष के अपने अंतर्मन में गहरे उतरने की कहानी है। ये पुरुष के अपने अहंकार की स्वीकृति का इकबालिया बयान है। 

आज भी प्रश्न वही पुराना है कि स्त्री और पुरुष आज भी समभाव से सहयात्री क्यों नहीं बन पा रहे हैं, सत्ता का दंभ कहाँ से आ रहा है? क्यों सभ्यताओं के विकास के क्रम में पुरुष में अभी भी वही आदि ग्रंथियाँ  छिपी रह गईं है, भले ही समय के साथ उसने अपनी भाषा पर औदार्य का मीठा मुलम्मा चढ़ाना सीख लिया हो। 

ये सदियों पुरानी उस लिपि की शिनाख्त की कहानी है, जिसके लिए एक संवेदनशील पुरुष राजपथ छोड़ कर अतीत की खाइयों में प्रवेश करता है। इस अंधेरे संसार का सारा खेल तो उसी का रचा हुआ है, भाषा उसकी, चौपड़ उसकी, पासे उसके, जिस पर दाँव पर लग रही है स्त्री…  जिसके हिस्से सिर्फ हार लिखी है। ये कहानी तलाशती है पुरुष मन के उस अंतरतम कोने को जहाँ स्त्री एक प्रस्तर से अधिक कुछ नहीं। एक संवेदनशील स्पर्श ही उसको मानवी स्त्री में परिवर्तित कर सकता है। 

विवेक मिश्र

मैं इस कहानी में मोनोलॉग नहीं एक आध्यात्मिकता देखती हूँ, ये “मैं” की यात्रा है, जहाँ पुरुष अपने भीतर झाँकने का साहस करता है, अपनी चालों कुटिलताओं को समझता है l भाषा और संवेदना के स्तर पर बदले हुए पुरुष में भी कहीं ना कहीं पितृसत्ता विद्धमान है, उसे चिह्नित करता है। अपने अभिमान को विलगित कर बार-बार खुद को जन्म देने के माध्यम से कहानी एक नए पुरुष की संभावना के प्रति आश्वस्ति भी जगाती है। 

सांकेतिक भाषा, गुंफित शिल्प में लिखी ये संश्लिष्ट कहानी विवेक मिश्र जी की कथा यात्रा को कई पायदान ऊपर ले जाती है। भाषा में लालित्य है। मुझे लगता है कहानी के लिए उन्होंने सही शिल्प का चयन किया है। निश्चित तौर पर इसे लिखना और पढ़ना लेखक और पाठक दोनों से थोड़ा भीतर प्रवेश करने के धैर्य  की माँग करता है। लेकिन कहानी पढ़ने के बाद पाठक को कुछ दे कर जाती है, यही कहानी की सफलता है। 

एक अच्छी कहानी के लिए विवेक मिश्र जी को बधाई

वंदना बाजपेयी 

वंदना बाजपेयी

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