“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥”
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 27)
कितने जन्मों और कितनी बार मृत्यु से गुजरते हम सब अनंत जीवन यात्रा के पथिक हैं। हमारी स्मृतियों में दर्ज वर्तमान जीवन उस अनंत यात्रा का एक टुकड़ा भर है। न जाने कितने मोह के धागों से बंधे हम इस सतत यात्रा में विछोह के दर्द से गुजरते रहते हैं। जो साथ नहीं हैं उनको स्मृतियों में सहेज लेते हैं। लेकिन कलम यहीं पर नहीं रुकती वह किसी अनदेखी सत्ता का प्रतिरोध उन स्मृतियों को शब्दों में ढ़ाल कर अमरत्व प्रदान कर करती है। यहाँ कल्पना का सहारा लिए बिना जीवन उसे रूप में दर्ज होता है। पूर्व में भी देशी-विदेशी साहित्य में हम ऐसे प्रयोगों से परिचित रहे हैं। कुछ नाम याद करूँ तो निराला की अपनी अट्ठारह वर्षीय पुत्री सरोज की याद में लिखी गई ‘सरोज स्मृति’ में उन्होंने पिता का अपनी पुत्री के प्रति प्रेम, वियोग की पीड़ा के साथ समाज पर कटाक्ष भी करते हैं। भाषा, शिल्प और गहनता के आधार पर इसे श्रेष्ठतम शोकगीतों में माना जाता है। वे लिखते हैं –
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण/कह—“पितः, पूर्ण आलोक वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,/‘सरोज‘ का ज्योतिःशरण—तरण—
वहीं अपनी प्रेमिका/पत्नी की स्मृति में लिखी गई जयशंकर प्रसाद की ‘आँसू’ में वे लिखते हैं कि –
मानस सागर के तट पर/क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती/कुछ विस्मृत बीती बातें?
जिसमें उन्होंने अपने प्रेम और वियोग की गहन पीड़ा को व्यक्त किया है, जिसे व्यक्तिगत दुःख से उठकर विरह से जूझते हर प्रेमी की पीड़ा का रूप दिया है। यहाँ उनकी पीड़ा आँसुओं की धारा बनकर आँखों से और शब्दों से भ निकली हैं।
हरिवंश राय बच्चन अपनी पहली पत्नी के विरह में “बीते दिन कब आने वाले” में लिखते हैं –
मेरी वाणी का मधुमय स्वर,/विश्व सुनेगा कान लगाकर,
दूर गए पर मेरे उर की धड़कन को सुन पाने वाले!/बीते दिन कब आने वाले!
ऋषि- हँसाते-रुलाते, प्रेरित करते सहज जीवन प्रसंग
संबंधित पुस्तक “ऋषि” स्मृतियों को सहेजती एक ऐसी ही पुस्तक है। मूल रूप से यह पुस्तक आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी जीवनी है। जहाँ एक माँ अपने ज्येष्ठ पुत्र के 34 साल के कालखंड को अमर कर देती है। लेकिन कथेतर गद्य में लिखी गयी यह पुस्तक उपरोक्त पुस्तकों से कई मायनों में भिन्न है। लेखिका किरण सिंह जी अपने भाव समर्पण पृष्ठ पर ही “तेरा तुझको अर्पण” के माध्यम से कर देती हैं। जीवन जिस रूप में सामने आया वे उसे वैसा-वैसा ही प्रस्तुत करती गईं। लेखिका का उद्देश्य पाठकों को रुलाना नहीं है, न ही अपना दुख पाठकों पर आरोपित करना है, न ही महिमा मंडन और न देश-काल, समाज के प्रति नैराश्य या व्यंग्य भाव है। अपितु कई स्थानों पर तो पाठक बाल सुलभ चेष्टाओं पर मुस्कुराएगा तो कहीं सब भूलकर हँस भी पड़ेगा। कई दृश्यों और प्रसंगों में रोचकता के साथ चुटीला अंदाज भी देखने को मिलेगा। ममता कालिया जी की ‘रवि-कथा’ याद आ जाएगी।
लेखिका एक सुखी सम्पन्न परिवार के सहज जीवन प्रसंगों से कथा को एक कुशल माली की भांति यूँ पिरोती हैं कि पाठक ‘ऋषि से जुड़ता जाता है। वह अपने घर का बच्चा बन जाता है। शरारतें करता, रूठता, हँसाता-मनाता, गलतियाँ करता और उनसे सीखता-सिखाता ‘ऋषि’ उत्तरोरतर तार्किक, परिश्रमी, समभाव से सबको देखने वाला युवा बनता जाता है। कहा जा सकता है कि व्यक्ति में समष्टि का दिग्दर्शन कराती है ‘ऋषि’। आगे बढ़ती इस कथा में पाठकों को पीढ़ियों की सोच का अंतर भी देखने को मिलेगा, तो काम के अत्यधिक दवाब में सेहत की अनदेखी करती युवा पीढ़ी भी। संगति का असर तो प्रेम प्रसंगों में भटकाव भी। बंगलुरु की आधुनिकता और एकाकीपन से बलिया की आंचलिकता संयुक्त परिवार तक सहजता से पुस्तक का ताना-बाना बुनते हैं। सारा विमर्श भी तो यहीं से उपजते हैं। सहकथा यात्री के रूप में लेखिका के व्यक्तित्व से भी परिचय मिलता है।
लेखिका ने बिना लाग-लपेट के जीवन प्रसंगों से बहुत बेबाकी से अपनी बात रखी है। भाषा की सरलता, सहजता, तरलता और प्रवाह पाठक को एक ही बैठक में पूरी पुस्तक पढ़वा ले जाती है। पाठक को पता ही नहीं चलता और पुस्तक अंतिम पृष्ठों पर पहुँच जाती है।
पुस्तक में पेज संख्या 34 पर वे लिखती हैं कि, “इस तरह सुनते-सुनाते, बोलते बतियाते समय अनुकूल चल रहा था। वैसे भी प्रतिकूल समय को अनूकूल बनाने का हुनर मैंने सीख लिया था। क्योंकि बचपन से ही दादी-नानी से सुनती आई थी कि, “रात के बाद दिन आता है और दुख के बाद सुख आता है। समय किसी का सगा नहीं होता। हमें समय के साथ चलना सीखना होगा।” मैं इस जीवन दर्शन को पुस्तक का प्रस्थान बिंदु मानती हूँ और मेरे लिए पुस्तक यहीं से खुलती है और क्यों का कारण स्पष्ट हो जाता है।
लेकिन क्या इसे लिखना इतना सहज रहा होगा। मनोविज्ञान कहता है कि जिस पीड़ा से निकलना संभव न हो उसे अपना लो। लेखिका स्वयं भूमिका में लिखती हैं-
“सच कहूँ, तो मैं क्रूर समय से हार मान गयी थी। मान गयी थी कि मैं कुछ भी नहीं हूँ। बस मैं एक मिट्टी की मूरत हूँ, जिसे किसी दिन मिट्टी में ही मिल जाना है। मिट्टी की मूरत से क्या अपेक्षा करना?
तभी, मेरी संगिनी ‘लेखनी’ मेरा हाथ थाम मुझसे कहती है-
‘उठो । तुम हार नहीं मान सकती । मैं हूँ तुम्हारे साथ। मैंने तुम्हारी आँखों से गिरे आँसुओं के एक-एक कतरे को एकत्रित कर लिया है।
‘मुझ पर भरोसा करो और लिखो।
मुझ डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। मैं समझ गयी कि वक्त का सामना करने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।
‘ऋषि कथा’ लिखना मेरे लिये बहुत कठिन काम था। कलम उठाती, लिखने का प्रयास करती और फिर धराशायी हो जाती। फिर भी मैंने कोशिश नहीं छोड़ी, क्योंकि मैं हारना नहीं चाहती थी। दो-चार पंक्तियाँ ही हर दिन लिख पाती थी। यही वजह है कि इस पुस्तक को तैयार करने में पूरे साढ़े तीन वर्ष लग गये।
चूँकि ‘ऋषि कथा’ को मैंने अपने अश्रुओं से लिखा है, इसलिए आप पाठकों की आँखों से आँसू का बहना स्वाभाविक है। लेकिन आपके अधरों पर मुस्कान भी खिलेगी, यह मेरा दावा है।“
पुस्तक का प्रारंभ ही वे शतरंज के खेल से करती हैं। शतरंज भी भाग्य की तरह का ही खेल है। कब कौन सा प्यादा पिट जाए और कब कौन सा प्यादा अंतिम घर में पहुंचकर वजीर में बदल जाए कहा नहीं जा सकता। प्रारबद्ध की सेनाओं द्वारा बुनी गयी शाह और मात ही जीवन का खेल है। खेलते जाना ही मन्तव्य है। लेखिका इसे चुनौती की तरह लेती हैं।
स्मृतियों के द्वार बचपन के गलियारों से होते हुए एक माह के प्रथम पुत्र के असमय वियोग तक खुलते जाते हैं। जब दुख से न निकल पाने पर दादी समझाती हैं कि, “रीना तुम खुद को ठीक रखो। तुम एक महीने के बच्चे का वियोग नहीं सह पा रही हो। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो ससुराल वाले तुम्हारे पति की दूसरी शादी कर देंगे पर तुम्हारे पिता अपनी 20 वर्ष की बेटी का वियोग कैसे सह पाएंगे?” दादी की बातों से लेखिका को स्त्री विमर्श से परिचय होता है। उन्हीं स्मृतियों को याद करते हुए लेखिका कलम पकड़ कर एक बार फिर साहस से प्रारबद्ध का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करती है। ये अंश पढ़ते हुए मैथिली शरण गुप्त बरबस याद आ गए। यशोधरा में वे लिखते हैं कि –
“स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -क्षात्र-धर्म के नाते”
लेखिका भी स्वयं को क्षत्राणी मानते हुए कथा की शुरुआत में गुरु दीक्षा की बात करती हैं । मुझे गुरु जी का यह कहना कि, “हर कोई हवा, पानी का एक निश्चित हिस्सा लेकर आया है। जो अपना हिस्सा जल्दी समाप्त कर देगा…” यह आज की बढ़ती हुई उपभोग की संस्कृति पर प्रहार करते हुए संरक्षण की जरूरी बात है। जिसे हम सब को याद रखना चाहिए। वहीं लेखिका ऋषि बचपन की बातें बहुत रोचक ढंग से संप्रेषित करती हैं। ऋषि की तीव्र बुद्धि, हर बात को पूर्णता से सीखने की प्रवृत्ति, भाई-भाई की नोक-झोंक, घर में कोई किसी से बात करना बंद नहीं करेगा और चुगली भी नहीं करेगा का रूल, तबादले वाली नौकरियों में बच्चों की शिक्षा में आई परेशानियाँ, ट्यूशन पढ़ने का दवाब और एक माँ का अपने बच्चे की शिक्षा दायित्व स्वयं अपने हाथों में लेना आदि प्रसंग सम्मिलित हैं। ऋषि के बाल सुलभ तर्क बहुत मनोहर लगते हैं। जैसे कि आरती की पंक्ति, “मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता” पर ऋषि कहता है, “मम्मी आप लोग भगवान को खुश करने के लिए अपने आप को गाली भी दे देती हैं?”
एक स्थान पर लेखिका स्वीकार करती हैं कि वे ऋषि की कथा पहले भी लिखना चाहती थीं पर ऋषि ने उन्हें यह कहकर रोक दिया था कि अभी और बड़े-बड़े काम करने दीजिए । फिर लोग खोज-खोज कर मेरे बारे में लिखेंगे। वह उसके जीवन के प्रेरक अंशों को कथा-कहानी का रूप देकर पहले भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती रहीं हैं। जो पाठकों द्वारा काफ़ी सराहे जाते रहे हैं। वैसे भी जीवन से बाद शिक्षक कौन है। हम भले ही कुछ गलत निर्णय ले लें पर हर निर्णय हमें यह सिखाता है कि क्या करना उचित रहता। ऐसे कई किस्से इस पुस्तक में पढ़ने को मिल जाएंगे। जैसे किशोरावस्था में विपरीत लिंगी तस्वीरों के प्रति सहज आकर्षण को एक मां के तौर पर उन्होंने सही ढंग से नहीं लिया। परंतु आज वे उस प्रसंग के माध्यम से माता-पिता को चेताती हैं कि भले ही हम सब अपने बच्चों को राम-कृष्ण की तरह देखना चाहते हों पर हमें इस उम्र के शारीरिक बदलावों के अनुसार उन्हें गलत समझने के स्थान पर वय के अनुसार उचित शिक्षा देनी चाहिए।
लेखिका ने उस समय के बिहार की तत्कालीन परिस्थितियाँ भी उठाई हैं। बच्चों की किडनैपिंग और पढ़ाई का अभिवावकों पर कितना दवाब रहता था। यूँ तो सारे भारत में बच्चों पर पेरेंट्स अपने सपने लादते हैं पर बिहार में ये दवाब कुछ अतरिक्त था। ये दवाब हमने नीलोत्पल मृणाल के “डार्क हॉर्स” में भी महसूस किया है। यहाँ वे अपने और अपने पति के मध्य इस मुद्देपर वैचारिक भिन्नता को उजागर करते हुए लिखती हैं कि, “यह समस्या सिर्फ मेरे ही पति की नहीं थी। अधिकतर पिता की उम्मीदें अपने बच्चों से बहुत अधिक होती है। इसलिए पिता को खुश कर पाना बच्चों के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है। पिता को बच्चों का हँसना और खेलना भी समय की बर्बादी लगती है।”

कृतिकार -किरण सिंह
आज परिवार टूट रहे हैं परंतु संयुक्त परिवार बच्चे के विकास में किस तरह सहायक हैं, ये पुस्तक पढ़ते हुए पता चलता है। दादा-दादी, नाना-नानी और मामा, मौसी, बुआ का लाड़ला ऋषि सबको साथ लेकर चलना सीखता है। हमारी परिवारों में संवाद का जो महत्व है और तार्किक दृष्टि से जिस तरह बुद्धि और विजन का विकास होता है उसका पता कथा सूत्रों से चलता है। वे लिखती हैं, “उसके दादा श्री बृज बिहारी सिंह उससे खेती बाड़ी, गाँव-गिराव की बातें करते तो नाना “श्री कुंज बिहारी सिंह (एडवोकेट) देश-विदेश, इतिहास-भूगोल, कोर्ट-कचहरी, राजनीति तथा खेल-कूद की बातें करते।”
जयदातर रोल मॉडल पिता होते हैं । लेकिन बच्चों को कैरियर में उनको अपने मन की सुननी चाहिए। लेकिन ऋषि अपने पिता की तरह इंजीनीयर ही बनना चाहता था। अपने सपने के पक्ष में उसकी दलील बहुत सुंदर है। वह कहता है-
‘मम्मी, डॉक्टर बीमारी का इलाज करके रुपये कमाता है, वकील किसी-किसी मामले में फँसने पर पैसे कमाता है, एक इंजीनियर ही है, जो सिर्फ और सिर्फ डेवलपमेंट की कमाई खाता है, इसलिये वह इंजीनियर बनना चाहता है।’
कथा में उत्तरोंतर ऋषि किसी फूल की तरह खिलता जाता है और उसके व्यक्तित्व के कई गुण सामने आते जाते हैं। लेखिका के पूजा पाठ का विरोध करता ऋषि भय और भगवान की अवधारणा प्रस्तुत करता है। पंडिताई के प्रपंच और जाति-धर्म समभाव की बात करता हुआ प्रगतिशील सशक्त तर्क रखता है। माँ और पुत्र की तार्किक बहसों के मध्य पंकज सुबीर की कविता याद आई, ‘पिता मैं तुम्हारा बुरा बेटा”। संभवतः यह दो पीढ़ियों का टकराव है और अपनी पसंद की जीवन शैली भी। जिसमें दूसरे के तर्कों के प्रति सम्मान भी होता है, और भावनाओं की मिठास भी। इसे पाठक अपने घरों से जोड़कर देख पाएंगें। लल्लन टॉप की ताज़ा बहस “क्या ईश्वर है?” की कुछ बहसें पाठक यहाँ भी देख सकते हैं। आस्तिकता और नास्तिकता के पैमाने के किसी बिंदु पर खड़े कुछ तथ्यों से टकरा रहें हैं। जातिगत मानसिकता आदि कुछ कंडीशनिग को तोड़ना ही बेहतर समाज के निर्माण में सहायक है। वहीं पुराना कुछ सार्थक लेकर आगे बढ़ना ही सही प्रगति है। “टाइम है मम्मी” कथा प्रसंग बहुत रोचक और युवाओं के लिए प्रेरणा दायक है। इसे लिखा भी बहुत आत्मीय और रोचक ढंग से गया है। यह स्थापित करता है कि रुचि के काम में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऋषि का यही जीवन दर्शन रहा है।
कुछ घटनाएँ भावुक करती हैं, जैसे लेखिका के अस्वस्थ होने पर ऋषि का उनकी जी-जान से सेवा करना और मातृ ऋण से मुक्त हो जाना। वहीं लेखिका महिलाओं की अपना स्वास्थ्य पीछे रखने की प्रवृत्ति का विरोध करती हैं कि स्त्री घर की धुरी होती है। उसके बीमार पड़ते ही पूरा घर प्रभावित हो जाता है। हिंदी भाषा, लोगों का झूठ बोलकर खुशी तलाशना, घरेलू सहायक के मनोभाव आदि कई प्रसंग बहुत संतुलित तरीके से आते जाते हैं। बंगलुरु में शिक्षा में आए व्यवधान,स्टूडेंट्स से झड़पें, भाइयों के प्रति अगाध प्रेम, सहायक के साथ मित्रवत व्यव्हार, अपनी गलतियों को सुधारते हुए अटूट परिश्रम करना और निरंतर सफलता की कीर्तिमान स्थापित करते जाना पुस्तक को ऐसे स्थान पर ले जाता है जहाँ पाठक भी माता-पिता की तरह संतुष्ट हो जाता है पर तभी काल का क्रूर आघात बहुत सी संभावनाओं के पुष्प खिलने से पहले मुरझा देता है। निशब्द कर देता है। आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के “70 आवर्स पर वीक” को प्रश्नों के घेरे में लेता है। सफलता की यह दौड़ सेहत को अनदेखा करने के दुष्परिणामों को चेताती है। वर्क लाइफ बेलेन्स अब किताबी नहीं जवाबी होना चाहिए।
अंत में यही कहूँगी कि “ऋषि” के माध्यम से लेखिका ने न केवल ऋषि को अमरत्व प्रदान किया है अपितु हँसाती-रुलाती सहज जीवन कथा के माध्यम से माता-पिता, युवाओं और बच्चों के कई प्रेरक प्रसंगों को भी कथा में सुगमता से गूँथ दिया है। सच्चाई, भाषा, रोचकता और प्रेरकता इस पुस्तक के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इस पुस्तक के लिए लेखिका को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ
वंदन बाजपेयी

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