स्पर्श रेखाएं

कहानी -स्पर्श रेखाएं

इससे पहले भी आप atootbandhann.com में वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानियाँ पढ़ चुके हैं | वो हमेशा एक नया सब्जेक्ट लाती हैं उसकी काफी रिसर्च करती हैं फिर पात्र के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक धरातल पर उतर कर कहानी लिखती हैं | ये कहानी भी एक ऐसी ही कहानी है जिसने मुझे बहुत देर तक विचलित किया | क्यों हो जाती है एक अच्छी भली स्त्री पागल? वो पागल हो जाती है या पागल करार दे दी जाती है | शायद  आशा , प्रेम सम्मान जब सब किसी स्त्री से छीन लिए जाते हैं तो वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है | क्या अपमान , अप्रेम की स्थिति में एक मानसिक संतुलन खोयी हुई स्त्री के भावनात्मक वलय को छूने वाले स्पर्श रेखाएं नाउम्मीदी की दशा में उसी वलय  में खिची चली जाती है | सच में जीवन बहुत उलझा हुआ है और उससे भी ज्यादा उलझा हुआ है मन और उसका विज्ञान … आइये पढ़ें एक ऐसी कहानी जिसमें उलझ कर आप थोडा ठहरने को विवश होंगे |

कहानी -स्पर्श रेखाएं 


झगड़ेके बाद माँ अकसर
इस मंदिर आया करतीं|घंटे, दो घंटे में जब मेरा गुस्सा उतर कर चिन्ता का रूप धारण
करने लगता तो उन्हें घर लिवाने मैं यहीं इसी मंदिर आती|


एक-एक कर मैं प्रत्येक
रुकाव एवं ठहराव पर जाती| प्रसाद की परची कटवा रहीं, प्रसाद का दोना सम्भाल रही,
माथा टेक रही, चरणामृतले रही, बंट रहे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ा रही, सरोवर की
मछलियों को प्रसाद खिला रही, स्नान-घर में स्नान कर रही सभी अधेड़ स्त्रियोंको मैं
ध्यान से देखती-जोहती और दो-अढ़ाई घंटों में माँ का पता लगाने में सफल हो ही जाती|

मगर उस दिन मंदिर के
मुख्य द्वार की ड्योढ़ी पर पाँव धरते ही मैं ने जान लिया सरोवर के जिस परिसर पर भीड़
जमा रही, माँवहीं थीं|

“क्या कोई हादसा हो
गया?” परिक्रमा से लौट रही एक दर्शनार्थी से मैंने पूछा|
“हाँ, बेचारी एक
बुढ़िया यहाँ मरने आयी थी| स्नान के बहाने डूब जाना चाहती थी मगर लोगबाग ने समय
रहते शोर मचा दिया और यहाँ के सेवादारों ने उसे गहरे में जाने से रोक लिया…..”


लोगों की भीड़ को
चीरना मेरे लिए कठिन न रहा| अवश्य ही मेरी चाल व ताक कूतना उनके लिए सुगम रहा
होगा|

“यह मेरी माँ हैं,”
संगमरमर के चकमक फर्श पर माँ पेट के बल लेटी थीं| उनकीसलवार कमीज़ उनकी देह के संग
चिपकी थी|

“जब यह दूसरे जोड़े
के बिना हमारे स्नानघर में दाख़िल हुईं, मैंने तभी जान लिया था, ज़रूर कुछ गड़बड़
है…..” सम्भ्रान्त एक अधेड़ महिला ने मेरा कन्धा थाम लिया|

“घर में क्या बहू से
झगड़ा हुआ?” एक वृद्धा की आँखों से आँसू ढुलक लिए|
“आपके पिता कहाँ
हैं?” एक युवक ने उत्साह दिखाया, “मैं उन्हें खबर करता हूँ| आप अकेली इन्हें कहाँ
सम्भाल पाएंगी?”
“गुड आफ़्टर नून, मै’म,”
भीड़ के एक परिचित चेहरे ने मेरी ओर हाथ हिलाया, “मैं अपनी कार से आयी हूँ| आप
दोनों को आपके घर पहुँचा आऊँगी…..”
“थैन्क यू,”मैंने
उसका सहयोग स्वीकारा|
“क्या किसी कॉलेज
में पढ़ाती हो?” पहली वाली सम्भ्रान्त महिला ने मुझ से पूछा|
“हाँ,” मैंने सिर
हिलाया, “यह लड़की मेरी छात्रा है|”
“नौकरी-पेशा हो कर
इतनी नासमझी दिखाई,” सम्भ्रान्त महिला ने मुझे फटकारा, “और माँ के लिए यह नौबत ले
आयी|”


“तुम्हारा पागलपन बढ़
रहा है, माँ,” शाम को जब माँ मुझे बात सहने लायक दिखायी दीं तो मैं ने उनकी खबर ली,
“आज फिर डॉक्टर के पास तुम्हें ले कर जाना पड़ेगा…..”
“मैं पागल नहीं हूँ,”
माँ रोने लगीं, “बस, अब और जीना नहीं चाहती…..”
“इसीलिए तो डॉक्टर
के पास जाना ज़रूरी है,” मैं कठोर हो ली|
“मैं वहां न जाऊंगी,”
माँ व्यग्र हुईं| बिजली के संघात उस डॉक्टर की चिकित्सा-प्रक्रिया के अभिन्न अंग
रहे और माँ वहां जाने से बहुत घबरातीं|

“आप ऐसे नहीं
मानेंगी तो फिर मजबूर हो कर मुझे आपको वहां दाखिल करवाना पड़ेगा,” मुझे माँ पर बहुत
गुस्सा आया|

“यह दुख तो नहीं ही
झेला जाएगा,” माँ गहरे उन्माद में चली गयीं; कभीअपने बाल नोचतीं तो कभी अपने कपड़े
फाड़ने का प्रयास करतीं, “पुराने दुख कट गए थे कि आगे सुख मिलने वाला है, मगर इस
बार तो कहीं उम्मीद की लकीर भी दिखाई नहीं दे रही…..”

“यह दवा खा लो, माँ,”
मैं ने डॉक्टर की बतायी दवा माँ के मुँहमें जबरन ठूंस देनी चाही|

माँ ने दवा मेरे
मुँह पर थूक दी और मेरा हाथ इतने ज़ोर से दबाया कि न चाहते हुए भी मेरी चीख निकल
ली|
चीख सुन कर मकान मालकिन
दौड़ी आयीं|
अस्पताल से एम्बुलेंस
उन्हीं ने मंगवायी|

कहानी -स्पर्श रेखाएं


माँ और मेरे बीच
रिश्ता तब तक ही ठीक रहा, जब तक मैं अपने पिता के घर पर अपनी पढ़ाई पूरी करती रही|
“तेरी नौकरी की
उम्मीद पर जी रही हूँ,” उन पन्द्रह वर्षों के दौरान माँ मुझे जब-जब मिलीं, मुझे
अपने सीने से लगा कर अपना एक ही सपना मेरी आँखों में उतारती रही, “तेरी नौकरी लगते
ही हम दोनों अपने अपने नरक से निकल लेंगी|”

हमारे साथ अजीब बीती
थी|असहाय अपनी विधवा माँ तथा स्वार्थी अपने तीन भाइयों के हाथों कच्ची उम्र में ही
माँ जब तंगहाल मेरे पिता के संग ब्याह दी गयी थीं तो उधर अपनी महत्वाकांक्षा के
अन्तर्गत मेरे पिता बीस वर्ष की अपनी उस उम्र में मिली अपनी स्कूल क्लर्की से असन्तुष्ट
रहने की वजहसे अपने लिए कॉलेज लेक्चरर की नौकरी जुटाने में प्रयासरत थे|


घोर संघर्ष वविकट
कृपणता का वह तेरह-वर्षीय परख-काल माँ के लिए किसी बल-परीक्षा से कम न रहा था|किन्तुसीढ़ी
हाथ लगते ही मेरे पिता को माँ बेमेल लगने लगी थीं|
माँ को उन्होंने फिर
ज़्यादा देर भ्रम में न रखा| उसी वर्ष अपने कॉलेज में पढ़ाने आयी एक नयी लेक्चरर से
अपनी शादी रचा ली और माँ को अपनी विपत्ति काटने के लिए नानी के पास भेज दिया| बढ़
रही माँ की बड़बड़ाहटों का हवाला दे कर|

हरजाने की एवज़ में
माँ ने मेरे पिता से मेरी पढ़ाई का बीड़ा उठाने की मांग रखी थी|जानती रही थीं उनके
गरीब मायके पर मेरी पढ़ाई अधूरी रह जाती जब कि मेरे पिता के घर पर एक साथ दो बड़ी
तनख्वाहों के आने से मेरी पढ़ाई सही ही नहीं, बल्कि उत्तम दिशा में आगे बढ़ने
कीसम्भावना रखती थी|
किन्तु माँ का और
मेरा सपना पूरा क्या हुआ, हम दोनों पर मानो एक साथ फिर पहाड़ टूटा|
शुरू के तीन-चार
महीने ज़रूर चुटकी में निकल लिए थे| तैंतालीस वर्ष में बुढ़ा आयी माँ को ब्यूटी पार्लर,
हेल्थ सेन्टर व बुटीक के बल पर स्वरुप देने में सफल रही थी और माँ स्वयं भी अति
प्रसन्न थीं|
हमारी भाव समाधि टूटी
राखी के दिन|

“अपने भाइयों को
राखी नहीं बांधोगी?” मेरेपिता अपने दूसरे परिवार के साथ उसदिन हमारे घर पर आ टपके|
“क्यों नहीं?” मैं
खिसिया गयी|

जब से नौकरी के
सिलसिले में मैंने अपना शहर बदला था, अपने पिता के साथ मेरा सम्पर्क टूट गया था|मेरे
कॉलेज के पते पर उन्होंने मेरे नाम दो पत्र भेजे भी थे, किन्तु मैंने उन्हें
निरुत्तर रहने दिया था|

“आप हमें बहुत याद आती
हो, जीजी,” बड़े ने मेरा दुपट्टा खींचा| वह बहुत नटखट था, अपने उस चौदहवें वर्ष
में|
“हाँ, बेटी,” मेरे
पिता की आँखों के कोर भीगे|

जब तक मैं उधर रही,
मेरे पिता ने अपने स्नेह-वृत्त के भीतर अपने दूसरे परिवार ही को रखा था, मुझे कभी
नहीं| मैं सदैव एक स्पर्श-रेखा सी वृत्त के बाहर ही रहती रही थी,किन्तु उस दिन पिता
की भर आयी आँखें देख कर मेरा दिल पसीज गया और मैं रोने लगी|
“चल, बस कर,” मेरी
सौतेली माँ मेरे साथ सदैव औपचारिक व संयत व्यवहारही प्रयोग में लाती थी, “ले, तेरे
लिए यह कपड़े और मिठाई लाए हैं|”

“आप भी हमें कुछ दोगी,
जीजी?” दस-वर्षीय छोटा लाड़ से मेरी बांह पर झूल गया|
“हाँ, हाँ, क्यों
नहीं?” उस दिन महीने की दो तारीख थी और मेरी एक पूरी तनख्वाह मेरे पर्स में ज्यों
की त्यों धरी थी, “तुम जो कहोगे मैं सब ले दूँगी…..”
“इन्हें बाज़ार कहाँ ले
जाती फिरोगी?” सौतेली माँ ने मुझे टोक दिया, “आज हमें लौटना भी तो है| तुम मुझे
कैश दे देना| इन्हें मैं उधर से इन का मनपसन्द सामान दिला दूँगी…..”
अपने पर्स से मैं
पांच हज़ार रुपए तत्काल निकाल लायी|

“तुम्हें एक महीने
में कितने रुपए मिलते हैं जीजी?” बड़े ने फिर मेरा दुपट्टा खींचा|
जभी अपने कमरे में
छिपी बैठी माँ की बड़बड़ाहटबाहरचली आयी, “इधर मैंने सुखचखा नहीं कि ये अपना हक जताने
चले आए| तेरी पढ़ाई की खातिर भूख काटी मैंने, बेआरामी सही मैंने, और मलाई चाटने आ
धमके ये सौतेले!”

“अपनी माँ को तू
अपने पास रखे है क्या?” मेरे पिता ने चौंक कर पूछा|

“जी,” मैंहड़बड़ा
गयी|
“उसे पास रखे हो तो
पागलखाने के किसी डॉक्टर का टेलीफ़ोन नम्बर भी पास रखे रहो| न मालूम कब वह पगलैट
बेकाबू हो कर तुम्हें ही कोई नुकसान पहुँचा दे!” मेरे पिता ने चिन्ता जतलायी|
“नहीं, नहीं, वह ठीक
हैं,” जब से माँ मेरे पास आन ठहरी थीं, मुझे उन से कोई शिकायत नहीं रही थी|

“वह छोड़िए,” सौतेली
माँ बाथरूम के बहाने मुझे अकेले में ले गयीं, “मुझे ज़रा उधर जाना है…..”
“पीले बंगले वाला
त्रिलोक अकसर घर पर आता है,” वह मेरे कान में फुसफुसायीं, “लगता है तुम से शादी
करने पर ही दम लेगा…..”
“ऐसी तो कोई बात न
रही…..” त्रिलोक एम. ए. में मेरासहपाठी रह चुका था और उसकी धनाढ्यता के चर्चे सुनने
में आते रहते थे|
“पर शादी तो तू
करेगी ही न! और फिर हम तेरी शादी की न सोचेंगे तो कौन सोचेगा? त्रिलोक में बुराई
तो कोई है नहीं|अपनी जात-बिरादरी का है, पैसे वाला है, रोबदार है, और हमें क्या
चाहिए?तू कहे तो तेरे पापा जी से कह कर बात चलाऊँ?”
“ठीक है,” मैंने
अपनी सहमति दे दी|
“बढ़िया,” सौतेली माँ
ने ताली बजा दी| जब भी वह उल्लासित होती, अपनी हीं-हीं के साथ ताली ज़रूर बजाती|


“वे पांच हज़ार तू
मंदिर चढ़ा आती, उन्हें क्यों दिए?” उनलोगों के जाते ही माँ चीख पड़ीं, “वे तेरे सगे
कभी नहीं हो सकते| मैं उन्हें जानती हूँ, तुम नहीं…..”
“वे इतने बुरे नहीं
हैं,” मैं माँ पर पहली बार बरसी, “आखिर मेरी पढ़ाई पर पैसा तो उन्हीं का लगा| बदले
में अगर थोड़ा-बहुत उनके बच्चों को दे भी दिया तो क्या हुआ? रोज़ तो वह आएँगे नहीं…..”
“मुँह में खून लग
जाए तो आदमी दोबारा शिकार करने ज़रूर आता है| देख लेना तुझे चूना लगाने वे जल्दी ही
आएँगे…..”
माँ का अनुमान सही
निकला| अगले महीने की चार तारीख को मेरी सौतेली माँ अपने दोनों लड़कों के साथ फिर
मेरे घर आ पहुँची|

“इस बार त्रिलोक
तुझे पूछने आया तो तेरे पापाजी ने उसे अन्दर बुला लिया| उम्दा चाय-नाश्ता कराया|
लगता है दो तीन मुलाकातें और हुईं नहीं कि बात पक्की बनी नहीं,” सौतेली माँ ने
मेरी पीठ थपथपायी|
दोनोंलड़कों ने उस
बार भी मेरे साथ बहुत लाड़-मनुहार दिखाया और मेरे पांच हज़ार फिर उनकी भेंट चढ़ गए|
तीसरी बार सौतेली
माँ अकेली आयीं, “बहन की शादी के इस कार्ड के साथ त्रिलोक ने तेरे लिए यह मिठाई भी
भेजी है| बोला, उसे शादी में ज़रूर आना है, वरना मेरा दिल टूट जाएगा|”
मगर जैसे ही सौतेली
माँ गेट से बाहर हुईं माँ ने कार्ड फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया और मिठाई का
डिब्बा खोले बगैर मकान-मालकिन को सौंप दिया, “उस शहर से तेरे जाने का मकसद अब ख़त्म
हो चुका है| उस शहर से अब हमें कोई वास्ता नहीं रखना|” उन्हें सौतेली माँ की मंशा
की भनक लग चुकी थी और वह किसी भी सूरत में मेरी शादी के लिए राज़ी होने के लिए
तैयार न थीं|
“त्रिलोक को मैं
जानती हूँ,” मैंने फटा हुआ कार्ड कूड़ेदान से उठा लिया, “वह बहुत भला लड़का है…..”
माँ ने कार्ड मेरे
हाथ से छीना और उसके छोटे छोटे टुकड़े कर डाले, “जबमैंने कह दिया हमें उस शहर से
वास्ता नहीं रखना तो बस नहीं रखना…..”
“तुम्हें वास्ता नहीं
रखना तो तुम वापस जा सकती हो|” मैं आपे से बाहर हो ली, “मगर मुझे तो उस शहर से भी
वास्ता रखना है और त्रिलोक से भी…..”
“तो मैं काहे को
यहाँ पड़ी हूँ? ऐसा ही है तो फिर मुझे भी तुझ से वास्ता नहीं रखना,” और माँ अपनी
चप्पल पहन कर इसी मंदिर की ओर लपक ली थीं|
तदनन्तर जब जब माँ
मंदिर में जा बैठतीं, माँ को मानसिक अस्पताल के डॉक्टर के पास मुझे ले जाना ही
पड़ता|
“पहले मेरे भाइयों
को सिखा-पढ़ा कर तेरे बाप ने पागलखाने में मेरी आवाजाही चालू रखी, अब तुझे भड़का कर
मुझे हमेशा के लिए पागलखानेमें फिकवा देगा,” हर बार माँ काँप-काँप जातीं|


अस्पताल में माँ के
दाखिले की सूचना मिलते ही मेरे पिता मेरी सौतेली माँ के साथ मेरे पास भागे आए|
“बहुत अच्छा किया,
बेटी,” उन्होंने मुझे शाबाशी दी, “समय रहते उसे ठिकाने पर पहुँचा दिया वरना यह
पागल लोग तो खून-खराबे पर उतर आते हैं…..”
सौतेली माँ को जब
मैंने लगातार मुझसे अपनी आँखें चुराते हुए देखा तो मैं उन्हें ओट में ले गयी|
“बात क्या है?”
मैंने पूछा, “इस बार आपने उधर का कोई समाचार नहीं दिया?”

कहानी -स्पर्श रेखाएं


“क्या बताऊँ?”
सौतेली माँ मेरी पीठ थपथपाने लगीं, “जब से त्रिलोक की माँ को तुम्हारी माँ के
पागलपन की खबर लगी है, वह डर गयी है| लगता है यह रिश्ता अब हाथ से निकल जाएगा|”
“मगर उन लोगों को
माँ के बारे में बताने की क्या ज़रुरत थी?” मैंने अपना एतराज़ जतलाया, “माँ हमेशा के
लिए थोड़े न पागलखाने गयी हैं| ठीक होकर जल्दी ही लौट आएंगी|”
“तू अभी बच्ची है|
नहीं जानती, पागल कभी ठीक नहीं होते| जहाँ उन्हें किसी की बात मन-माफ़िक नहीं लगती,
वहीं उनका पागलपन फिर अपना सिर उठा लेता है…..”
“ऐसे में तो भेद
बनाए रखना और भी ज़रूरी था,” मैं क्षुब्ध हो ली|

“क्या बताऊँ?”
सौतेली माँ ने मेरी पीठ फिर थपथपा दी, “ऐसे भेद छिपाए नहीं छिपते| पागलपन की
बीमारी ही ऐसी कमबख्त बीमारी है….. जब माँ को लगती है तो फिर यक़ीनन उसके बच्चों
पर भी अपनी बारी बाँध लेती है| कल को उधर अपनी ससुराल मेंकिसी बात केमन-माफ़िक न
रहने पर कहीं यह बीमारी तुझे धर लेती तो वे लोग तो मुझी को दोष देते| कहते, मैंने
उन्हें अँधेरे में रखा…..”


उसी रात सौतेली माँ
का वहम अमल में आया| हूबहू माँ की तरह मैंने पहले अपने बाल नोचे, फिरअपने कपड़े
फाड़े और उसके बाद दीवार से सिर टकरा कर देर तक चिल्लायी, “यह दुख सहना मुश्किल है|
पिछले दुख इस उम्मीद पर कट गए थे कि आगे सुख आने वाले हैं, मगर इस बार कोई उम्मीद
नहीं…..”

कहानी -स्पर्श रेखाएं


मेरे लिए भी माँ के
अस्पताल से एम्बुलेंस मेरी मकान-मालकिन ही ने मँगवायी|

लेखिका -दीपक शर्मा
निकट -मई -अगस्त २०१६ में प्रकाशित

                                               

लेखिका -दीपक शर्मा

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