अटूट बंधन अंक -११ सम्पादकीय ….बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ
बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ …. कलरव करते हैं,पंक्षी रंभाती हैं गाय दहाड़ते है शेर मिमियाते हैं …
बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ …. कलरव करते हैं,पंक्षी रंभाती हैं गाय दहाड़ते है शेर मिमियाते हैं …
कुछ खौफनाक जंजीरे जो दिखती नहीं हैं पहना दी जाती हैं अपनों द्वारा इस चतुराई से कि मासूम कैदी स्वयं …
माँ और पिता हमारी जड़ें हैं और उनसे निर्मित रिश्ते गहरी जड़ें जड़ों की मजबूती से हम हैं हमारा ख्याल …
जंगल में रहने वाले मानव ने जिस दौर में आग जलाना सीखा , पत्थरों को नुकीला कर हथियार बनाना सीखा …
नाम की बड़ी महिमा है, नाम पहचान है, ज़िन्दगी भर साथ रहता है। लोग शर्त तक लगा लेते हैं कि …
समझौता “आज फिर वही साड़ी ! कितनी बार कहा है तुम्हें..इस साड़ी को मत पहना करो ! तुम्हें समझ नहीं …
क्या आपने कभी सोचा है की हँसते -बोलते ,खाते -पीते भी हमें महसूस होता है टनो बोझ अपने सर पर। …
बाजरबाद की घुसपैठ ने लोगों को अपना कैदी बना लिया है,जिसमें लोग खुद को भी अनदेखा करने लगे है। आज …
नशा कभी बाएं कभी दायें डोलती सी तेज गति से आती अनियंत्रित गाड़ी मोड पर पलट गई. भीड़ जमा हो …