शांति से ओत -प्रोत नारी युग के आगमन की शुरुआत हो चुकी है







डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल:-
संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रतिवर्ष 8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का उद्देष्य विष्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रषंसा और प्यार प्रकट करते हुए इस दिन को महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। आज विज्ञान, अंतरिक्ष, खेल, साहित्य, चिकित्सा, षिक्षा, राजनीति, समाज सेवा, बैंकिंग, उद्योग, प्रषासन, सिनेमा आदि ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं हैं जहाँ महिलाओं ने अपना वर्चस्व न कायम किया हो। वास्तव में आज विष्व समाज में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक हिस्सेदारी पहले से काफी बढ़ गई है। महिलाओं ने महत्वपूर्ण व असरदार भूमिकाएँ निभा कर न सिर्फ पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा है, बल्कि पुरूष प्रधान समाज का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया है। लेकिन इसके साथ ही साथ आज समाज में आज चारों तरफ लड़कियों तथा महिलाओं पर घरेलू हिंसा, रेप, बलात्कार, भू्रण हत्याऐं आदि की घटनायें भी लगातार बढ़ती ही जा रहीं हैं।


(2) जब तक देश में स्त्रियां सुरक्षित नहीं होगी तब तक परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है:-
महिलाओं तथा छोटी बच्चियों पर होने वाले भेदभाव, शोषण एवं अत्याचार से विचलित होकर किसी ने कहा है कि विश्व में गर बेटियाँ अपमानित हैं और नाशाद हैं तो दिल पर रखकर हाथ कहिये कि क्या विश्व खुशहाल है? किसी ने नारी पीड़ा को इन शब्दों में व्यक्त किया है – बोझ बस काम का होता, तो शायद हंस के सह लेती ये तो भेदभाव है, जिसे तुम काम कहते हो। वास्तव में अपने जन्म के पहले से ही अपने अस्तित्व की लड़ाई को लड़ती हुई बेटियां इस धरती पर जन्म लेने के बाद भी अपनी सारी जिंदगी संघर्षों एवं मुश्किलों से सामना करते हुए समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाती जा रही हैं। लेकिन बड़े दुःख की बात है कि घर, परिवार की जिम्मेदारियों से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी कामयाबी का झंडा फहराने वाली इन बेटियों को समाज में अभी भी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। जबकि महर्षि दयानंद ने कहा था कि ‘‘जब तक देश में स्त्रियां सुरक्षित नहीं होगी और उन्हें, उनके गौरवपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं किया जायेगा, तब तक समाज, परिवार और राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है।’’ इस प्रकार राष्ट्र का निर्माण मातृषक्ति करती है, माँ ही परिवार, समाज और राष्ट्र को संस्कारित करती है। राष्ट्र की गुणवत्ता का आधार नागरिकों की चारित्रिक गुणवत्ता है, जिसकी निर्मात्री केवल मातृषक्ति है।
(3) जिस घर में नारी का सम्मान होता है वहाॅ देवता वास करते हंै:-
वह मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री भी है। ‘मनुस्मृति’ में लिखा है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवतः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।। (मनुस्मृति,3/56) अर्थात् ”जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वहाँ सब कार्य निष्फल होते हैं। वाल्मीकि जी ने ‘रामायण’ में कहा है ”जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् ”जननी और जन्म-भूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।” महाभारत में श्री विदुर जी ने कहा है ”घर को उज्जवल करने वाली और पवित्र आचरण वाली महाभाग्यवती स्त्रियाँ पूजा (सत्कार) करने योग्य हैं, क्योंकि वे घर की लक्ष्मी कही गई हैं, अतः उनकी विशेष रूप से रक्षा करें।” (महाभारत, 38/11)। नये युग का सन्देश लेकर आयी 21वीं सदी नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की है। मेरा विश्वास है कि नारी के नये युग की शुरूआत हो चुकी है।
(4) नारी के सम्मान में एक प्रेरणादायी गीत इस प्रकार है:-
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हंै विश्वास तुम्हारे।।
कभी मीरा, कभी उर्मिला, लक्ष्मी बाई, कभी पन्ना, कभी अहिल्या, पुतली बाई।
अपने बलिदानों से, इतिहास रचा रे।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हंै विश्वास तुम्हारे।।
अबला नहीं, बला सी ताकत रूप भवानी, पहचानो अपनी अद्भुत क्षमता हे कल्याणी।
बढ़ो बना दो, विश्व एक परिवार सगा रे।।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे। धैर्य, दया, ममता बल हंै विश्वास तुम्हारे।
महिला हो तुम, मही हिला दो, सहो न शोषण, अत्याचार न होने दो, दुष्टांे का पोषण।
अन्यायी अन्याय मिटा दो, चला दुधारे।।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।।
(5) अगर धरती पर कहीं जन्नत है तो वह माँ के कदमों में है:-
महिला का स्वरूप माँ का हो या बहन का, पत्नी का स्वरूप हो या बेटी का। महिला के चारांे स्वरूप ही पुरूष को सम्बल प्रदान करते हैं। पुरूष को पूर्णता का दर्जा प्रदान करने के लिए महिला के इन चारों स्वरूपों का सम्बल आवश्यक है। इतनी सबल व सशक्त महिला को अबला कहना नारी जाति का अपमान है। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालायित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा है कि अगर धरती पर कहीं जन्ऩत है तो वह माँ के कदमों में है। हमारा मानना है कि एक माँ के रूप में नारी का हृदय बहुत कोमल होता है। वह सभी की खुशहाली तथा सुरक्षित जीवन की कामना करती है। ‘महिला’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘मही’ (पृथ्वी) को हिला देने वाली महिला। विश्व की वर्तमान उथल-पुथल शान्ति से ओतप्रोत नारी युग के आगमन के पूर्व की बैचेनी है।
(6) माँ, बहिन, पत्नी तथा बेटी को हृदय से पूरा सम्मान देकर ही विश्व को बचाया जा सकता है:-
मेरा मानना है कि अनेक महापुरूषों के निर्माण में नारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान रहा है। कहीं नारी प्रेरणा-स्रोत तथा कहीं निरन्तर आगे बढ़ने की शक्ति रही है। प्राचीन काल से ही नारी का महत्व स्वीकार किया गया है। नये युग का सन्देश लेकर आयी 21वीं सदी नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की है। जगत गुरू भारत से नारी के नये युग की शुरूआत हो चुकी है। आज बेटियां फौज से लेकर अन्तरिक्ष तक पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। स्वयं मुझे भी मेरी बेटी गीता, जो कि मेरी आध्यात्मिक माँ भी है, ने शिक्षा के माध्यम से ही मुझे बच्चों के निर्माण के लिए प्रेरित किया। आज मैं बच्चों की शिक्षा के माध्यम से जो थोड़ी बहुत समाज की सेवा कर पा रहा हूँ उसके पीछे मेरी पत्नी डा0 (श्रीमती) भारती गांधी एवं मेरी बेटी गीता का बहुत बड़ा योगदान है।
(7) अवतारों को जन्म देने वाली मातायें सदैव अमर रहेंगी:-
वे नारियाँ कितनी महान, पूज्यनीया तथा सौभाग्यशाली थी जिन्होंने राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, अब्राहीम, मूसा, जरस्थु, ईशु, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि जैसे अवतारों तथा संसार के महापुरूषों को जन्म दिया। प्रभु कृपा से युग-युग में धरती पर मानव जाति का कल्याण करने आये अवतारों ने मर्यादा, न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, अहिंसा, हृदयों की एकता आदि जैसे महान विचारों को अपनाने की शिक्षा समाज को देने हेतु धर्मशास्त्रों गीता, कुरान, बाईबिल, गुरू ग्रन्थ साहिब, त्रिपटक, किताबे अकदस, किताबे अजावेस्ता का ज्ञान दिया। धन्य है तुलसीदास जी की माँ जिन्होंने इस महान आत्मा को जन्म दिया। तुलसीदास जी ने अपनी आत्मा के सुख के लिए रामायण जैसी पुस्तक लिख डाली। रामायण जैसी पुस्तक बिना परमात्मा के अहैतुकी कृपा के लिखा जाना संभव नहीं था। कबीरजी जुलाहे के घर में पले-बढ़े और इतने महान बन गये। क्या बिना माँ के आशीर्वाद के यह सम्भव है?
(8) सृष्टि के आंरभ से नारी अनंत गुणों की भण्डार रही है:-
सतयुग की बेला में जागने की शुरूआत हमें हर बच्चे को धरती का प्रकाश बनाने के विचार को हृदय से स्वीकार करके, अब एक पल की देर किये बिना, कर देनी चाहिए। एक बालिका को शिक्षित करने के मायने है पूरे परिवार को शिक्षित करना। सृष्टि के आंरभ से ही नारी अनंत गुणों की भण्डार रही है। पृथ्वी जैसी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र जैसी गंभीरता, चंद्रमा जैसी शीतलता, पर्वतों जैसा मानसिक उच्चता हमें एक साथ नारी हृदय में दृष्टिगोचर होती है। वह दया, करूणा, ममता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है और समय पड़ने पर प्रचंड चंडी का भी रूप धारण कर सकती है। वह मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री भी है। नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। नर और नारी पक्षी के दो पंखों के समान हैं। दोनों पंखों के मजबूत होने से ही पक्षी आसमान में ऊँची उड़ान भर सकता है।
(9) 21वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है:-
विश्व की आधी आबादी महिलाएं विश्व की रीढ़ हैं। सारे विश्व में आज महिलायें विज्ञान, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, न्याय, मीडिया, राजनीति, अन्तरिक्ष, खेल, उद्योग, प्रबन्धन, कृषि, भूगर्भ विज्ञान, समाज सेवा, आध्यात्म, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीकी, बैंकिग, सुरक्षा आदि सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों का बड़े ही बेहतर तथा योजनाबद्ध ढंग से नेतृत्व तथा निर्णय लेने की क्षमता से युक्त पदों पर आसीन हैं। इस प्रकार 21वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है। इसलिए हम यह पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि एक माँ शिक्षित या अशिक्षित हो सकती है, परन्तु वह एक अच्छी शिक्षक है जिससे बेहतर स्नेह और देखभाल करने का पाठ और किसी से नहीं सीखा जा सकता है। नारी के नेतृत्व में दुनिया से युद्धों की समाप्ति हो जायेगी। क्योंकि किसी भी महिला का कोमल हृदय एवं संवेदना युद्ध में एक-दूसरे का खून बहाने के पक्ष में कभी नही होता है। हमारा मानना है कि महिलायें ही एक युद्धरहित एवं न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का गठन करेंगी। इसके लिए विश्व भर के पुरूष वर्ग के समर्थन एवं सहयोग का भी वसुधा को कुटुम्ब बनाने के अभियान में सर्वाधिक श्रेय होगा।

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