उन्होंने गाँव में घूम –घूम कर प्रवचन देना शुरू किया | तभी एक स्त्री उनके पास आई
और बोली महात्मन मैं जानना चाहती हूँ कि आप ने इतनी युवावस्था में संन्यास क्यों
लिया|
रोग लगेंगे , वृद्धवस्था आएगी और एक दिन इस नाशवान शरीर का अंत भी होगा| जो चीज
खत्म ही होनी है उससे मोह करके उसमें आसक्ति क्यों रखी जाए | क्यों न समय रहते इस
शरीर का उपयोग ज्ञान को प्राप्त करने व् उसका प्रसार करने में किया जाए, जिसके लिए ईश्वर ने हमें भेजा है| इसी कारण मैंने सन्यास लिया|
अपने घर पर भोजन के लिए बुलाया| महात्मा बुद्ध ने सहर्ष उसका आमंत्रण स्वीकार कर
लिया| जैसे ही ये बात गाँव के लोगों को पता चली उन्होंने महात्मा बुद्ध को उसके
घर जाने से मन किया| उन्हने बुद्ध से कहा, “ आप इस गाव में नए हैं, आप नहीं जानते
वो स्त्री चरित्रहीन है | इसीलिये वो गाँव के बाहर की तरफ रहती है, गाँव वाले उससे
संपर्क भी नहीं रखते|
ताली बजा कर दिखाओं? वह व्यक्ति थोड़ी देर हवा में हाथ चलाता रहा, फिर बोला महाराज
, ये क्या अनर्थ है ? आपने मेरा एक हाथ पकड़ा हुआ है, अब एक हाथ से मैं ताली कैसे
बजाऊं?
नहीं बज सकती, तो फिर वो स्त्री अकेली ही कैसे चरित्र हीन हो सकती है? अवश्य ही इस
गाँव के पुरुष भी चरित्र हीन होंगे, पर मुझे तो कोई पुरुष अपने परिवार से दूर वहां
गाँव की सरहद पर अकेले रहते नहीं दिखा| ये
दंड केवल उस स्त्री को ही क्यों? जब मैं उन घरों में भोजन कर चुका हूँ जहाँ चरित्र
हीन पुरुष रहते हैं, तो मैं उस स्त्री के घर भी भोजन करने जाऊँगा| गाँव के लोगों
को महात्मा बुद्ध की बात समझ आगयी और वो उनके पैरों में गिर कर माफ़ी मांगने लगे|
प्रेरक कथा बुद्ध के समय की है| तब से कितना समय बदला लेकिन समाज का नजरिया अभी भी
स्त्रियों के लिए वैसा ही है| अभी भी दो व्यस्क लोगों द्वारा बनाये गए रिश्ते में
सामाजिक अवहेलना की शिकार स्त्री ही होती है| स्त्री के ऊपर चरित्रहीन का धब्बा लग
जाता है, जबकि पुरुष को ज्यादा से ज्यादा इतना कहा जाता है की वो उस स्त्री के जाल
में फंस कर बहक गया था| क्यों नहीं पुरुष को भी कहा जाता है कि वो भी चरित्रहीन
है| जब एक हाथ से ताली नहीं बज सकती तो फिर स्त्री अकेले ही चरित्र हीन कैसे हुई|
सवाल अभी भी वहीँ है , जवाब हमें ही तलाशने होंगे?
जब स्वामी विवेकानंद जी ने डायरी में लिखा , ” मैं हार गया हूँ “
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