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बदलाव

बदलाव

रज्जो धीर गंभीर मुद्रा में बैठी थी , जबकि उसके  माथे पर चिंता की लकीरे थीं | अभी थोड़ी ही देर पहले आँगन से  घर परिवार जात -बिरादरी वाले  उठ कर गए थे | हर अंगुली रज्जो के ऊपर उठी थी | रज्जो पर इलज़ाम था कि उसकी बेटी ने भाग कर शादी कर ली है | क्या -क्या नहीं कहा सबने रज्जो को | माँ ही संस्कार देती है | बाँध कर ना रख पायी लड़की को | सब कुछ जहर की तरह गटकती रही रज्जो |

अतीत का नाग उसे फिर डस रहा था | दुल्हन बन कर जब इस घर में आई थी | तब कहाँ पता था कि शराबी पति का दिल कहानी और लगा हुआ है | उसने बहुत कोशिश  की  कि वह शराब और उस लड़की को छोड़ दे | पर रज्जो के हिस्से में सिर्फ मार ही आई |  तभी तपती मन की धरती पर सावन की फुहार बन कर आई उसकी बेटी पूजा | रज्जो को यकीबन  था कि उसके लिए न सही पर पिता का दिल अपनी बेटी के लिए तो पसीजेगा | पर उसके नसीब में ये सुख कहाँ था | उसका पति दूसरी औरत को घर ले आया | उसने बेटों को जन्म दिया |  एक कहावत है माँ दूसरी तो बाप तीसरा हो जाता है | उसके साथ -साथ  उसकी बेटी पूजा भी दुर्व्यवहार का शिकार होने लगी |

पीली फराक

                एक दिन हिम्मत करके वो बेटी को ले मायके चली आई | जो हो मेहनत करके खा लेगी पर अपनी बेटी पर जुल्म नहीं होने देगी | नादान कहाँ जानती थी कि  मायका भी पराया हो गया था | भाई उसे देख त्योरियां चढ़ा कर बोला , ” भले घर की औरते ऐसे अकेले रह कर कमाँ कर नहीं खातीं | यहाँ भी रहोगी तो क्या इज्ज़त रहेगी समाज में | हमारी तो नाक कट जायेगी | मुझे अपनी बेटी का ब्याह भी करना है | जाओ  ससुराल लौट जाओ | आदमी कोई पत्थर नहीं होता है -प्यार से बात करोगी तो उसे छोड़ देगा |

निराश हो रज्जो अपने घर लौट आई | साल दर साल दर्द सहती रही पर उफ़ तक नहीं की | उसने आज भी उफ़ नहीं की थी | जानती थी , पूजा कब तक यहाँ दर्द सहती , कौन उसका ब्याह करता , वो उसकी राह पर नहीं चली जहाँ सिर्फ सहना ही लिखा होता है | विद्रोह करके निकल गयी उसके साथ जो शायद कुछ पल सुख के उसके नाम लिख दे | वो जानती थी कि पूजा लौट कर कभी नहीं आएगी | लौट के आई लड़कियों के लिए मायके दरवाजे कहाँ खुले होते हैं ? तभी भाई उसके सामने आया और क्रोध में बोला , ” कुल का नाम डुबो दिया इस लड़की ने , भाग कर शादी की वो भी एक विजातीय के साथ | अब हम क्या मुंह दिखाएँगे समाज को | अरे दिक्कत थी पालने में तो मेरे घर आ जाती | कुछ कह सुन के दो रोटी का जुगाड़ कर ही लेता यूँ नाक तो न कटने देता |

रज्जो के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कुराहट तैर गयी | भाई  का ये बदलाव अब की बार उसके लिए अप्रत्याशित नहीं था |

वंदना बाजपेयी

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